तर्क, विज्ञान और मिथक – परिचय दास

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Logic, Science and Myth

 

Parichay Das

।। एक।।

र्क, विज्ञान और मिथक तीन ऐसे ज्ञान-क्षेत्र हैं, जिन्हें अक्सर एक-दूसरे का विरोधी मान लिया जाता है। तर्क को विवेक का पर्याय, विज्ञान को प्रमाण और प्रयोग का क्षेत्र तथा मिथक को कल्पना, अंधविश्वास और अतार्किकता का पर्याय समझ लिया जाता है। लेकिन मनुष्य की ज्ञान-यात्रा इतनी सरल और सीधी रेखा में नहीं चलती। मनुष्य ने संसार को समझने के लिए कभी मिथक रचे, कभी तर्क का सहारा लिया और कभी विज्ञान की प्रयोगशाला में जाकर अपने प्रश्नों की जाँच की। ये तीनों मनुष्य की उसी जिज्ञासा के अलग-अलग रूप हैं, जो अज्ञात को ज्ञात करने की बेचैनी से पैदा होती है।

मिथ को केवल झूठी, काल्पनिक या अवैज्ञानिक कथा मानना उसके अर्थ को बहुत छोटा कर देना है। मनुष्य ने जब पहली बार अँधेरे आकाश की ओर देखा होगा और तारों को चमकते पाया होगा, तब उसके पास न दूरबीन थी, न खगोलीय गणना, न कोई वैज्ञानिक सूत्र। उसके पास केवल आँखें थीं, विस्मय था और प्रश्न थे। उसी विस्मय से मिथ का जन्म हुआ। मिथ, वस्तुतः, मनुष्य की उस पहली व्याख्या का नाम है जो उसने संसार को समझने के लिए अपने भीतर से निर्मित की।

‘मिथ’ का मूल अर्थ ~ कथा, आख्यान, वचन या कही गई बात। मिथ का अर्थ अनिवार्यतः झूठ या कल्पना नहीं था। वह किसी कथित, सुनाई गई या परंपरा से प्राप्त कथा के लिए प्रयुक्त होता था। गया। Mythos कथा, प्रतीक और परंपरा की भाषा बना, जबकि logos तर्क, विवेचन और प्रमाण की भाषा। मानव-चिंतन का एक बड़ा हिस्सा इसी तनाव से निर्मित हुआ: कथा बनाम तर्क, मिथ बनाम दर्शन, कल्पना बनाम प्रमाण।

मनुष्य की चेतना इतनी सुविधाजनक खाँचों में रहने को तैयार नहीं थी। वह तर्क करता रहा, पर कथाएँ भी रचता रहा। विज्ञान विकसित हुआ, पर मिथ समाप्त नहीं हुआ। देवताओं की पुरानी कथाएँ पीछे हटती गईं, लेकिन मनुष्य ने नए मिथक गढ़ लिए। आधुनिक मनुष्य ने अपने को मिथक-विरोधी घोषित किया, फिर राष्ट्र, प्रगति, बाजार, सफलता और तकनीक के बारे में ऐसी सामूहिक कथाएँ रच लीं, जिन पर वह उतने ही विश्वास से भरोसा करने लगा जितना कभी देवताओं पर किया जाता था। मनुष्य शायद कथा के बिना रह ही नहीं सकता। वह पहले देवताओं की कथा बनाता है, फिर इतिहास की, फिर राष्ट्र की, फिर अपनी निजी सफलता की। कथा बदलती है, मनुष्य की आवश्यकता नहीं।

मिथ का एक महत्त्वपूर्ण अर्थ है: वह ऐसी कथा है जो किसी संस्कृति की सामूहिक चेतना को अर्थ देती है। मिथ को उसके बाहरी कथानक से अधिक उसके भीतर छिपे अर्थों के माध्यम से समझा जाता है। पश्चिमी मिथक में प्रोमीथियस का देवताओं से अग्नि चुराकर मनुष्य को देना केवल एक साहसिक कथा नहीं है। वह मनुष्य की ज्ञान-लिप्सा, सत्ता के विरुद्ध विद्रोह और तकनीकी शक्ति की आकांक्षा का प्रतीक भी है। इकारस का आकाश में उड़ना केवल एक असफल उड़ान की कहानी नहीं, बल्कि मनुष्य की असीम आकांक्षा और सीमा-लाँघने की इच्छा का आख्यान है।

यहीं मिथ-चिंतन का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। मिथ को केवल यह पूछकर नहीं समझा जाता कि “यह सच में हुआ था या नहीं?” बल्कि यह भी पूछा जाता है कि “यह कथा मनुष्य के भीतर किस सत्य को व्यक्त करती है?” किसी मिथक का ऐतिहासिक सत्य संदिग्ध हो सकता है, लेकिन उसका मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक या अस्तित्वगत सत्य अत्यंत गहरा हो सकता है। मनुष्य के भीतर भय है, मृत्यु का आतंक है, अमर होने की इच्छा है, प्रेम है, ईर्ष्या है, अपराध-बोध है, शक्ति की लालसा है। मिथ इन अदृश्य अनुभवों को दृश्य कथा में बदल देता है।

मिथ को समझने की एक बड़ी परंपरा मनोविश्लेषण और मनोविज्ञान से जुड़ती है। फ्रायड ने मिथों में मानव मन की इच्छाओं, दबी हुई आकांक्षाओं और संघर्षों की छवियाँ देखीं। कार्ल युंग ने मिथों को मानव-जाति की सामूहिक अचेतन स्मृतियों और आदिरूपों से जोड़ा। उनके अनुसार अनेक मिथकीय पात्र और स्थितियाँ अलग-अलग संस्कृतियों में अलग रूपों में दिखाई देती हैं, क्योंकि मानव मन की कुछ मूल संरचनाएँ सार्वभौमिक होती हैं। माता, नायक, अंधकार, यात्रा, मृत्यु, पुनर्जन्म, राक्षस, प्रकाश और संघर्ष जैसे प्रतीक बार-बार विभिन्न संस्कृतियों की कथाओं में उपस्थित होते हैं।

इस दृष्टि से मिथ मनुष्य के बाहर घटित किसी अद्भुत घटना की कथा मात्र नहीं है। वह मनुष्य के भीतर घटित होने वाली घटनाओं का भी रूपक है। नायक की यात्रा बाहर की यात्रा दिखाई देती है लेकिन वास्तव में वह आत्म-खोज की यात्रा हो सकती है। राक्षस कोई बाहरी प्राणी हो सकता है, लेकिन वह मनुष्य के भीतर का भय भी हो सकता है। अंधकार कोई भौतिक रात हो सकती है, लेकिन वह अज्ञान, अकेलेपन या अस्तित्वगत संकट का प्रतीक भी हो सकता है।

मिथों को समझने का एक और महत्त्वपूर्ण तरीका समाज की गहरी मानसिक संरचनाओं को समझना है। मिथक अक्सर विरोधी द्वंद्वों के माध्यम से संसार को व्यवस्थित करता है: प्रकृति और संस्कृति, जीवन और मृत्यु, कच्चा और पका, प्रकाश और अंधकार, देवता और मनुष्य। मिथक इन विरोधों को कथा के माध्यम से जोड़ने और समझने का प्रयास करता है। इस प्रकार मिथक केवल मनोरंजन नहीं करता, वह समाज के भीतर उपस्थित गहरे तनावों को भी अभिव्यक्त करता है।

आधुनिक समाज के मिथकों की ओर भी ध्यान देना आवश्यक है। मिथ केवल प्राचीन देवताओं और नायकों की कथाओं में नहीं रहता। आधुनिक विज्ञापन, राजनीति, राष्ट्रवाद, लोकप्रिय संस्कृति और मीडिया भी मिथक निर्मित करते हैं। एक साधारण वस्तु को सफलता, प्रतिष्ठा या स्वतंत्रता का प्रतीक बना देना भी मिथकीय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। एक व्यक्ति को केवल व्यक्ति न मानकर राष्ट्र की आकांक्षाओं का प्रतीक बना देना भी मिथक-निर्माण है। आधुनिक समाज ने मिथकों को समाप्त नहीं किया; उसने उनके वस्त्र बदल दिए हैं।

इसलिए मिथ को झूठ कहना अत्यंत अपर्याप्त है। झूठ का उद्देश्य प्रायः धोखा देना होता है। मिथ का उद्देश्य हमेशा धोखा देना नहीं होता। मिथ सामूहिक कल्पना, सांस्कृतिक स्मृति और अस्तित्वगत प्रश्नों से निर्मित होता है। वह ऐतिहासिक रूप से सत्य न हो, फिर भी किसी समाज के लिए अर्थपूर्ण हो सकता है। मिथ का सत्य तथ्य का सत्य नहीं होता। वह प्रतीक का सत्य हो सकता है, मनोविज्ञान का सत्य हो सकता है, संस्कृति का सत्य हो सकता है।

यहीं मिथ और विज्ञान का अंतर स्पष्ट होता है। विज्ञान पूछता है: यह कैसे हुआ? मिथ पूछ सकता है: इसका अर्थ क्या है? विज्ञान बिजली की चमक की भौतिक प्रक्रिया समझाता है। मिथ बिजली को देवता का अस्त्र बना सकता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देवता का अस्त्र होने का दावा सत्यापित नहीं किया जा सकता। लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से वह कथा मनुष्य के भय, विस्मय और प्रकृति के प्रति उसकी अनुभूति को व्यक्त कर सकती है। एक को दूसरे की जगह रख देना दोनों के साथ अन्याय है।

आधुनिकता ने मिथ को तर्क और विज्ञान के विरोध में रखकर उसे पीछे छोड़ने की कोशिश की। लेकिन आधुनिकता स्वयं मिथ से मुक्त नहीं हो सकी। विज्ञान ने अनेक पुराने मिथकों को चुनौती दी, लेकिन मनुष्य की अर्थ-निर्माण की आवश्यकता बनी रही। अब वह नई कथाओं में विश्वास करने लगा। कभी राष्ट्र सर्वोच्च मिथ बन गया, कभी बाजार, कभी प्रगति, कभी तकनीकी मुक्ति। मनुष्य ने देवताओं को हटाया, लेकिन सिंहासन खाली नहीं छोड़ा। किसी न किसी विचार को वहाँ बैठाना ही था।

इसलिए मिथ वह कथा है जिसमें मनुष्य अपने सामूहिक अनुभव, भय, आकांक्षा, स्मृति और अर्थ-बोध को प्रतीकात्मक रूप देता है। वह इतिहास नहीं, फिर भी इतिहास को प्रभावित कर सकता है। वह विज्ञान नहीं, फिर भी वैज्ञानिक जिज्ञासा को जन्म दे सकता है। वह तर्क नहीं, फिर भी मानव-चेतना के गहरे तर्कों को कथा के रूप में व्यक्त कर सकता है।

मिथ का सबसे बड़ा सौंदर्य शायद यही है कि वह मनुष्य की उस अवस्था को सुरक्षित रखता है, जब वह अभी संसार को पूरी तरह जानता नहीं था, लेकिन उसे जानने की तीव्र इच्छा रखता था। विज्ञान ने संसार के अनेक रहस्यों को खोला, तर्क ने अनेक विश्वासों की परीक्षा की, फिर भी मनुष्य के भीतर वह पहला विस्मय बचा रहा। तारों को देखकर आज हम उनकी दूरी, तापमान और संरचना जान सकते हैं, लेकिन उन्हें देखकर चकित होना अभी भी हमारी प्रकृति है। शायद मिथ उसी चकित होने की पहली भाषा था।

इसीलिए मिथ का अंत संभव नहीं। जब तक मनुष्य प्रश्न पूछता रहेगा, जब तक वह अज्ञात के सामने खड़ा होकर अर्थ खोजता रहेगा, जब तक वह अपने भय और आकांक्षाओं को कथा में बदलता रहेगा, तब तक मिथ जीवित रहेगा। देवता बदलेंगे, प्रतीक बदलेंगे, कथाएँ बदलेंगी लेकिन मनुष्य की कथा कहने की आवश्यकता नहीं बदलेगी। मिथ अंततः किसी पुराने समय की मूर्खता नहीं, बल्कि मनुष्य की स्मृति में सुरक्षित वह क्षण है, जब उसने पहली बार अज्ञात संसार से कहा था: “मैं तुम्हें समझना चाहता हूँ।”

विज्ञान का जन्म भी इसी जिज्ञासा से हुआ, लेकिन उसकी पद्धति अलग है। विज्ञान प्रश्न पूछता है, पर वह प्रश्न को विश्वास पर समाप्त नहीं करता। वह प्रमाण चाहता है, परीक्षण चाहता है, पुनरावृत्ति चाहता है। विज्ञान कहता है कि किसी दावे को इसलिए सत्य नहीं मान लिया जा सकता कि वह प्राचीन है, लोकप्रिय है या किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति ने कहा है। किसी भी धारणा को प्रमाण और परीक्षण की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। इस अर्थ में विज्ञान मिथक से अलग है। मिथक मुख्यतः अर्थ और सांस्कृतिक स्मृति का निर्माण करता है, जबकि विज्ञान प्रकृति के कार्य-व्यापार को प्रमाणित नियमों और सिद्धांतों के माध्यम से समझने का प्रयास करता है।

फिर भी विज्ञान और मिथक के बीच संबंध केवल विरोध का नहीं है। विज्ञान के विकास के प्रारंभिक चरणों में मिथकीय कल्पनाओं ने मनुष्य को प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित किया। आकाश को देखकर देवताओं की कल्पना करने वाला मनुष्य ही आगे चलकर तारों, ग्रहों और आकाशगंगाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करता है। अमरत्व की मिथकीय आकांक्षा ने औषधि, चिकित्सा और जीवन-विस्तार की खोज को प्रेरित किया। उड़ने की कल्पना ने विमान का स्वप्न पैदा किया। समुद्र, आकाश और अंतरिक्ष के संबंध में अनेक मिथकीय कल्पनाएँ बाद में वैज्ञानिक जिज्ञासा का आधार बनीं। कल्पना विज्ञान नहीं है, लेकिन विज्ञान की शुरुआत अक्सर कल्पना से होती है।

यहाँ तर्क की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण हो जाती है। तर्क वह सेतु है जो मिथकीय कल्पना और वैज्ञानिक प्रमाण के बीच विवेकपूर्ण दूरी बनाए रखता है। तर्क यह पूछता है कि किसी कथा का अर्थ क्या है, उसका सांस्कृतिक महत्त्व क्या है और उसके भीतर कौन-से प्रतीक छिपे हैं। साथ ही वह यह भी पूछता है कि क्या उस कथा को ऐतिहासिक या वैज्ञानिक तथ्य के रूप में स्वीकार करने का पर्याप्त आधार है। इस प्रकार तर्क मिथक का अपमान नहीं करता, बल्कि उसके क्षेत्र और सीमा को स्पष्ट करता है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब मिथक को विज्ञान का स्थान दे दिया जाता है। किसी प्राचीन कथा में विमान जैसी कोई कल्पना मिल जाने से वह कथा आधुनिक विमान-विज्ञान का वैज्ञानिक दस्तावेज नहीं बन जाती। किसी पुराण में ब्रह्मांड की विराट कल्पना होने से वह आधुनिक खगोल विज्ञान की पाठ्यपुस्तक नहीं हो जाती। इसी प्रकार किसी वैज्ञानिक उपलब्धि को मिथकीय भाषा में प्रस्तुत कर देना उसे मिथक नहीं बना देता। विज्ञान को विज्ञान की कसौटी पर और मिथक को मिथक की सांस्कृतिक कसौटी पर समझना चाहिए। हर चीज को एक ही तराजू पर तौलना मनुष्य की पुरानी आदत है, जैसे हर समस्या का समाधान एक ही चम्मच से करने की कोशिश करना।

मिथक का सत्य और विज्ञान का सत्य एक ही प्रकार का सत्य नहीं होता। विज्ञान पूछता है: यह घटना कैसे घटती है? मिथक अक्सर पूछता है: इस घटना का हमारे लिए अर्थ क्या है? विज्ञान वर्षा की भौतिक प्रक्रिया को समझाता है। मिथक वर्षा को जीवन, उर्वरता और आशा के प्रतीक के रूप में देख सकता है। विज्ञान मृत्यु की जैविक प्रक्रिया का विश्लेषण करता है। मिथक मृत्यु के अनुभव को अर्थ देने का प्रयास करता है। विज्ञान प्रकृति के नियमों को समझता है, मिथक मनुष्य के अस्तित्वगत भय और आशाओं को भाषा देता है। दोनों के प्रश्न अलग हो सकते हैं, इसलिए उनके उत्तरों को भी एक ही प्रकार का मानना उचित नहीं।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की दृष्टि में मिथक को केवल अंधविश्वास की श्रेणी में रख देना उसके गहरे मानवीय और सांस्कृतिक अर्थ को नष्ट कर देना है। मिथक सामूहिक मानव-चेतना की सृजनात्मक शक्ति से निर्मित होता है। उसमें किसी समाज के अनुभव, स्मृतियाँ, भय, आकांक्षाएँ और जीवन-मूल्य संचित रहते हैं। इसलिए मिथक को समझने के लिए केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि वह वैज्ञानिक रूप से सत्य है या असत्य। यह भी पूछना आवश्यक है कि वह किस मानवीय आवश्यकता से पैदा हुआ, उसने समाज की कल्पना को कैसे आकार दिया और वह आज भी हमारे भीतर किस रूप में जीवित है।

आधुनिक मनुष्य स्वयं को मिथक-मुक्त समझता है, जबकि वह अनेक नए मिथकों से घिरा हुआ है। राष्ट्र, बाजार, प्रगति, तकनीक, सफलता और विकास के बारे में भी समाज अनेक ऐसी धारणाएँ बनाता है, जिन्हें लोग बिना पर्याप्त परीक्षण के स्वीकार कर लेते हैं। सोशल मीडिया के युग में तो मिथक निर्माण और भी तेज हो गया है। एक अप्रमाणित सूचना हजारों बार दोहराए जाने पर सत्य जैसी दिखाई देने लगती है। मनुष्य ने देवताओं की जगह कभी-कभी आँकड़ों, वायरल संदेशों और प्रभावशाली व्यक्तियों को रख दिया है। रूप बदला है, मिथक बनाने की मानवीय प्रवृत्ति नहीं।

यहीं वैज्ञानिक चेतना की आवश्यकता सबसे अधिक है। वैज्ञानिक चेतना का अर्थ केवल विज्ञान पढ़ लेना नहीं है। इसका अर्थ है प्रश्न पूछने की आदत, प्रमाण की माँग, संशय की क्षमता और अपनी मान्यताओं की समीक्षा करने का साहस। वैज्ञानिक व्यक्ति वह नहीं जो हर परंपरा का उपहास करे, बल्कि वह है जो परंपरा को समझते हुए उसके दावों की प्रकृति को पहचान सके। वह जानता है कि किसी मिथक का सांस्कृतिक मूल्य हो सकता है, भले ही उसे वैज्ञानिक तथ्य न माना जा सके।

तर्क का वास्तविक कार्य भी यही है कि वह मनुष्य को दो अतियों से बचाए। एक ओर अंधविश्वास है, जहाँ बिना प्रमाण के हर बात को सत्य मान लिया जाता है। दूसरी ओर अंध-विज्ञानवाद है, जहाँ मनुष्य के अनुभव, कला, कल्पना, प्रतीक और संस्कृति को केवल इसलिए निरर्थक मान लिया जाता है कि उन्हें प्रयोगशाला में मापा नहीं जा सकता। मनुष्य केवल जैविक प्राणी नहीं है। वह स्मृतियों, कथाओं, प्रतीकों और कल्पनाओं से भी निर्मित होता है। विज्ञान उसे प्रकृति को समझने की शक्ति देता है, तर्क उसे विवेक देता है और मिथक उसे अपने सांस्कृतिक अतीत तथा सामूहिक कल्पना से जोड़ता है।

इसलिए तर्क, विज्ञान और मिथक को परस्पर शत्रु बनाकर देखने के बजाय उनके कार्य-क्षेत्रों को समझना अधिक आवश्यक है। मिथक मनुष्य की सामूहिक कल्पना का इतिहास है, तर्क उसकी विवेकशीलता का उपकरण है और विज्ञान प्रकृति के सत्य की परीक्षण-आधारित खोज। मिथक हमें यह बताता है कि मनुष्य ने संसार को कैसे अनुभव किया; तर्क पूछता है कि उस अनुभव को कैसे समझा जाए; और विज्ञान जाँचता है कि प्रकृति वास्तव में किस प्रकार कार्य करती है।

मानव सभ्यता की वास्तविक प्रगति तब होती है जब मिथक को मिथक की गरिमा के साथ, विज्ञान को विज्ञान की कठोरता के साथ और तर्क को तर्क की स्वतंत्रता के साथ स्वीकार किया जाए। मिथक को विज्ञान बना देना मिथक का भी अपमान है और विज्ञान का भी। विज्ञान को मिथक समझ लेना ज्ञान का संकट है और तर्क को मिथक-विरोधी हथियार बना देना मनुष्य की कल्पना के विरुद्ध एक संकीर्णता। स्वस्थ सभ्यता वह है जो अपनी कथाओं को याद रखती है, अपने विश्वासों की समीक्षा करती है और अपने ज्ञान को प्रमाण की कसौटी पर परखती है।

मनुष्य की यात्रा मिथक से विज्ञान तक की सीधी यात्रा नहीं है। वह मिथक, कल्पना, तर्क, अनुभव, प्रयोग और पुनः प्रश्नों से होकर चलती है। मनुष्य पहले आकाश को देखकर कथा बनाता है, फिर प्रश्न पूछता है, फिर गणना करता है, फिर दूरबीन बनाता है और अंततः उसी आकाश में अपनी सीमाओं को पहचानता है। यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता है। वह कथा भी रचता है, प्रमाण भी खोजता है और कभी-कभी अपने ही निष्कर्षों पर फिर से संदेह भी करता है। शायद इसी संदेह में उसकी बुद्धि का सबसे सुंदर प्रकाश छिपा है।

।। दो ।।

विज्ञान को तर्क और मिथक के सामने रखकर केवल उसकी श्रेष्ठता घोषित कर देना भी वैज्ञानिक दृष्टि नहीं है। विज्ञान की वैज्ञानिकता प्रश्नातीत नहीं है। विज्ञान की शक्ति इस में है कि वह स्वयं को अंतिम, पूर्ण और अपरिवर्तनीय सत्य नहीं मानता किंतु विज्ञान के नाम पर निर्मित संस्थाएँ, वैज्ञानिक दावे, वैज्ञानिक समुदाय और विज्ञान के सामाजिक उपयोग हमेशा उतने वैज्ञानिक हों, यह आवश्यक नहीं।

तर्क, विज्ञान और मिथक के संबंध पर विचार करते समय एक प्रश्न लगातार हमारे सामने उपस्थित रहना चाहिए: विज्ञान की कितनी वैज्ञानिकता है? यह प्रश्न विज्ञान-विरोधी नहीं, बल्कि वास्तविक वैज्ञानिक चेतना का प्रश्न है। विज्ञान का अर्थ केवल प्रयोगशालाएँ, आँकड़े, उपकरण और कठिन शब्दावली नहीं है। विज्ञान एक पद्धति है, एक अनुशासन है, एक निरंतर आत्म-संशोधन की प्रक्रिया है। जहाँ प्रश्न पूछना बंद हो जाता है, जहाँ प्रमाण की जाँच समाप्त हो जाती है, जहाँ किसी व्यक्ति, संस्था या सिद्धांत को आलोचना से ऊपर रख दिया जाता है, वहाँ विज्ञान का बाहरी रूप तो बचा रह सकता है लेकिन उसकी वैज्ञानिकता समाप्त होने लगती है।

विज्ञान की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह अपने निष्कर्षों को अंतिम नहीं मानता। न्यूटन के सिद्धांतों ने प्रकृति को समझने की हमारी दृष्टि को बदला, फिर आइंस्टीन ने उन्हीं सिद्धांतों की सीमाओं को स्पष्ट किया। विज्ञान अपने पुराने निष्कर्षों को नष्ट करके नहीं, बल्कि उन्हें अधिक व्यापक संदर्भ में पुनर्स्थापित करके आगे बढ़ता है। इस अर्थ में विज्ञान की वैज्ञानिकता उसके निष्कर्षों में जितनी है, उससे कहीं अधिक उसकी संदेह करने, जाँचने और स्वयं को सुधारने की क्षमता में है।

लेकिन जब विज्ञान अपने निष्कर्षों को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत करने लगता है, तब वह अपने मूल स्वभाव से दूर जाने लगता है। विज्ञान का कोई सिद्धांत इसलिए सत्य नहीं होता कि उसे किसी महान वैज्ञानिक ने कहा है। उसका मूल्य उसके प्रमाण, प्रयोग और तर्कसंगत परीक्षण से निर्धारित होता है। वैज्ञानिक भी मनुष्य हैं और मनुष्य पूर्वाग्रहों, संस्थागत दबावों, आर्थिक हितों, सत्ता-संबंधों और प्रतिष्ठा की इच्छाओं से मुक्त नहीं होता। इसलिए वैज्ञानिक निष्कर्षों को भी उनके प्रमाण और पद्धति के आधार पर परखा जाना चाहिए।

यहाँ विज्ञान और विज्ञानवाद के बीच अंतर समझना आवश्यक है। विज्ञान कहता है कि प्रकृति और भौतिक जगत के बारे में विश्वसनीय ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रमाण और परीक्षण आवश्यक हैं। विज्ञानवाद कभी-कभी यह दावा करने लगता है कि वही ज्ञान वास्तविक है जिसे प्रयोगशाला में मापा जा सके। लेकिन प्रेम, करुणा, सौंदर्य, स्मृति, कविता, नैतिकता और मानवीय अर्थ को केवल प्रयोगशाला के उपकरणों से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। इसका अर्थ यह नहीं कि ये क्षेत्र अंधविश्वास के लिए खुले हुए हैं। इसका अर्थ केवल इतना है कि ज्ञान के सभी प्रश्नों की एक ही पद्धति नहीं हो सकती।

विज्ञान प्रकृति के बारे में अत्यंत शक्तिशाली ज्ञान देता है, लेकिन वह स्वयं यह तय नहीं करता कि उस ज्ञान का उपयोग किस उद्देश्य से किया जाए। परमाणु विज्ञान ऊर्जा भी दे सकता है और विनाश भी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता चिकित्सा और शिक्षा में सहायता कर सकती है, लेकिन निगरानी और नियंत्रण का उपकरण भी बन सकती है। जैव-प्रौद्योगिकी जीवन बचा सकती है, पर उसके दुरुपयोग की संभावनाएँ भी हैं। इसलिए विज्ञान अपने आप में नैतिकता नहीं है। विज्ञान हमें यह बता सकता है कि हम क्या कर सकते हैं, लेकिन यह प्रश्न कि हमें क्या करना चाहिए, केवल विज्ञान के भीतर से हमेशा हल नहीं होता।

इसलिए विज्ञान की वैज्ञानिकता के साथ उसकी सामाजिक और नैतिक सीमाओं पर भी विचार करना आवश्यक है। विज्ञान का उपयोग कौन कर रहा है? किसके हित में कर रहा है? किसकी कीमत पर कर रहा है? कौन-से प्रश्नों पर शोध हो रहा है और कौन-से प्रश्न उपेक्षित हैं? विज्ञान की दिशा भी समाज, अर्थव्यवस्था और सत्ता से प्रभावित होती है। इसलिए वैज्ञानिक ज्ञान को सामाजिक संदर्भ से अलग करके देखना भी एक प्रकार की सरलता है।

यहाँ मिथक और विज्ञान के बीच एक अप्रत्याशित समानता भी दिखाई देती है। दोनों मनुष्य को संसार को समझने के लिए कथाएँ और व्याख्याएँ प्रदान करते हैं, लेकिन उनके सत्यापन के तरीके अलग हैं। मिथक सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक विश्वास से शक्ति प्राप्त करता है, विज्ञान परीक्षण और प्रमाण से। समस्या तब उत्पन्न होती है जब मिथक अपने प्रतीकात्मक सत्य को वैज्ञानिक तथ्य घोषित करने लगता है या विज्ञान अपने अस्थायी निष्कर्षों को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत करने लगता है।

विज्ञान का वास्तविक स्वभाव विनम्रता है। वह कहता है: “यह अब तक उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर हमारा सर्वोत्तम निष्कर्ष है।” छद्म-विज्ञान कहता है: “हमारे पास अंतिम उत्तर है।” मिथकीय कट्टरता और छद्म-विज्ञान के बीच इस अर्थ में एक गहरी समानता है। दोनों प्रश्नों को समाप्त करना चाहते हैं। विज्ञान प्रश्नों को जीवित रखता है।

इसलिए विज्ञान की आलोचना विज्ञान-विरोध नहीं है। बल्कि विज्ञान की आलोचना तभी वैज्ञानिक हो सकती है जब वह प्रमाण, पद्धति और तर्क पर आधारित हो। किसी वैज्ञानिक सिद्धांत पर प्रश्न उठाना वैज्ञानिकता है; केवल इसलिए किसी सिद्धांत को अस्वीकार करना कि वह हमारी पूर्वधारणा के विरुद्ध है, वैज्ञानिकता नहीं। इसी तरह किसी प्राचीन ग्रंथ में कोई आधुनिक विचार मिल जाने पर उसे वैज्ञानिक सिद्धांत घोषित कर देना भी वैज्ञानिकता नहीं है।

विज्ञान की वैज्ञानिकता का सबसे बड़ा परीक्षण स्वयं विज्ञान के भीतर होता है। क्या कोई सिद्धांत परीक्षण योग्य है? क्या उसके परिणामों को दोहराया जा सकता है? क्या उसके विरुद्ध प्रमाण मिलने पर उसे संशोधित किया जा सकता है? क्या शोधकर्ता अपने निष्कर्षों की आलोचना स्वीकार करता है? क्या आँकड़ों को ईमानदारी से प्रस्तुत किया गया है? क्या निष्कर्ष प्रमाण से बड़ा तो नहीं हो गया? ये प्रश्न विज्ञान को विज्ञान बनाए रखते हैं।

इस दृष्टि से तर्क, विज्ञान और मिथक का संबंध एक त्रिकोण की तरह समझा जा सकता है। मिथक मनुष्य की सामूहिक कल्पना और सांस्कृतिक स्मृति का संसार है। विज्ञान प्रकृति के परीक्षण-आधारित ज्ञान का संसार है। तर्क दोनों के बीच विवेकपूर्ण संवाद की क्षमता है। लेकिन तर्क स्वयं भी किसी सत्ता का दास नहीं होना चाहिए। यदि तर्क केवल विज्ञान के नाम पर हर सांस्कृतिक अनुभव को नकार दे, तो वह संकीर्ण हो जाता है; और यदि वह मिथक के नाम पर प्रमाण को अस्वीकार कर दे, तो वह अंधविश्वास का उपकरण बन जाता है।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि मिथक वैज्ञानिक है या विज्ञान मिथकीय। प्रश्न यह है कि किस दावे को किस कसौटी पर परखा जाना चाहिए। मिथक से सांस्कृतिक अर्थ और मानवीय अनुभव की व्याख्या माँगना उचित है, लेकिन उससे प्रयोगशाला-आधारित प्रमाण माँगना अनुचित हो सकता है। विज्ञान से प्रकृति के नियमों की व्याख्या माँगना उचित है, लेकिन उससे कविता का अर्थ या करुणा का अंतिम मूल्य पूछना उसकी सीमा से बाहर का प्रश्न हो सकता है।

विज्ञान की वैज्ञानिकता उसके अधिकार में नहीं, बल्कि उसकी आत्म-समीक्षा में है। वह जितना अधिक अपने निष्कर्षों की जाँच करता है, उतना ही वैज्ञानिक होता है। जिस क्षण वह अपने निष्कर्षों को प्रश्नातीत बना देता है, उसी क्षण उसके भीतर एक नए प्रकार का मिथक जन्म लेने लगता है। इसलिए विज्ञान को मिथक से बचाने के लिए भी तर्क चाहिए और मिथक को अंधविश्वास बनने से बचाने के लिए भी तर्क चाहिए।

मनुष्य ने देवताओं के मिथक बनाए, फिर प्रकृति के नियम खोजे, फिर उन नियमों को सिद्धांतों में बदला और फिर उन्हीं सिद्धांतों की सीमाओं की खोज की। यह यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है। शायद विज्ञान की सबसे बड़ी वैज्ञानिकता इसी में है कि वह अपने लिए भी अंतिम अध्याय लिखने से इनकार करता है।


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