— परिचय दास —
।। एक ।।
समकालीन होने के बावजूद यदि साही और मुक्तिबोध के बीच कोई उल्लेखनीय वैचारिक संवाद नहीं दिखाई देता है तो इसका कारण केवल ऐतिहासिक नहीं, वैचारिक भी है। वास्तव में यह अनुपस्थिति स्वयं एक संकेत है। कई बार संवाद केवल इसलिए नहीं होता कि दो व्यक्तियों के मिलने का अवसर नहीं मिला बल्कि इसलिए भी कि उनके बौद्धिक संस्कार एक-दूसरे को पर्याप्त महत्त्व नहीं देते। साही और मुक्तिबोध के मामले में यह बात विचारणीय है।
साही का पूरा बौद्धिक व्यक्तित्व असहमति, प्रश्नाकुलता और वैचारिक स्वतंत्रता पर आधारित था। वे किसी भी विचारधारा को अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार करने के प्रति स्वभावतः संशयशील थे। उनके लिए साहित्य का क्षेत्र वह स्थान था जहाँ मनुष्य को अपने अनुभवों, संदेहों और अंतर्विरोधों के साथ उपस्थित होने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। दूसरी ओर मुक्तिबोध की रचनात्मक चेतना, चाहे वह कितनी ही जटिल और आत्मसंघर्षपूर्ण क्यों न रही हो, अंततः एक निश्चित ऐतिहासिक और नैतिक दिशा की ओर उन्मुख दिखाई देती है। उनके यहाँ मनुष्य का मूल्यांकन अक्सर इस आधार पर होता है कि वह इतिहास और समाज के प्रश्नों के प्रति कितना प्रतिबद्ध है।
साही को संभवतः यही बात असुविधाजनक लगती थी। उनके लिए साहित्य का कार्य किसी ऐतिहासिक सत्य की पुष्टि करना नहीं था, बल्कि सत्य की खोज को निरंतर खुला रखना था। वे यह मानने को तैयार नहीं थे कि किसी विचारधारा ने मनुष्य और समाज के बारे में अंतिम उत्तर खोज लिया है। इसलिए जहाँ मुक्तिबोध की आलोचना में कई बार वैचारिक निश्चितता दिखाई देती है, वहीं साही की आलोचना में संशय, प्रश्न और बहुवचनात्मकता दिखाई देती है।

यदि दोनों के बीच व्यापक संवाद नहीं हुआ, तो इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि साही उस बौद्धिक वातावरण से संतुष्ट नहीं थे जिसमें साहित्य का मूल्यांकन मुख्यतः वैचारिक प्रतिबद्धता के आधार पर किया जा रहा था। मुक्तिबोध स्वयं उस वातावरण के सबसे महत्वपूर्ण प्रतिनिधियों में थे। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिंदी साहित्य में मुक्तिबोध के प्रभाव के बाद “प्रतिबद्धता” लगभग एक नैतिक कसौटी बन गई थी। साही को इस प्रवृत्ति से मूलभूत असहमति थी। वे मानते थे कि जैसे सत्ता का निरंकुश होना खतरनाक है, वैसे ही विचारधारा का निरंकुश होना भी खतरनाक है।
साही के लिए लेखक का पहला दायित्व अपनी स्वतंत्रता को बचाना था। यदि लेखक किसी विचारधारा के प्रति इतना निष्ठावान हो जाए कि वह अपने अनुभवों पर भी उसी का नियंत्रण स्वीकार कर ले, तो साहित्य की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है। मुक्तिबोध के यहाँ यह खतरा कई बार दिखाई देता है। उनकी महानता निर्विवाद है, लेकिन उनकी रचनात्मक दृष्टि में एक ऐतिहासिक दिशा की खोज लगातार सक्रिय रहती है। साही इस प्रकार की दिशा-निश्चितता के प्रति सावधान थे। वे मानते थे कि मनुष्य का अनुभव किसी भी विचारधारा से बड़ा है।
एक और कारण साही की लोकतांत्रिक चेतना में खोजा जा सकता है। साही का बौद्धिक संसार बहस, संवाद और असहमति पर आधारित था। वे साहित्य को एक खुला मंच मानते थे जहाँ विभिन्न दृष्टियाँ एक-दूसरे से टकरा सकती हैं। मुक्तिबोध की दृष्टि में भी संवाद का महत्व था, लेकिन उनके यहाँ नैतिक आग्रह इतना प्रबल है कि कई बार संवाद की जगह निर्णय अधिक दिखाई देता है। साही के लिए कोई भी विचार यदि स्वयं को अंतिम मानने लगे तो वह लोकतांत्रिक नहीं रह जाता। संभवतः इसी कारण वे उन वैचारिक संरचनाओं से दूरी बनाए रखते थे जिनमें सत्य पहले से निर्धारित हो।
साही को पढ़ते समय बार-बार यह अनुभव होता है कि वे मनुष्य की जटिलता को बचाना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि मनुष्य को केवल वर्ग, विचारधारा या राजनीतिक स्थिति के आधार पर समझा जाए। मुक्तिबोध के यहाँ यह जटिलता मौजूद अवश्य है, लेकिन अंततः वह एक बड़े ऐतिहासिक संघर्ष की रूपरेखा में समाहित हो जाती है। साही इस समाहार के विरुद्ध खड़े दिखाई देते हैं। उनके लिए मनुष्य हमेशा किसी भी सिद्धांत से अधिक जटिल है।
यदि साही और मुक्तिबोध के बीच कोई बड़ा सार्वजनिक संवाद हुआ होता, तो संभवतः साही बार-बार यह प्रश्न उठाते कि क्या साहित्य को विचारधारा के अधीन रखा जा सकता है? क्या लेखक का मूल्यांकन उसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता के आधार पर होना चाहिए? क्या मनुष्य की स्वतंत्र चेतना किसी ऐतिहासिक परियोजना से बड़ी नहीं है? ये वे प्रश्न हैं जो साही के लेखन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित रहते हैं।
यहीं साही की विशिष्टता दिखाई देती है। वे केवल वामपंथ की आलोचना नहीं करते, वे हर प्रकार की वैचारिक अंतिमता की आलोचना करते हैं। वे दक्षिणपंथी कट्टरता से भी असहमत हो सकते हैं और वामपंथी कट्टरता से भी। उनके लिए मूल प्रश्न विचारधारा नहीं, स्वतंत्रता है। इस दृष्टि से वे हिंदी साहित्य में लोकतांत्रिक बौद्धिकता के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि बन जाते हैं।
मुक्तिबोध का व्यक्तित्व नैतिक दृढ़ता का प्रतीक है, लेकिन साही का व्यक्तित्व बौद्धिक स्वतंत्रता का। मुक्तिबोध अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस देते हैं, लेकिन साही यह याद दिलाते हैं कि न्याय के नाम पर भी स्वतंत्रता का हनन हो सकता है। मुक्तिबोध इतिहास की दिशा खोजते हैं, साही इतिहास के भीतर छिपी हुई अनेक दिशाओं को देखने का आग्रह करते हैं। मुक्तिबोध प्रतिबद्धता के कवि हैं, साही स्वतंत्रता के चिंतक।
इसलिए यह संभव है कि दोनों के बीच प्रत्यक्ष संवाद का अभाव केवल एक ऐतिहासिक दुर्घटना न हो। यह दो भिन्न बौद्धिक संस्कृतियों का संकेत भी हो सकता है। एक संस्कृति सत्य की खोज में अधिक आश्वस्त है, दूसरी सत्य के प्रति अधिक संशयशील। एक इतिहास की दिशा पर भरोसा करती है, दूसरी मनुष्य की स्वतंत्र चेतना पर। एक प्रतिबद्धता को प्राथमिकता देती है, दूसरी असहमति को।
आज पीछे मुड़कर देखने पर साही की प्रासंगिकता इसलिए बढ़ जाती है कि इक्कीसवीं सदी का संसार विचारधाराओं की निरंकुशता से अधिक उनकी विफलताओं को देख चुका है। बड़े-बड़े ऐतिहासिक दावे टूट चुके हैं। ऐसे समय में साही का आग्रह कि साहित्य का पहला धर्म स्वतंत्रता है, अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। यदि मुक्तिबोध हमें नैतिक बेचैनी देते हैं, तो साही हमें बौद्धिक स्वाधीनता देते हैं। और कई बार स्वतंत्रता, किसी भी महान विचार से अधिक मूल्यवान सिद्ध होती है, क्योंकि उसी के भीतर असहमति, संवाद और नए सत्य की संभावना जन्म लेती है।
।। दो ।।
हिंदी साहित्य के इतिहास का एक अत्यंत जटिल और विवादास्पद प्रश्न है कि मृत्यु के बाद मुक्तिबोध हिंदी आलोचना के केंद्र में कैसे लाये गए ! इस प्रश्न का उत्तर केवल साहित्यिक गुणों में नहीं बल्कि हिंदी साहित्य की संस्थागत संरचना, वैचारिक संघर्षों, आलोचनात्मक राजनीति और सांस्कृतिक सत्ता-संतुलन में भी खोजा जाना चाहिए। यह कहना कि मुक्तिबोध केवल अपनी रचनात्मक प्रतिभा के कारण केंद्र में आए, आधा सत्य होगा। उतना ही महत्त्वपूर्ण यह भी है कि उन्हें केंद्र में लाने वाली ऐतिहासिक और साहित्यिक शक्तियाँ कौन-सी थीं !
मुक्तिबोध का निधन 1964 में हुआ। जीवनकाल में वे न तो बड़े पुरस्कारों से सम्मानित हुए, न किसी प्रभावशाली साहित्यिक गुट के केंद्र में रहे, न विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में उनकी विशेष उपस्थिति थी। उनकी आर्थिक स्थिति भी कठिन थी और साहित्यिक प्रतिष्ठा भी सीमित। उस समय हिंदी कविता के आकाश पर अज्ञेय, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, गिरिजाकुमार माथुर, भवानीप्रसाद मिश्र जैसे नाम अधिक चर्चित थे। नई कविता की चर्चा होती थी, लेकिन मुक्तिबोध उस चर्चा के केंद्रीय नायक नहीं थे।
मृत्यु के बाद स्थिति तेजी से बदली। इसका पहला कारण था हिंदी वामपंथी आलोचना की एक वैचारिक आवश्यकता। 1960 और 1970 के दशक में हिंदी साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन को एक ऐसे कवि की आवश्यकता थी जो आधुनिकतावाद की कलात्मक उपलब्धियों और वामपंथी सामाजिक दृष्टि दोनों को एक साथ समेट सके। प्रगतिशील आलोचना लंबे समय तक नई कविता को संदेह की दृष्टि से देखती रही थी। उसे लगता था कि नई कविता व्यक्तिवादी और मध्यवर्गीय है। दूसरी ओर नई कविता के समर्थक प्रगतिशील साहित्य को कई बार नारेबाजी और सरलीकरण का शिकार मानते थे।
मुक्तिबोध इस वैचारिक संकट का समाधान बनकर सामने आए। वे नई कविता के भी बड़े कवि थे और सामाजिक प्रतिबद्धता के भी। वे आधुनिकतावादी शिल्प का उपयोग करते थे, लेकिन उनकी चिंता वर्ग, शोषण, अन्याय और सामाजिक परिवर्तन से जुड़ी थी। इस प्रकार वे दो विरोधी शिविरों के बीच एक सेतु की तरह प्रस्तुत किए जा सकते थे। हिंदी की वामपंथी आलोचना ने शीघ्र ही यह पहचान लिया कि मुक्तिबोध एक ऐसे प्रतीक बन सकते हैं जिनके माध्यम से आधुनिक कविता पर भी दावा किया जा सके।
यहीं से मुक्तिबोध का “पुनर्निर्माण” प्रारंभ होता है। ध्यान दीजिए, मैं “पुनर्पाठ” नहीं, “पुनर्निर्माण” शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ। क्योंकि केवल उनकी कविताएँ नहीं पढ़ी गईं, बल्कि एक विशिष्ट मुक्तिबोध-छवि निर्मित की गई। उन्हें संघर्षशील, ईमानदार, प्रतिबद्ध, शोषित, उपेक्षित और क्रांतिकारी बुद्धिजीवी के आदर्श रूप में प्रस्तुत किया गया। यह छवि पूरी तरह असत्य नहीं थी लेकिन यह पूर्ण सत्य भी नहीं थी। उनके व्यक्तित्व और रचना के अनेक जटिल पक्ष इस प्रक्रिया में पीछे छूट गए।
इस प्रक्रिया में आलोचकों की भूमिका निर्णायक रही। विशेष रूप से नामवर सिंह और बाद की मार्क्सवादी आलोचना ने मुक्तिबोध को हिंदी साहित्य की केंद्रीय उपस्थिति बना दिया। मुक्तिबोध की आलोचनात्मक अवधारणाएँ, उनके निबंध, उनकी डायरी और उनकी कविताएँ लगातार उद्धृत की जाने लगीं। धीरे-धीरे स्थिति यह हो गई कि आधुनिक हिंदी कविता की चर्चा मुक्तिबोध के बिना अधूरी मानी जाने लगी।
यहाँ एक दिलचस्प प्रश्न उठता है। यदि मुक्तिबोध इतने ही महान थे, तो उनके जीवनकाल में वही आलोचक उन्हें केंद्र में क्यों नहीं ला पाए? यह प्रश्न असुविधाजनक है, लेकिन महत्वपूर्ण है। साहित्य का इतिहास केवल प्रतिभा से नहीं बनता; वह संस्थाओं, पत्रिकाओं, विश्वविद्यालयों और आलोचना की शक्ति से भी बनता है। मुक्तिबोध की मृत्यु के बाद उनकी अनुपस्थिति ने उन्हें एक नैतिक प्रतीक में बदलने में सहायता की। मृत लेखक प्रतिवाद नहीं करता। उसके चारों ओर एक वैचारिक आख्यान निर्मित करना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है।
इसमें एक और तत्व कार्य कर रहा था। साठ और सत्तर का दशक भारतीय राजनीति में भी उथल-पुथल का समय था। सामाजिक असमानता, किसान आंदोलनों, छात्र आंदोलनों और वामपंथी विचारधाराओं का प्रभाव बढ़ रहा था। साहित्य को भी एक नैतिक और राजनीतिक भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया जा रहा था। मुक्तिबोध का व्यक्तित्व इस ऐतिहासिक वातावरण के लिए अत्यंत उपयुक्त प्रतीक बन गया। वे एक ऐसे कवि थे जिनके यहाँ आत्मसंघर्ष भी था और सामाजिक संघर्ष भी। इसलिए उन्हें एक प्रकार के “शहीद बुद्धिजीवी” के रूप में स्थापित किया गया।
यहीं से साहित्यिक राजनीति का दूसरा पक्ष दिखाई देता है। किसी लेखक को केंद्र में लाने का अर्थ केवल उसे प्रतिष्ठित करना नहीं होता, बल्कि अन्य लेखकों को अपेक्षाकृत हाशिए पर भेजना भी होता है। मुक्तिबोध की प्रतिष्ठा बढ़ने के साथ-साथ अज्ञेय, धर्मवीर भारती, कुँवर नारायण और निर्मल वर्मा जैसे लेखकों की कुछ धाराएँ “कम प्रतिबद्ध” या “अधिक व्यक्तिवादी” घोषित की जाने लगीं। मुक्तिबोध एक प्रकार की नैतिक कसौटी में बदल दिए गए। यह स्थिति स्वयं मुक्तिबोध की आलोचनात्मक चेतना के भी विरुद्ध थी, क्योंकि वे किसी स्थिर मूर्ति में बदलने वाले लेखक नहीं थे।
विजयदेव नारायण साही का महत्व इसी बिंदु पर बढ़ जाता है। साही ने साहित्य में विचारधारा की बढ़ती हुई केंद्रीयता को लेकर प्रश्न उठाए। उन्हें आशंका थी कि साहित्य को यदि किसी एक वैचारिक प्रतिमान से मापा जाने लगेगा, तो उसकी स्वतंत्रता संकट में पड़ जाएगी। मुक्तिबोध को जिस प्रकार धीरे-धीरे एक वैचारिक आदर्श के रूप में स्थापित किया गया, वह साही जैसी चेतना के लिए चिंता का विषय हो सकता था। साही साहित्य को बहुलता, संवाद और असहमति का क्षेत्र मानते थे, जबकि मुक्तिबोध की आलोचनात्मक प्रतिष्ठा का उपयोग कई बार एक वैचारिक अनुशासन स्थापित करने के लिए किया गया।
यह कहना गलत होगा कि मुक्तिबोध की प्रतिष्ठा केवल साहित्यिक राजनीति की देन है। उनकी रचनात्मक शक्ति इतनी बड़ी थी कि उन्हें लंबे समय तक अनदेखा करना संभव नहीं था। लेकिन यह कहना भी अधूरा होगा कि उनकी प्रतिष्ठा केवल साहित्यिक गुणों से निर्मित हुई। वास्तव में उनकी प्रतिष्ठा साहित्यिक प्रतिभा और वैचारिक राजनीति, दोनों के संयुक्त प्रभाव से बनी।
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो मुक्तिबोध का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक लगता है। उन्हें न तो केवल मार्क्सवादी प्रतीक के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, न केवल आधुनिकतावादी कवि के रूप में। वे उससे कहीं अधिक जटिल लेखक हैं। उनकी शक्ति उनकी बेचैनी में है, किसी वैचारिक निष्कर्ष में नहीं। विडंबना यह है कि जिस लेखक ने जीवन भर स्थापित सत्यों पर प्रश्न उठाए, उसे बाद की आलोचना ने कई बार स्वयं एक स्थापित सत्य में बदल दिया।
संभवतः मुक्तिबोध के साथ सबसे बड़ा अन्याय उनके विरोधियों ने नहीं, उनके कुछ उत्साही समर्थकों ने किया। उन्होंने मुक्तिबोध को पढ़ने की जगह उन्हें उद्धृत करना शुरू कर दिया; उन्हें समझने की जगह उन्हें प्रतीक बना दिया; और उन्हें एक जीवित बौद्धिक संघर्ष की जगह एक वैचारिक ध्वज में बदल दिया। हिंदी साहित्य की आलोचनात्मक परिपक्वता इसी में होगी कि मुक्तिबोध को फिर से एक जटिल, अंतर्विरोधपूर्ण, प्रश्नाकुल और असुविधाजनक लेखक की तरह पढ़ा जाए, न कि किसी साहित्यिक संप्रदाय के संरक्षक देवता की तरह।
।। तीन ।।
यदि मुक्तिबोध को हिंदी साहित्य का केंद्रीय कवि बनाया गया तो उस प्रक्रिया में किन-किन रचनाकारों को अपेक्षाकृत हाशिए पर धकेला गया? साहित्य का इतिहास केवल प्रतिष्ठा का इतिहास नहीं होता, वह विस्मृति का इतिहास भी होता है। जिस समय मुक्तिबोध का आलोचनात्मक कद लगातार बढ़ रहा था, उसी समय विजयदेव नारायण साही, लक्ष्मीकांत वर्मा, धर्मवीर भारती, जगदीश गुप्त और यहाँ तक कि नई कविता की कुछ अन्य धाराएँ आलोचना के केंद्र से धीरे-धीरे बाहर जा रही थीं।
यह संयोग नहीं था। किसी भी साहित्यिक संस्कृति में जब एक केंद्रीय प्रतिमान निर्मित होता है तो वह अन्य संभावित प्रतिमानों को सीमित कर देता है। सत्तर और अस्सी के दशक में मुक्तिबोध को आधुनिक हिंदी कविता का सर्वोच्च नैतिक आदर्श घोषित करने की प्रक्रिया ने एक प्रकार का आलोचनात्मक वातावरण निर्मित किया। इस वातावरण में कवियों का मूल्यांकन अक्सर इस आधार पर होने लगा कि वे मुक्तिबोधीय प्रतिमान के कितने निकट हैं। उनकी कविता में सामाजिक प्रतिबद्धता कितनी है, वर्गीय चेतना कितनी है, सत्ता-विरोध कितना है, मध्यवर्गीय आत्मालोचना कितनी है। जो कवि इस प्रतिमान में फिट नहीं बैठते थे, वे अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण माने जाने लगे।
यहीं साहित्यिक राजनीति का सबसे सूक्ष्म रूप दिखाई देता है। राजनीति केवल गुटबंदी या पुरस्कारों तक सीमित नहीं होती। वह मूल्यांकन की कसौटियों में भी काम करती है। जब किसी एक लेखक को आदर्श घोषित किया जाता है, तो उसकी विशेषताएँ धीरे-धीरे साहित्यिक गुणों की सार्वभौमिक परिभाषा बन जाती हैं। मुक्तिबोध के साथ यही हुआ। उनकी बेचैनी, उनका आत्मसंघर्ष, उनका वैचारिक आग्रह, उनकी नैतिक कठोरता और उनकी सामाजिक दृष्टि को आधुनिकता के अनिवार्य गुणों के रूप में प्रस्तुत किया गया।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या आधुनिकता केवल इतनी ही है? क्या आधुनिकता में संशय, विडंबना, खेल, निजी अनुभव, प्रेम, स्मृति, आध्यात्मिक प्रश्न, भाषा का सौंदर्य और व्यक्ति की स्वतंत्रता शामिल नहीं हैं? यदि हैं, तो फिर साही, कुँवर नारायण, निर्मल वर्मा और शमशेर जैसे लेखकों को उस तरह का अपेक्षित समान महत्त्व क्यों नहीं मिला? यह प्रश्न हिंदी आलोचना की संरचना पर भी लागू होता है।
विजयदेव नारायण साही का मामला विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। साही की बौद्धिकता मुक्तिबोध की तरह घोषणात्मक नहीं थी। वे न तो किसी वैचारिक खेमे के स्थायी प्रतिनिधि बने, न किसी आंदोलन के आधिकारिक प्रवक्ता। उनकी शक्ति उनके संशय में थी। वे हर प्रकार की निश्चितता पर प्रश्न उठाते थे। यही कारण है कि वे किसी संगठित आलोचनात्मक अभियान के नायक नहीं बन सके। विचारधाराएँ अपने लिए नायकों का निर्माण करती हैं, संशयवादियों का नहीं। साही का दुर्भाग्य यह था कि वे किसी भी शिविर के लिए पूरी तरह उपयोगी नहीं थे।
इसके विपरीत मुक्तिबोध को एक प्रतीक में बदलना अपेक्षाकृत आसान था। उनके जीवन की गरीबी, संघर्ष, असमय मृत्यु और वैचारिक प्रतिबद्धता ने एक ऐसा आख्यान तैयार कर दिया जिसे साहित्यिक राजनीति आसानी से ग्रहण कर सकती थी। वे एक प्रकार के “नैतिक शहीद” के रूप में स्थापित किए गए। यह छवि प्रभावशाली थी और है, लेकिन इसके कारण उनके भीतर का जटिल कलाकार कई बार पीछे छूट गया।
यहाँ एक विडंबना और है। मुक्तिबोध स्वयं अपने समय की साहित्यिक सत्ता से असंतुष्ट थे। वे लगातार स्थापित मान्यताओं की आलोचना करते थे। यदि वे आज जीवित होते और देखते कि उनके नाम पर एक नया आलोचनात्मक अनुशासन स्थापित हो गया है, तो संभव है कि वे स्वयं उससे असहमत होते। मुक्तिबोध का स्वभाव मूर्तिभंजन का था, मूर्ति बनने का नहीं। लेकिन साहित्यिक इतिहास अक्सर अपने विद्रोहियों को भी स्मारक में बदल देता है। एक बार जब कोई लेखक पाठ्यक्रमों, शोध-प्रबंधों और आलोचनात्मक उद्धरणों का स्थायी हिस्सा बन जाता है, तो उसकी जीवित बेचैनी धीरे-धीरे संस्थागत प्रतिष्ठा में बदलने लगती है।
साही इस स्थिति को शायद अधिक तीक्ष्णता से पहचानते। उनके लिए साहित्य का मूल तत्व स्वतंत्रता था। वे किसी भी ऐसी आलोचना से सावधान रहते जो एक लेखक को अंतिम प्रतिमान बना दे। साही की दृष्टि में साहित्य का स्वास्थ्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें कितनी असहमतियाँ संभव हैं। यदि कोई आलोचनात्मक संस्कृति इस निष्कर्ष पर पहुँच जाए कि आधुनिकता का सर्वोच्च मॉडल मुक्तिबोध ही हैं, तो साही पूछते कि फिर अन्य संभावनाओं का क्या होगा? क्या आधुनिकता का केवल एक ही चेहरा है? क्या व्यक्ति की स्वतंत्रता, भाषा की स्वायत्तता और अनुभव की बहुलता आधुनिकता का हिस्सा नहीं हैं?
दरअसल मुक्तिबोध की प्रतिष्ठा का प्रश्न हिंदी आलोचना की सत्ता-संरचना का प्रश्न भी है। विश्वविद्यालयों में कौन पढ़ाया जाएगा, शोध किस पर होंगे, संगोष्ठियाँ किन विषयों पर होंगी, आलोचना किसे केंद्रीय मानेगी, यह सब केवल साहित्यिक गुणवत्ता से तय नहीं होता। इसमें वैचारिक रुझान, संस्थागत नेटवर्क, पत्रिकाओं की भूमिका और बौद्धिक फैशन भी शामिल होते हैं। मुक्तिबोध के साथ यह सब एक अनुकूल ऐतिहासिक क्षण में एकत्र हो गया। परिणामस्वरूप वे आधुनिक हिंदी कविता के केंद्रीय प्रतीक बन गए।
लेकिन आज, इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में, जब हम उस इतिहास को देखते हैं, तो पुनर्पाठ की आवश्यकता दिखाई देती है। इसका अर्थ मुक्तिबोध को कमतर करना नहीं है। इसका अर्थ यह पूछना है कि क्या हमने उन्हें पढ़ा है, या केवल उनकी प्रतिष्ठा को स्वीकार किया है? क्या हमने मुक्तिबोध के साथ-साथ साही, कुँवर नारायण और अन्य वैकल्पिक आधुनिकताओं को भी पर्याप्त गंभीरता से पढ़ा है? क्या हमने आधुनिक हिंदी साहित्य को केवल प्रतिबद्धता की दृष्टि से देखा है, या स्वतंत्रता और असहमति की दृष्टि से भी?
संभवतः आने वाले समय की हिंदी आलोचना का सबसे बड़ा कार्य मुक्तिबोध को उनके सिंहासन से उतारना नहीं, बल्कि उनके आसपास बनाए गए एकाधिकार को तोड़ना होगा। मुक्तिबोध तब और अधिक महत्त्व पूर्ण हो जाएंगे क्योंकि तब वे किसी विचारधारा के प्रतीक नहीं बल्कि एक जटिल मनुष्य और बेचैन रचनाकार के रूप में दिखाई देंगे। उसी क्षण साही भी अपनी पूरी चमक के साथ सामने आएँगे। तब हिंदी साहित्य का इतिहास एक केंद्रीय सूर्य के इर्द-गिर्द घूमने वाली व्यवस्था नहीं रहेगा, बल्कि अनेक तारों वाला आकाश बनेगा, जहाँ मुक्तिबोध की रोशनी भी होगी और साही की भी। शायद वही स्थिति साहित्य के लिए अधिक लोकतांत्रिक, अधिक सृजनात्मक और अधिक ईमानदार होगी।
।। चार ।।
आगे देखें तो एक अत्यंत असुविधाजनक प्रश्न सामने आता है
~ क्या मुक्तिबोध की प्रतिष्ठा वास्तव में मुक्तिबोध की प्रतिष्ठा थी या मुक्तिबोध के माध्यम से एक विशेष प्रकार की आलोचनात्मक सत्ता की प्रतिष्ठा थी? यह प्रश्न सुनने में कठोर लग सकता है लेकिन साहित्य के इतिहास में ऐसे प्रश्नों से बचकर नहीं चला जा सकता।
किसी लेखक को श्रेष्ठ घोषित करना केवल उस लेखक के बारे में निर्णय नहीं होता बल्कि यह भी तय करता है कि महानता की परिभाषा क्या होगी। मुक्तिबोध को केंद्र में लाने के साथ-साथ हिंदी आलोचना ने यह भी घोषित किया कि साहित्य की सर्वोच्च कसौटी नैतिक बेचैनी, वैचारिक प्रतिबद्धता, सामाजिक संघर्ष और आत्मालोचना है। निश्चय ही ये महत्त्वपूर्ण गुण हैं किंतु क्या साहित्य केवल इन्हीं गुणों से बनता है? क्या भाषा का सौंदर्य, अनुभव की सूक्ष्मता, अस्तित्वगत रहस्य, स्मृति, प्रेम, विडंबना, हास्य और सांस्कृतिक बहुलता कम महत्त्वपूर्ण हैं?
यहीं से समस्या आरंभ होती है। मुक्तिबोध की स्थापना के साथ-साथ हिंदी आलोचना में एक प्रकार की “नैतिक पदानुक्रम” की प्रवृत्ति विकसित हुई। ऐसा लगने लगा कि जो लेखक अधिक राजनीतिक है, वह अधिक गंभीर है; जो अधिक वैचारिक है, वह अधिक महत्वपूर्ण है; जो अधिक आत्मपीड़क है, वह अधिक ईमानदार है। इस वातावरण में साही जैसे लेखक स्वाभाविक रूप से असुविधाजनक हो जाते हैं, क्योंकि साही साहित्य को नैतिक अनुशासन की जगह बौद्धिक स्वतंत्रता का क्षेत्र मानते हैं।
साही की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वे किसी भी बौद्धिक शिविर के लिए पूरी तरह विश्वसनीय सैनिक नहीं बन सकते थे। वे समाजवादी थे, लेकिन समाजवाद की भी आलोचना कर सकते थे। वे आधुनिकता के पक्षधर थे, लेकिन आधुनिकता की सीमाएँ भी देखते थे। वे लोकतंत्र में विश्वास करते थे, लेकिन लोकतांत्रिक समाज की मूर्खताओं पर भी प्रश्न उठा सकते थे। ऐसी चेतना किसी आंदोलन का पोस्टर नहीं बन सकती। साहित्यिक राजनीति को अक्सर ऐसे नायक चाहिए होते हैं जिनके चारों ओर एक स्पष्ट कथा निर्मित की जा सके। मुक्तिबोध के साथ यह संभव था। साही के साथ नहीं।
यह भी विचारणीय है कि हिंदी आलोचना ने मुक्तिबोध को पढ़ने का कौन-सा तरीका विकसित किया। मुक्तिबोध के भीतर जो गहरे संशय हैं, जो आत्मविरोध हैं, जो वैचारिक दुविधाएँ हैं, उन्हें कई बार कम महत्व दिया गया। उनकी रचनाओं में मौजूद बेचैनी को एक निश्चित वैचारिक निष्कर्ष में बदल दिया गया। जबकि मुक्तिबोध की वास्तविक शक्ति उनके निष्कर्षों में नहीं, उनके प्रश्नों में थी। वे लगातार स्वयं से लड़ते हैं, स्वयं को कटघरे में खड़ा करते हैं, अपने विश्वासों को भी संदेह की दृष्टि से देखते हैं। लेकिन बाद की आलोचना ने कई बार उन्हें एक स्थिर वैचारिक प्रतिमा में बदल दिया।
विडंबना यह है कि इस प्रक्रिया में मुक्तिबोध स्वयं भी आंशिक रूप से खो गए। जो कवि जीवन भर निश्चितताओं से लड़ता रहा, उसे निश्चितता का प्रतीक बना दिया गया। जो लेखक आत्मसंघर्ष का प्रतिनिधि था, उसे वैचारिक आश्वस्ति का प्रतिनिधि बना दिया गया। यह केवल मुक्तिबोध के साथ नहीं हुआ। इतिहास में अक्सर बड़े रचनाकारों के साथ यही होता है। वे अपने समय में असुविधाजनक होते हैं, लेकिन बाद की पीढ़ियाँ उन्हें सुविधाजनक बना देती हैं।
यदि साही की दृष्टि से इस प्रक्रिया को देखें, तो यह और अधिक स्पष्ट हो जाता है। साही संभवतः पूछते कि किसी लेखक को पढ़ने का उद्देश्य क्या है? क्या हम उसे अपने विचारों की पुष्टि के लिए पढ़ते हैं, या अपनी धारणाओं को चुनौती देने के लिए? यदि पहला उद्देश्य है, तो हम लेखक को विचारधारा का उपकरण बना देंगे। यदि दूसरा उद्देश्य है, तो लेखक हमेशा जीवित रहेगा। साही की आलोचनात्मक चेतना दूसरे रास्ते की समर्थक थी।
यहीं हिंदी आलोचना की एक संरचनात्मक समस्या दिखाई देती है। उसने कई बार जटिल लेखकों को सरल प्रतिमानों में बदल दिया। मुक्तिबोध “प्रतिबद्धता” के प्रतीक बन गए, अज्ञेय “व्यक्तिवाद” के, धर्मवीर भारती “रोमानी चेतना” के, निर्मल वर्मा “अस्तित्ववादी संवेदना” के। इस प्रक्रिया में इन लेखकों की वास्तविक जटिलता कम होती गई। साहित्य का इतिहास जीवित व्यक्तित्वों का इतिहास कम और प्रतीकों का इतिहास अधिक बनता गया।
मुक्तिबोध की आलोचनात्मक प्रतिष्ठा को समझने के लिए विश्वविद्यालयों की भूमिका पर भी विचार करना होगा। जब कोई लेखक शोध-प्रबंधों, पाठ्यक्रमों और प्रतियोगी परीक्षाओं का हिस्सा बन जाता है, तो उसकी प्रतिष्ठा संस्थागत रूप से सुरक्षित हो जाती है। मुक्तिबोध के साथ यही हुआ। उनकी रचनाओं पर असंख्य शोध हुए, उनके उद्धरण आलोचना की भाषा का हिस्सा बन गए, और धीरे-धीरे उनकी उपस्थिति लगभग अनिवार्य हो गई। यह प्रक्रिया साहित्यिक मूल्यांकन से अधिक संस्थागत पुनरुत्पादन की प्रक्रिया भी थी।
इसके विपरीत साही की स्थिति अलग रही। वे उद्धरणों के कवि नहीं थे। वे प्रश्नों के कवि थे। उनकी रचनाएँ पाठक से अधिक सक्रिय भागीदारी की माँग करती हैं। वे किसी तैयार निष्कर्ष तक नहीं पहुँचातीं। इसलिए उन्हें संस्थागत रूप से स्थापित करना अपेक्षाकृत कठिन था। विश्वविद्यालयों को अक्सर ऐसे लेखक अधिक सुविधाजनक लगते हैं जिनके बारे में एक स्वीकृत आलोचनात्मक ढाँचा मौजूद हो। मुक्तिबोध के साथ ऐसा ढाँचा विकसित हो गया। साही के साथ नहीं।
लेकिन समय के साथ यह स्थिति बदल भी सकती है। आज का बौद्धिक संसार बीसवीं शताब्दी के वैचारिक आत्मविश्वास से काफी दूर आ चुका है। बड़े आख्यानों, महान विचारधाराओं और अंतिम सत्यों पर विश्वास कम हुआ है। ऐसे समय में साही की संशयवादी, बहुलतावादी और लोकतांत्रिक चेतना अधिक प्रासंगिक दिखाई देने लगी है। जो प्रश्न कभी हाशिए पर थे, वे अब केंद्र में आ रहे हैं। स्वतंत्रता, असहमति, विविधता और संवाद के प्रश्न आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण हैं।
संभव है कि भविष्य का हिंदी साहित्यिक इतिहास मुक्तिबोध और साही को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि आधुनिकता के दो पूरक चेहरों के रूप में पढ़े। मुक्तिबोध हमें बताते हैं कि बिना नैतिक साहस के साहित्य खोखला हो जाता है। साही हमें बताते हैं कि बिना स्वतंत्रता के साहित्य खतरनाक हो सकता है। मुक्तिबोध अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की चेतना देते हैं। साही किसी भी प्रकार की बौद्धिक निरंकुशता के विरुद्ध सावधान करते हैं। एक हमें प्रतिबद्धता का मूल्य समझाता है, दूसरा असहमति का।
और शायद हिंदी आलोचना की सबसे बड़ी भूल यही रही कि उसने लंबे समय तक इन दोनों को साथ पढ़ने के बजाय एक को केंद्र और दूसरे को परिधि में रखा। जिस दिन यह संतुलन बदलेगा, उस दिन न केवल साही अधिक स्पष्ट दिखाई देंगे, बल्कि मुक्तिबोध भी अपने वास्तविक, अधिक जटिल और अधिक मानवीय रूप में सामने आएँगे। तब साहित्यिक इतिहास किसी विचारधारा की विजयगाथा नहीं, बल्कि अनेक स्वरों, अनेक असहमतियों और अनेक संभावनाओं का इतिहास बन सकेगा। यही किसी जीवित साहित्यिक संस्कृति की पहचान होती है।
।। चार ।।
मुक्तिबोध के यहाँ साहित्य और विचारधारा के बीच कोई कठोर दीवार नहीं है। वे मार्क्सवाद से गहरे प्रभावित थे और मानते थे कि लेखक का नैतिक दायित्व सामाजिक यथार्थ के साथ जुड़ना है। उनकी कविता में वर्ग-संघर्ष, शोषण, सत्ता की संरचना, मध्यवर्गीय आत्मालोचना और क्रांतिकारी चेतना बार-बार उपस्थित होती है। उनके लिए कविता केवल सौन्दर्य का प्रदेश नहीं बल्कि आत्म-संघर्ष और सामाजिक संघर्ष का क्षेत्र भी है। “अँधेरे में” जैसी कविता में विचार और संवेदना एक-दूसरे में इस तरह घुल जाते हैं कि उन्हें अलग करना कठिन हो जाता है।
साही की दृष्टि इससे भिन्न थी। वे साहित्य को किसी भी विचारधारा का उपनिवेश बनाने के विरुद्ध थे। उनके लिए कविता का सत्य विचारधारा के सत्य से बड़ा था। वे मानते थे कि विचारधारा संसार को समझने का एक उपकरण हो सकती है, लेकिन कविता को उसी के भीतर कैद नहीं किया जा सकता। कविता का क्षेत्र अधिक जटिल, अधिक मानवीय और अधिक बहुव्याख्यात्मक है। साही को भय था कि जब साहित्य किसी विचारधारा का सेवक बन जाता है तो उसकी स्वतंत्रता समाप्त होने लगती है।
यहीं से दोनों के बीच मूल विभाजन रेखा खिंचती है। मुक्तिबोध साहित्य में विचारधारा के प्रवेश को आवश्यक मानते हैं, जबकि साही साहित्य की स्वायत्तता की रक्षा करते हैं। मुक्तिबोध के यहाँ कवि एक वैचारिक योद्धा भी है। साही के यहाँ कवि सबसे पहले एक स्वतंत्र चेतना है।
जीवन-व्यवहार में भी दोनों अलग दिखाई देते हैं। मुक्तिबोध का जीवन आर्थिक संघर्ष, उपेक्षा और असुरक्षा से भरा था। उनकी छवि एक ऐसे लेखक की बनी जिसने अपने विश्वासों के लिए लगातार कष्ट झेले। दूसरी ओर साही का व्यक्तित्व अधिक संवादधर्मी, खुला और सार्वजनिक था। वे राजनीतिक सक्रियता से जुड़े थे, विश्वविद्यालयी जीवन में उपस्थित थे और साहित्यिक बहसों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करते थे। मुक्तिबोध का संसार अधिक आंतरिक और त्रासद है, जबकि साही का संसार अधिक वाद-विवादपूर्ण और बौद्धिक।
हिंदी आलोचना के इतिहास में एक रोचक तथ्य यह है कि मुक्तिबोध की प्रतिष्ठा स्वयं कम्युनिस्ट आलोचना के भीतर भी सर्वसम्मत नहीं थी। एक धड़ा उन्हें अपने सबसे बड़े वैचारिक कवि के रूप में प्रस्तुत करता रहा, जबकि दूसरा धड़ा उनकी जटिलता और आत्मसंघर्ष को लेकर असहज था। मुक्तिबोध को बाद में जिस तरह लगभग “प्रतिमान” बना दिया गया, वह उनके जीवनकाल में नहीं हुआ था।
साही की स्थिति और भी विचित्र रही। वे न तो दक्षिणपंथी थे, न मार्क्सवादी खेमे में समाहित हुए। वे स्वतंत्र समाजवादी चेतना के प्रतिनिधि थे। इस कारण वे किसी संगठित साहित्यिक गुट के प्रिय नहीं बन सके। हिंदी साहित्य में प्रायः वही लेखक अधिक प्रचारित होता है जिसके पीछे कोई वैचारिक संस्था, आलोचनात्मक समूह या अकादमिक नेटवर्क खड़ा हो। साही के साथ यह सुविधा नहीं थी।
साही ने साहित्यिक प्रतिष्ठानों और स्थापित आलोचनात्मक रूढ़ियों पर तीखे व्यंग्य किए थे तो यह स्पष्ट है कि वे हिंदी साहित्य की संस्थागत पवित्रताओं को चुनौती देने वाले व्यक्ति थे। वे साहित्यिक देवमूर्तियाँ बनाने के विरुद्ध थे। इस कारण वैचारिक खेमों को उनसे असुविधा होती थी।
रचनात्मक स्तर पर भी अंतर उल्लेखनीय है। मुक्तिबोध की भाषा घनी, प्रतीकात्मक, बेचैन और आत्मविश्लेषी है। उनकी कविता पाठक से कठोर श्रम मांगती है। साही की भाषा अपेक्षाकृत अधिक संवादात्मक, बौद्धिक और विडंबनापूर्ण है। मुक्तिबोध अँधेरे की सुरंगों में उतरते हैं, साही खुली बहस के मैदान में खड़े दिखाई देते हैं। मुक्तिबोध के यहाँ आत्मसंघर्ष की तीव्रता अधिक है, साही के यहाँ विवेक की स्वतंत्रता अधिक महत्त्वपूर्ण है।
यदि साहित्य के स्वातंत्र्य की दृष्टि से देखा जाए तो साही आज विशेष रूप से प्रासंगिक लगते हैं। आज भी साहित्य को किसी न किसी विचारधारा, पहचान या राजनीतिक प्रतिबद्धता के अधीन करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। साही हमें याद दिलाते हैं कि कविता का नागरिकता-पत्र किसी राजनीतिक दल से जारी नहीं होता। दूसरी ओर मुक्तिबोध यह स्मरण कराते हैं कि साहित्य पूरी तरह सामाजिक यथार्थ से विमुख भी नहीं हो सकता।
मुक्तिबोध हमें साहित्य की नैतिक बेचैनी देते हैं, जबकि साही साहित्य की बौद्धिक स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं। एक बिना दूसरे के हिंदी साहित्य अधूरा दिखाई देता है। किंतु यदि कोई पाठक साहित्य की स्वायत्तता, वैचारिक असहमति और रचनात्मक स्वतंत्रता को सर्वोच्च मूल्य मानता है, तो उसका झुकाव साही की ओर होना स्वाभाविक है। साही का सबसे बड़ा आग्रह यही था कि कविता किसी विचारधारा की दासी नहीं बल्कि मनुष्य की स्वतंत्र चेतना की अभिव्यक्ति है। यही आग्रह उन्हें हिंदी के सबसे विशिष्ट और आज भी पर्याप्त रूप से न समझे गए चिंतकों में शामिल करता है।
।। पाँच।।
साही और मुक्तिबोध को एक साथ देखें तो एक प्रश्न बार-बार सामने आता है कि हिंदी साहित्य ने अंततः किसे अपनी केंद्रीय स्मृति में अधिक स्थान दिया और क्यों? इसका उत्तर केवल साहित्यिक गुणवत्ता में नहीं बल्कि साहित्यिक राजनीति, संस्थागत शक्ति और आलोचनात्मक वर्चस्व में भी छिपा हुआ है। मनुष्य की तरह साहित्य भी केवल रचनाओं से नहीं चलता, उसके पीछे विश्वविद्यालय, आलोचक, पत्रिकाएँ, प्रकाशक और वैचारिक समूह आदि काम करते हैं। यह व्यवस्था कभी-कभी किसी लेखक को इतिहास के केंद्र में पहुँचा देती है और किसी दूसरे को हाशिए पर रख देती है। मानव जाति ने पुस्तकालय बनाए और गुट भी बनाए। दोनों का इतिहास साथ-साथ चलता है।
मुक्तिबोध की प्रतिष्ठा का निर्माण केवल उनकी कविताओं के कारण नहीं हुआ। उनकी मृत्यु के बाद उनकी रचनाओं को जिस प्रकार पढ़ा गया, संपादित किया गया और आलोचना में स्थापित किया गया, उसने उन्हें हिंदी आधुनिकता का एक केंद्रीय प्रतीक बना दिया। उनकी जीवन-गाथा भी इस प्रतिष्ठा का हिस्सा बनी। आर्थिक अभाव, संघर्ष, अस्वीकृति और अकाल मृत्यु ने उनकी छवि को लगभग एक शहीद लेखक का रूप दे दिया। हिंदी आलोचना को ऐसा व्यक्तित्व चाहिए था जो विचारधारात्मक प्रतिबद्धता और रचनात्मक ऊँचाई दोनों का प्रतीक बन सके। मुक्तिबोध इस भूमिका के लिए उपयुक्त प्रतीत हुए।
साही का मामला भिन्न था। वे किसी प्रकार की वैचारिक निष्ठा के विरोधी नहीं थे लेकिन साहित्य को विचारधारा का उपनिवेश बनाने के विरोधी अवश्य थे। वे मार्क्सवाद के विरोधी नहीं थे बल्कि मार्क्सवादी कट्टरता के आलोचक थे। वे साहित्य को राजनीतिक घोषणापत्र में बदलने के खिलाफ थे। यही कारण है कि उनकी आलोचना और कविता दोनों में स्वतंत्रता का आग्रह दिखाई देता है।
साही के यहाँ एक गहरा लोकतांत्रिक विवेक है। वे किसी अंतिम सत्य पर विश्वास नहीं करते। उनके लिए साहित्य प्रश्न पूछने का क्षेत्र है, उत्तर बाँटने का नहीं। मुक्तिबोध की रचना में कई बार एक वैचारिक दिशा स्पष्ट दिखाई देती है। साही उस दिशा को भी संदेह की दृष्टि से देखने का साहस रखते हैं। वे मानते हैं कि साहित्य का सबसे बड़ा धर्म संदेह है। जहाँ संदेह समाप्त होता है, वहाँ कविता भी कमजोर होने लगती है।
यही कारण है कि साही का लेखन पढ़ते समय पाठक को किसी वैचारिक अनुशासन में भर्ती नहीं होना पड़ता। वह स्वतंत्र रह सकता है। मुक्तिबोध के यहाँ पाठक को एक नैतिक और वैचारिक यात्रा से गुजरना पड़ता है। साही के यहाँ पाठक एक संवाद में शामिल होता है। यह अंतर बहुत सूक्ष्म है, पर अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
एक और अंतर उल्लेखनीय है। मुक्तिबोध की कविता में त्रासदी की तीव्रता है। वहाँ मनुष्य लगातार पराजित, घायल और संघर्षरत दिखाई देता है। साही के यहाँ विडंबना है, व्यंग्य है, प्रश्न हैं और एक प्रकार की बौद्धिक मुस्कान भी है। मुक्तिबोध अँधेरे की संरचना को पहचानते हैं। साही उस अँधेरे के भीतर छिपी हुई वैचारिक सत्ता को भी पहचानते हैं।
हिंदी आलोचना के एक हिस्से ने मुक्तिबोध को लगभग निर्विवाद महापुरुष के रूप में प्रस्तुत किया। इसके परिणामस्वरूप कभी-कभी उनके ऊपर आलोचनात्मक चर्चा भी कठिन हो गई। साही इस प्रकार की देवमूर्ति-निर्माण प्रक्रिया के विरोधी थे। वे साहित्य में मूर्तिभंजन की परंपरा के व्यक्ति थे। उन्हें किसी लेखक की महानता से अधिक उसकी सीमाओं में रुचि थी। वे मानते थे कि आलोचना का काम श्रद्धांजलि लिखना नहीं, बल्कि समझना है।
आज जब साहित्य में पहचान-राजनीति, वैचारिक ध्रुवीकरण और सांस्कृतिक खेमेबंदी पहले से अधिक दिखाई देती है, तब साही की प्रासंगिकता नए रूप में उभरती है। वे हमें बताते हैं कि साहित्य का मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि लेखक किस विचारधारा से जुड़ा है, बल्कि इस बात से तय होता है कि वह मनुष्य और अनुभव की जटिलता को कितनी ईमानदारी से व्यक्त कर पाता है।
मुक्तिबोध का महत्त्व है लेकिन साही का महत्त्व इस बात में है कि वे साहित्य को किसी भी प्रकार की वैचारिक एकाधिकारवादी प्रवृत्ति से बचाने की कोशिश करते हैं। यदि मुक्तिबोध हिंदी कविता के अंतरतम अँधेरे के कवि हैं तो साही उसकी स्वतंत्र चेतना के प्रहरी हैं। एक हमें बेचैन करता है, दूसरा हमें सतर्क करता है। और कभी-कभी सतर्कता, बेचैनी से भी अधिक दुर्लभ गुण सिद्ध होती है।
।। छः।।
साही और मुक्तिबोध के बीच बहस को केवल साहित्यिक मतभेद मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। यह आधुनिक हिंदी साहित्य के भीतर दो अलग-अलग बौद्धिक संस्कारों का संघर्ष भी है। एक संस्कार यह मानता है कि साहित्य को इतिहास की दिशा पहचाननी चाहिए और सामाजिक परिवर्तन की शक्तियों के साथ खड़ा होना चाहिए। दूसरा संस्कार यह मानता है कि साहित्य का पहला दायित्व किसी ऐतिहासिक दिशा की पुष्टि करना नहीं, बल्कि मनुष्य की स्वतंत्र चेतना को बचाए रखना है। मुक्तिबोध पहले संस्कार के सबसे बड़े प्रतिनिधि हैं, जबकि साही दूसरे संस्कार के।
साही का एक बड़ा गुण यह है कि वे विचारधारा की आलोचना विचारधारा-विरोधी होकर नहीं करते। वे जानते हैं कि बिना विचार के साहित्य संभव नहीं है। उनका विरोध उस क्षण से है जब विचार, अनुभव पर शासन करने लगता है। वे इस बात से सावधान करते हैं कि जब कोई विचारधारा स्वयं को अंतिम सत्य घोषित कर देती है, तब वह धर्म की तरह व्यवहार करने लगती है। तब उसके अपने पुरोहित, अपने शास्त्र और अपने विधर्मी पैदा हो जाते हैं। हिंदी साहित्य में भी कई बार ऐसा हुआ कि कुछ आलोचकों ने साहित्य को पढ़ने के लिए एक ही वैचारिक चश्मे को अनिवार्य बना दिया।
मुक्तिबोध महत्त्वपूर्ण लेखक थे और वे किसी एक सूत्र में नहीं समाते। विडंबना यह है कि उनके कुछ अनुयायियों ने उन्हें उसी प्रकार पढ़ा, जैसे धार्मिक लोग अपने धर्मग्रंथों को पढ़ते हैं। मुक्तिबोध की जटिलता, आत्मसंघर्ष और आत्मालोचना की जगह उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता को अधिक महत्त्व दिया गया। परिणाम यह हुआ कि मुक्तिबोध का जीवंत व्यक्तित्व धीरे-धीरे एक प्रतीक में बदलता गया।
साही इस प्रवृत्ति से असहमत थे। वे साहित्य में किसी भी प्रकार की आधिकारिक व्याख्या को संदेह की दृष्टि से देखते थे। उनके लिए कविता का अर्थ स्थिर नहीं होता। वह हर नए पाठक के साथ नया अर्थ ग्रहण करती है। इसलिए वे आलोचना को सत्ता नहीं, संवाद मानते हैं। उनकी दृष्टि में आलोचक न्यायाधीश नहीं, सहयात्री होना चाहिए।
लेखन और जीवन के स्तर पर भी दोनों में गहरा अंतर था। मुक्तिबोध का जीवन एक प्रकार की तपस्या और संघर्ष की कथा है। उनके व्यक्तित्व में एक नैतिक कठोरता दिखाई देती है। वे स्वयं से भी असंतुष्ट रहते हैं और समाज से भी। उनकी रचनाओं में यह बेचैनी निरंतर उपस्थित है। दूसरी ओर साही का व्यक्तित्व अधिक खुला, बहसप्रिय और सार्वजनिक था। वे जीवन को केवल त्रासदी के रूप में नहीं देखते। उनके भीतर लोकतांत्रिक संवाद की एक गहरी आस्था थी। वे असहमति को संकट नहीं, रचनात्मक संभावना मानते थे।
यहीं साही की आधुनिकता मुक्तिबोध से अलग दिखाई देती है। मुक्तिबोध की आधुनिकता संघर्ष की आधुनिकता है। साही की आधुनिकता स्वतंत्रता की आधुनिकता है। मुक्तिबोध का प्रश्न है कि मनुष्य शोषण से कैसे मुक्त होगा। साही का प्रश्न है कि मनुष्य किसी भी प्रकार की बौद्धिक गुलामी से कैसे बचेगा। दोनों प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन उनका केंद्र अलग है।
साहित्यिक संस्थानों के संदर्भ में भी साही का अनुभव विशिष्ट था। वे उन लोगों में थे जो हिंदी साहित्य में बढ़ती हुई वैचारिक एकरूपता को लेकर चिंतित थे। उन्हें लगता था कि साहित्य में विविधता की जगह धीरे-धीरे वैचारिक अनुशासन ले रहा है। जो लेखक किसी स्थापित खेमे से बाहर है, उसके लिए जगह कम होती जा रही है। इस दृष्टि से साही को पढ़ना आज के समय में और भी आवश्यक हो जाता है, क्योंकि आज भी साहित्यिक संसार वैचारिक ध्रुवीकरण से मुक्त नहीं है। केवल झंडों के रंग बदल गए हैं, प्रवृत्ति वही बनी हुई है।
साही का महत्त्व इस बात में भी है कि वे हिंदी साहित्य के उन दुर्लभ व्यक्तियों में हैं जिन्होंने स्वतंत्र बुद्धिजीवी की भूमिका निभाई। वे किसी बौद्धिक शिविर के स्थायी निवासी नहीं बने। यह स्थिति आकर्षक कम और कठिन अधिक होती है। संगठित समूह अपने लोगों को आगे बढ़ाते हैं, उनकी चर्चा करते हैं, उन्हें पाठ्यक्रमों में स्थापित करते हैं। स्वतंत्र व्यक्ति को अपने बल पर खड़ा रहना पड़ता है। साही ने यही रास्ता चुना।
आज जब पीछे मुड़कर देखा जाता है तो लगता है कि मुक्तिबोध ने हिंदी साहित्य को नैतिक गहराई दी और साही ने बौद्धिक स्वतंत्रता। मुक्तिबोध ने हमें यह सिखाया कि आत्मालोचना के बिना कोई सच्ची रचना संभव नहीं। साही ने हमें यह चेतावनी दी कि स्वतंत्रता के बिना कोई सच्ची आलोचना संभव नहीं। हिंदी साहित्य की सबसे स्वस्थ परंपरा शायद वहीं बनती है जहाँ मुक्तिबोध की नैतिक बेचैनी और साही की स्वतंत्र चेतना एक-दूसरे से संवाद करती हैं, न कि एक-दूसरे को निरस्त करती हैं।
फिर भी, यदि साहित्य के क्षेत्र में स्वतंत्र विवेक, बहुलता, असहमति और रचनात्मक स्वायत्तता को सर्वोच्च मूल्य माना जाए, तो साही का व्यक्तित्व असाधारण महत्त्व ग्रहण कर लेता है। वे हमें याद दिलाते हैं कि कविता किसी विचारधारा की सैनिक टुकड़ी नहीं है। वह मनुष्य की उस स्वतंत्र आवाज़ का नाम है जो हर सत्ता, हर सिद्धांत और हर स्थापित सत्य से प्रश्न पूछने का साहस रखती है। यही कारण है कि साही का पुनर्पाठ आज केवल साहित्यिक आवश्यकता नहीं, बल्कि बौद्धिक आवश्यकता भी प्रतीत होता है।
।। सात ।।
मुक्तिबोध की सीमाओं को समझने के लिए उनके व्यक्तित्व और लेखन के बीच के संबंध को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। वे उन रचनाकारों में नहीं थे जो जीवन और साहित्य को अलग-अलग खानों में रखते हैं। उनके लिए कविता केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं थी बल्कि आत्मसंघर्ष, वैचारिक ईमानदारी और नैतिक परीक्षा का क्षेत्र भी थी। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ पढ़ते हुए कई बार ऐसा लगता है कि हम कविता नहीं, एक बेचैन आत्मा की निरंतर चलती हुई बहस पढ़ रहे हैं। यह बहस जितनी आकर्षक है, उतनी ही थकाने वाली भी। मुक्तिबोध कभी-कभी अपने अनुभवों को कविता के भीतर इतना अधिक विश्लेषित कर देते हैं कि अनुभव की तात्कालिकता कम हो जाती है और विचार की संरचना अधिक प्रमुख हो जाती है।
उनकी कविता में सौंदर्य का स्थान भी विशिष्ट प्रकार का है। वे प्रकृति, प्रेम, सौंदर्य और जीवन के कोमल पक्षों को उस तरह नहीं देखते जैसे छायावादी कवि या बाद के अनेक कवि देखते हैं। उनके लिए सौंदर्य स्वयं में कोई अंतिम मूल्य नहीं है। वह तब तक सार्थक नहीं होता जब तक वह मनुष्य और समाज के गहरे प्रश्नों से जुड़ा न हो। इस दृष्टि का अपना महत्व है, किंतु इसके कारण उनकी कविता में सौंदर्य का स्वतंत्र और स्वच्छंद आयाम अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि वे फूल को फूल की तरह नहीं बल्कि किसी सामाजिक संकेत या ऐतिहासिक प्रतीक की तरह देख रहे हैं। इससे कविता की वैचारिक शक्ति बढ़ती है पर उसकी सौंदर्यात्मक उड़ान सीमित हो सकती है।
उनके यहाँ एक और समस्या यह दिखाई देती है कि वे मनुष्य को प्रायः नैतिक श्रेणियों में देखने लगते हैं। शोषित और शोषक, ईमानदार और अवसरवादी, प्रतिबद्ध और आत्मकेन्द्रित जैसी द्वंद्वात्मक संरचनाएँ उनकी रचनाओं में बार-बार आती हैं। वास्तविक जीवन इससे अधिक जटिल होता है। मनुष्य न तो पूर्णतः नायक होता है, न पूर्णतः खलनायक। उसमें अच्छाई और कमजोरी साथ-साथ रहती हैं। मुक्तिबोध इस जटिलता को पहचानते अवश्य हैं लेकिन उनकी वैचारिक दृष्टि कई बार उसे व्यापक मानवीय धुंधलके में देखने के बजाय नैतिक संघर्ष के रूप में व्यवस्थित कर देती है।
उनकी आलोचना का एक पक्ष यह भी है कि उन्होंने साहित्य में “प्रतिबद्धता” को अत्यधिक महत्त्व दिया। इसके परिणामस्वरूप हिंदी साहित्य में लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि जो साहित्य सामाजिक या राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं है, वह कम महत्त्वपूर्ण है। इस दृष्टिकोण ने अनेक उत्कृष्ट रचनाओं के मूल्यांकन को प्रभावित किया। कविता का एक क्षेत्र ऐसा भी होता है जो केवल संवेदना, स्मृति, भाषा और अस्तित्व के सूक्ष्म अनुभवों से निर्मित होता है। मुक्तिबोध की आलोचनात्मक दृष्टि इस क्षेत्र को पूरी तरह अस्वीकार नहीं करती लेकिन उसे केंद्र में भी नहीं रखती।
मुक्तिबोध के लेखन में आशा की तुलना में संकट अधिक है। वे भविष्य के प्रति विश्वास रखते हैं लेकिन उनकी रचनात्मक दुनिया में वह विश्वास अक्सर अंधेरे से ढका हुआ दिखाई देता है। उनकी प्रसिद्ध काव्य-दृष्टि में अंधेरा केवल सामाजिक नहीं, मानसिक और आध्यात्मिक भी है। यह अंधेरा आधुनिक मनुष्य की त्रासदी को अभिव्यक्त करता है किंतु लगातार अंधेरे पर केंद्रित रहने से जीवन की अन्य संभावनाएँ कभी-कभी छूट जाती हैं। उनकी कविता में उल्लास, विनोद, प्रेम की सहजता और जीवन के सामान्य सुख अपेक्षाकृत कम मिलते हैं। ऐसा लगता है कि वे मनुष्य को उसके संकटों में अधिक देखते हैं, उसकी सहज प्रसन्नताओं में कम।
यदि उनकी तुलना नागार्जुन से की जाए तो अंतर और स्पष्ट हो जाता है। नागार्जुन भी सामाजिक चेतना के कवि हैं पर उनके यहाँ जीवन की रंगीन बहुलता है। वे खेत, गाँव, सड़क, पशु-पक्षी, प्रेम, राजनीति और लोकभाषा को एक साथ कविता में ले आते हैं। मुक्तिबोध का संसार अधिक अंतर्मुखी और बौद्धिक है। वे बाहर की दुनिया को भी अपने भीतर के संघर्षों के माध्यम से देखते हैं। परिणामस्वरूप उनकी कविता का भावलोक अधिक सघन तो बनता है लेकिन उसका विस्तार कुछ सीमित हो जाता है।
विजयदेव नारायण साही की दृष्टि से देखें तो मुक्तिबोध की एक बड़ी कमी यह थी कि वे साहित्य और विचारधारा के संबंध को लेकर पर्याप्त संशयशील नहीं थे। साही को लगता था कि विचारधारा मनुष्य को समझने का एक उपकरण हो सकती है, लेकिन यदि वही अंतिम सत्य बन जाए तो साहित्य की स्वतंत्रता संकट में पड़ जाती है। मुक्तिबोध के यहाँ विचारधारा कभी-कभी अनुभव के ऊपर छा जाती है। साही इस बिंदु पर अधिक उदार और बहुवचनात्मक दिखाई देते हैं। उनके लिए साहित्य का कार्य किसी निष्कर्ष तक पहुँचना नहीं, बल्कि अनुभव की जटिलता को खुला रखना है।
मुक्तिबोध की त्रासदी यह थी कि वे अपने समय से आगे थे और अपने समय के भीतर भी कैद थे। वे आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवी की आत्मा को गहराई से समझते थे।लेकिन उसी आत्मा के संकटों से मुक्त नहीं हो पाए। वे शोषण के विरुद्ध थे परंतु मनुष्य की उन दुर्बलताओं को पूरी सहानुभूति से नहीं देख सके जो किसी विचारधारा की भाषा में नहीं समातीं। वे न्याय के पक्षधर थे, किंतु जीवन हमेशा न्याय की स्पष्ट रेखाओं में नहीं चलता। वह अक्सर विरोधाभासों, असंगतियों और अपूर्णताओं से भरा होता है।
।। आठ ।।
मुक्तिबोध के यहाँ मित्रता मूलतः एक नैतिक श्रेणी है। वे मित्र को केवल व्यक्तिगत निकटता के आधार पर नहीं पहचानते बल्कि उसे एक साझा नैतिक संघर्ष का सहभागी मानते हैं। उनके लिए मित्र वह है जो सत्य के पक्ष में खड़ा हो जो आत्मालोचना करने का साहस रखता हो और जो सामाजिक अन्याय के प्रति संवेदनशील हो। इसीलिए मुक्तिबोध की रचनाओं में मित्रता का भाव अत्यंत गंभीर और उत्तरदायित्वपूर्ण दिखाई देता है। वे मित्रता को भावनात्मक सुविधा नहीं बल्कि नैतिक साझेदारी के रूप में देखते हैं।
मुक्तिबोध का जीवन आर्थिक कठिनाइयों, संस्थागत उपेक्षा और वैचारिक संघर्षों से भरा हुआ था। इस जीवनानुभव ने उनके भीतर यह विश्वास पैदा किया कि लेखक को अपने समय के नैतिक संकटों में अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इसलिए उनके लिए बौद्धिक समुदाय का अर्थ था ऐसे लोगों का समूह जो एक साझा ऐतिहासिक उद्देश्य से जुड़े हों। वे साहित्यिक समुदाय को केवल रचनाकारों का समूह नहीं मानते, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में सक्रिय हस्तक्षेप करने वाली शक्ति के रूप में देखते हैं।
यहीं से साही उनसे अलग हो जाते हैं। साही के लिए बौद्धिक समुदाय किसी एक विचारधारा, लक्ष्य या ऐतिहासिक कार्यक्रम पर आधारित नहीं हो सकता। वे मानते हैं कि समुदाय का वास्तविक अर्थ विविधताओं का सह-अस्तित्व है। यदि मुक्तिबोध के यहाँ समुदाय का आधार साझा प्रतिबद्धता है तो साही के यहाँ उसका आधार साझा संवाद है। साही को ऐसे समुदाय की तलाश है जिसमें मतभेदों के लिए पर्याप्त स्थान हो। वे इस बात को लेकर सजग हैं कि कोई भी बौद्धिक समुदाय यदि केवल समान विचार वाले लोगों का समूह बन जाए, तो वह धीरे-धीरे जीवंतता खो देता है।
इस दृष्टि से साही मित्रता को भी अधिक उदार और खुली अवधारणा के रूप में देखते हैं। उनके लिए मित्र वह भी हो सकता है जिससे बुनियादी असहमति हो। वे मित्रता को सहमति का परिणाम नहीं मानते। उनके यहाँ मित्रता का आधार संवाद की निरंतरता है। यह आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना का महत्वपूर्ण पहलू है। साही इस बात को स्वीकार करते हैं कि मनुष्य और विचार दोनों अपूर्ण हैं। इसलिए किसी भी मित्रता या बौद्धिक संबंध को अंतिम सत्य के आधार पर निर्मित नहीं किया जा सकता।
मुक्तिबोध के यहाँ बौद्धिक समुदाय का संकट बार-बार दिखाई देता है। वे अपने समय के मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों से गहरे स्तर पर निराश हैं। उन्हें लगता है कि बहुत-से लेखक और आलोचक नैतिक साहस खो चुके हैं। वे सुविधाओं, पदों और प्रतिष्ठा के लिए अपने मूल्यों से समझौता कर लेते हैं। मुक्तिबोध की प्रसिद्ध आलोचनात्मक दृष्टि का एक बड़ा हिस्सा इसी निराशा से निर्मित हुआ है। वे बार-बार ऐसे बौद्धिक समुदाय की खोज करते हैं जो आत्मसंघर्ष और ईमानदारी पर आधारित हो।
साही इस समस्या को अलग ढंग से देखते हैं। वे भी बौद्धिक जीवन की कमजोरियों को पहचानते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि समुदाय का निर्माण नैतिक शुद्धता के आधार पर नहीं किया जा सकता। मनुष्य हमेशा अपूर्ण रहेगा। इसलिए समुदाय का आधार नैतिक पूर्णता नहीं, बल्कि आलोचनात्मक सह-अस्तित्व होना चाहिए। साही के यहाँ यह विश्वास दिखाई देता है कि मतभेदों के बावजूद संवाद संभव है। यही लोकतांत्रिक बौद्धिकता का आधार है।
दोनों रचनाकारों के बीच का यह अंतर उनकी लेखकीय मुद्रा में भी दिखाई देता है। मुक्तिबोध अक्सर एक ऐसे अकेले व्यक्ति की तरह दिखाई देते हैं जो अपने समय से संघर्ष कर रहा है। उनकी रचनाओं में एकाकीपन की गहरी अनुभूति है। यह एकाकीपन केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि बौद्धिक भी है। उन्हें लगता है कि उनके आसपास का संसार उनके नैतिक आदर्शों तक नहीं पहुँच पा रहा है। इसलिए उनकी कविता में मित्रता की आकांक्षा तो है, लेकिन उसके साथ गहरी निराशा भी जुड़ी हुई है।
इसके विपरीत साही का व्यक्तित्व संवादप्रिय है। वे बहस को महत्व देते हैं। वे विचारों के टकराव से भयभीत नहीं होते। उनके लिए बौद्धिक जीवन का अर्थ ही है कि विभिन्न दृष्टियाँ एक-दूसरे के साथ संवाद करें। इसलिए उनके यहाँ एकाकीपन की जगह संवाद की संभावना अधिक दिखाई देती है। वे साहित्यिक समुदाय को एक खुली सभा की तरह देखते हैं, न कि किसी वैचारिक संगठन की तरह।
यदि आधुनिक भारतीय बौद्धिकता के संदर्भ में देखा जाए तो मुक्तिबोध और साही दो भिन्न परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुक्तिबोध की परंपरा नैतिक प्रतिबद्धता की परंपरा है। वह पूछती है कि लेखक किसके पक्ष में खड़ा है। साही की परंपरा बौद्धिक स्वतंत्रता की परंपरा है। वह पूछती है कि लेखक कितना स्वतंत्र होकर सोच सकता है। मुक्तिबोध समुदाय में नैतिक एकजुटता खोजते हैं, साही समुदाय में वैचारिक बहुलता।
मित्रता के प्रश्न पर भी यही अंतर दिखाई देता है। मुक्तिबोध की दृष्टि में मित्रता एक साझा संघर्ष की संज्ञा है। साही की दृष्टि में मित्रता साझा असहमति की भी संज्ञा हो सकती है। मुक्तिबोध मित्र से नैतिक निष्ठा की अपेक्षा करते हैं। साही मित्र से वैचारिक ईमानदारी की। मुक्तिबोध के लिए मित्रता का केंद्र प्रतिबद्धता है, साही के लिए संवाद।
यहाँ यह कहना उचित होगा कि दोनों दृष्टियों की अपनी-अपनी सीमाएँ और संभावनाएँ हैं। केवल मुक्तिबोध की अवधारणा को स्वीकार कर लिया जाए तो बौद्धिक समुदाय वैचारिक अनुशासन का शिकार हो सकता है। केवल साही की अवधारणा को स्वीकार कर लिया जाए तो समुदाय नैतिक दृढ़ता खो सकता है। एक ओर प्रतिबद्धता की कठोरता का खतरा है, दूसरी ओर उदारता की शिथिलता का।
मुक्तिबोध हमें बताते हैं कि बिना नैतिक साहस के कोई बौद्धिक समुदाय जीवित नहीं रह सकता। साही हमें याद दिलाते हैं कि बिना असहमति के कोई बौद्धिक समुदाय लोकतांत्रिक नहीं रह सकता। मुक्तिबोध समुदाय को आत्मा देते हैं, साही उसे खुली हवा देते हैं।
मित्रता और बौद्धिक समुदाय के प्रश्न पर मुक्तिबोध और साही का संवाद आधुनिक हिंदी साहित्य की एक बड़ी बहस को सामने लाता है। क्या समुदाय समान विचारों से बनता है या संवाद से? क्या मित्रता का आधार निष्ठा है या स्वतंत्रता? क्या लेखक का दायित्व किसी साझा उद्देश्य में भागीदारी है या अपनी स्वतंत्र चेतना की रक्षा करना? इन प्रश्नों का अंतिम उत्तर शायद किसी एक के पास नहीं है। किंतु इतना निश्चित है कि मुक्तिबोध और साही की उपस्थिति इन प्रश्नों को आज भी जीवित रखती है, और यही उनकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।
।। नौ ।।
मुक्तिबोध का युग बड़े वैचारिक विश्वासों का युग था। उस समय यह विश्वास मौजूद था कि इतिहास की एक दिशा है, समाज को बदला जा सकता है, शोषण की संरचनाओं को पहचाना जा सकता है और साहित्य इस परिवर्तन में सक्रिय भूमिका निभा सकता है। इसलिए मुक्तिबोध के लिए लेखक केवल दर्शक नहीं था; वह एक नैतिक योद्धा था। वह अपने समय की अन्यायपूर्ण संरचनाओं से लड़ता है, अपने भीतर की कायरता से लड़ता है, और समाज के भीतर छिपे अंधेरों को उजागर करता है। मुक्तिबोध की आलोचना इसी नैतिक ऊर्जा से संचालित होती है।
समय बहुत दूर आ चुका है। आज विचारधाराओं के प्रति व्यापक संशय है। बीसवीं शताब्दी के अनेक बड़े राजनीतिक स्वप्न टूट चुके हैं। जिन विचारधाराओं ने मुक्ति का वादा किया था, वे भी कई बार दमनकारी संरचनाओं में बदल गईं। ऐसे समय में मनुष्य का विश्वास किसी एक अंतिम सत्य पर नहीं बल्कि अनेक सत्यों की सह-अस्तित्व क्षमता पर अधिक बढ़ा है। यही वह बिंदु है जहाँ साही की प्रासंगिकता बढ़ने लगती है।
साही किसी भी अंतिम सत्य से सावधान रहते हैं। वे मानते हैं कि मनुष्य की स्वतंत्रता किसी भी विचारधारा से बड़ी है। उनके लिए असहमति केवल अधिकार नहीं, बल्कि बौद्धिक जीवन की अनिवार्य शर्त है। भविष्य की हिंदी आलोचना यदि लोकतांत्रिक और बहुलतावादी होगी तो उसे साही के इस आग्रह से बहुत कुछ ग्रहण करना पड़ेगा क्योंकि आज आलोचना का कार्य केवल विचारधारा की पुष्टि करना नहीं रह गया है; उसका कार्य विभिन्न दृष्टियों के बीच संवाद स्थापित करना भी है।
मुक्तिबोध का आलोचनात्मक संसार नैतिक रूप से अत्यंत प्रेरक है, किंतु उसमें एक प्रकार का ऐतिहासिक विश्वास भी मौजूद है। उन्हें लगता है कि मनुष्य को सही दिशा की पहचान करनी चाहिए और उसके पक्ष में खड़ा होना चाहिए। साही इस विश्वास के प्रति संशयशील हैं। वे पूछते हैं कि सही दिशा का निर्धारण कौन करेगा? क्या कोई विचारधारा स्वयं को अंतिम मान सकती है? क्या असहमति को हमेशा जीवित नहीं रहना चाहिए? ये प्रश्न आज पहले की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण हो गए हैं।
समकालीन आलोचना में पहचान, लैंगिकता, क्षेत्रीयता, जाति, भाषा और सांस्कृतिक विविधता जैसे प्रश्नों का महत्त्व बढ़ा है। इन प्रश्नों का स्वभाव बहुवचनात्मक है। इनके भीतर एक ही दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं होता। यहाँ संवाद, विविधता और अनेक दृष्टियों की आवश्यकता होती है। इस संदर्भ में साही का चिंतन अधिक अनुकूल दिखाई देता है। वे आलोचना को किसी एक वैचारिक अनुशासन में सीमित नहीं करते। वे उसे खुला और गतिशील बनाए रखना चाहते हैं।
यह कहना उचित होगा कि मुक्तिबोध की आलोचना का केंद्रीय शब्द “प्रतिबद्धता” है, जबकि साही की आलोचना का केंद्रीय शब्द “स्वतंत्रता” है। बीसवीं शताब्दी ने प्रतिबद्धता को बहुत महत्त्व दिया। इक्कीसवीं शताब्दी स्वतंत्रता को अधिक महत्त्व दे रही है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रतिबद्धता अप्रासंगिक हो गई है बल्कि यह कि प्रतिबद्धता को अब स्वतंत्रता के भीतर रहकर ही अर्थपूर्ण माना जाता है। यदि कोई प्रतिबद्धता स्वतंत्रता को नष्ट कर दे तो वह आलोचनात्मक नहीं रह जाती।
हिंदी विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की स्थिति को देखकर भी यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो जाता है। लंबे समय तक आलोचना का एक बड़ा हिस्सा वैचारिक निष्ठाओं से संचालित होता रहा। लेखक का मूल्यांकन कई बार उसकी रचना से अधिक उसकी वैचारिक स्थिति के आधार पर किया गया लेकिन नई पीढ़ी के शोधार्थियों और आलोचकों में यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे बदल रही है। वे किसी लेखक को केवल एक विचारधारा के प्रतिनिधि के रूप में नहीं पढ़ना चाहते। वे उसकी जटिलता, अंतर्विरोध और बहुआयामी अनुभवों को समझना चाहते हैं। यह प्रवृत्ति साही के अधिक निकट है।
साही की एक और भविष्य में उनकी प्रासंगिकता को बढ़ाती है। वे संशय को कमजोरी नहीं मानते। आधुनिक लोकतंत्र का आधार ही यह है कि कोई भी विचार अंतिम नहीं है। हर विचार प्रश्नों के लिए खुला है। साही इसी खुलेपन के पक्षधर हैं। मुक्तिबोध की दुनिया में भी प्रश्न हैं लेकिन वहाँ प्रश्न अंततः किसी नैतिक निष्कर्ष की ओर बढ़ते हैं। साही के यहाँ प्रश्न कई बार प्रश्न ही बने रहते हैं। भविष्य की आलोचना संभवतः इसी अपूर्णता को अधिक महत्त्व देगी।
फिर भी यह कहना गलत होगा कि भविष्य पूरी तरह साही का है और मुक्तिबोध अप्रासंगिक हो जाएँगे। वास्तव में भविष्य की हिंदी आलोचना को दोनों की आवश्यकता होगी। मुक्तिबोध हमें यह याद दिलाते हैं कि साहित्य केवल भाषा का खेल नहीं है; उसका संबंध मनुष्य के दुख, अन्याय और नैतिक संकट से भी है। साही हमें यह याद दिलाते हैं कि न्याय की खोज में भी स्वतंत्रता का त्याग नहीं किया जा सकता। मुक्तिबोध चेतना को सक्रिय करते हैं, साही चेतना को स्वतंत्र रखते हैं।
इक्कीसवीं शताब्दी की लोकतांत्रिक, बहुलतावादी और संवादधर्मी आलोचना किसके अधिक निकट दिखाई देती है तो उत्तर संभवतः साही की ओर झुकेगा।
।। दस ।।
बीसवीं शताब्दी का बड़ा हिस्सा विचारधाराओं का युग था। साहित्यकार केवल रचनाकार नहीं, बल्कि वैचारिक योद्धा भी माने जाते थे। उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे किसी सामाजिक, राजनीतिक या ऐतिहासिक पक्ष का प्रतिनिधित्व करें। इसी वातावरण में मुक्तिबोध जैसे कवि और चिंतक अत्यंत प्रभावशाली बने। उनकी नैतिक बेचैनी, सामाजिक न्याय के प्रति आग्रह और आत्मसंघर्ष ने उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का एक केंद्रीय व्यक्तित्व बना दिया। लेकिन इक्कीसवीं शताब्दी में प्रवेश करते ही साहित्यिक और बौद्धिक परिदृश्य बदलने लगा। अब मनुष्य किसी एक महान विचारधारा की छाया में नहीं जी रहा। वह अनेक पहचानों, अनेक अनुभवों और अनेक सत्यों के बीच जी रहा है। इसी परिवर्तन ने विजयदेव नारायण साही को नए ढंग से प्रासंगिक बना दिया है।
साही विचारों के विरोधी नहीं हैं लेकिन विचारों के निरंकुश हो जाने के विरोधी हैं। उनके लिए साहित्य का कार्य किसी स्थापित निष्कर्ष की पुनरावृत्ति नहीं बल्कि प्रश्नों को जीवित रखना है। आज का साहित्य भी धीरे-धीरे इसी दिशा में बढ़ता दिखाई देता है। समकालीन साहित्य में अब कोई एक केंद्रीय विचारधारा नहीं है। इस बहुलता को समझने के लिए साही की दृष्टि अधिक उपयोगी प्रतीत होती है।
विडंबना यह है कि हिंदी साहित्य ने लंबे समय तक साही को एक महत्त्वपूर्ण कवि और आलोचक माना लेकिन उन्हें एक स्वतंत्र बौद्धिक परंपरा के रूप में कम पढ़ा। आज जब विचारधाराओं की चमक मंद पड़ रही है और संवाद, असहमति, स्वतंत्रता तथा बहुलता के प्रश्न केंद्र में आ रहे हैं, तब साही का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। वे केवल एक कवि नहीं रह जाते बल्कि एक बौद्धिक संस्कार के प्रतिनिधि बन जाते हैं।
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