— परिचय दास —
रक्षाबंधन आते ही घर के भीतर एक बहुत पुरानी ध्वनि लौट आती है। कहीं थाली में रोली सजती है, कहीं अक्षत की छोटी-सी चमक दिखाई देती है, कहीं मिठाई की गंध बचपन की स्मृतियों को अचानक जगा देती है और कहीं बहन अपने भाई की कलाई पर एक पतली-सी डोरी बाँधते हुए वर्षों को एक क्षण में समेट लेती है। लगता है जैसे समय ने अपनी तेज चाल थोड़ी देर के लिए रोक दी हो और बचपन फिर से आँगन में आकर बैठ गया हो।
लेकिन हर परंपरा के भीतर एक ऐसा क्षण आता है जब उसे केवल निभाना नहीं, समझना भी पड़ता है। रक्षाबंधन के साथ भी ऐसा ही है। सदियों से हम कहते आए हैं कि राखी का अर्थ है भाई बहन की रक्षा करेगा। इस अर्थ में स्नेह है, लेकिन आज की चेतना के लिए यह अर्थ अधूरा है। बहन कोई असहाय देह नहीं जिसकी सुरक्षा किसी पुरुष के हाथ में सौंप दी जाए और भाई कोई नियुक्त प्रहरी नहीं जिसे उसके जीवन की चौकीदारी करनी हो। मनुष्य की गरिमा किसी दूसरे मनुष्य की पहरेदारी पर निर्भर नहीं हो सकती।
राखी को आज शायद “रक्षा” की अपेक्षा “संबंध” के विज्ञान और सौंदर्य से पढ़ना अधिक सार्थक होगा।
विज्ञान हमें बताता है कि मनुष्य मूलतः संबंधपरक प्राणी है। हमारे मस्तिष्क की संरचना केवल संसार को समझने के लिए नहीं बनी; वह दूसरे मनुष्यों की उपस्थिति, संकेतों, आवाजों, चेहरे और स्पर्श को पहचानने और उनके अर्थ ग्रहण करने के लिए भी निरंतर सक्रिय रहती है। हमारा मस्तिष्क अकेलेपन और अपनत्व के बीच अंतर करता है। किसी विश्वसनीय व्यक्ति की उपस्थिति तनाव के अनुभव को बदल सकती है; आत्मीय संवाद भावनात्मक संतुलन में सहायक हो सकता है; और सुरक्षित सामाजिक संबंध व्यक्ति को संकटों से उबरने की क्षमता दे सकते हैं।
इसलिए राखी का धागा वैज्ञानिक अर्थ में कोई सुरक्षा-कवच नहीं है। उसके रेशों में कोई अदृश्य शक्ति नहीं छिपी। लेकिन मनुष्य अर्थों का ऐसा अद्भुत प्राणी है कि वह एक साधारण धागे को स्मृति, विश्वास और आत्मीयता का वाहक बना देता है। धागा शरीर को नहीं बचाता; वह संबंध की स्मृति को सक्रिय करता है। कलाई पर उसका स्पर्श हमें उस व्यक्ति की याद दिलाता है जिसके साथ हमारा जीवन किसी गहरी भावनात्मक कथा से जुड़ा हुआ है।
स्पर्श स्वयं मनुष्य के सामाजिक अनुभव का प्राचीन माध्यम है। जन्म से पहले ही मनुष्य स्पर्श की दुनिया में प्रवेश करता है। माँ की त्वचा, गोद की ऊष्मा, हाथ का सहारा, माथे पर रखा हुआ स्नेहिल स्पर्श, ये सब शब्दों से पहले की भाषाएँ हैं। इसलिए राखी बाँधने का क्षण केवल एक धार्मिक या पारिवारिक अनुष्ठान नहीं; वह स्पर्श, स्मृति और संबंध की एक सांस्कृतिक भाषा भी है।
एक पतली डोरी कलाई से कहती है कि तुम्हें याद किया गया है।
और शायद मनुष्य के लिए इससे बड़ी सामाजिक सूचना कोई नहीं कि उसे याद किया गया है।
मनोविज्ञान की दृष्टि से भी आत्मीय संबंधों का मूल्य इसी जगह खुलता है। जीवन में तनाव अपरिहार्य है, लेकिन तनाव का अनुभव केवल बाहरी परिस्थिति से निर्धारित नहीं होता। व्यक्ति के पास कौन है, वह किससे अपनी बात कह सकता है, किसके सामने उसे अपने असफल होने पर भी अपना सम्मान बचा हुआ महसूस होता है, ये सब उसके अनुभव को बदलते हैं। इस अर्थ में भाई-बहन का संबंध एक प्रकार की भावनात्मक पूँजी है, जिसका मूल्य बैंक के खाते में दिखाई नहीं देता, लेकिन जीवन के कठिन समय में उसका महत्व अचानक बहुत स्पष्ट हो जाता है।
राखी इसी अदृश्य पूँजी का वार्षिक स्मरण हो सकती है।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आवश्यक है। यदि भाई बहन की रक्षा करता है, तो बहन भी भाई के भावनात्मक संसार की रक्षा करती है। यदि भाई संकट में उसके साथ खड़ा होता है, तो बहन भी उसके अकेलेपन में उसके पास होती है। यदि भाई उसके अधिकारों और सम्मान के लिए आवाज उठाता है, तो बहन भी उसके आत्मसम्मान और मानसिक स्वतंत्रता के लिए उतनी ही सजग हो सकती है। संबंध में एक ही व्यक्ति हमेशा रक्षक और दूसरा हमेशा संरक्षित रहे, तो वह आत्मीयता नहीं, असमानता की संरचना बन जाती है।
आज की राखी इस असमानता को बदल सकती है।
वह कह सकती है कि हमें एक-दूसरे की रक्षा करनी है, लेकिन एक-दूसरे से नहीं।
हमें एक-दूसरे को हिंसा, अपमान, अन्याय, अकेलेपन और निराशा से बचाने का प्रयत्न करना है; लेकिन एक-दूसरे की स्वतंत्रता से नहीं। हमें एक-दूसरे के जीवन को सुरक्षित बनाना है, लेकिन उस जीवन का निर्णय अपने हाथ में नहीं लेना है।
यहीं “रक्षा” का अर्थ एक गहरी सामाजिक अवधारणा में बदल जाता है।
किसी स्त्री से यह कहना कि “मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ, इसलिए तुम यह नहीं कर सकती”, सुरक्षा नहीं है। यह नियंत्रण है। किसी पुरुष से यह कहना कि “तुम पुरुष हो, इसलिए तुम्हें हमेशा मजबूत रहना चाहिए”, यह भी सम्मान नहीं, उसके भावनात्मक अस्तित्व पर लगाया गया एक सामाजिक अनुशासन है। दोनों ही स्थितियों में मनुष्य को उसकी पूर्णता से काट दिया जाता है।
सच्ची रक्षा उस समय होती है जब हम दूसरे मनुष्य को उसकी संपूर्णता में स्वीकार करते हैं।
उसे निर्णय लेने देते हैं।
उसे असफल होने देते हैं।
उसे अपनी राह चुनने देते हैं।
उसे असहमत होने देते हैं।
उसे रोने देते हैं।
उसे बदलने देते हैं।
और जब जीवन उसे थका देता है, तब बिना किसी उपदेश के उसके पास बैठ जाते हैं।
शायद राखी का सबसे वैज्ञानिक अर्थ यही है कि वह संबंधों को “सुरक्षित आधार” में बदलने की संभावना रखती है। मनोवैज्ञानिक विकास में सुरक्षित संबंध व्यक्ति को संसार में आगे बढ़ने का साहस देते हैं। जिस व्यक्ति को पता हो कि उसके पीछे कोई विश्वसनीय संबंध है, वह संसार की ओर अधिक निर्भयता से देख सकता है। इसलिए संबंध का उद्देश्य व्यक्ति को अपने भीतर बाँधकर रखना नहीं, बल्कि उसे दुनिया में जाने का आत्मविश्वास देना होना चाहिए।
राखी की डोरी तब एक अद्भुत विरोधाभास बन जाती है।
वह बाँधती है, ताकि मनुष्य अधिक स्वतंत्र हो सके।
यह विरोधाभास ही इसकी सबसे सुंदर सांस्कृतिक शक्ति है।
वास्तविक संबंध वह नहीं जो हमें अपने घेरे में कैद कर ले। वास्तविक संबंध वह है जिसकी उपस्थिति हमें अपना आकाश चुनने का साहस देती है। यदि भाई बहन से कहता है, “तुम्हें मेरी वजह से अपने जीवन के निर्णय बदलने की जरूरत नहीं”, तो वह शायद किसी भी पारंपरिक रक्षा-वचन से अधिक आधुनिक और अधिक मानवीय बात कह रहा है।
और बहन यदि भाई से कहती है, “तुम्हें हर समय मजबूत बने रहने की जरूरत नहीं; तुम्हारी कमजोरियाँ भी मेरे लिए उतनी ही स्वीकार्य हैं”, तो वह भी राखी की डोरी को एक नए अर्थ में बाँध रही है।
यहाँ विज्ञान और संस्कृति एक-दूसरे से मिलते हैं।
विज्ञान हमें मनुष्य के मस्तिष्क, भावनाओं, तनाव और सामाजिक व्यवहार के बारे में बताता है; संस्कृति उन तथ्यों को अर्थ और स्मृति देती है। विज्ञान कह सकता है कि विश्वसनीय सामाजिक संबंध मनुष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं; संस्कृति उसी सत्य को एक डोरी, एक थाली, एक स्पर्श और एक त्योहार में बदल देती है। विज्ञान संबंध की प्रक्रिया को समझता है, संस्कृति उसे अनुभव करने की भाषा देती है।
इसीलिए त्योहारों को केवल अतीत की पुनरावृत्ति मानना भी ठीक नहीं। त्योहार जीवित संस्कृतियाँ हैं। वे हर पीढ़ी के साथ अपना अर्थ थोड़ा बदलते हैं। दीपावली में प्रकाश का अर्थ बदल सकता है, होली में रंगों का अर्थ बदल सकता है, और रक्षाबंधन में रक्षा का अर्थ भी बदल सकता है।
आज की राखी शायद देह की रक्षा से अधिक गरिमा की रक्षा की बात करे।
स्त्री की स्वतंत्रता की रक्षा।
पुरुष की संवेदनशीलता की रक्षा।
बच्चों की जिज्ञासा की रक्षा।
बुजुर्गों की गरिमा की रक्षा।
असहमति के अधिकार की रक्षा।
और अंततः मनुष्य के भीतर बचे हुए मनुष्य की रक्षा।
इस अर्थ में रक्षाबंधन केवल भाई-बहन का निजी उत्सव नहीं रह जाता। वह समाज को यह स्मरण कराने वाला दिन बन सकता है कि कोई भी संबंध तब तक सुंदर नहीं हो सकता जब तक उसमें दूसरे की स्वतंत्रता के लिए पर्याप्त स्थान न हो।
राखी की डोरी को बहुत कसकर बाँध दिया जाए तो कलाई पर निशान पड़ जाता है। संबंधों के साथ भी यही है। प्रेम को इतना कसकर बाँध दिया जाए कि दूसरे की साँस ही कठिन हो जाए, तो वह प्रेम नहीं रहता। वह अधिकार में बदल जाता है। डोरी का सौंदर्य उसकी कसावट में नहीं, उसके संतुलन में है।
इतनी निकटता कि दूरी में भी अपनापन बना रहे।
इतनी आत्मीयता कि स्वतंत्रता नष्ट न हो।
इतना विश्वास कि निगरानी की जरूरत न पड़े।
शायद यही आधुनिक संबंधों की सबसे कठिन और सबसे सुंदर कला है।
इसलिए इस रक्षाबंधन पर राखी की ओर देखते हुए हम एक पुराने प्रश्न को नए ढंग से पूछ सकते हैं: किसकी रक्षा करनी है?
उत्तर शायद यह नहीं कि भाई बहन की रक्षा करेगा।
उत्तर यह हो सकता है कि हमें उस संबंध की रक्षा करनी है जिसमें दोनों बराबर हैं; उस विश्वास की रक्षा करनी है जिसमें कोई भय नहीं; उस स्वतंत्रता की रक्षा करनी है जिसमें कोई स्वामित्व नहीं; उस स्मृति की रक्षा करनी है जिसमें बचपन अभी भी जीवित है; और उस मनुष्यता की रक्षा करनी है जो आधुनिक जीवन की भागदौड़ में धीरे-धीरे कठोर होती जा रही है।
राखी तब कलाई पर बँधी हुई एक छोटी-सी डोरी से अधिक हो जाती है। वह मनुष्य के मस्तिष्क और स्मृति, स्पर्श और संवेदना, परिवार और समाज, स्वतंत्रता और आत्मीयता के बीच एक सूक्ष्म सेतु बन जाती है।
बहन जब भाई की कलाई पर राखी बाँधे तो उस क्षण का अर्थ यह हो सकता है: “मैं तुम्हें बाँध नहीं रही, तुम्हारे साथ अपना दुलार भरा संबंध स्वीकार कर रही हूँ।”
भाई जब उस डोरी को देखे तो उसका अर्थ यह हो सकता है: “ तुम्हारे अधिकार, तुम्हारे निर्णय और तुम्हारे स्वप्न मेरे सम्मान के विषय हैं।”
और दोनों मिलकर शायद इतना कह सकें:
हम एक-दूसरे के पहरेदार नहीं हैं।
हम एक-दूसरे की स्वतंत्रता के साक्षी हैं।
तब रक्षाबंधन अतीत का केवल स्मृति-पर्व नहीं रहेगा। वह भविष्य की ओर खुलती हुई संस्कृति का पर्व बन जाएगा।
एक ऐसी संस्कृति, जिसमें संबंध मनुष्य को छोटा नहीं करते, बड़ा बनाते हैं; प्रेम उसकी उड़ान नहीं रोकता, उसके आकाश को विस्तृत करता है; और राखी की डोरी कलाई को बाँधते हुए भी मनुष्य की आत्मा को मुक्त रहने देती है।
शायद यही उस छोटे-से धागे का सबसे बड़ा विज्ञान है और सबसे सुंदर काव्य भी।
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