असम के समाजवादी आंदोलन के इतिहास में Barbora का नाम एक ऐसे नेता के रूप में सामने आता है, जिन्होंने सार्वजनिक जीवन में नैतिकता, सादगी, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनी राजनीति का आधार बनाया। उनके जीवन और राजनीतिक यात्रा को केवल एक मुख्यमंत्री या समाजवादी नेता की कहानी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। Golap Barbora की राजनीतिक विरासत असम में समाजवादी आंदोलन के विकास, श्रमिक आंदोलनों, भूमि के सवाल, पूर्वोत्तर के लोकतांत्रिक एकीकरण तथा क्षेत्रीय वंचना के प्रश्नों से जुड़ी हुई है।
Golap Barbora की जन्मशती के अवसर पर उनके जीवन को पुनः याद करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मुख्यधारा में समाजवादी आंदोलन की चर्चा प्रायः उत्तर भारत तक सीमित दिखाई देती है। राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और समाजवादी आंदोलन की राष्ट्रीय भूमिका पर पर्याप्त चर्चा हुई है, लेकिन असम और पूर्वोत्तर भारत में समाजवादी राजनीति ने जिन विशिष्ट प्रश्नों को उठाया, उनका इतिहास अपेक्षाकृत कम सामने आया है। गुलाब बोरा के जीवन के माध्यम से इस उपेक्षित इतिहास को समझने का अवसर मिलता है।
प्रारंभिक जीवन और समाजवादी चेतना का निर्माण-
Golap Barbora का जन्म अगस्त 1925 में गोलाघाट में हुआ और उनका पालन-पोषण तिनसुकिया में हुआ। उनके राजनीतिक दृष्टिकोण के निर्माण में उनके पारिवारिक और सामाजिक परिवेश की महत्वपूर्ण भूमिका थी। विशेष रूप से 1939 की दो घटनाओं ने उनके जीवन को प्रभावित किया।
पहली घटना डिगबोई तेल रिफाइनरी में हुआ श्रमिक आंदोलन था। डिगबोई एशिया की प्रारंभिक तेल रिफाइनरियों में से एक थी और वहाँ श्रमिकों के अधिकारों को लेकर संघर्ष हुआ। Golap Barbora के पिता कोमल बोरा स्वयं श्रमिक आंदोलन और ट्रेड यूनियन गतिविधियों से जुड़े हुए थे। ब्रिटिश औपनिवेशिक हितों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए उन्होंने श्रमिकों के अधिकारों के प्रश्न को गंभीरता से उठाया। इस संघर्ष और उनके पिता के समर्पण ने युवा बोरा को श्रमिक वर्ग की समस्याओं और संगठित श्रमिक आंदोलन की शक्ति से परिचित कराया।
दूसरी घटना डिब्रूगढ़ क्षेत्र के स्टीमर कर्मचारियों की हड़ताल से जुड़ी थी। इस आंदोलन में कांग्रेस से जुड़े स्थानीय नेताओं की भूमिका थी, लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा आंदोलन को समाप्त करने का निर्देश दिया गया। बोरा ने इस घटना को श्रमिक हितों और राजनीतिक सत्ता के बीच के तनाव के रूप में देखा। इससे कांग्रेस की राजनीति के प्रति उनके मन में गहरा अविश्वास पैदा हुआ और आगे चलकर यही उनके समाजवाद तथा गैर-कांग्रेसवाद की राजनीतिक दिशा का महत्वपूर्ण आधार बना।
लोहिया और जयप्रकाश से प्रेरणा-
1940 के दशक के मध्य में Golap Barbora कलकत्ता गए। वहाँ छात्र जीवन के दौरान उन्हें डॉ. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी नेताओं को सुनने का अवसर मिला। इन नेताओं के विचारों ने उनके राजनीतिक चिंतन को प्रभावित किया।
1947-48 के आसपास असम में समाजवादी पार्टी के संगठनात्मक विस्तार के साथ गुलाब बोरा औपचारिक रूप से समाजवादी आंदोलन का हिस्सा बने। यह उस समय का दौर था जब स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और राष्ट्र-निर्माण की नई चुनौतियाँ थीं। बोरा ने इन प्रश्नों को असम की विशिष्ट परिस्थितियों से जोड़कर देखा।
1966-67 के दौरान वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बने। इसके बाद 1968 में वे समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा के लिए चुने गए और असम से राज्यसभा पहुँचने वाले पहले विपक्षी सदस्य बने। यह उपलब्धि उनके राष्ट्रीय राजनीतिक महत्व को दर्शाती है।
भूमि का प्रश्न और गरीबों के पक्ष में संघर्ष-
असम के समाजवादी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण मुद्दा भूमि का प्रश्न था। भूमि-विहीनता और भूमि के असमान वितरण को समाजवादियों ने सामाजिक अन्याय का प्रमुख कारण माना। यह प्रश्न केवल असम तक सीमित नहीं था; पूरे देश में समाजवादी आंदोलन भूमि सुधार और भूमि के पुनर्वितरण की मांग उठा रहा था।
डोयांग क्षेत्र में समाजवादियों ने भूमि-विहीन लोगों को भूमि दिलाने के लिए सत्याग्रह किया। उस समय वहाँ चाय बागानों के नियंत्रण में बड़ी मात्रा में अनुपयोगी भूमि थी। समाजवादियों ने मांग की कि ऐसी भूमि को भूमि-विहीन किसानों में वितरित किया जाए। बोरा ने युवा कार्यकर्ता के रूप में इस संघर्ष में सक्रिय भाग लिया।
यह संघर्ष तत्काल सफल नहीं हुआ, लेकिन इसकी स्मृति समाप्त नहीं हुई। जब बोरा 1978 में असम के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने डोयांग क्षेत्र के भूमि-विहीन किसानों को भूमि उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाया। जिस आंदोलन में वे कभी एक कार्यकर्ता के रूप में शामिल हुए थे, सत्ता में आने के बाद उन्होंने उसी मांग को नीति के स्तर पर आगे बढ़ाया। इस अर्थ में उनके राजनीतिक जीवन में आंदोलन और शासन के बीच एक महत्वपूर्ण निरंतरता दिखाई देती है।
पूर्वोत्तर और राष्ट्रीय एकीकरण का प्रश्न-
असम के समाजवादी आंदोलन की एक विशिष्ट विशेषता यह थी कि उसने पूर्वोत्तर भारत के प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास किया। स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन NEFA (North-East Frontier Agency) , जो आज अरुणाचल प्रदेश है, को लंबे समय तक अपेक्षाकृत अलग-थलग प्रशासनिक व्यवस्था के तहत रखा गया। वहाँ लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और आम नागरिकों की स्वतंत्र आवाजाही से संबंधित अनेक सीमाएँ थीं।
डॉ. राममनोहर लोहिया ने पूर्वोत्तर के इस अलगाववादी प्रशासनिक दृष्टिकोण का विरोध किया। उनका मानना था कि पूर्वोत्तर को भारत से अलग-थलग रखने के बजाय लोकतांत्रिक संस्थाओं, स्वायत्तता और सम्मान के साथ राष्ट्रीय जीवन में शामिल किया जाना चाहिए। बोरा और असम के अन्य समाजवादी नेता इस प्रयास में उनके साथ खड़े रहे।
लोहिया ने NEFA में प्रवेश के लिए कई सत्याग्रह किए। 1963 में उनके एक प्रयास में वे असम के समाजवादी कार्यकर्ताओं के साथ आगे बढ़े और बोमडिला तक पहुँचने में सफल हुए। यह केवल प्रशासनिक प्रतिबंध को चुनौती देने का प्रयास नहीं था, बल्कि यह संदेश भी था कि राष्ट्रीय एकता का अर्थ केंद्रीकरण या सांस्कृतिक समरूपीकरण नहीं है।
समाजवादी दृष्टिकोण में एकता और पहचान दोनों का सम्मान आवश्यक था। पूर्वोत्तर को भारत की मुख्यधारा में शामिल करने का अर्थ वहाँ की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को समाप्त करना नहीं, बल्कि लोकतंत्र, स्वायत्तता, संवाद और समान नागरिकता के आधार पर संबंध स्थापित करना था।
Relative deprivation (सापेक्ष वंचना) का प्रश्न-
असम के समाजवादी आंदोलन की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता थी—सापेक्ष वंचना (relative deprivation) के प्रश्न को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाना। असम प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध था, विशेषकर तेल और चाय के क्षेत्र में, लेकिन इसके बावजूद राज्य विकास के कई मानकों पर पिछड़ा हुआ था। समाजवादियों ने इस विरोधाभास को रेखांकित किया कि संसाधन असम के हैं, लेकिन उनके लाभ का पर्याप्त हिस्सा राज्य और स्थानीय समाज को नहीं मिलता।
इसी संदर्भ में असम में दूसरी तेल रिफाइनरी की मांग का आंदोलन महत्वपूर्ण था। जब केंद्र सरकार ने दूसरी रिफाइनरी के लिए असम के बजाय बिहार के बरौनी को चुना, तो असम के समाजवादियों ने इसका विरोध किया। गुलाब बोरा इस आंदोलन में सक्रिय थे। अंततः असम में दूसरी रिफाइनरी स्थापित करने की मांग स्वीकार हुई और गुवाहाटी में रिफाइनरी स्थापित की गई।
इसी प्रकार ब्रह्मपुत्र पर पुल की मांग भी विकासात्मक वंचना के सवाल से जुड़ी थी। समाजवादियों ने प्रश्न उठाया कि यदि गंगा पर अनेक पुल हैं, तो ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल नदी पर पुल क्यों नहीं है? इस प्रकार विकास की मांग को उन्होंने क्षेत्रीय असमानता और न्याय के प्रश्न से जोड़ा।
1978: असम के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री-
गुलाब बोरा के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण चरण 1978 में आया, जब वे असम के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल केवल लगभग 18 महीने का रहा, लेकिन इस छोटी अवधि में उन्होंने समाजवादी विचारों को शासन की नीतियों में बदलने का प्रयास किया।
मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके शुरुआती महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक था दसवीं कक्षा तक शिक्षा को निःशुल्क करना। यह कदम शिक्षा को सामाजिक अधिकार के रूप में देखने वाली समाजवादी दृष्टि का उदाहरण था।
उनकी सरकार ने छोटे चाय बागानों की अवधारणा को भी प्रोत्साहित किया। उस समय असम का चाय उद्योग बड़े पूंजीगत समूहों के प्रभाव में था। छोटे और मध्यम वर्ग के स्थानीय युवाओं के लिए इस क्षेत्र में प्रवेश करना कठिन था। छोटे चाय बागानों की नीति ने अपेक्षाकृत कम पूंजी वाले लोगों के लिए चाय उत्पादन में प्रवेश की संभावनाएँ खोलीं।
यह नीति लोहिया के छोटी इकाई की मशीन और विकेंद्रीकृत आर्थिक विकास की व्यापक अवधारणा से जोड़ी जा सकती है—ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें रोजगार का विस्तार हो और उत्पादन के साधनों पर केवल बड़े पूंजीगत समूहों का नियंत्रण न रहे।
आज असम में बड़ी संख्या में छोटे चाय उत्पादकों की उपस्थिति इस प्रयोग की दीर्घकालीन विरासत को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है।
रेलवे हड़ताल और आपातकाल का दौर-
Golap Barbora केवल चुनावी राजनीति के नेता नहीं थे। वे श्रमिक और लोकतांत्रिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहे। 1974 की ऐतिहासिक रेलवे हड़ताल में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और गिरफ्तार हुए।
आपातकाल के दौरान भी वे गिरफ्तार किए गए और लंबे समय तक जेल में रहे। आपातकाल समाप्त होने के बाद भी वे असम में लंबे समय तक राजनीतिक बंदी रहे। इस प्रकार उनका जीवन लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा के संघर्ष से भी जुड़ा हुआ था।
उनका सार्वजनिक जीवन इस बात का उदाहरण है कि समाजवादी राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने की राजनीति नहीं थी, बल्कि लोकतांत्रिक स्वतंत्रता, श्रमिक अधिकार और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष की राजनीति भी थी।
असम आंदोलन और समाजवादी राजनीति का अवसान-
1979 के बाद असम आंदोलन ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। क्षेत्रीय अस्मिता, प्रवासन और नागरिकता से जुड़े प्रश्नों ने राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया। इसके बाद असम गण परिषद जैसी क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति का उदय हुआ।
इस परिवर्तन के साथ समाजवादी आंदोलन का प्रभाव लगातार कम होता गया। इसके पीछे केवल राजनीतिक परिस्थितियाँ ही जिम्मेदार नहीं थीं। संगठनात्मक कमजोरी, संसाधनों की कमी और दूसरी पीढ़ी के नेतृत्व को प्रभावी ढंग से विकसित न कर पाना भी समाजवादी आंदोलन के कमजोर होने के महत्वपूर्ण कारण थे।
Golap Barbora का सक्रिय राजनीतिक जीवन भी धीरे-धीरे समाप्त हुआ। उन्होंने बाद में समता पार्टी से दूरी बनाई और 2006 में उनका निधन हो गया।
Golap Barbora की विरासत-
Golap Barbora की विरासत को केवल उनके 18 महीने के मुख्यमंत्री कार्यकाल या उनके द्वारा धारण किए गए राजनीतिक पदों से नहीं मापा जा सकता। उनका महत्व उस राजनीतिक नैतिकता में है जिसे उन्होंने अपने जीवन में स्थापित किया।
उनकी राजनीति में कुछ प्रमुख तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं—सामाजिक न्याय, श्रमिक अधिकार, भूमि सुधार, शिक्षा का सार्वभौमीकरण, विकेंद्रीकृत आर्थिक विकास, क्षेत्रीय समानता, लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और पूर्वोत्तर की गरिमा के साथ राष्ट्रीय एकीकरण।
उनका जीवन यह भी दिखाता है कि समाजवाद एक समान राजनीतिक फार्मूला नहीं था। असम के समाजवादियों ने राष्ट्रीय समाजवादी विचारों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाला। जहाँ पूरे भारत में भूमि और सामाजिक न्याय के प्रश्न महत्वपूर्ण थे, वहीं असम में तेल, चाय, ब्रह्मपुत्र, क्षेत्रीय विकास, पूर्वोत्तर की पहचान और सापेक्ष वंचना जैसे मुद्दे भी समाजवादी राजनीति के केंद्रीय प्रश्न बने।
Golap Barbora को याद करना इसलिए केवल अतीत को याद करना नहीं है। यह उस संभावना को फिर से तलाशना है जिसमें राजनीति नैतिकता, सामाजिक न्याय और सार्वजनिक उत्तरदायित्व से जुड़ी हो। उनकी कहानी यह प्रश्न भी हमारे सामने रखती है कि आज के भारत में समाजवादी आंदोलन की कमजोरियों से क्या सीखा जा सकता है और सामाजिक न्याय, लोकतंत्र तथा क्षेत्रीय समानता की राजनीति को नई पीढ़ी के बीच किस प्रकार पुनर्जीवित किया जा सकता है।
Golap Barbora का जीवन अंततः यह संदेश देता है कि राजनीति का मूल्य केवल सत्ता में रहने की अवधि से तय नहीं होता। कभी-कभी एक छोटा राजनीतिक कार्यकाल भी ऐसी नीतियों और आदर्शों की नींव रख सकता है जिनका प्रभाव दशकों तक समाज में दिखाई देता है। उनकी जन्मशती ऐसे ही एक समाजवादी, लोकतांत्रिक और नैतिक राजनीतिक जीवन को पुनः समझने का अवसर है।
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