
— परिचय दास —
।। एक।।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना को पढ़ना केवल किसी आलोचक के साहित्यिक निष्कर्षों से गुजरना नहीं है बल्कि उस मनुष्य के भीतर प्रवेश करना है जो साहित्य को जीवन से अलग करके देखने को तैयार नहीं है। उनके यहाँ आलोचना किसी रचना पर बाहर से लगाया गया निर्णय नहीं, रचना के भीतर घटित अनुभव को समझने की एक संवेदनशील प्रक्रिया है। इसलिए उनकी आलोचना में तर्क है पर तर्क अकेला नहीं; विचार है, पर विचार निर्जीव नहीं; दर्शन है, पर दर्शन साहित्य के ऊपर बैठा हुआ कोई भारी पत्थर नहीं। वह रचना के अनुभव में घुला हुआ है। यही कारण है कि नंदकिशोर आचार्य की आलोचना पढ़ते हुए आलोचक से अधिक एक ऐसे सहयात्री का अनुभव होता है जो पाठक को रचना के भीतर की उन पगडंडियों पर ले जाता है जहाँ अर्थ धीरे-धीरे खुलता है।
उनकी आलोचना-दृष्टि का एक महत्वपूर्ण आधार यह विश्वास है कि साहित्य को केवल उसके कथ्य, शिल्प या सामाजिक उपयोगिता से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। साहित्य मनुष्य के अनुभव की जटिलता से जन्म लेता है और उसी जटिलता में अपना अर्थ प्राप्त करता है। इसीलिए आचार्य रचना को उसके अनुभव-संसार के साथ पढ़ते हैं। उनके लिए कविता केवल कही हुई बात नहीं है बल्कि वह चेतना है जिसमें कोई बात कहे जाने योग्य बनती है। शब्द उसके बाद आते हैं। पहले जीवन का स्पर्श होता है, भीतर कोई कंपन पैदा होता है, अनुभव अपनी आकृति खोजता है और फिर भाषा उसका घर बनती है। आलोचक का काम उस घर की दीवारें गिनना नहीं, यह समझना है कि उसके भीतर कैसी रोशनी जल रही है।
यहीं से उनकी आलोचना में ‘अनुभव’ की केंद्रीयता सामने आती है। ‘अनुभव का भव’ जैसी कृति का शीर्षक ही इस ओर संकेत करता है कि अनुभव उनके लिए स्थिर घटना नहीं है। अनुभव घटता है, बदलता है, स्मृति में जाता है, चेतना में लौटता है और रचना में एक नया रूप ग्रहण करता है। साहित्यकार किसी घटना की रिपोर्ट नहीं लिखता; वह अनुभव को अर्थ में बदलता है। इस परिवर्तन की प्रक्रिया को समझे बिना रचना की असली प्रकृति तक पहुँचना संभव नहीं। आचार्य की आलोचना इसी सूक्ष्म परिवर्तन को पकड़ने का प्रयास करती है।
उनके यहाँ आलोचना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि वे रचना और रचनाकार के संबंध को सरल मनोवैज्ञानिक सूत्र में नहीं बाँधते। रचनाकार की जीवनी जान लेना उसकी रचना को जान लेना नहीं है। लेखक के जीवन में जो घटा, वह साहित्य में उसी रूप में नहीं आता। वह रचनात्मक चेतना से गुजरता है और वहाँ उसका रूप बदल जाता है। ‘सर्जक का मन’ इसी रचनात्मक अंतःप्रक्रिया को समझने की दिशा में महत्त्वपूर्ण है। यहाँ ‘मन’ केवल भावुकता का दूसरा नाम नहीं, बल्कि वह पूरा आंतरिक क्षेत्र है जहाँ संवेदना, स्मृति, कल्पना, मूल्य-बोध और भाषा एक-दूसरे से संवाद करते हैं।
इस दृष्टि से नंदकिशोर आचार्य की आलोचना में एक विशेष मानवीय गरमाहट दिखाई देती है। वे रचना को dissect करने वाले आलोचक नहीं हैं। उनके यहाँ रचना कोई शव नहीं कि उसे मेज पर रखकर उसकी नसें, हड्डियाँ और अंग अलग-अलग दिखाए जाएँ। वह जीवित अनुभव है। उसे समझने के लिए उसके साथ कुछ देर रहना पड़ता है। उसकी धड़कन सुननी पड़ती है। यही उनकी आलोचना की ललितता है। यह ललितता सजावटी भाषा से पैदा नहीं होती, बल्कि विचार के भीतर मौजूद संवेदना से पैदा होती है।
उनकी भाषा में दार्शनिकता भी इसी कारण बोझिल नहीं होती। वे साहित्य पर दर्शन थोपते नहीं, बल्कि साहित्य के भीतर से दर्शन की संभावना खोजते हैं। साहित्य मनुष्य को क्या बनाता है, मनुष्य अपने अनुभव को भाषा में कैसे पहचानता है, स्वतंत्रता और सर्जनात्मकता का क्या संबंध है, परंपरा व्यक्ति की चेतना को किस प्रकार प्रभावित करती है, रचना में सत्य का स्वरूप क्या है, ऐसे प्रश्न उनकी आलोचना को सामान्य साहित्यिक विवेचन से ऊपर उठाकर व्यापक मानवीय चिंतन से जोड़ते हैं।
‘साहित्य का स्वभाव’ में यह प्रवृत्ति विशेष रूप से दिखाई देती है। साहित्य को किसी एक प्रयोजन में बाँध देना आचार्य की दृष्टि में उसकी प्रकृति को छोटा करना होगा। साहित्य का स्वभाव उसके अनेक स्तरों में खुलता है। वह मनुष्य की स्वतंत्रता से जुड़ता है, भाषा से जुड़ता है, अनुभव से जुड़ता है और उस आंतरिक बेचैनी से भी जुड़ता है जिसके बिना रचना संभव नहीं। इसीलिए उनके लिए साहित्य केवल मनोरंजन या सूचना का माध्यम नहीं है। वह मनुष्य के आत्मबोध की प्रक्रिया है।
उनकी आलोचना में ‘सत्य’ का प्रश्न भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। पर साहित्य का सत्य उनके यहाँ किसी तैयार सिद्धांत की तरह नहीं आता। रचना अपने भीतर जिस अनुभव को सच्चा बनाती है, वही उसका साहित्यिक सत्य है। कोई कविता तथ्यात्मक रूप से किसी घटना का विवरण न दे, फिर भी वह जीवन के बारे में ऐसा सत्य उद्घाटित कर सकती है जिसे तथ्य नहीं पकड़ पाते। आलोचना का दायित्व इसी सत्य को पहचानना है। यहाँ आलोचक न्यायाधीश कम और अन्वेषक अधिक हो जाता है।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना की एक विशेषता यह भी है कि वे साहित्य को मनुष्य की स्वतंत्रता से जोड़ते हैं। उनके व्यापक चिंतन में स्वतंत्रता कोई राजनीतिक नारा भर नहीं, बल्कि मनुष्य के अस्तित्व की मूल आवश्यकता है। रचनात्मकता उसी स्वतंत्रता की एक गहरी अभिव्यक्ति है। जब मनुष्य अपने अनुभव को स्वयं पहचानता है और उसे अपनी भाषा देता है, तभी वह किसी पूर्वनिर्धारित साँचे से बाहर निकलता है। इसलिए रचना मूलतः आत्मनिर्माण की प्रक्रिया भी है।
यही कारण है कि उनकी आलोचना में लेखक और पाठक दोनों के लिए जगह है। रचना केवल लेखक की संपत्ति नहीं रहती। वह पाठक के अनुभव में पुनः जन्म लेती है। आलोचक इस पुनर्जन्म की प्रक्रिया का साक्षी होता है। वह अर्थ को बंद नहीं करता, खोलता है। इस अर्थ में आचार्य की आलोचना किसी अंतिम निर्णय की आलोचना नहीं, बल्कि संवाद की आलोचना है।
उनकी आलोचना का सौंदर्य यह है कि वह हमें साहित्य के बारे में सोचने के साथ-साथ अपने अनुभव के बारे में सोचने के लिए भी बाध्य करती है। एक अच्छी आलोचना वही है जो रचना को समाप्त नहीं करती, बल्कि पाठक के भीतर उसे फिर से आरंभ कर देती है। नंदकिशोर आचार्य की आलोचना में यह आरंभ बार-बार दिखाई देता है। उनके लिए साहित्य पर विचार करना अंततः मनुष्य पर विचार करना है और मनुष्य पर विचार करना उसके अनुभव, स्वतंत्रता, संवेदना और सत्य पर विचार करना है। इसलिए उनकी आलोचना किसी पुस्तक की व्याख्या भर नहीं रह जाती; वह धीरे-धीरे मनुष्य की आंतरिक यात्रा का आख्यान बन जाती है।
।। दो।।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना का महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी रचना-केंद्रित दृष्टि है। वे साहित्य को किसी पहले से तय वैचारिक खाँचे में रखकर उसका मूल्य निर्धारित करने के बजाय रचना के भीतर उपस्थित जीवनानुभव से अपना आलोचनात्मक विवेक विकसित करते हैं। उनके यहाँ आलोचक की प्रतिष्ठा इस बात में नहीं कि वह रचना के ऊपर अपना सिद्धांत कितनी ऊँचाई से रख सकता है, बल्कि इस बात में है कि वह रचना के भीतर उतरकर उसके मौन, उसकी बेचैनी, उसकी आकांक्षा और उसकी भाषा के सूक्ष्म कंपन को कितना पहचान पाता है। आलोचना इसीलिए उनके लिए रचना पर अधिकार जमाने की क्रिया नहीं, उसके सामने अपने अहं को थोड़ा पीछे हटाने की कला है।
इस दृष्टि का संबंध उनकी पुस्तक ‘रचना का सच’ से विशेष रूप से समझा जा सकता है। ‘सच’ यहाँ केवल कथ्य की सत्यता नहीं है। साहित्यिक रचना का सच उसके अनुभव की प्रामाणिकता, उसकी संवेदना की ईमानदारी और उसकी अभिव्यक्ति की आंतरिक संगति में निहित होता है। किसी रचना में बड़े-बड़े विचार हों, सामाजिक सरोकार हों, सुंदर भाषा हो, लेकिन यदि उसके भीतर अनुभव की सच्चाई नहीं है तो वह रचना भीतर से खोखली रह सकती है। दूसरी ओर, एक छोटी-सी कविता या मामूली-सी कहानी जीवन के किसी अनदेखे सत्य को छू सकती है। आचार्य की आलोचना इसी अंतर को पहचानने की कोशिश करती है।
यहाँ उनकी आलोचना की एक बड़ी खूबी सामने आती है: वे साहित्य के मूल्य को केवल उसके ‘विषय’ से तय नहीं करते। विषय बड़ा होने से रचना बड़ी नहीं हो जाती। मनुष्य की पीड़ा पर लिखना और पीड़ा को साहित्य में अनुभव करा देना दो अलग बातें हैं। प्रेम पर लिखना और प्रेम की अनुभूति को भाषा में इस तरह उपस्थित कर देना कि पाठक अपने भीतर उसे पहचान ले, दो अलग बातें हैं। इसी तरह स्वतंत्रता पर लिखना और भाषा को ही स्वतंत्र अनुभव की तरह बरतना भी अलग-अलग स्थितियाँ हैं। आचार्य की आलोचना इन भेदों को पकड़ती है।
उनके आलोचनात्मक विवेक में भाषा इसलिए केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है। भाषा स्वयं रचनात्मक अनुभव का अंग है। लेखक जो कहना चाहता है, वह हमेशा उसी रूप में भाषा में नहीं आ सकता। भाषा की अपनी स्मृति है, अपनी ध्वनियाँ हैं, अपने सांस्कृतिक संकेत हैं और अपनी सीमाएँ भी। रचनाकार इन सबके बीच से अपने अनुभव के लिए एक रास्ता बनाता है। आलोचक को उस रास्ते की पहचान करनी होती है। इसीलिए आचार्य की आलोचना में शब्द और अर्थ के बीच का संबंध महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
उनकी दृष्टि में साहित्यिक भाषा को केवल अलंकार, बिंब, प्रतीक या शैली की सूची बनाकर नहीं समझा जा सकता। किसी कवि की भाषा का वास्तविक सौंदर्य यह है कि वह उसके अनुभव को किस प्रकार वहन करती है। भाषा यदि अनुभव से बड़ी हो जाए तो वह प्रदर्शन बन सकती है और यदि अनुभव भाषा को पार कर जाए तो अभिव्यक्ति असंभव हो सकती है। श्रेष्ठ रचना इन दोनों के बीच एक जीवंत संतुलन बनाती है। आचार्य की आलोचना इसी जीवंतता को पहचानने वाली आलोचना है।
यहाँ उनकी ललित आलोचना का स्वर भी उभरता है। वे विचार को सूखे निष्कर्ष में बदलने से बचते हैं। उनके यहाँ किसी साहित्यिक अवधारणा पर बात करते हुए जीवन का कोई प्रसंग, कोई अनुभव या कोई मानवीय प्रश्न अचानक सामने आ सकता है। इससे आलोचना में एक ऐसी गति पैदा होती है जिसमें पाठक केवल बौद्धिक रूप से नहीं चलता, संवेदनात्मक रूप से भी चलता है। आलोचना पढ़ते हुए लगता है कि विचार किसी बंद कमरे में नहीं बैठा, जीवन के खुले आकाश में चल रहा है।
उनकी आलोचना का यह गुण उन्हें केवल ‘साहित्य का व्याख्याकार’ बनने से बचाता है। व्याख्या का उद्देश्य अर्थ बताना हो सकता है, लेकिन आचार्य का उद्देश्य अर्थ की संभावनाएँ खोलना है। वे रचना को एकमात्र अर्थ में कैद नहीं करते। साहित्य की शक्ति ही यह है कि वह हर पाठ में अपने कुछ नए अर्थों की संभावना रखता है। इसलिए आलोचक को निर्णायक होने के साथ-साथ विनम्र भी होना चाहिए। उसे यह स्वीकार करना पड़ता है कि रचना उससे बड़ी हो सकती है।
इस संदर्भ में आचार्य की आलोचना में असहमति की गरिमा भी दिखाई देती है। किसी रचना को स्वीकार करना ही आलोचना नहीं है और उसे खारिज कर देना भी आलोचना नहीं। आलोचना का असली क्षेत्र उस बीच में है जहाँ हम रचना से संवाद करते हैं, उसके तर्क को समझते हैं, उसकी शक्ति को पहचानते हैं और उसकी सीमाओं को भी स्पष्ट करते हैं। आचार्य की दृष्टि में आलोचना प्रशंसा का विस्तृत रूप नहीं बनती। वह प्रेमपूर्वक असहमति व्यक्त करने की क्षमता भी रखती है।
उनकी पुस्तक ‘अज्ञेय की काव्य-तितीर्षा’ इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है। अज्ञेय को पढ़ते हुए आचार्य केवल उनके काव्य-संसार का वर्णन नहीं करते, बल्कि उस बेचैनी को पहचानने का प्रयास करते हैं जो उनकी काव्य-चेतना के भीतर सक्रिय है। ‘तितीर्षा’ शब्द ही एक ऐसी आकांक्षा की ओर संकेत करता है जो किसी सीमा को पार करना चाहती है। नदी को पार करने की इच्छा की तरह कविता भी अपने सामने उपस्थित सीमाओं से आगे जाने की कोशिश करती है। अज्ञेय के काव्य को इस आंतरिक आकांक्षा के संदर्भ में पढ़ना आलोचना को केवल काव्य-विश्लेषण नहीं रहने देता; वह कवि की अस्तित्वगत बेचैनी की खोज बन जाता है।
यहीं नंदकिशोर आचार्य की आलोचना का एक और महत्त्वपूर्ण गुण दिखाई देता है: वे कवि के भीतर मौजूद प्रश्न को उसकी उपलब्धियों से अधिक महत्त्व देते हैं। महान रचनाकार वह नहीं जो सारे उत्तर दे चुका हो। कई बार उसकी महानता इस बात में होती है कि उसने अपने समय और अपने अस्तित्व के सबसे कठिन प्रश्नों को ईमानदारी से सुना है। कविता उन प्रश्नों का अंतिम उत्तर नहीं, उनकी सघन अनुभूति भी हो सकती है। आचार्य की आलोचना इस प्रश्नशीलता को पहचानती है।
उनके यहाँ रचना और जीवन के बीच कोई अभेद्य दीवार नहीं है। साहित्य जीवन का प्रतिरूप भर नहीं, बल्कि जीवन को देखने की एक नई दृष्टि है। रचना संसार को जस का तस नहीं लौटाती; वह हमारे देखने की आदत बदल देती है। यही साहित्य की परिवर्तनकारी शक्ति है। लेकिन यह परिवर्तन किसी नारे से नहीं आता। वह पाठक की चेतना में धीरे-धीरे घटता है। नंदकिशोर आचार्य की आलोचना इसी धीमे परिवर्तन की आलोचना है।
इसलिए उनकी आलोचना में मनुष्य अंतिम संदर्भ के रूप में उपस्थित रहता है। कविता हो, कहानी हो, लेखक का व्यक्तित्व हो या साहित्य का स्वभाव, प्रश्न अंततः यही है कि इससे मनुष्य के अनुभव की समझ कितनी गहरी होती है। साहित्य यदि मनुष्य को उसके भीतर के अँधेरे, उसकी स्वतंत्रता, उसकी असुरक्षा, उसकी करुणा और उसकी संभावनाओं से परिचित नहीं कराता, तो उसकी सारी कलात्मक चमक अधूरी है।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना हमें यह भी सिखाती है कि साहित्य को पढ़ना जल्दी में किया जाने वाला काम नहीं। कविता को तुरंत ‘समझ’ लेना कई बार उसे समझने से बच निकलना है। रचना के साथ ठहरना पड़ता है। शब्द के पीछे छिपी चुप्पी को सुनना पड़ता है। अर्थ के बनने की प्रक्रिया को देखना पड़ता है। आचार्य की आलोचना का असली सौंदर्य इसी ठहराव में है। वह पाठक को निष्कर्ष नहीं थमाती, बल्कि उसे सोचने की जिम्मेदारी वापस कर देती है।
इस अर्थ में नंदकिशोर आचार्य हिन्दी आलोचना में उस परंपरा के महत्त्वपूर्ण आलोचक हैं जहाँ विचार और संवेदना एक-दूसरे के विरोधी नहीं, सहचर हैं। उनकी आलोचना में दर्शन साहित्य को दबाता नहीं, साहित्य दर्शन को मानवीय बनाता है। तर्क संवेदना को नष्ट नहीं करता, संवेदना तर्क को जीवन देती है। और आलोचना रचना को समाप्त नहीं करती, बल्कि उसे एक दूसरे, अधिक गहरे पाठ के लिए खोल देती है। यही उनकी आलोचना की असली शक्ति है।
।। तीन।।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना उनके साहित्य-दर्शन में खुलती है। वे साहित्य को केवल साहित्यिक विधाओं, शिल्पगत प्रवृत्तियों और काव्य-रूपों के भीतर सीमित करके नहीं देखते। उनके लिए साहित्य मनुष्य के अपने होने की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। मनुष्य संसार को केवल देखता नहीं, उसे अर्थ देता है; अपने अनुभव को केवल भोगता नहीं, उसे भाषा में पहचानता है। साहित्य इसी पहचान का एक गहरा माध्यम है। इसीलिए आचार्य की आलोचना में साहित्य पर विचार करते-करते मनुष्य, स्वतंत्रता, सत्य, संस्कृति और जीवन-मूल्यों के प्रश्न सामने आने लगते हैं। यह विस्तार उनकी आलोचना को दार्शनिक बनाता है लेकिन उसकी साहित्यिक संवेदना को नष्ट नहीं करता।
उनकी दृष्टि में साहित्य की सार्थकता किसी बाहरी आदेश से निर्धारित नहीं होती। साहित्य को यह बताने की आवश्यकता नहीं कि उसे क्या कहना चाहिए। रचना का अपना आंतरिक विवेक होता है। सच्चा रचनाकार अपने अनुभव और अपनी चेतना के दबाव से लिखता है। यही कारण है कि आचार्य के यहाँ रचनात्मक स्वतंत्रता एक केंद्रीय मूल्य बनकर सामने आती है। स्वतंत्रता का अर्थ केवल किसी सत्ता या संस्था से मुक्त होना नहीं, बल्कि अपने अनुभव को स्वयं पहचानने और उसे अपनी भाषा में व्यक्त करने की क्षमता भी है। रचना का जन्म इसी आंतरिक स्वतंत्रता से होता है।
यहाँ उनकी आलोचना एक सूक्ष्म प्रश्न उठाती है: क्या साहित्य को किसी सामाजिक या वैचारिक उपयोगिता के आधार पर ही मूल्यांकित किया जाना चाहिए? आचार्य का उत्तर नकारात्मक दिशा में जाता है। साहित्य समाज से बाहर नहीं है, लेकिन उसका मूल्य केवल तत्काल सामाजिक उपयोग से नहीं मापा जा सकता। कविता का काम कोई सरकारी विज्ञप्ति जारी करना नहीं है और कहानी कोई निर्देश-पुस्तिका नहीं। साहित्य मनुष्य की चेतना में जो परिवर्तन करता है, वह बहुत सूक्ष्म और दीर्घकालिक हो सकता है। वह हमें किसी समस्या का तैयार समाधान न दे, फिर भी समस्या को देखने का ढंग बदल सकता है। कभी-कभी यही अधिक बड़ा काम होता है।
इसलिए उनकी आलोचना में साहित्य की स्वायत्तता और सामाजिकता के बीच कोई कृत्रिम युद्ध नहीं दिखाई देता। रचना स्वतंत्र है, पर निरपेक्ष नहीं; वह अपनी दुनिया बनाती है, पर संसार से कटकर नहीं। लेखक अपनी निजी अनुभूति से शुरू करता है, लेकिन उसकी भाषा में एक सामूहिक अनुभव की प्रतिध्वनि आ सकती है। निजी दुःख कविता में आकर मानवीय दुःख बन जाता है और निजी प्रेम अपनी विशिष्टता बचाए रखते हुए भी पाठक के जीवन से संवाद करने लगता है। साहित्य की यही क्षमता उसे निजी और सार्वभौम के बीच पुल बनाती है।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना का एक बड़ा गुण यह है कि वे साहित्य को अनुभव की नैतिकता से जोड़ते हैं। यहाँ नैतिकता का अर्थ उपदेश या सदाचार की सूची नहीं है। इसका अर्थ है अनुभव के प्रति ईमानदार होना। लेखक जिस जीवन को नहीं जानता, उसके बारे में केवल वैचारिक मुद्रा बनाकर लिख सकता है, लेकिन उस लेखन में वह ताप नहीं आ सकता जो जिए हुए अनुभव से आता है। साहित्य का सत्य इसी प्रामाणिकता से जन्म लेता है। इसलिए रचना की नैतिक शक्ति उसके उपदेश में नहीं, उसकी ईमानदारी में है।
यहीं ‘रचना का सच’ का अर्थ और गहरा हो जाता है। रचना का सच कोई बाहर रखा हुआ तथ्य नहीं जिसे आलोचक जाकर उठा लाए। वह रचना के भीतर निर्मित होता है। कवि अपने अनुभव को जिस तरह भाषा देता है, उसी प्रक्रिया में एक नया सत्य आकार लेता है। आलोचक को इस निर्माण-प्रक्रिया को समझना होता है। इसीलिए आचार्य के लिए आलोचना मूलतः संवेदनात्मक और बौद्धिक सह-अनुभूति है।
उनकी आलोचना में ‘साहित्य का अध्यात्म’ इसी चिंतन को एक और गहराई देता है। यहाँ अध्यात्म को किसी धार्मिक कर्मकांड के अर्थ में ग्रहण करना उनकी आलोचना के साथ न्याय नहीं होगा। साहित्य का अध्यात्म मनुष्य के भीतर उस क्षेत्र की खोज है जहाँ वह अपने अस्तित्व के मूल प्रश्नों से सामना करता है। मैं कौन हूँ? मेरे अनुभव का अर्थ क्या है? दूसरे मनुष्य से मेरा संबंध क्या है? मृत्यु, प्रेम, पीड़ा, स्वतंत्रता और सत्य के सामने मेरा स्थान क्या है? साहित्य इन प्रश्नों को हमेशा सीधे नहीं पूछता, लेकिन उसकी गहरी रचनाएँ इनके आसपास अवश्य घूमती हैं।
आचार्य की आलोचना में यही ‘भीतर की यात्रा’ विशेष महत्त्व रखती है। वे साहित्य को बाहरी संसार का वर्णन मानकर संतुष्ट नहीं होते। बाहरी दृश्य के पीछे छिपे हुए आंतरिक अनुभव को पकड़ना आवश्यक है। एक पेड़ केवल पेड़ नहीं रह जाता जब वह किसी कवि की स्मृति, प्रतीक्षा या अकेलेपन का प्रतीक बनता है। एक नदी केवल नदी नहीं रहती जब उसमें समय, मृत्यु या पार जाने की आकांक्षा का अनुभव उतर आता है। साहित्य वस्तुओं को उनके नाम से नहीं, उनके मानवीय अर्थ से पहचानता है।
यही कारण है कि नंदकिशोर आचार्य की आलोचना में मौन का भी अपना महत्त्व है। जो कहा गया है, उसके साथ जो नहीं कहा गया, वह भी रचना का हिस्सा है। कई बार कविता का सबसे तीखा अर्थ उसके शब्दों के बीच की रिक्त जगह में छिपा होता है। आलोचक यदि केवल कथन को पकड़ता है तो आधी रचना ही उसके हाथ आती है। आचार्य की दृष्टि उस मौन की ओर भी जाती है जहाँ भाषा अपने पार जाने की कोशिश करती है।
उनकी आलोचना में परंपरा का प्रश्न भी इसी कारण नए ढंग से सामने आता है। परंपरा केवल अतीत की वस्तुओं का संग्रह नहीं है। यदि वह जीवित है तो वर्तमान चेतना के साथ उसका संवाद होता रहेगा। रचनाकार परंपरा को ज्यों का त्यों ग्रहण नहीं करता; वह उसे अपने समय में पुनः अर्थ देता है। इसीलिए परंपरा और आधुनिकता का संबंध केवल विरोध का संबंध नहीं। वर्तमान यदि अतीत से संवाद करना बंद कर दे तो वह अपनी स्मृति खो सकता है और अतीत यदि वर्तमान में नए अर्थ ग्रहण न करे तो वह संग्रहालय की वस्तु बन सकता है। आचार्य की आलोचना इन दोनों के बीच जीवित संवाद की संभावना खोजती है।
यहाँ उनका सांस्कृतिक चिंतन उनकी साहित्यिक आलोचना से जुड़ जाता है। संस्कृति उनके लिए केवल उत्सव, परिधान, भाषा या रीति-रिवाजों का नाम नहीं। संस्कृति मनुष्य के जीवन को अर्थ देने वाली प्रक्रियाओं का व्यापक संसार है। साहित्य उस संसार का अत्यंत संवेदनशील दस्तावेज भी है और उसका आलोचनात्मक पुनर्विचार भी। इसलिए साहित्य को पढ़ना संस्कृति को पढ़ना भी है।
नंदकिशोर आचार्य की आलोचना की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में एक यह है कि वह साहित्यिक आलोचना को जीवन-दर्शन में विलीन किए बिना जीवन-दर्शन से संवाद कराती है। यह संतुलन आसान नहीं है। आलोचक जब दर्शन की ओर बहुत अधिक चला जाता है तो कविता पीछे छूट जाती है और जब वह केवल काव्य-शिल्प में फँस जाता है तो जीवन का विराट प्रश्न गायब हो जाता है। आचार्य दोनों के बीच एक ऐसा रास्ता बनाते हैं जहाँ कविता की पंक्ति से विचार का प्रश्न निकलता है और विचार फिर कविता के अनुभव में लौट आता है।
उनकी आलोचना हमें इसलिए महत्त्वपूर्ण लगती है कि वह साहित्य को किसी एक सूत्र से बाँधने से इंकार करती है। साहित्य न केवल सौंदर्य है, न केवल विचार; न केवल अनुभूति है, न केवल सामाजिक यथार्थ; न केवल भाषा है, न केवल जीवन का प्रतिबिंब। वह इन सबके बीच निर्मित होने वाला जटिल मानवीय अनुभव है। आलोचना का काम इस जटिलता को सरल करके नष्ट करना नहीं, उसकी परतों को धीरे-धीरे खोलना है।
नंदकिशोर आचार्य का आलोचक इसी अर्थ में अर्थ का उद्घाटक है, अर्थ का मालिक नहीं। वह पाठक को यह नहीं बताता कि रचना का एकमात्र अर्थ यही है; वह यह दिखाता है कि रचना में अर्थ किस तरह पैदा होता है। साहित्य की गरिमा इसी खुली संभावना में है। मनुष्य की तरह साहित्य भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। हर बार पढ़े जाने पर उसमें कुछ नया बचा रहता है। आचार्य की आलोचना इसी बचे हुए को सुनने की कला है।
और शायद उनकी आलोचना की सबसे बड़ी मानवीय शक्ति यही है कि वह साहित्य को हमारे जीवन से फिर जोड़ देती है। पुस्तक बंद हो जाने के बाद भी उसका प्रश्न भीतर चलता रहता है। आलोचना यदि पाठक को इस स्थिति तक पहुँचा दे कि वह रचना से आगे बढ़कर अपने समय, अपने समाज और अंततः अपने भीतर झाँकने लगे, तो आलोचना केवल आलोचना नहीं रहती। वह आत्मसंवाद की एक गंभीर विधा बन जाती है। नंदकिशोर आचार्य की आलोचना इसी आत्मसंवाद की ओर जाती हुई हिन्दी आलोचना की एक विशिष्ट और विचार-संपन्न धारा है।
( पहला भाग)
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