परंपरा से परे नहीं, समय के भीतर : तुलसी की कविता का आज

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Tulsi Das
पेंटिंग साभार : घनश्याम

Parichay Das

— परिचय दास —

“नाना पुराण निगमागम सम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति॥”

और इसी विनम्र आत्मस्वीकार को तुलसी एक दूसरी जगह और अधिक मानवीय बनाते हैं—

“कवित विवेक एक नहिं मोरे।
सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे॥”

न दोनों कथनों को साथ रखकर पढ़ें तो तुलसी की काव्य-दृष्टि का एक विलक्षण रहस्य खुलता है। एक ओर वे कहते हैं कि उनकी कथा अनेक पुराणों, निगम-आगमों, रामायण और अन्य स्रोतों से सम्बद्ध है; दूसरी ओर वे अपनी कविता के विवेक का दावा करने के बजाय लगभग बाल-सुलभ विनम्रता से कहते हैं कि मुझमें कविता का कोई विवेक नहीं है। यह विरोधाभास नहीं है। बल्कि यही तुलसी की रचनात्मक नैतिकता है। वे अपनी रचना को महान सिद्ध करने के लिए स्वयं को महान घोषित नहीं करते। वे अपने शब्दों को आगे रखते हैं और स्वयं पीछे हट जाते हैं।

आज के समय में इस विनम्रता का महत्त्व असाधारण है। हमारा समय आत्मप्रचार का समय है। लिखने से पहले लेखक अपना परिचय देता है, बोलने से पहले वक्ता अपनी उपलब्धियां गिनाता है, विचार से पहले विचारक अपनी प्रतिष्ठा प्रस्तुत करता है। मनुष्य ने शायद पहली बार ऐसी दुनिया बनाई है जिसमें कभी-कभी विचार से अधिक महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि विचार कह कौन रहा है। तुलसी इसके ठीक उलट खड़े दिखाई देते हैं। वे कहते हैं, मेरे भीतर कवित्व का विवेक नहीं है, कागज कोरा है, मैं लिख रहा हूं। अब निर्णय पाठक करे।

“सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे” में एक असाधारण आत्म-साक्षात्कार है। कागद कोरा है, लेकिन कवि का अनुभव कोरा नहीं। कवि अपने अहंकार को कोरा कर रहा है। यह कोरा कागज केवल लेखन का माध्यम नहीं, आत्मविसर्जन का प्रतीक भी बन जाता है। रचना के पहले कवि अपने ‘मैं’ को थोड़ा खाली करता है, तभी कोई बड़ी कथा उसमें उतर सकती है।

आज के रचनात्मक संसार में यह बात विशेष रूप से प्रासंगिक है। सूचना की कोई कमी नहीं है, पर आत्मपरीक्षण की कमी है। शब्दों की कोई कमी नहीं, पर मौन की कमी है। मत बहुत हैं, विचार कम। प्रतिक्रियाएं बहुत हैं, अनुभव की धीमी आंच कम। हर व्यक्ति के पास कुछ कहने को है, लेकिन हर व्यक्ति के भीतर यह पूछने की जगह कम होती जा रही है कि जो मैं कह रहा हूं, उसे कहने का नैतिक अधिकार और अनुभवजन्य आधार क्या है।

तुलसी का “मुझे कविता का विवेक नहीं” कहना इसी प्रश्न की ओर ले जाता है। यह अक्षमता का बयान नहीं, अहंकार से दूरी का विधान है। जो सचमुच बड़ा रचनाकार होता है, वह अपनी रचना की संभावनाओं के साथ-साथ उसकी सीमाओं को भी जानता है। उसे पता होता है कि शब्द उसके पास आते हैं, लेकिन शब्दों का अंतिम अर्थ हमेशा उसके नियंत्रण में नहीं रहता।

और यहीं “नाना पुराण निगमागम” वाला श्लोक फिर सामने आता है। तुलसी अपने स्रोतों को छिपाते नहीं। वे घोषणा करते हैं कि रामकथा उनसे पहले भी कही जा चुकी है। वे अकेले आविष्कारक होने का दावा नहीं करते। यह साहित्यिक ईमानदारी है। आधुनिक भाषा में कहें तो तुलसी अपनी रचना की सांस्कृतिक वंशावली स्वीकार करते हैं। लेकिन स्वीकार करते हुए भी वे अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता नहीं खोते।

आज की रचना के लिए यह संतुलन अत्यंत आवश्यक है। एक ओर अंधी मौलिकता का आग्रह है, जिसमें लेखक यह भ्रम पाल लेता है कि जो कुछ वह लिख रहा है, वह पहली बार संसार में आया है। दूसरी ओर नकल, पुनरावृत्ति और उधार की भाषा का संकट है। तुलसी इन दोनों अतियों से अलग एक तीसरा रास्ता दिखाते हैं: स्रोत स्वीकार करो, लेकिन उन्हें अपनी अनुभूति में पुनर्जीवित करो।

यही साहित्य की वास्तविक रचनात्मकता है।

किसी पुराने आख्यान को फिर कहना तभी सार्थक है जब उसमें नया मनुष्य दिखाई दे। तुलसी ने रामकथा को इसलिए नहीं लिखा कि संसार में रामकथा की कमी थी। उन्होंने उसे इसलिए लिखा कि उनके समय के मनुष्य को उस कथा में अपने जीवन का नया अर्थ दिखाई दे सके। यही कारण है कि उनकी कथा केवल पुरानी कथा नहीं रहती। वह अपने समय का सांस्कृतिक अनुभव बन जाती है।

आज हमारा संकट भी कुछ ऐसा ही है। हमारे पास कथाएं असंख्य हैं, लेकिन अपनी कथा का अर्थ खोता जा रहा है। हमारे पास इतिहास है, पर इतिहास से संवाद कम है। हमारे पास स्मृतियां हैं, पर स्मृतियों को समझने का धैर्य कम है। हमारे पास परंपराएं हैं, पर उनके भीतर छिपे प्रश्नों को सुनने की क्षमता कम होती जा रही है।

तुलसी का महत्व यहां खुलता है। वे परंपरा को केवल सुरक्षित नहीं रखते, उसे वर्तमान के लिए उपयोगी बनाते हैं। वे पुरानी कथा को अपने समय की संवेदना से जोड़ते हैं। इसीलिए आज हमें तुलसी की नकल करने की आवश्यकता नहीं है; तुलसी की तरह अपने समय को अपनी परंपरा से संवाद कराना सीखने की आवश्यकता है।

“क्वचिदन्यतोऽपि” की छोटी-सी स्वीकृति आज बहुत बड़ी बात कहती है। कथा का स्रोत एक नहीं है। मनुष्य का अनुभव भी एक नहीं है। कोई भी संस्कृति केवल एक आवाज से निर्मित नहीं होती। उसमें अनेक स्मृतियां, संघर्ष, विश्वास, असहमतियां और अनुभव एक साथ रहते हैं। बड़ी रचना इन विविध स्रोतों को मिटाती नहीं, उनमें एक रचनात्मक संबंध बनाती है।

आज के समाज में जहां पहचानें तेजी से कठोर खांचों में बदल रही हैं, यह दृष्टि विशेष महत्त्व रखती है। अपने स्रोत से प्रेम करने का अर्थ दूसरे स्रोत को नकारना नहीं है। अपनी परंपरा को स्वीकार करने का अर्थ यह भी नहीं कि उसे प्रश्नों से मुक्त कर दिया जाए। तुलसी का काव्य स्वयं अनेक स्रोतों से बना है। इसलिए तुलसी को पढ़ने का सबसे तुलसीय तरीका शायद यही है कि हम उन्हें श्रद्धा और विवेक, दोनों के साथ पढ़ें।

“कवित विवेक एक नहिं मोरे” का अर्थ तब और सुंदर हो जाता है। कवि अपने लिए विवेक का दावा नहीं करता, लेकिन उसकी रचना पाठक में विवेक पैदा करती है। वह स्वयं कहता है कि मुझमें कविता का विवेक नहीं, पर उसकी कविता सदियों से मनुष्य को अपने निर्णयों, अपने संबंधों, अपने आचरण और अपनी नैतिकता के बारे में सोचने के लिए बाध्य करती रही है। कभी-कभी रचनाकार का सबसे बड़ा विवेक यही होता है कि वह अपनी बुद्धि को अंतिम सत्य न माने।

आज की दुनिया में यह बात कितनी जरूरी है। हम ऐसे समय में हैं जहां हर व्यक्ति अपने मत को अंतिम मानने की जल्दी में है। असहमति को अज्ञान समझ लिया जाता है, प्रश्न को विरोध और संशय को अपराध। तुलसी की काव्य-दृष्टि इसके विपरीत एक संवादात्मक संसार बनाती है। रामचरितमानस में कथा केवल आदेश नहीं देती, वह स्थितियां पैदा करती है। पात्र निर्णय लेते हैं, संकट में पड़ते हैं, दुख सहते हैं, प्रेम करते हैं, गलती करते हैं, त्याग करते हैं। पाठक उनके साथ चलता है। वह केवल निष्कर्ष नहीं पाता, अनुभव से गुजरता है।

यही महान साहित्य की शक्ति है। वह पाठक के लिए जीवन का उत्तर नहीं लिखता, बल्कि जीवन के प्रश्न को इतना जीवंत बना देता है कि पाठक स्वयं अपने भीतर उत्तर खोजने लगे।

तुलसी की भाषा की शक्ति भी इसी से जुड़ी है। “भाषानिबन्धमतिमञ्जुलम्” का आशय केवल सुंदर भाषा नहीं है। भाषा ऐसी हो जो मनुष्य के अनुभव को वहन कर सके। तुलसी ने भाषा को शास्त्रीय ऊंचाई और लोक की आत्मीयता के बीच इस तरह रखा कि वह एक साथ गंभीर भी रही और गेय भी। वह विद्वान को अर्थ देती है और सामान्य मनुष्य को आत्मीयता।

आज भाषा का संकट अलग प्रकार का है। शब्दों की संख्या बढ़ी है, लेकिन शब्दों का वजन घटा है। सार्वजनिक भाषा में कई बार नारे हैं, निजी भाषा में जल्दबाजी है और डिजिटल भाषा में संक्षेप का इतना दबाव है कि भावनाएं भी संक्षिप्त होकर रह जाती हैं। तुलसी की भाषा हमें बताती है कि शब्द केवल सूचना देने के लिए नहीं होते; वे स्मृति बनाते हैं, संबंध बनाते हैं, सांस्कृतिक अनुभव को बचाते हैं और मनुष्य के भीतर ऐसी जगह बनाते हैं जहां वह स्वयं से मिल सके।

इसीलिए “स्वान्तःसुखाय” भी आज एक नया अर्थ ग्रहण करता है। इसे केवल निजी आनंद की संकीर्ण धारणा मानना उचित नहीं। सच्चा आत्मसुख आत्ममुग्धता नहीं है। वह भीतर की उस शांति और सत्य का अनुभव है जिसमें रचना जन्म लेती है। जब वह अनुभव प्रामाणिक होता है तो उसकी रोशनी दूसरे तक पहुंचती है। तुलसी अपने सुख के लिए लिखते हैं और उनकी रचना असंख्य लोगों के जीवन का हिस्सा बन जाती है। निजी से लोक की यह यात्रा साहित्य के सबसे सुंदर चमत्कारों में से एक है।

आज का रचनाकार भी यदि केवल भीड़ को प्रसन्न करने के लिए लिखेगा तो उसकी रचना भीड़ के साथ ही बदल जाएगी। लेकिन यदि वह अपने समय की सच्ची बेचैनी को भीतर से अनुभव करके लिखेगा, तो उसकी रचना अपने समय से आगे जाने की संभावना रखेगी। साहित्य का जीवन तत्काल तालियों में नहीं, दीर्घकालीन संवाद में होता है।

तुलसी की समकालीनता का असली रहस्य भी यही है। वे हमारे समय के आदमी की तरह नहीं लिखते, फिर भी हमारे समय के आदमी को छू लेते हैं। उनका समय बदल गया, जीवन की परिस्थितियां बदल गईं, सामाजिक संरचनाएं बदल गईं, भाषा का बहुत कुछ बदल गया, लेकिन मनुष्य की मूल बेचैनियां समाप्त नहीं हुईं। प्रेम, वियोग, सत्ता, परिवार, कर्तव्य, अकेलापन, करुणा, नैतिक निर्णय, प्रतिष्ठा, अपमान, संघर्ष और अर्थ की तलाश, ये सब आज भी हमारे जीवन में हैं।

इसलिए तुलसी को आज पढ़ने का अर्थ अतीत की ओर भागना नहीं है। इसका अर्थ अपने वर्तमान को एक गहरी सांस्कृतिक स्मृति के सामने रखकर देखना है।

राम को भी इसी तरह पढ़ना चाहिए। केवल आराधना के पात्र के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक प्रश्नों के केंद्र के रूप में। जब व्यक्तिगत इच्छा और उत्तरदायित्व टकराते हैं तो मनुष्य क्या करे? जब सत्ता और नैतिकता आमने-सामने हों तो किसे प्राथमिकता मिले? जब संबंध और न्याय के बीच तनाव पैदा हो तो निर्णय कैसे हो? जब व्यक्ति को अपने सुख का त्याग करना पड़े तो त्याग का अर्थ क्या होगा? ये प्रश्न किसी एक युग के नहीं हैं।

इसीलिए तुलसी की रचना को केवल अतीत का धार्मिक दस्तावेज मानना उसकी साहित्यिक ऊर्जा को कम करना होगा। वह मनुष्य के व्यवहार और नैतिक कल्पना का विशाल आख्यान भी है। उसमें जीवन को अर्थ देने की कोशिश है। और जहां मनुष्य अर्थ खोजता है, वहां साहित्य की समकालीनता बनी रहती है।

लेकिन समकालीनता का अर्थ यह भी नहीं कि हम तुलसी के हर कथन को आज के लिए अक्षरशः स्वीकार कर लें। जीवित परंपरा के साथ संवाद में प्रश्न भी होते हैं। कुछ बातें आज पुनर्विचार मांगेंगी, कुछ नए अर्थ पाएंगी, कुछ से असहमति होगी और कुछ अप्रत्याशित रूप से हमारे समय की नई समस्याओं को समझने में सहायक होंगी। यही स्वस्थ पाठ है।

तुलसी की महानता इस बात में भी है कि उनकी रचना अपने पाठक को निष्क्रिय नहीं रहने देती। वह उसे भावुक करती है, लेकिन केवल भावुक नहीं छोड़ती; वह उसे नैतिक स्थिति के सामने खड़ा करती है। वह करुणा जगाती है, लेकिन करुणा के साथ निर्णय का प्रश्न भी उपस्थित करती है।

“कवित विवेक एक नहिं मोरे” तब एक विलक्षण साहित्यिक विडंबना बन जाता है। कवि अपने भीतर विवेक का अभाव घोषित करता है और उसकी कविता सदियों के विवेक का विषय बन जाती है। वह अपने कागद को कोरा कहता है और आने वाली पीढ़ियां उसी कागद पर अपने-अपने प्रश्न लिखती चली जाती हैं।

शायद महान रचना की यही पहचान है। लेखक लिखते समय जितना कहता है, उससे कहीं अधिक वह आने वाले समय को कहने के लिए छोड़ जाता है।

तुलसी ने “नाना पुराण” से कथा ली, “रामायण” से संवाद किया, “अन्यतोऽपि” से स्रोतों की बहुलता स्वीकार की, “स्वान्तःसुखाय” से अपनी अंतःचेतना को आधार बनाया, “भाषानिबन्ध” से लोक की भाषा को प्रतिष्ठा दी और “कवित विवेक एक नहिं मोरे” कहकर अपने अहंकार को पीछे कर दिया। इन सबको जोड़ें तो तुलसी का कवि हमारे सामने एक ऐसे रचनाकार के रूप में आता है जो परंपरा से शक्ति लेता है, परंपरा का दास नहीं बनता; अपनी भाषा पर भरोसा करता है, पर भाषा को प्रदर्शन नहीं बनने देता; अपने अनुभव से लिखता है, पर अपने अनुभव को अंतिम सत्य नहीं मानता।

आज जब हर क्षेत्र में अंतिम सत्य बोलने की जल्दी है, तुलसी का यह विनय और भी अर्थवान हो उठता है। वे जैसे कह रहे हैं कि कविता अधिकार की घोषणा से नहीं, आत्मसंवाद से पैदा होती है। ज्ञान का अर्थ केवल जानना नहीं, अपनी सीमाओं को जानना भी है। और रचना का अर्थ केवल कहना नहीं, सुनना भी है।

कोरा कागद आज भी हमारे सामने है। फर्क इतना है कि आज कागद की जगह स्क्रीन है, अक्षरों की जगह त्वरित संदेश हैं और पाठक के पास असंख्य विकल्प। फिर भी मूल प्रश्न वही है: उस खाली जगह में हम क्या लिखेंगे? शोर, प्रचार, पूर्वाग्रह और तात्कालिक उत्तेजना, या ऐसा अनुभव जो मनुष्य को अपने भीतर थोड़ी देर ठहरने दे?

तुलसी का उत्तर उनके काव्य में है। वे पुरानी कथा लेकर आते हैं, लेकिन उसे ऐसा जीवन देते हैं कि वह हर युग में फिर से जन्म ले सके। यही किसी महाकाव्यात्मक कृति की असली शक्ति है। वह अपने समय की होकर भी अपने समय से बड़ी हो जाती है।

और शायद इसीलिए “नाना पुराण निगमागम…” से लेकर “कवित विवेक एक नहिं मोरे” तक तुलसी की पूरी काव्य-यात्रा एक सुंदर विरोधाभास में खिलती है: जितना कवि अपने ‘मैं’ को पीछे करता है, उतनी ही उसकी कविता आगे आती है; जितना वह अपने स्रोतों को स्वीकार करता है, उतना ही उसकी मौलिकता उजागर होती है; जितना वह स्वयं को छोटा कहता है, उतना ही उसकी रचना का विस्तार दिखाई देता है।

तुलसी की समकालीनता अंततः उनके उत्तरों में कम, उनके द्वारा जीवित किए गए प्रश्नों में अधिक है। यही कारण है कि सदियां बीत जाने पर भी उनकी कविता हमारे सामने बैठी हुई लगती है, जैसे कोई बहुत पुराना वृक्ष जिसकी छाया में आकर नया मनुष्य भी अपनी थकान पहचान ले। कथा पुरानी है, मनुष्य नया है, समय नया है, प्रश्न नए हैं; फिर भी कहीं भीतर एक पहचान बची हुई है। उसी पहचान का नाम साहित्य है, और उसी जीवित पहचान में तुलसी आज भी हमारे समकालीन हैं।


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