जनतंत्र में सत्याग्रह और विघ्नसंतोषी – अरुण कुमार त्रिपाठी

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Satyagraha and the Malicious Detractor in a Democracy

Arun Kumar Tripathi
जंतर मंतर के शिक्षा सत्याग्रह ने अजीब स्थिति पैदा कर दी है। यह स्थिति अन्यायी निजाम ने तो पैदा की ही, लेकिन अन्याय का विरोध करने वालों ने भी पैदा की है। कुछ लोग कह रहे हैं कि पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांचुक का आमरण अनशन वास्तव में गांधीवादी है ही नहीं। क्योंकि अपने सत्रह बार के सत्याग्रह में गांधी ने कभी कुछ पाने और सत्ता का विरोध करने के लिए अनशन किया ही नहीं। दूसरी तरफ वे लोग हैं जो हंसी मजाक में विदेश की धरती से आए काकरोच जनता पार्टी के विचार को ही अन्यायियों द्वारा प्रायोजित एक नाटक के रूप में देख रहे हैं। यह दोनों तर्क नैष्कर्म्य(कुछ न करने) की ओर ले जाते हैं इसलिए इन पर समाज में बात होनी चाहिए। लेकिन यहां एक बात जरूर कहना चाहिए कि साजिश के सिद्धांत की कल्पनाशक्ति और कुतर्कों की कोई सीमा नहीं होती इसलिए साजिश के आख्यान का एक सीमा तक ही प्रतिउत्तर दिया जा सकता है।

सबसे पहले इस बात पर विचार होना चाहिए कि सोनम वांचुक का अनशन गांधीवादी है या नहीं। इसी के साथ यह भी प्रश्न है कि क्या गांधी ने कभी सरकार के विरुद्ध कोई अनशन किया था या नहीं? पहली बात यह है कि अनशन, सत्याग्रह या सिविल नाफरमानी को महज गांधी तक सीमित करना ठीक नहीं है। इसकी एक परंपरा है मानव इतिहास में। कुछ ऐतिहासिक तथ्यों के तौर पर दिखती है तो कुछ पौराणिक कथाओं के रूप में। गांधी पौराणिक कथाओं से लेकर ऐतिहासिक प्रसंगों से समान प्रेरणा ग्रहण करते थे। गांधी ने प्रहलाद, सुकरात, ईसा मसीह, मीरा और थोरो सभी से प्रेरणाएं ग्रहण कीं। गांधी की विशेषता यह थी कि वे चीजों को उनके उच्च स्तरीय दार्शनिक अर्थों में समझते थे। न की उनके शाब्दिक अर्थों में। आज के विध्नसंतोषी प्रवक्ता(विशेष कर कांग्रेस समर्थक वौद्धिक) वैसा समझने के लिए तैयार नहीं हैं। इस स्तंभकार ने एक बार ‘वर्शिपिंग फाल्स गॉड’ के बहाने अरुण शौरी पर एक आलेख तैयार किया। उसमें प्रीतीश नंदी की टिप्पणी यह थी कि अरुण शौरी चीजों को शाब्दिक अर्थों में लेते हैं। उसका भावार्थ नहीं समझते। जैसे कि अगर कह दिया जाए कि राजा सगर के साठ हजार पुत्र थे वे उसे गिनने लगेंगे और गिन कर बताएंगे कि, नहीं उसमें तो दस कम पड़ रहा है। ऐसा ही एक बौद्धिक वर्ग सत्याग्रह की परंपरा को महज गांधी तक बांध देना चाहता है जबकि गांधी स्वयं उसे हजारों साल पुरानी परंपरा बताते हैं।

इस विषय को बौद्ध विद्वान, अर्थशास्त्री और समाजवादी चिंतक कृष्णनाथ ‘जनतंत्र और सत्याग्रह’ नामक एक पुस्तिका में बेहद खूबसूरत ढंग से स्पष्ट करते हैं। वे लिखते हैं कि प्रहलाद पुराण की परंपरा का पहला ज्ञात सत्याग्रही है। संभव है कि दूसरे देशों की पौराणिक कथाओं में कोई ऐसा निकल आए जो कालक्रम के हिसाब से प्रहलाद से पहले का साबित हो और उसे स्वीकार करने में हमें खुशी ही होगी। लेकिन यहां कालक्रम का सवाल ही नहीं उठाना चाहिए। फिर वे सुकरात का जिक्र करते हुए कहते हैं कि सुकरात ने जहर का प्याला पिया, लेकिन जीभ का निरादर न होने दिया। उन्होंने अपनी वाणी पर कोई पाबंदी नहीं मानी। ग्रीस का वह बूढ़ा सुकरात दुनिया के इतिहास का पहला ज्ञान सत्याग्रही है।

वे उन्नीसवीं सदी के दार्शनिक सत्याग्रही हेनरी डेविड थोरो के सत्याग्रह का वर्णन करते हुए कहते हैं कि अमेरिका मेक्सिको में लड़ाई लड़ रहा था। थोरो ने उस अमेरिकी सरकार को टोल टैक्स देने से इंकार किया जो गुलामी कायम रखती है और लड़ाई करती है। इसके लिए थोरो ने एक रात जेल में काटी। इसी अनुभव से निकला उसका लेख—रेजिस्टेंस टू सिविल गवर्नमेंट(1849)। जो बाद में सिविल डिसओबिडियंस के नाम से ज्यादा लोकप्रिय हुआ। थोरो से इमर्सन ने पूछा—तुम जेल में क्यों आए हो? थोरो ने इसके जवाब में सवाल किया—तुम जेल से बाहर क्यों हो? उसका तात्पर्य यह था कि जिस राज्य में एक भी आदमी अन्यायपूर्वक जेल में बंद हो उस राज में न्यायपूर्ण आदमी की न्याय संगत जगह जेल में है।

गांधी प्रहलाद से लेकर थोरो तक के तमाम सत्याग्रहियों का बार बार उल्लेख करते हैं। थोरो के लेख का तो गांधी जी ने इतनी बार उल्लेख किया कि वह मशहूर हो गया। यहां सवाल सत्याग्रह को शाब्दिक अर्थों में लेते हुए उसकी नकल करने का नहीं है। सवाल उसके भावार्थ को समझते हुए उससे प्रेरणा लेने की है। गांधी ने उन्हीं सत्याग्रहों से प्रेरणा लेते हुए अपने सत्याग्रह के हथियार की खोज की थी। लेकिन यहां यह बात गौर करने की है कि हर सत्याग्रही निजी ज्ञान, प्रतिबद्धता, क्षमता औऱ परिस्थितियों के लिहाज से अपने सत्याग्रह की खोज स्वयं करता है।

यह एक सतत होने वाला नवीन प्रयोग है न कि नकल जैसी पुनरावृत्ति। सभी कुछ जानते हुए गांधी ने अपने सत्याग्रह की खोज 11 सितंबर 1906 को ट्रांसवाल में काले कानूनों के विरुद्ध एक सभा में तब किया जब एक मुस्लिम भाई ने कहा कि हम अल्लाह के नाम पर इन कानूनों का विरोध करेंगे और कोई भी कष्ट उठाने के लिए तैयार हैं।

रही सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह की बात तो यह कहना तथ्यात्मक रूप से ठीक नहीं है कि गांधी ने ऐसा नहीं किया। गांधी ने जब सितंबर 1932 में दोहरी मतदान प्रणाली के कम्युनल अवार्ड के विरुद्ध येरवदा जेल में अनशन(20 से 24 सितंबर तक) किया और जिस पर प्यारेलाल जी ने ‘द इपिक फास्ट’ जैसी मशहूर पुस्तक लिखी। उसका निशाना कौन था? इसकी व्याख्या करते हुए राजमोहन गांधी लिखते हैं कि उसके निशाने पर तीन शक्तियां थीं। एक शक्ति भारतीय समाज की वह वर्ण व्यवस्था थी जो छुआछूत पर टिकी थी। दूसरी शक्ति के तौर पर वह ब्रिटिश साम्राज्य था जो हिंदू समाज को बांटने पर तुला हुआ था और गांधी इसमें हिंदू समाज का हित नहीं देखते थे। तीसरी शक्ति डॉ आंबेडकर थे जो इस बात की जिद पकड़े थे कि अनुसूचित जाति के लोगों को कल्याण इसी में है चाहे गांधी की जान चली जाए। गांधी के इस अनशन(सत्याग्रह) पर पूरी दुनिया में बेचैनी थी। उसी सबका प्रभाव था कि जेल की चाहरदीवारी के भीतर से गांधी ने तीनों मोर्चों पर कामयाबी हासिल की। गांधी की जान बचाने को डॉ आंबेडकर राजी हुए, परिणामस्वरूप पूना समझौता हुआ, ब्रिटिश सरकार ने कम्युनल अवार्ड वापस लिया और हिंदू समाज अपनी छुआछूत पर लज्जित होते हुए उसे मिटाने में लग गया। 1932 वाला अनशन तो छोटा था लेकिन गांधी ने दूसरा अनशन 1943 में 21 दिन का किया क्योंकि अंग्रेज सरकार ने भारत छोड़ो आंदोलन के बाद उत्पन्न हिंसा की जिम्मेदारी कांग्रेस पर डाल दी थी। उसके विरुद्ध गांधी ने अनशन किया और कहा कि हिंसा की जिम्मेदारी अंग्रेज सरकार की है।

लेकिन इन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आजकल सत्याग्रह असरदार क्यों नहीं हो रहा है। तमाम लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया है कि वो अंग्रेजों का जमाना था जो कि संघ परिवार से अधिक सभ्य थे इसलिए उन्होंने गांधी के सत्याग्रह पर ध्यान दिया। आज की सरकार अधिक क्रूर है। इसलिए उस पर किसी सत्याग्रह का असर नहीं होगा। ऐसे लोग क्रूर शक्तियों का गुस्सा और उनके कठोर कदमों की ओर ध्यान नहीं देते। वास्तव में इतिहास का नियम यह है कि जो जितना बड़ा अहिंसक हुआ है उसने सामने वाले अन्यायी में उतना ही बड़ा क्रोध पैदा किया है। प्रहलाद ने हिरण्यकश्यप में , बुद्ध ने देवदत्त में, सुकरात ने एटिनस में, ईसा ने यरुशलम के पुजारियों में, थोरो ने अमेरिकी गोरों में गांधी ने गोडसे में जबरदस्त क्रोध पैदा किया। वह ऐसा था कि सत्याग्रही की जान लेने से कम पर राजी नहीं था। इस लिहाज से भगत सिंह भी ‘सत्याग्रह’ ही कर रहे थे और ब्रिटिश सरकार ने उन्हें मृत्यु से कुछ कम देकर संतुष्ट हो नहीं सकती थी। क्योंकि भगत सिंह ने न तो अपनी जान बचाने की कोशिश की और न ही जेल से बाहर आने की।

वास्तव में जंतर मंतर की सिविलनाफरमानी(सत्याग्रह) को गैर-गांधीवादी बताने और सत्याग्रह की श्रेणी से बाहर रखने वाले एक किस्म के विघ्नसंतोषी हैं। उनका लक्ष्य निष्कर्म्य(कुछ न करने का) है। उनका यह तर्क समझ से परे है कि यह आंदोलन कांग्रेस पार्टी और उसकी जमीन छीनने के लिए है। वास्तव में यह अन्यायी की जमीन छीनने के लिए है और कांग्रेस पार्टी इस आंदोलन को अपने से क्यों नहीं जोड़ सकती या इससे खुद क्यों नहीं जुड़ सकती? या कांग्रेस और यह दोनों आंदोलन साथ साथ क्यों नहीं चल सकते? जीन शार्प, रिचर्ड ग्रेग, ग्लेन डी पेज, जोहान गाल्तुंग जैसे तमाम विदेशी विद्वानों ने गहरे शोध से यह प्रमाणित किया है कि हिंसा, अन्याय और युद्ध के विरोध में मानव व्यक्तिगत रूप से और सामूहिक रूप से सदियों से सक्रिय है। अभी सत्याग्रह का सामूहिक रूप विकसित नहीं हुआ है इसलिए वह व्यक्तिगत रूप से ज्यादा असरदार होता रहा है और सामूहिक रूप विकसित होने तक उसे मुअत्तल करने का सुझाव ठीक नहीं है। दुनिया के तमाम देशों में उसका प्रभाव रहा है। इसलिए भारत में कुछ विघ्नसंतोषियों के कुतर्क के चलते यह मान लेने का कोई कारण नहीं है कि वह सफल नहीं होगा।


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