लोकतंत्र : तंत्र और लोक तथा प्रेमचंद

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— RAJIV Ranjan chaturvedi —

यों तो साधारण से साधारण आदमी अपनी-अपनी शब्दावली में कह देता है कि, “लोकतंत्र है जरूर, किन्तु तंत्र लोक की छाती पर बैठा हुआ है।” बात सच है और इस बात में मतभेद की कोई गुंजाइश भी नहीं है। परन्तु सवाल यह है कि ऐसा हुआ कैसे? क्यों हुआ? इसके लिए हमें स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक के उस परिवेश पर विचार करना होगा, जिसमें लोक-संबंधी चिंतन का विकास हुआ। हमें सोचना होगा कि क्या इस अंतराल में राजनीतिक मतवाद लोक-संबंधी चिंतन पर हावी रहा? राजनीतिक मतवाद कोई भी हो, अंततः वह लोक को विभक्त करता है। हमें यह भी सोचना होगा कि स्वतंत्रता-आंदोलन के समय जिस लोक-संबंधी चिंतन का विकास हो रहा था, बाद के अंतराल में सामाजिक एवं सार्वजनिक जीवन, शिक्षा और साहित्य में उसकी स्थिति क्या रही? क्या विभेदक विचारधाराएँ लोक-संबंधी चिंतन पर हावी हो गईं कि प्रेमचंद जैसे जनता के प्रति समर्पित कथाकार को भी अपने-अपने पाले में समेटने का उद्धत व्यवहार हुआ?

प्रेमचंद ने स्वयं लिखा था कि महात्मा गांधी गोरखपुर आए। प्रत्येक रास्ता मानो गांधी से मिलने जा रहा था। उनके भाषण ने मेरे जैसे मरे हुए आदमी में भी प्राणों का संचार कर दिया और मैंने स्कूल इंस्पेक्टरी से इस्तीफा दे दिया। आज जितने लोग प्रेमचंद के नाम का झंडा फहरा रहे हैं, उनमें कितने हैं जो अपनी नौकरी छोड़ सकेंगे?

इतने पर भी ढिठाई यह कि प्रेमचंद को अमुक पार्टी के झंडे में समेटने का प्रयास किया जाता है। प्रेमचंद सत्ता की जुगाड़ में नहीं थे।

प्रेमचंद के झंडे के नीचे आने का अर्थ था लोक-संबंधी चिंतन। लेकिन लोगों ने उलटे प्रेमचंद के ऊपर चढ़कर अपनी-अपनी पार्टी का झंडा गाड़ दिया। यह विभक्त चिंतन है—प्रेमचंद का उपयोग करना। यही वह प्रवृत्ति रही, जिसके कारण तंत्र लोक की छाती पर चढ़ सका।

प्रेमचंद की महानता का मूल तत्व था—लोकजीवन में, लोकजीवन की व्यथा में तदाकार होना। लोकजीवन और उसकी व्यथा में तदाकार होने का कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं। लोकजीवन के अतिरिक्त यदि साहित्य की कोई दूसरी कसौटी किसी ने बना रखी है, तो वह किसी वर्ग-विशेष, दल-विशेष अथवा विचारधारा-विशेष की ही होगी। सामान्य जन से उसका क्या संबंध?

प्रेमचंद की लोकचेतना किसी भी वाद के झंडे की मोहताज नहीं थी। लोक के प्रति करुणा और संवेदना डिब्बे में बंद नहीं होती, और न ही हो सकती है। प्रेमचंद ने लोकचेतना जगाई थी। शोषण और अन्याय के प्रति उनकी बगावत किसी जाति या मजहब के डिब्बे में बंद नहीं थी। जहाँ भी उन्होंने अन्याय और विषमता देखी, वहीं उसके विरुद्ध विद्रोह का स्वर बुलंद किया। उनमें मनुष्यता का भाव था, हृदय में पीड़ा थी और सत्य था। इसलिए वे किसी वर्ग या जाति के नहीं, बल्कि समग्र मानवता के कथाकार बन सके। केवल भारतीय साहित्य में ही नहीं, विश्व साहित्य में भी उनकी प्रतिष्ठा मनुष्यता के कारण है।

विचार कीजिए—यदि मनुष्यता का भाव नहीं है, करुणा का भाव नहीं है, हृदय में पीड़ा नहीं है, तो आपके परिवार या बिरादरी के लोग चाहे कुछ भी कहें, लोकचेतना नहीं जग सकती। क्योंकि विभक्त चेतना लोकचेतना नहीं होती; वह जाति-चेतना हो सकती है। जाति-चेतना ने लोकतंत्र के मार्ग में जो विघ्न उत्पन्न किए हैं, उनका परिणाम हम आज भोग रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद इतनी जटिल परिस्थिति पहले कभी नहीं देखी गई।

लेकिन यदि आप इस जटिलता की अनदेखी करके केवल जाति-चेतना वाले किताबी भाष्य पढ़ रहे हैं, तो यह लोकतंत्र के किस अर्थ का परिचायक है? क्या आप वर्तमान युग-जीवन की परिस्थितियों का विश्लेषण कर सकते हैं? क्या आपके पास करोड़ों जनता के जीवन की समस्याओं का कोई समाधान है?

प्रेमचंद ने अपने युग के समग्र जीवन की परिस्थितियों का विश्लेषण भी किया और समाधान भी सुझाया। उन्होंने लोकजीवन में चेतना का संचार किया। उन्होंने उस समय सरकारी नौकरी छोड़ी, सरकारी सम्मान ठुकराया। उनके तपे हुए आचरण में ही उनके लेखन की शक्ति थी।

जीवन विच्छिन्न नहीं है, विखंडित नहीं है; परंतु आपका यह किताबी भाष्य विखंडित और विभाजित है तथा आपकी संवेदना डिब्बाबंद है।

प्रेमचंद सामान्य जनता के जीवन में बहुत गहरे तक पैठे हुए थे और जनता के आदमी के रूप में ही बने रहना चाहते थे।

सन् 1924 में जब अलवर के राजा ने उन्हें अपना प्राइवेट सेक्रेटरी बनाने का प्रस्ताव दिया, तो उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया।

इसी प्रकार सन् 1929 में जब सर मालकम हेली गवर्नर बनकर भारत आए, तब वे उच्चकोटि के लेखक के रूप में प्रेमचंद को ‘रायसाहब’ का खिताब देना चाहते थे। प्रेमचंद ने प्रस्ताव लाने वाले से कहा—”भाई, आपको धन्यवाद; किन्तु सरकारी खिताब से मेरा ध्यान जनता की ओर से बँट जाएगा और मुझे जनता का ही खिताब चाहिए। जनता का खिताब सरकार के खिताब से बड़ा है।”

प्रेमचंद को लेखन की प्रेरणा और शक्ति जनता से ही मिलती थी। उनका साहित्य स्वतंत्रता-आंदोलन की चेतना से आप्लावित है। महात्मा गांधी का भाषण सुनकर उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी थी। उनका उपन्यास गोदान उस युग के द्वंद्व का साकार स्वरूप है। इसी प्रकार रंगभूमि केवल उपन्यास नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन की जीवित गाथा और समसामयिक इतिहास है।

यहाँ उनकी एक कहानी ‘जुलूस’ का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूँगा। इस कहानी से हम उस समय के जनजीवन और लोकचेतना के उद्वेलन को समझ सकते हैं।

स्वराजियों का जुलूस निकल रहा है। पटरी पर खड़े दो दुकानदार बातें कर रहे हैं। एक सेठ कहता है—”सब के सब काल के मुँह में जा रहे हैं। आगे सवारों का दल है, मार-मारकर भगा देगा।”

दूसरा सेठ बोला—”महात्माजी सठिया गए हैं। जुलूस निकालने से स्वराज्य मिल जाता, तो अब तक कब का मिल गया होता। और देखो, जुलूस में हैं कौन? लोंडे, लफंगे, सिरफिरे! शहर का कोई बड़ा आदमी नहीं है।”

मैकू उनकी बातें सुनकर हँसने लगा। सेठ ने पूछा—”क्यों हँसा, मैकू?”

मैकू बोला—”बड़ा आदमी जुलूस में क्यों होगा? वह तो महलों में रहता है। उसे क्या तकलीफ़ है? बड़े आदमियों ने ही तो मिट्टी खराब कर रखी है।”

जुलूस आगे बढ़ रहा था कि नए दरोगा ने डीएसपी को आते देखकर अपनी कारगुजारी दिखाने के लिए घोड़ों को जुलूस पर चढ़ा दिया। घोड़े ने दोनों पैर उठाए और जुलूस के आगे चलने वाला आदमी उसकी टापों के नीचे आ गया। दरोगा का लट्ठ पड़ा और उसकी खोपड़ी फट गई। पुलिस के डंडे बरसने लगे और जुलूस के लोगों के सिर फूट गए।

बाज़ार में सन्नाटा छा गया। दुकानदार अपनी दुकानें बंद करके उसी दिशा में चल पड़े। वे सोचने लगे—एक दिन तो मरना ही है; जो कुछ होना है, हो जाए। आखिर ये लोग सभी के लिए जान दे रहे थे। जो लोग जुलूस का तमाशा देख रहे थे, वे भी घटनास्थल पर आ गए। भीड़ बढ़ने लगी और जनाक्रोश भी उमड़ने लगा। भीड़ का रुख देखकर पुलिस का दल पीछे हट गया।

जनता में सहानुभूति की लहर दौड़ गई। जिस दरोगा ने जुलूस के नायक पर प्रहार किया था, उसकी पत्नी को जब अपने पति की करतूत का पता चला, तो वह बिगड़ उठी—”तुम अपने ही लोगों को घोड़ों से कुचलकर जवाँमर्दी दिखा रहे थे?”

तीन-चार दिन बाद जुलूस का नेतृत्व करने वाला वह नायक मर जाता है, जिसके सिर पर घोड़े की टाप और दरोगा की लाठी लगी थी। उसके शव के साथ जब स्वराजियों का जुलूस निकला, तो पूरा शहर उमड़ पड़ा। दरोगा की पत्नी महिलाओं की टोली में सबसे आगे चल रही थी।

उनके उपन्यास रंगभूमि का पात्र सूरदास कहता है—

“जबरदस्ती करने के लिए जो कानून चाहो बना लो। यहाँ कोई सरकार का हाथ पकड़ने वाला तो है नहीं। उसके सलाहकार भी तो सेठ-महाजन ही हैं। वे सभी नियम पूँजीपतियों के लाभ के लिए बनाए गए हैं और पूँजीपतियों को ही यह निश्चय करने का अधिकार दिया गया है कि उन नियमों का व्यवहार कहाँ करें। कुत्ते को खाल की रखवाली सौंपी गई है।”


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