— परिचय दास —
।। एक ।।
विजयदेव नारायण साही का नाम हिंदी साहित्य में केवल एक कवि, आलोचक और चिंतक के रूप में नहीं लिया जाता, बल्कि एक ऐसे सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में भी लिया जाता है जिसने साहित्य को जीवन से अलग किसी सुरक्षित और निष्क्रिय क्षेत्र के रूप में स्वीकार नहीं किया। उनकी दृष्टि में साहित्य का संबंध मनुष्य की स्वतंत्रता से था, और स्वतंत्रता केवल कलात्मक नहीं बल्कि राजनीतिक, सामाजिक तथा नैतिक भी थी। यही कारण है कि जब भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में आपातकाल का दौर आया, तब साही की प्रतिक्रिया मात्र राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं थी; वह मनुष्य की स्वाधीनता के पक्ष में एक गहरी सांस्कृतिक और नैतिक प्रतिक्रिया थी।
साही का पूरा वैचारिक विकास ही इस प्रश्न के इर्द-गिर्द हुआ था कि मनुष्य को किसी भी प्रकार की विचारधारात्मक कैद से कैसे मुक्त रखा जाए। वे उन विरले साहित्यकारों में थे जिन्होंने मार्क्सवाद, समाजवाद, गांधीवाद और लोहियावाद, सभी से संवाद किया, परंतु किसी एक विचारधारा के स्थायी बंदी नहीं बने। उनकी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि कहीं विचारधारा मनुष्य से बड़ी न हो जाए। साहित्य के क्षेत्र में भी वे इसी कारण किसी राजनीतिक दल या वैचारिक गुट की अधीनता स्वीकार नहीं कर सके। आपातकाल के समय यही बुनियादी दृष्टि उनके प्रतिरोध का आधार बनी।
सत्तर के दशक का भारत केवल राजनीतिक संकट का भारत नहीं था। यह विश्वासों के टूटने का समय था। स्वतंत्रता के बाद जो लोकतांत्रिक स्वप्न निर्मित हुआ था, उसमें दरारें दिखाई देने लगी थीं। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक विफलता और राजनीतिक केंद्रीकरण के कारण समाज में असंतोष बढ़ रहा था। गुजरात और बिहार के छात्र आंदोलनों ने इस असंतोष को सार्वजनिक रूप दिया। इसी पृष्ठभूमि में जयप्रकाश नारायण का आंदोलन उभरा। यह आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन का आंदोलन नहीं था; यह व्यवस्था परिवर्तन की आकांक्षा का आंदोलन था। साही ने इस आंदोलन को उसी रूप में समझा।
साही और जयप्रकाश नारायण का संबंध केवल राजनीतिक सहमति का संबंध नहीं था। दोनों के बीच मनुष्य और समाज को लेकर एक गहरा नैतिक संवाद था। जयप्रकाश नारायण जिस “संपूर्ण क्रांति” की बात कर रहे थे, साही उसके भीतर केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं देखते थे। वे उसमें भारतीय समाज की जड़ताओं को तोड़ने की संभावना खोजते थे। उन्हें लगता था कि लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है; लोकतंत्र एक मानसिकता है, एक सांस्कृतिक संस्कार है। यदि समाज में स्वतंत्र विचार, असहमति और संवाद की परंपरा नहीं होगी, तो लोकतंत्र का बाहरी ढाँचा भी अंततः निरंकुशता में बदल जाएगा।
यहीं से साही का साहित्य और राजनीति का संबंध स्पष्ट होता है। वे साहित्य को किसी दल का प्रचारक नहीं बनाना चाहते थे, लेकिन साहित्य को सार्वजनिक जीवन से काटकर भी नहीं देखते थे। उनके लिए कविता और आलोचना का सबसे बड़ा दायित्व मनुष्य की स्वतंत्र चेतना की रक्षा करना था। जब आपातकाल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नियंत्रण लगाया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई और असहमति को अपराध की तरह देखा जाने लगा, तब साही ने इसे केवल राजनीतिक घटना नहीं माना। उनके लिए यह भारतीय संस्कृति की संवादपरक परंपरा पर हमला था।
साही की चिंता का केंद्र सत्ता नहीं बल्कि सत्ता की मानसिकता थी। वे जानते थे कि किसी भी लोकतंत्र में निरंकुशता अचानक नहीं आती। वह पहले भाषा को नियंत्रित करती है, फिर विचारों को, फिर संस्थाओं को और अंततः मनुष्य के भीतर के भय को स्थायी बना देती है। आपातकाल में उन्हें यही प्रक्रिया दिखाई दे रही थी। इसलिए उनका प्रतिरोध केवल सरकार के विरुद्ध नहीं था; वह उस मानसिकता के विरुद्ध था जो नागरिक को प्रजा में बदल देना चाहती थी।
साही का साहित्यिक व्यक्तित्व इस संदर्भ में विशेष महत्त्व रखता है। हिंदी साहित्य में उस समय एक बड़ा वर्ग ऐसा था जो राजनीतिक विचारधाराओं के प्रभाव में काम कर रहा था। अनेक लेखक प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सत्ता के निकट थे, जबकि कुछ लेखक केवल वैचारिक प्रतिबद्धताओं के आधार पर घटनाओं को देख रहे थे। साही ने इस दोनों प्रकार की संकीर्णताओं से दूरी बनाई। उन्होंने साहित्यकार की भूमिका को सत्ता और विचारधारा दोनों के प्रति आलोचनात्मक बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया।
उनकी आलोचना का मूल स्वभाव ही प्रश्नाकुलता का था। वे तैयार उत्तरों पर विश्वास नहीं करते थे। आपातकाल के समय यही प्रश्नाकुलता लोकतांत्रिक चेतना का रूप ले लेती है। वे पूछते हैं कि यदि नागरिक को बोलने का अधिकार नहीं है तो राष्ट्र की आत्मा कहाँ बचेगी? यदि असहमति को देशद्रोह समझ लिया जाएगा तो लोकतंत्र का अर्थ क्या रह जाएगा? यदि लेखक भय के कारण मौन हो जाएगा तो साहित्य का भविष्य क्या होगा?
जेपी आंदोलन में साही की भागीदारी को केवल राजनीतिक भागीदारी कहना पर्याप्त नहीं होगा। यह एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप भी था। वे उन बुद्धिजीवियों में थे जो समझते थे कि राजनीतिक परिवर्तन तभी टिकाऊ होगा जब समाज की चेतना बदलेगी। इसलिए वे आंदोलन को नैतिक ऊर्जा प्रदान करने वाले चिंतकों में दिखाई देते हैं। उनके लिए “संपूर्ण क्रांति” का अर्थ केवल शासन परिवर्तन नहीं था; यह व्यक्ति, समाज, शिक्षा, संस्कृति और राजनीति के संबंधों का पुनर्विचार था।
साही के लेखन में बार-बार “स्वतंत्र मनुष्य” की अवधारणा उभरती है। यही अवधारणा उन्हें आपातकाल-विरोधी बनाती है। वे किसी भी ऐसी व्यवस्था के विरोधी थे जो मनुष्य को एक मशीन के पुर्जे में बदल दे। चाहे वह राज्य की निरंकुशता हो, पार्टी की अनुशासनात्मक संरचना हो या विचारधारा की कठोरता, साही हर जगह मनुष्य की स्वतंत्रता के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। इस दृष्टि से उनका आपातकाल-विरोध किसी एक राजनीतिक घटना की प्रतिक्रिया नहीं बल्कि उनके समूचे बौद्धिक जीवन का स्वाभाविक विस्तार था।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि साही लोकतंत्र को केवल संवैधानिक व्यवस्था के रूप में नहीं देखते थे। उनके लिए लोकतंत्र का वास्तविक आधार संवाद था। भारतीय परंपरा में शास्त्रार्थ, वाद-विवाद और प्रश्न पूछने की जो संस्कृति रही है, वे उसे लोकतांत्रिक संस्कृति का प्राचीन रूप मानते थे। आपातकाल ने इसी संवाद संस्कृति को सबसे अधिक क्षति पहुँचाई। इसलिए साही के लिए यह केवल राजनीतिक संकट नहीं बल्कि सांस्कृतिक संकट था।
साहित्य के स्तर पर इसका अर्थ था कि लेखक को अधिक सतर्क होना पड़ेगा। साही मानते थे कि जब राजनीतिक संस्थाएँ कमजोर पड़ने लगती हैं, तब साहित्य और संस्कृति की भूमिका बढ़ जाती है। लेखक का काम केवल सौंदर्य रचना नहीं रह जाता; उसे भाषा की स्वतंत्रता की भी रक्षा करनी पड़ती है। क्योंकि भाषा पर नियंत्रण अंततः विचार पर नियंत्रण में बदल जाता है। आपातकाल के अनुभव ने इस सत्य को अत्यंत स्पष्ट रूप से सामने ला दिया था।
साही की दृष्टि में जेपी आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसने नागरिक समाज को सक्रिय किया। छात्रों, युवाओं, शिक्षकों और सामान्य नागरिकों ने पहली बार बड़े पैमाने पर लोकतंत्र को अपनी व्यक्तिगत चिंता का विषय बनाया। यह राजनीतिक जागरण ही नहीं था; यह सांस्कृतिक जागरण भी था। साही इस प्रक्रिया को आशा की दृष्टि से देखते थे। उन्हें लगता था कि भारतीय समाज में लोकतंत्र की जड़ें तभी मजबूत होंगी जब नागरिक स्वयं उसकी रक्षा के लिए खड़े होंगे।
उनकी आलोचना में एक महत्वपूर्ण तत्व “व्यक्ति की गरिमा” है। आपातकाल के समय यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक हो गया। जब राज्य स्वयं नागरिक अधिकारों को सीमित करने लगे, तब व्यक्ति की गरिमा की रक्षा कौन करेगा? साही का उत्तर था कि साहित्य, संस्कृति और जागरूक नागरिक समाज को यह दायित्व निभाना होगा। इसीलिए उनका साहित्यिक चिंतन राजनीतिक घटनाओं से जुड़ते हुए भी साहित्य की स्वायत्तता को बनाए रखता है।
यहाँ साही और कई अन्य समकालीन लेखकों के बीच अंतर दिखाई देता है। कुछ लेखक राजनीति को साहित्य का प्रत्यक्ष विस्तार मानते थे। साही ऐसा नहीं मानते थे। वे साहित्य की स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार करते थे। लेकिन वे यह भी मानते थे कि साहित्य का नैतिक दायित्व होता है। इसलिए जब स्वतंत्रता पर संकट आए तो साहित्य मौन नहीं रह सकता। यही संतुलन उन्हें विशिष्ट बनाता है।
आपातकाल के बाद भारतीय राजनीति में जो परिवर्तन आए, उन्हें भी साही केवल चुनावी परिणामों के रूप में नहीं देखते। उनके लिए यह भारतीय लोकतंत्र की आत्मरक्षा की प्रक्रिया थी। जनता द्वारा निरंकुश प्रवृत्तियों को अस्वीकार करना लोकतांत्रिक चेतना की विजय थी। लेकिन साही शायद इस विजय को अंतिम विजय नहीं मानते। वे जानते थे कि लोकतंत्र का संकट बार-बार लौट सकता है। इसलिए लोकतंत्र की रक्षा भी एक सतत प्रक्रिया है।
साही का पूरा बौद्धिक व्यक्तित्व हमें यह समझने में सहायता करता है कि साहित्य और राजनीति का संबंध न तो पूर्ण अलगाव का है और न पूर्ण विलय का। साहित्य राजनीति का सेवक नहीं है, लेकिन वह सार्वजनिक जीवन से उदासीन भी नहीं रह सकता। जब स्वतंत्रता संकट में हो, तब साहित्य का मौन भी एक प्रकार की राजनीतिक स्थिति बन जाता है। साही इस मौन के विरुद्ध थे।
उनकी दृष्टि में लेखक का सबसे बड़ा धर्म सत्ता से प्रश्न करना है। यह प्रश्न किसी विशेष दल के विरुद्ध नहीं बल्कि हर प्रकार की सत्ता के विरुद्ध होना चाहिए। क्योंकि सत्ता का स्वभाव विस्तार करना है और स्वतंत्रता का स्वभाव प्रतिरोध करना। साहित्य इस प्रतिरोध की भाषा निर्मित करता है। आपातकाल के समय साही ने इसी साहित्यिक धर्म को निभाने का प्रयास किया।
आज जब हम साही और आपातकाल को एक साथ देखते हैं, तब स्पष्ट होता है कि उनका महत्त्व केवल ऐतिहासिक नहीं है। वे हमें यह याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र केवल संविधान की धाराओं से जीवित नहीं रहता; वह उन लोगों से जीवित रहता है जो स्वतंत्रता, संवाद और असहमति की रक्षा करते हैं। साही ऐसे ही लोगों में थे। उनका साहित्य हमें सिखाता नहीं, बल्कि हमें सोचने के लिए विवश करता है कि यदि मनुष्य की स्वतंत्रता ही न बचे तो कविता किसके लिए होगी, आलोचना किसके लिए होगी और संस्कृति किसकी होगी।
विजयदेव नारायण साही का आपातकाल संबंधी दृष्टिकोण मूलतः स्वतंत्रता, संवाद, नैतिक प्रतिरोध और लोकतांत्रिक संस्कृति का दृष्टिकोण है। जयप्रकाश नारायण के साथ उनकी निकटता किसी राजनीतिक सुविधा का परिणाम नहीं थी, बल्कि मनुष्य की गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति साझा प्रतिबद्धता का परिणाम थी। उनके लिए साहित्य का अंतिम पक्ष सत्ता नहीं, मनुष्य था; विचारधारा नहीं, विवेक था; और व्यवस्था नहीं, स्वतंत्र चेतना थी। यही कारण है कि आपातकाल के संदर्भ में साही का नाम केवल एक साहित्यकार के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आत्मा के एक सजग प्रहरी के रूप में स्मरण किया जाता है।
विजयदेव नारायण साही के साहित्यिक व्यक्तित्व को समझने के लिए आपातकाल केवल एक राजनीतिक प्रसंग नहीं है, बल्कि एक ऐसी ऐतिहासिक भट्ठी है जिसमें उनके चिंतन, उनकी लोकतांत्रिक आस्था, उनकी वैचारिक स्वतंत्रता और उनकी साहित्यिक नैतिकता का वास्तविक ताप महसूस किया जा सकता है। साही का महत्व इस बात में नहीं है कि उन्होंने आपातकाल का विरोध किया; उनका महत्व इस बात में है कि उन्होंने उस समय विरोध किया जब विरोध करना सुविधाजनक नहीं था। और इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्होंने उस समय विरोध किया जब हिंदी साहित्य का एक प्रभावशाली वैचारिक वर्ग आपातकाल का समर्थन कर रहा था।
यह तथ्य बार-बार याद रखा जाना चाहिए कि साही का संघर्ष केवल इंदिरा गांधी की सत्ता से नहीं था। उनका संघर्ष उस बौद्धिक वातावरण से भी था जिसमें स्वतंत्रता को “प्रतिक्रियावाद” और दमन को “प्रगतिशीलता” की भाषा में वैध ठहराया जा रहा था। यह उनके लिए अधिक पीड़ादायक अनुभव रहा होगा। क्योंकि राजनीतिक सत्ता से टकराना एक बात है, लेकिन अपने ही वैचारिक संसार के लोगों को स्वतंत्रता के विरुद्ध खड़ा देखना दूसरी बात है।
आपातकाल के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के एक बड़े हिस्से ने इंदिरा गांधी का समर्थन किया। पार्टी ने आपातकाल को फासीवाद-विरोधी कदम, राष्ट्रीय स्थिरता का उपाय और प्रगतिशील शक्तियों की रक्षा का माध्यम बताने का प्रयास किया। अनेक वामपंथी बुद्धिजीवियों और लेखकों ने भी इस दृष्टिकोण का समर्थन किया। उनके लिए लोकतांत्रिक अधिकारों का निलंबन उतना बड़ा प्रश्न नहीं था जितना कि राजनीतिक सत्ता के माध्यम से अपने वैचारिक लक्ष्यों की प्राप्ति का प्रश्न।
साही की बौद्धिक संरचना इस प्रकार की सोच को स्वीकार नहीं कर सकती थी। वे समाजवादी थे, लेकिन किसी विचारधारा के दास नहीं थे। वे लोकतंत्रवादी थे, लेकिन अंध-लोकतंत्रवादी नहीं थे। वे स्वतंत्रता के पक्षधर थे, लेकिन उसे केवल बुर्जुआ मूल्य कहकर खारिज कर देने वाली मार्क्सवादी रूढ़ियों से भी सहमत नहीं थे। उनके लिए स्वतंत्रता कोई वर्गीय विलासिता नहीं थी; वह मनुष्य की मूल शर्त थी।
यहीं साही हिंदी साहित्य में अपने समय के अनेक वैचारिक लेखकों से अलग दिखाई देते हैं। उनके लिए प्रश्न यह नहीं था कि सत्ता किसके हाथ में है। प्रश्न यह था कि क्या मनुष्य स्वतंत्र है? क्या वह अपनी बात कह सकता है? क्या वह असहमति प्रकट कर सकता है? क्या वह सत्ता की आलोचना कर सकता है? यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है, तो फिर चाहे सत्ता स्वयं को कितनी भी प्रगतिशील क्यों न घोषित करे, साही उसकी आलोचना करेंगे।
इस संदर्भ में साही का जेल जाना एक राजनीतिक घटना से अधिक एक साहित्यिक और नैतिक घटना है। जेल में बंद साही केवल एक राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे; वे उस लेखक का प्रतिनिधित्व कर रहे थे जो अपनी स्वतंत्र चेतना को बचाने के लिए व्यक्तिगत कष्ट सहने को तैयार है। हिंदी साहित्य में ऐसे उदाहरण बहुत अधिक नहीं हैं जहाँ कोई आलोचक, कवि और चिंतक अपने वैचारिक विश्वासों की कीमत अपनी स्वतंत्रता से चुकाने को तैयार हो।
साही के लिए जेल केवल भौतिक कैद नहीं रही होगी। वह उनके लिए भारतीय लोकतंत्र की स्थिति का प्रतीक भी रही होगी। एक तरफ वे लोग थे जो जेलों में बंद थे, दूसरी तरफ वे लोग थे जो सत्ता के निकट बैठकर स्वतंत्रता के निलंबन को ऐतिहासिक आवश्यकता सिद्ध कर रहे थे। यह विडंबना साही जैसे संवेदनशील बुद्धिजीवी को भीतर तक झकझोरने वाली रही होगी।
यदि हम उनके समूचे साहित्यिक चिंतन को देखें तो पाएँगे कि वे जीवन भर किसी भी प्रकार के बौद्धिक अधिनायकवाद के विरोधी रहे। वे साहित्य को विचारधारा का उपनिवेश बनाने के विरुद्ध थे। उनकी प्रसिद्ध आलोचनात्मक मुद्रा ही यह थी कि साहित्य को किसी तैयार वैचारिक साँचे में कैद नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि आपातकाल उनके लिए केवल राजनीतिक दमन नहीं था; वह विचार की स्वतंत्रता पर हमला भी था।
साही के साहित्यिक संघनन के रूप में आपातकाल का अर्थ यही है कि उनके पूरे चिंतन के केंद्रीय मूल्य इस एक घटना में एकत्रित होकर दिखाई देने लगते हैं। स्वतंत्र विवेक, असहमति का अधिकार, संवाद की संस्कृति, व्यक्ति की गरिमा, सत्ता के प्रति संशय और विचारधारा के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि। ये सभी तत्व आपातकाल के प्रसंग में एक साथ सक्रिय हो जाते हैं।
एक अर्थ में कहा जा सकता है कि साही का पूरा साहित्य आपातकाल की पूर्वपीठिका जैसा प्रतीत होता है। वे लगातार चेतावनी देते रहे थे कि जब विचारधारा सत्य से बड़ी हो जाती है, जब संगठन मनुष्य से बड़ा हो जाता है, जब सत्ता संवाद से बड़ी हो जाती है और जब राजनीतिक लक्ष्य स्वतंत्रता से बड़ा हो जाता है, तब लोकतंत्र संकट में पड़ जाता है। आपातकाल ने इन आशंकाओं को ऐतिहासिक रूप से सत्यापित कर दिया।
साही की दृष्टि में सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं थी कि कुछ नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि अनेक बुद्धिजीवियों ने गिरफ्तारी का विरोध करने के बजाय गिरफ्तारी को उचित ठहराना शुरू कर दिया। साहित्य का संकट यहीं से आरम्भ होता है। जब लेखक सत्ता से डरता है तो वह दुर्बल होता है; लेकिन जब लेखक सत्ता के दमन को नैतिकता का रूप देने लगता है तो वह अपनी आत्मा खो देता है।
इसलिए साही का आपातकाल-विरोध केवल राजनीतिक प्रतिरोध नहीं था। वह साहित्य की आत्मा की रक्षा का संघर्ष था। वे समझते थे कि यदि लेखक स्वतंत्रता के प्रश्न पर समझौता कर लेगा तो उसकी कविता, उसकी आलोचना और उसका समूचा रचनात्मक व्यक्तित्व खोखला हो जाएगा।
यहीं साही और उनके अनेक समकालीन वामपंथी बुद्धिजीवियों के बीच मूल अंतर दिखाई देता है। कई लोगों ने लोकतंत्र को अस्थायी रूप से स्थगित करने योग्य माना। साही ने नहीं माना। कई लोगों ने स्वतंत्रता को वर्गीय प्रश्न के अधीन रखा। साही ने नहीं रखा। कई लोगों ने विचारधारा को मनुष्य से बड़ा माना। साही ने मनुष्य को विचारधारा से बड़ा माना।
इसलिए साही का आपातकाल संबंधी अनुभव केवल राजनीतिक इतिहास का हिस्सा नहीं है। वह हिंदी साहित्य की नैतिक स्मृति का हिस्सा है। यह स्मृति हमें बताती है कि किसी लेखक की वास्तविक परीक्षा उसके लेखों, पुस्तकों और भाषणों से नहीं होती; उसकी परीक्षा तब होती है जब उसे स्वतंत्रता और सुविधा में से एक को चुनना पड़े। साही ने स्वतंत्रता को चुना।
उनकी जेल-यात्रा, उनका जेपी आंदोलन से जुड़ाव, उनका वैचारिक साहस और उनका लोकतांत्रिक आग्रह मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि साही के लिए साहित्य केवल सौंदर्य का उपक्रम नहीं था। वह नैतिक साहस का भी उपक्रम था। इसीलिए आपातकाल उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का एक परिशिष्ट नहीं, बल्कि उसका संघनित रूप बन जाता है।
यदि कबीर के लिए सत्ता के सामने सच बोलना उनके काव्य का सार था, यदि निराला के लिए मनुष्य की गरिमा उनकी कविता का केंद्र थी, तो साही के लिए स्वतंत्र विवेक की रक्षा उनका केंद्रीय मूल्य था। आपातकाल ने इसी मूल्य को सबसे स्पष्ट रूप में उजागर किया। इसलिए साही को पढ़ते समय आपातकाल केवल इतिहास नहीं रह जाता; वह उनकी समूची साहित्यिक और नैतिक साधना का सबसे तीव्र प्रकाश-बिंदु बन जाता है।
।। दो ।।
स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में आपातकाल अचानक आकाश से नहीं उतरा था। वह कई वर्षों से तैयार हो रही राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का परिणाम था। किसी भी लोकतंत्र में निरंकुशता एक दिन में जन्म नहीं लेती। वह धीरे-धीरे संस्थाओं के भीतर प्रवेश करती है, सत्ता के केंद्रीकरण के रूप में विकसित होती है और अंततः नागरिक स्वतंत्रताओं को अपने लिए बाधा मानने लगती है। विजयदेव नारायण साही जैसे सजग बुद्धिजीवी इस प्रक्रिया को बहुत पहले पहचान चुके थे। इसलिए आपातकाल उनके लिए केवल 25 जून 1975 की एक राजनीतिक घटना नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भीतर लंबे समय से जमा हो रहे संकट का विस्फोट था।
स्वतंत्रता के बाद भारतीय लोकतंत्र ने एक विशाल आशा के साथ अपनी यात्रा आरम्भ की थी। संविधान, सार्वभौमिक मताधिकार, संसदीय व्यवस्था और नागरिक अधिकारों ने एक नए भारत का स्वप्न निर्मित किया था। किंतु समय बीतने के साथ यह स्पष्ट होने लगा कि लोकतंत्र का संस्थागत ढाँचा जितना मजबूत दिखाई देता है, उसकी सामाजिक और नैतिक नींव उतनी ही कमजोर है। सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ रहा था, प्रशासनिक मशीनरी अधिकाधिक नियंत्रणकारी होती जा रही थी और राजनीतिक दलों के भीतर लोकतांत्रिक परंपराएँ क्षीण होती जा रही थीं। साही इस पूरे परिदृश्य को केवल राजनीतिक विश्लेषक की दृष्टि से नहीं बल्कि संस्कृति-चिंतक की दृष्टि से देख रहे थे।
साठ के दशक के अंत तक भारतीय राजनीति में एक प्रकार की बेचैनी दिखाई देने लगी थी। 1967 के आम चुनावों ने पहली बार यह संकेत दिया कि कांग्रेस की सर्वशक्तिमान छवि में दरार पड़ रही है। अनेक राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं और राजनीतिक बहुलता का नया अध्याय आरम्भ हुआ। किंतु इसी दौर में सत्ता के भीतर केंद्रीकरण की प्रवृत्ति भी तेज हुई। लोकतंत्र का स्वाभाविक अर्थ सत्ता का विकेंद्रीकरण है, परंतु भारतीय राजनीति धीरे-धीरे व्यक्तिकेंद्रित होने लगी। साही को इस प्रवृत्ति में भविष्य के संकट की आहट सुनाई देती थी।
आर्थिक मोर्चे पर भी स्थिति संतोषजनक नहीं थी। बेरोजगारी बढ़ रही थी, महँगाई सामान्य नागरिक के जीवन को प्रभावित कर रही थी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुका था। स्वतंत्रता के बाद जो विकासवादी स्वप्न निर्मित हुआ था, वह धीरे-धीरे अविश्वास के घेरे में आने लगा। युवा पीढ़ी विशेष रूप से बेचैन थी। विश्वविद्यालयों में प्रश्न उठ रहे थे। छात्र आंदोलनों की संख्या बढ़ रही थी। साही स्वयं विश्वविद्यालयी वातावरण से गहरे जुड़े हुए थे और वे इस बेचैनी को केवल असंतोष नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना के एक नए उभार के रूप में देख रहे थे।
गुजरात का नव निर्माण आंदोलन और बिहार का छात्र आंदोलन इसी पृष्ठभूमि में सामने आया। ये आंदोलन केवल महँगाई या भ्रष्टाचार के विरोध तक सीमित नहीं थे। इनके भीतर व्यवस्था की संरचनात्मक आलोचना उपस्थित थी। विशेष रूप से बिहार आंदोलन ने राष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा दी। यहाँ छात्रों ने सत्ता के चरित्र, प्रशासनिक विफलताओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण को लेकर व्यापक प्रश्न उठाए। साही को इस आंदोलन में भारतीय लोकतंत्र की जीवित ऊर्जा दिखाई देती थी। वे समझते थे कि जब संस्थाएँ जनता की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पातीं, तब समाज स्वयं अपने भीतर से सुधार की शक्ति उत्पन्न करता है।
इसी समय जयप्रकाश नारायण का सार्वजनिक जीवन में पुनः सक्रिय होना एक निर्णायक घटना सिद्ध हुआ। जेपी ने आंदोलन को नैतिक आधार प्रदान किया। उन्होंने इसे केवल सरकार-विरोधी अभियान नहीं रहने दिया, बल्कि “संपूर्ण क्रांति” का स्वरूप दिया। साही इस अवधारणा से गहरे प्रभावित थे क्योंकि इसमें सत्ता परिवर्तन से अधिक समाज परिवर्तन की आकांक्षा निहित थी। साही की दृष्टि में लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं था; वह नागरिक चेतना, नैतिक जिम्मेदारी और संवाद की संस्कृति पर आधारित व्यवस्था थी। जेपी का आंदोलन इन्हीं मूल्यों को पुनर्जीवित करने का प्रयास प्रतीत होता था।
सत्तर के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में सत्ता और समाज के बीच दूरी लगातार बढ़ रही थी। सरकार विकास और स्थिरता की भाषा बोल रही थी, जबकि समाज असंतोष और परिवर्तन की भाषा में संवाद कर रहा था। यही द्वंद्व आगे चलकर राजनीतिक टकराव में परिवर्तित हुआ। साही के लिए यह केवल दो राजनीतिक शक्तियों का संघर्ष नहीं था। यह लोकतंत्र की दो अवधारणाओं का संघर्ष था। एक ओर केंद्रीकृत सत्ता की अवधारणा थी, दूसरी ओर सक्रिय नागरिक समाज की अवधारणा। साही स्वाभाविक रूप से दूसरी धारा के निकट दिखाई देते हैं।
1971 के युद्ध और उसके बाद उत्पन्न राष्ट्रीय गौरव ने कुछ समय के लिए राजनीतिक नेतृत्व को अभूतपूर्व लोकप्रियता प्रदान की, किंतु लोकप्रियता और लोकतंत्र समानार्थी नहीं होते। साही इस तथ्य को भली-भाँति समझते थे। लोकतंत्र का आधार केवल जनसमर्थन नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन और असहमति के अधिकार की रक्षा है। जब लोकप्रियता के आधार पर सत्ता स्वयं को आलोचना से ऊपर मानने लगे, तब लोकतंत्र का संकट आरम्भ हो जाता है। साही बार-बार इस बिंदु की ओर संकेत करते हैं कि लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब सत्ता आलोचना को सहन करने की क्षमता बनाए रखती है।
1974 और 1975 तक आते-आते राजनीतिक वातावरण अत्यंत तनावपूर्ण हो चुका था। विरोध प्रदर्शनों, हड़तालों, छात्र आंदोलनों और विपक्षी लामबंदी ने सत्ता को असुरक्षित बना दिया था। दूसरी ओर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय राजनीतिक संकट को और गहरा कर गया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे संकटों का समाधान संवाद और संवैधानिक प्रक्रियाओं से होना चाहिए था, किंतु परिस्थितियाँ एक भिन्न दिशा में बढ़ रही थीं। साही जैसे चिंतकों को लगने लगा था कि भारतीय लोकतंत्र एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।
यहाँ साही की विशिष्टता दिखाई देती है। उन्होंने संकट को केवल राजनीतिक घटनाओं की श्रृंखला के रूप में नहीं देखा। उनके लिए यह भारतीय लोकतांत्रिक संस्कृति की परीक्षा थी। वे मानते थे कि लोकतंत्र केवल संविधान में नहीं रहता; वह नागरिकों की मानसिकता में रहता है। यदि समाज प्रश्न पूछने की क्षमता खो देता है, यदि विश्वविद्यालय बहस करना छोड़ देते हैं, यदि लेखक भय के कारण मौन हो जाते हैं और यदि सत्ता आलोचना को शत्रुता समझने लगती है, तो लोकतंत्र का बाहरी ढाँचा बचा रह सकता है लेकिन उसकी आत्मा नष्ट हो जाती है।
यही कारण है कि आपातकाल की पूर्वपीठिका पर विचार करते हुए साही का ध्यान केवल राजनीतिक घटनाओं पर नहीं जाता। वे उस सांस्कृतिक वातावरण की ओर भी देखते हैं जिसमें स्वतंत्रता का मूल्य धीरे-धीरे कम होता जा रहा था। उन्हें लगता था कि नागरिक समाज की सजगता कमज़ोर पड़ रही है और सत्ता की आकांक्षाएँ बढ़ रही हैं। यह असंतुलन किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक होता है।
इस प्रकार आपातकाल की पूर्वपीठिका भारतीय राजनीति की घटनाओं का मात्र इतिहास नहीं है। यह उस प्रक्रिया का इतिहास है जिसमें लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर हुईं, सत्ता अधिक केंद्रीकृत हुई, समाज में असंतोष बढ़ा और अंततः नागरिक स्वतंत्रताओं पर संकट उपस्थित हुआ। विजयदेव नारायण साही ने इस पूरे परिदृश्य को एक साहित्यकार, आलोचक और लोकतांत्रिक चिंतक के रूप में देखा। उनके लिए यह केवल शासन का संकट नहीं था; यह भारतीय लोकतांत्रिक आत्मा का संकट था। यही समझ आगे चलकर उनके आपातकाल-विरोधी चिंतन और जयप्रकाश आंदोलन के प्रति उनकी सहानुभूति का आधार बनी।
।। तीन ।।
जयप्रकाश नारायण और विजयदेव नारायण साही का संबंध केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं था; वह स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक चेतना के दो महत्त्वपूर्ण स्रोतों का संवाद था। एक ओर जयप्रकाश नारायण थे, जिन्होंने सत्ता और पद की राजनीति से स्वयं को दूर रखकर नैतिक राजनीति की परंपरा को जीवित रखा, और दूसरी ओर विजयदेव नारायण साही थे, जिन्होंने साहित्य, आलोचना और बौद्धिक जीवन में स्वतंत्र विवेक को सर्वोच्च मूल्य माना। दोनों की जीवन-यात्राएँ भिन्न थीं, लेकिन दोनों के चिंतन का केंद्र मनुष्य की स्वतंत्रता और समाज की नैतिकता थी। यही कारण है कि जब सत्तर के दशक में भारतीय लोकतंत्र संकट के दौर से गुज़रा, तब साही और जेपी के बीच एक गहरा वैचारिक सामंजस्य दिखाई देता है।
साही मूलतः साहित्य के व्यक्ति थे। उनका कार्यक्षेत्र कविता, आलोचना और विचार का क्षेत्र था। किंतु वे उन साहित्यकारों में नहीं थे जो साहित्य को जीवन से पृथक किसी सुरक्षित द्वीप की तरह देखते हैं। उनके लिए साहित्य मनुष्य की स्वतंत्र चेतना की अभिव्यक्ति था। इसलिए जब समाज और राजनीति में स्वतंत्रता पर संकट आता है, तब साहित्यकार का मौन रहना संभव नहीं होता। यही वह बिंदु था जहाँ उनका चिंतन जयप्रकाश नारायण की लोकतांत्रिक और नैतिक राजनीति से जुड़ता है।
जयप्रकाश नारायण भारतीय राजनीति के उन विरल व्यक्तित्वों में थे जिन्होंने सत्ता प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य नहीं बनाया। स्वतंत्रता आंदोलन के बाद उन्होंने अनेक अवसरों पर उच्च राजनीतिक पदों को अस्वीकार किया। उनका विश्वास था कि समाज का वास्तविक परिवर्तन केवल सरकार बदलने से नहीं होगा। इसके लिए व्यक्ति, समाज, शिक्षा, राजनीति और संस्कृति के स्तर पर व्यापक परिवर्तन आवश्यक है। जब उन्होंने “संपूर्ण क्रांति” का नारा दिया, तब उसका अर्थ केवल शासन परिवर्तन नहीं था। वह मनुष्य और समाज के नैतिक पुनर्निर्माण की परियोजना थी।
साही इस विचार को गहरे स्तर पर समझते थे। उन्हें जेपी की सबसे बड़ी विशेषता यह लगती थी कि वे राजनीति को नैतिकता से जोड़ते हैं। भारतीय राजनीति में जहाँ सत्ता प्राप्ति धीरे-धीरे प्रमुख लक्ष्य बनती जा रही थी, वहाँ जेपी राजनीति को सार्वजनिक नैतिकता के रूप में देख रहे थे। साही को इसमें एक ऐसी संभावना दिखाई देती थी जो लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया बनने से बचा सकती थी।
जेपी आंदोलन के उदय को केवल राजनीतिक असंतोष का परिणाम मानना पर्याप्त नहीं होगा। उसके भीतर समाज की गहरी बेचैनी थी। युवा पीढ़ी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और प्रशासनिक जड़ता से त्रस्त थी। विश्वविद्यालयों में असंतोष बढ़ रहा था। लोकतंत्र के औपचारिक ढाँचे और जनता के वास्तविक अनुभवों के बीच दूरी बढ़ती जा रही थी। ऐसे समय में जेपी ने युवाओं को केवल विरोध का कार्यक्रम नहीं दिया; उन्होंने उन्हें एक नैतिक उद्देश्य प्रदान किया। साही इसी नैतिक पक्ष के कारण इस आंदोलन के प्रति आकर्षित हुए।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण तथ्य ध्यान देने योग्य है। साही किसी राजनीतिक दल के प्रचारक नहीं थे। वे वैचारिक स्वतंत्रता को अत्यंत महत्त्व देते थे। उन्होंने जीवन भर किसी भी विचारधारा की अंध स्वीकृति का विरोध किया। इसलिए उनका जेपी के साथ खड़ा होना किसी दलगत निष्ठा का परिणाम नहीं था। यह लोकतंत्र, स्वतंत्रता और नैतिक सार्वजनिक जीवन के पक्ष में उनकी प्रतिबद्धता का परिणाम था।
संपूर्ण क्रांति की अवधारणा में साही को वह व्यापकता दिखाई देती थी जो सामान्य राजनीतिक आंदोलनों में नहीं मिलती। जेपी केवल सरकार बदलने की बात नहीं कर रहे थे। वे शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक ढाँचे, सामाजिक संबंधों, आर्थिक असमानताओं और सांस्कृतिक मूल्यों पर पुनर्विचार की बात कर रहे थे। साही स्वयं साहित्य और संस्कृति के व्यक्ति थे, इसलिए उन्होंने इस आंदोलन के सांस्कृतिक अर्थों को अधिक गहराई से समझा।
उनके लिए संपूर्ण क्रांति का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष था नागरिक चेतना का जागरण। लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं चलता; वह जागरूक नागरिकों से चलता है। यदि नागरिक प्रश्न पूछना बंद कर दें, यदि वे अन्याय को सामान्य मान लें और यदि वे सत्ता को आलोचना से ऊपर मानने लगें, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे खोखला हो जाता है। जेपी का आंदोलन नागरिक समाज को पुनः सक्रिय करने का प्रयास था। साही इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक मानते थे।
साही और जेपी दोनों ही संवाद की संस्कृति में विश्वास करते थे। दोनों मानते थे कि लोकतंत्र का आधार असहमति का सम्मान है। किसी भी स्वस्थ समाज में विभिन्न विचारों के बीच बहस होती है, टकराव होता है और नए निष्कर्ष सामने आते हैं। लेकिन जब सत्ता स्वयं को अंतिम सत्य मानने लगे, तब संवाद समाप्त हो जाता है। साही को लगता था कि भारतीय राजनीति इसी दिशा में बढ़ रही है। इसलिए जेपी आंदोलन उनके लिए लोकतांत्रिक संवाद की पुनर्स्थापना का प्रयास था।
इस आंदोलन में बुद्धिजीवियों और लेखकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। साही का मानना था कि लेखक केवल दर्शक नहीं हो सकता। उसे अपने समय की नैतिक चुनौतियों का सामना करना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि साहित्य को राजनीतिक घोषणापत्र में बदल दिया जाए। बल्कि इसका अर्थ यह है कि साहित्यकार स्वतंत्रता, न्याय और मनुष्यता के प्रश्नों के प्रति सजग रहे। जेपी आंदोलन ने लेखकों और बुद्धिजीवियों को इसी प्रकार की भूमिका निभाने का अवसर दिया।
साही की दृष्टि में जेपी की सबसे बड़ी शक्ति उनका नैतिक विश्वास था। वे किसी दमनकारी शक्ति के विरुद्ध हिंसा का मार्ग नहीं सुझाते थे। वे लोकतांत्रिक और अहिंसक प्रतिरोध में विश्वास करते थे। यह गांधीवादी परंपरा का विस्तार था। साही स्वयं भी संवाद, विवेक और नैतिक साहस को परिवर्तन का वास्तविक साधन मानते थे। इस दृष्टि से दोनों के बीच गहरी वैचारिक निकटता थी।
जब आपातकाल की घोषणा हुई, तब जेपी आंदोलन लोकतांत्रिक प्रतिरोध का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका था। सरकार ने इसे अपने लिए चुनौती माना। अनेक नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। नागरिक स्वतंत्रताओं पर नियंत्रण लगाया गया। इस परिस्थिति में साही के लिए जेपी केवल एक राजनीतिक नेता नहीं रह गए थे; वे लोकतांत्रिक प्रतिरोध और नैतिक साहस के प्रतीक बन गए थे।
साही के लेखन में बार-बार यह आग्रह दिखाई देता है कि लोकतंत्र को केवल संवैधानिक व्यवस्था के रूप में नहीं समझा जा सकता। लोकतंत्र एक सांस्कृतिक मूल्य है। उसमें व्यक्ति की गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति का अधिकार और संवाद की परंपरा शामिल होती है। जेपी आंदोलन इन मूल्यों की रक्षा का आंदोलन था। इसलिए साही का समर्थन मूलतः इन मूल्यों का समर्थन था।
यह भी उल्लेखनीय है कि साही ने जेपी आंदोलन को किसी आदर्शीकृत रोमांटिक आंदोलन के रूप में नहीं देखा। वे उसकी सीमाओं से भी परिचित थे। किंतु इसके बावजूद उन्हें लगता था कि उस समय भारतीय लोकतंत्र को एक नैतिक हस्तक्षेप की आवश्यकता थी और जेपी ने वही भूमिका निभाई। उनके बिना लोकतंत्र का संकट और गहरा हो सकता था।
साहित्यिक दृष्टि से देखें तो साही और जेपी का संबंध एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न को सामने लाता है। क्या साहित्यकार को अपने समय के राजनीतिक संघर्षों से जुड़ना चाहिए? साही का उत्तर था कि साहित्यकार को किसी दल का कार्यकर्ता बनने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उसे स्वतंत्रता और मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। जब लोकतंत्र संकट में हो, तब तटस्थता भी एक प्रकार की राजनीतिक स्थिति बन जाती है। इसलिए लेखक का नैतिक दायित्व है कि वह सत्य और स्वतंत्रता के पक्ष में अपनी आवाज़ बनाए रखे।
यही कारण है कि साही और जयप्रकाश नारायण का संबंध भारतीय बौद्धिक इतिहास में विशेष महत्व रखता है। यह संबंध साहित्य और राजनीति के बीच किसी यांत्रिक गठजोड़ का नहीं था। यह स्वतंत्र विवेक और नैतिक राजनीति के बीच संवाद का संबंध था। दोनों की साझा चिंता यह थी कि मनुष्य की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, लोकतंत्र जीवित रहे और समाज में प्रश्न पूछने की संस्कृति बनी रहे।
इस प्रकार जयप्रकाश नारायण और विजयदेव नारायण साही का संबंध भारतीय लोकतांत्रिक चेतना के इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है। दोनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतंत्रता, नैतिकता और संवाद की रक्षा का प्रयास किया। एक ने राजनीति के माध्यम से, दूसरे ने साहित्य और विचार के माध्यम से। लेकिन दोनों की मंज़िल एक ही थी: ऐसा समाज जहाँ सत्ता से अधिक महत्त्व मनुष्य को प्राप्त हो और जहाँ लोकतंत्र केवल शासन-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन-मूल्य बन सके।
।। पांच ।।
साहित्य और सत्ता का संबंध मानव सभ्यता के सबसे जटिल संबंधों में से एक है। सत्ता हमेशा समाज को नियंत्रित, व्यवस्थित और संचालित करना चाहती है, जबकि साहित्य मनुष्य की स्वतंत्र चेतना का क्षेत्र है। सत्ता का स्वभाव एकरूपता की ओर झुकता है, साहित्य का स्वभाव विविधता की ओर। सत्ता व्यवस्था चाहती है, साहित्य प्रश्न पूछता है। सत्ता निर्णय सुनाती है, साहित्य संवाद रचता है। यही कारण है कि इतिहास के लगभग हर दौर में साहित्य और सत्ता के बीच एक प्रकार का तनाव बना रहा है। विजयदेव नारायण साही इस तनाव को गहराई से समझने वाले साहित्यकार थे। आपातकाल के संदर्भ में उनकी दृष्टि विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उन्होंने साहित्य को न तो सत्ता का विरोधी शिविर माना और न ही उसका सेवक। उन्होंने साहित्य को स्वतंत्र विवेक की ऐसी भूमि माना जहाँ से मनुष्य अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
साही का मानना था कि साहित्य का मूल संबंध सत्ता से नहीं, मनुष्य से होता है। सत्ता बदलती रहती है, सरकारें आती-जाती रहती हैं, राजनीतिक विचारधाराएँ भी समय के साथ अपना प्रभाव खो सकती हैं, लेकिन मनुष्य की स्वतंत्रता, उसकी पीड़ा, उसकी आकांक्षाएँ और उसकी गरिमा साहित्य के स्थायी विषय हैं। इसलिए साहित्य की पहली निष्ठा किसी दल, सरकार या विचारधारा के प्रति नहीं, बल्कि मनुष्य के प्रति होनी चाहिए। यही कारण है कि वे साहित्य को राजनीतिक प्रचार का उपकरण बनाने के विरुद्ध थे।
यहाँ साही की दृष्टि अपने समय के अनेक वैचारिक आग्रहों से भिन्न दिखाई देती है। बीसवीं शताब्दी के मध्य में साहित्य को विचारधारात्मक प्रतिबद्धता के आधार पर देखने की प्रवृत्ति काफी प्रभावशाली थी। अनेक लेखक मानते थे कि साहित्य को किसी सामाजिक या राजनीतिक आंदोलन का प्रत्यक्ष उपकरण बन जाना चाहिए। साही इस धारणा को अधूरा मानते थे। उनका विश्वास था कि साहित्य का कार्य किसी पूर्वनिर्धारित सत्य का प्रचार करना नहीं, बल्कि जीवन की जटिलताओं को समझना और मनुष्य की स्वतंत्र चेतना को सक्रिय रखना है।
आपातकाल के समय यह प्रश्न और अधिक तीखा हो गया। जब सत्ता ने अभिव्यक्ति के क्षेत्र में हस्तक्षेप करना शुरू किया, तब साहित्यकारों के सामने चुनौती यह थी कि वे अपनी भूमिका को कैसे समझें। कुछ लोगों ने मौन को चुना, कुछ ने समर्थन का मार्ग अपनाया और कुछ ने प्रतिरोध किया। साही की दृष्टि में यह केवल राजनीतिक विकल्पों का प्रश्न नहीं था। यह लेखक की नैतिक जिम्मेदारी का प्रश्न था। यदि लेखक स्वतंत्रता पर होने वाले आघात को देखकर भी मौन रहता है, तो वह अपने ही रचनात्मक अस्तित्व को कमजोर करता है।
साही का विश्वास था कि साहित्य का सबसे बड़ा दायित्व भाषा की स्वतंत्रता की रक्षा करना है। यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी भी निरंकुश व्यवस्था का पहला लक्ष्य भाषा को नियंत्रित करना होता है। शब्दों के अर्थ बदल दिए जाते हैं, आलोचना को अपराध की तरह प्रस्तुत किया जाता है और प्रचार को सत्य का स्थान दे दिया जाता है। ऐसी स्थिति में साहित्य भाषा को पुनः मनुष्य के पक्ष में खड़ा करता है। वह शब्दों को उनकी वास्तविक गरिमा लौटाता है। साही के लिए यही साहित्य का प्रतिरोध था।
उनके अनुसार प्रतिरोध का अर्थ केवल राजनीतिक नारे लगाना नहीं है। प्रतिरोध का अर्थ है मनुष्य की स्वतंत्र चेतना को जीवित रखना। एक कविता भी प्रतिरोध हो सकती है, यदि वह मनुष्य की स्वतंत्रता को बचाती है। एक आलोचनात्मक निबंध भी प्रतिरोध हो सकता है, यदि वह सत्ता द्वारा निर्मित भ्रमों को चुनौती देता है। एक कहानी भी प्रतिरोध हो सकती है, यदि वह उस मनुष्य की आवाज़ बनती है जिसे व्यवस्था ने हाशिये पर धकेल दिया है। इस प्रकार साही प्रतिरोध को साहित्य की आंतरिक नैतिक शक्ति के रूप में देखते हैं।
आपातकाल के दौरान सेंसरशिप का प्रश्न विशेष महत्व रखता था। समाचार पत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया गया। सार्वजनिक अभिव्यक्ति की सीमाएँ निर्धारित की गईं। इस परिस्थिति में साही को सबसे अधिक चिंता इस बात की थी कि कहीं समाज में भय सामान्य न हो जाए। उनका मानना था कि जब भय सामाजिक स्वभाव बन जाता है, तब केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं, रचनात्मकता भी संकट में पड़ जाती है। लेखक धीरे-धीरे आत्म-सेंसरशिप का शिकार होने लगता है। वह वही लिखता है जो सुरक्षित हो, न कि जो सत्य हो। साही इसे साहित्य की पराजय मानते थे।
उनकी दृष्टि में साहित्य का संबंध साहस से भी है। यह साहस केवल राजनीतिक साहस नहीं, बल्कि बौद्धिक साहस है। लेखक को उन प्रश्नों को उठाने का साहस होना चाहिए जिनसे समाज असहज होता है। उसे उन सत्यों को देखने की क्षमता रखनी चाहिए जिन्हें सत्ता छिपाना चाहती है। यदि साहित्य इस साहस को खो देता है, तो वह केवल मनोरंजन या प्रचार का माध्यम बनकर रह जाता है। साही साहित्य को इस स्थिति में पहुँचने नहीं देना चाहते थे।
साही के चिंतन में एक और महत्वपूर्ण बात मिलती है। वे साहित्य को सत्ता-विरोध की स्थायी मशीन भी नहीं बनाते। उनके लिए साहित्य का कार्य केवल विरोध करना नहीं है। यदि सत्ता कोई अच्छा कार्य करे तो साहित्य उसे स्वीकार कर सकता है। यदि समाज में सकारात्मक परिवर्तन हो रहे हों तो साहित्य उन्हें भी देख सकता है। लेकिन साहित्य का विवेक स्वतंत्र होना चाहिए। उसे किसी भी सत्ता के साथ स्थायी गठबंधन नहीं करना चाहिए। यही स्वतंत्रता साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति है।
आपातकाल ने इस प्रश्न को अत्यंत स्पष्ट कर दिया था। अनेक लेखक और बुद्धिजीवी सत्ता के निकट चले गए। कुछ लोगों ने इसे राष्ट्रीय आवश्यकता बताया। कुछ लोगों ने मौन साध लिया। साही को इन दोनों प्रवृत्तियों में खतरा दिखाई देता था। उनका मानना था कि लेखक का काम सत्ता के साथ खड़ा होना या उसके विरुद्ध खड़ा होना नहीं है; उसका काम सत्य के साथ खड़ा होना है। और यदि किसी समय सत्य सत्ता के विरुद्ध चला जाए, तो लेखक को भी उसी दिशा में जाना चाहिए।
यहाँ साही की आलोचना-दृष्टि विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाती है। वे आलोचना को केवल साहित्यिक मूल्यांकन नहीं मानते थे। आलोचना उनके लिए एक नैतिक और बौद्धिक अभ्यास थी। आलोचक का काम केवल रचनाओं की व्याख्या करना नहीं, बल्कि अपने समय की चेतना को भी समझना है। आपातकाल के दौरान यह भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई। आलोचक को यह देखना था कि भाषा कैसे बदल रही है, सार्वजनिक जीवन में भय कैसे प्रवेश कर रहा है और लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण किस प्रकार हो रहा है।
साही के अनुसार साहित्य का वास्तविक प्रतिरोध उसकी स्वतंत्रता में निहित है। जब सत्ता किसी लेखक को नियंत्रित नहीं कर पाती, जब कोई कवि अपने समय की पीड़ा को व्यक्त करता है, जब कोई आलोचक सुविधाजनक चुप्पी स्वीकार नहीं करता, तब साहित्य अपनी सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा होता है। यह प्रतिरोध कभी-कभी प्रत्यक्ष होता है, कभी सांकेतिक, कभी सौंदर्य के माध्यम से और कभी विचार के माध्यम से, लेकिन उसका मूल उद्देश्य मनुष्य की गरिमा की रक्षा करना होता है।
उनके चिंतन में लोकतंत्र और साहित्य का गहरा संबंध दिखाई देता है। लोकतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं है; वह अनेक आवाज़ों के सह-अस्तित्व की व्यवस्था है। साहित्य भी अनेक अनुभवों, दृष्टियों और भाषाओं का संसार है। इसलिए जब लोकतंत्र कमजोर होता है, तब साहित्य भी प्रभावित होता है। और जब साहित्य कमजोर होता है, तब लोकतंत्र भी अपनी सांस्कृतिक शक्ति खोने लगता है। साही इस पारस्परिक संबंध को बहुत स्पष्ट रूप से समझते थे।
यही कारण है कि वे आपातकाल को केवल राजनीतिक संकट नहीं मानते। उनके लिए यह साहित्य और संस्कृति का भी संकट था। यह वह समय था जब यह तय हो रहा था कि लेखक अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करेगा या नहीं, भाषा अपने नैतिक अर्थों को बचाए रखेगी या नहीं, और समाज प्रश्न पूछने की क्षमता बनाए रखेगा या नहीं। इस अर्थ में साहित्य का प्रतिरोध लोकतंत्र की रक्षा का भी प्रतिरोध था।
साही की दृष्टि में लेखक का अंतिम दायित्व किसी विचारधारा, दल या सत्ता के प्रति नहीं, बल्कि स्वतंत्र मनुष्य के प्रति है। यदि साहित्य इस दायित्व को निभाता है, तो वह समाज को केवल सुंदर शब्द नहीं देता, बल्कि स्वतंत्रता की वह चेतना भी देता है जिसके बिना कोई लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। आपातकाल के अनुभव ने इस सत्य को और अधिक उजागर किया। इसलिए साही के लिए साहित्य और प्रतिरोध का संबंध आकस्मिक नहीं था; वह साहित्य की आंतरिक नैतिक संरचना का अनिवार्य अंग था।
इस प्रकार साहित्य, सत्ता और प्रतिरोध पर साही की दृष्टि हमें यह समझने में सहायता करती है कि लेखक की वास्तविक शक्ति उसके स्वतंत्र विवेक में निहित होती है। सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि साहित्य अपनी स्वतंत्रता और नैतिक साहस को बचाए रखता है, तो वह मनुष्य की गरिमा और लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा कर सकता है। यही साही की सबसे महत्त्वपूर्ण देन है और यही आपातकाल के संदर्भ में उनके चिंतन का स्थायी महत्व भी।
।। छ: ।।
आपातकाल के इतिहास को केवल राजनीतिक घटनाओं के इतिहास के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है। यह हिंदी साहित्य की नैतिक परीक्षा का भी इतिहास है। 25 जून 1975 के बाद जब नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित की गईं, प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया और सार्वजनिक असहमति को नियंत्रित करने का प्रयास हुआ, तब केवल राजनीतिक दल ही नहीं, साहित्यिक समुदाय भी एक कठिन प्रश्न के सामने खड़ा था। लेखक क्या करे? क्या वह मौन रहे? क्या वह सत्ता का समर्थन करे? क्या वह प्रतिरोध करे? या क्या वह यह मान ले कि साहित्य का राजनीति से कोई संबंध नहीं है? विजयदेव नारायण साही की दृष्टि से देखें तो यही वह क्षण था जहाँ हिंदी साहित्य की नैतिक विश्वसनीयता की परीक्षा आरम्भ होती है।
साही मूलतः साहित्य को स्वतंत्र चेतना का क्षेत्र मानते थे। उनके लिए लेखक की पहली जिम्मेदारी सत्ता के प्रति नहीं, सत्य के प्रति थी। इस कारण वे साहित्यिक जगत की प्रतिक्रियाओं को केवल राजनीतिक मतभेदों के आधार पर नहीं देखते। वे यह देखने का प्रयास करते हैं कि किस लेखक ने अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता को बचाए रखा और किसने उसे सुविधा, भय या वैचारिक आग्रह के कारण सीमित कर लिया।
आपातकाल के समय हिंदी साहित्यिक संसार एकरूप नहीं था। उसमें अनेक धाराएँ सक्रिय थीं। प्रगतिशील लेखक थे, समाजवादी विचारधारा से जुड़े लेखक थे, गांधीवादी चिंतक थे, प्रयोगवादी और नई कविता के लेखक थे, तथा ऐसे साहित्यकार भी थे जो किसी संगठित विचारधारा से संबद्ध नहीं थे। आपातकाल ने इन सभी धाराओं की वास्तविक लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता की परीक्षा ली।
सबसे रोचक स्थिति उन साहित्यकारों की थी जो स्वयं को प्रगतिशील और जनवादी कहते थे। उनमें से कुछ ने आपातकाल का समर्थन किया। उनका तर्क था कि देश में अराजकता फैल रही थी, प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ सक्रिय थीं और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कठोर कदम आवश्यक थे। साही इस प्रकार की सोच को संदेह की दृष्टि से देखते। उनकी समस्या किसी विशेष राजनीतिक मत से नहीं थी, बल्कि उस प्रवृत्ति से थी जिसमें स्वतंत्रता को किसी बड़े लक्ष्य के नाम पर स्थगित किया जा सकता है। वे मानते थे कि यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों को निलंबित करके प्रगति लाई जाती है, तो वह प्रगति अंततः मनुष्य-विरोधी बन सकती है।
साही के लिए यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण था कि क्या कोई लेखक स्वतंत्रता के बिना सचमुच जनवादी रह सकता है? यदि जनता को बोलने का अधिकार नहीं है, यदि आलोचना को दबाया जा रहा है और यदि असहमति को अपराध माना जा रहा है, तो फिर जनवाद का अर्थ क्या रह जाता है? यही कारण है कि वे विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से अधिक लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता को महत्व देते दिखाई देते हैं।
आपातकाल के दौरान हिंदी साहित्य में एक दूसरा वर्ग भी था जिसने प्रत्यक्ष समर्थन तो नहीं किया, लेकिन मौन धारण कर लिया। यह मौन कई प्रकार का था। कुछ लोग भयभीत थे। कुछ लोग अपने संस्थागत पदों और सुविधाओं को लेकर चिंतित थे। कुछ लोगों को लगा कि राजनीति में हस्तक्षेप करना साहित्यकार का काम नहीं है। साही की दृष्टि में यह मौन भी एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना थी। वे जानते थे कि हर मौन कायरता नहीं होता, लेकिन वे यह भी मानते थे कि इतिहास में कुछ ऐसे क्षण आते हैं जब मौन स्वयं एक राजनीतिक निर्णय बन जाता है।
लेखक का मौन विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि लेखक का पूरा अस्तित्व भाषा पर आधारित होता है। जो व्यक्ति शब्दों के माध्यम से समाज से संवाद करता है, यदि वही संकट के समय चुप हो जाए, तो यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं रहता। यह सार्वजनिक जीवन को भी प्रभावित करता है। साही संभवतः इसी कारण लेखक की नैतिक जिम्मेदारी पर इतना बल देते हैं।
इसके विपरीत कुछ साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने प्रतिरोध का मार्ग चुना। उन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आपातकाल की आलोचना की, लोकतांत्रिक मूल्यों का समर्थन किया और नागरिक स्वतंत्रताओं के पक्ष में अपनी आवाज़ उठाई। साही की सहानुभूति स्वाभाविक रूप से इसी धारा के साथ दिखाई देती है। लेकिन वे इस प्रतिरोध को भी किसी राजनीतिक दल के समर्थन तक सीमित नहीं रखते। उनके लिए महत्वपूर्ण यह था कि लेखक स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ा हो।
साही की आलोचना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह था कि वे साहित्यिक अवसरवाद को पहचानते थे। हर युग में कुछ लेखक सत्ता के निकट जाने का प्रयास करते हैं। वे अपने लेखन को इस प्रकार ढाल लेते हैं कि वह शासक वर्ग की अपेक्षाओं के अनुकूल हो जाए। बदले में उन्हें प्रतिष्ठा, पुरस्कार, संस्थागत शक्ति या अन्य सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। साही इस प्रवृत्ति को साहित्य के लिए अत्यंत हानिकारक मानते थे। उनके अनुसार लेखक की सबसे बड़ी पूँजी उसका स्वतंत्र विवेक है। यदि वही नष्ट हो जाए, तो शेष उपलब्धियाँ अर्थहीन हो जाती हैं।
आपातकाल के समय यह अवसरवाद अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। कुछ साहित्यकारों ने सत्ता की भाषा को ही अपनी भाषा बना लिया। वे आलोचना को अव्यवस्था और स्वतंत्रता को अनुशासनहीनता की तरह प्रस्तुत करने लगे। साही के लिए यह केवल राजनीतिक भूल नहीं थी; यह साहित्यिक और नैतिक विफलता भी थी। क्योंकि साहित्य का धर्म सत्ता की शब्दावली को दोहराना नहीं, बल्कि जीवन के सत्य को पहचानना है।
यहाँ साही की तुलना उनके अनेक समकालीनों से की जा सकती है। वे किसी राजनीतिक संगठन के अनुशासित कार्यकर्ता नहीं थे। उन्होंने साहित्य की स्वायत्तता पर लगातार बल दिया। लेकिन यही स्वायत्तता उन्हें लोकतंत्र का पक्षधर बनाती है। वे जानते थे कि यदि साहित्य अपनी स्वतंत्रता खो देगा, तो वह किसी भी विचारधारा का मात्र प्रचारक बनकर रह जाएगा। इसलिए वे साहित्यिक स्वतंत्रता और राजनीतिक स्वतंत्रता को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ मानते थे।
साही की दृष्टि में हिंदी साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी बहुलता रही है। कबीर से लेकर निराला तक, हिंदी परंपरा में असहमति, प्रश्न और विद्रोह के स्वर उपस्थित रहे हैं। यह परंपरा किसी एक विचारधारा की बपौती नहीं है। आपातकाल के समय यही परंपरा चुनौती के सामने थी। प्रश्न यह था कि क्या हिंदी साहित्य अपनी आलोचनात्मक चेतना को बचाए रख पाएगा? साही को इस प्रश्न की गहरी चिंता थी।
उनके लिए लोकतंत्र केवल संसद और चुनाव का विषय नहीं था। वह एक सांस्कृतिक मूल्य था। साहित्य में भी लोकतंत्र का अर्थ था विविध आवाज़ों का सम्मान, असहमति का अधिकार और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का वातावरण। इसलिए जब लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बढ़ा, तब साहित्यिक समुदाय की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई। लेखक केवल रचनाकार नहीं रहा; वह लोकतांत्रिक संस्कृति का संरक्षक भी बन गया।
आपातकाल के अनुभव ने साही को यह विश्वास दिलाया कि साहित्य की वास्तविक परीक्षा संकट के समय होती है। सामान्य परिस्थितियों में स्वतंत्रता का समर्थन करना आसान होता है। कठिनाई तब आती है जब स्वतंत्रता की रक्षा के लिए व्यक्तिगत जोखिम उठाना पड़े। लेखक की नैतिकता का मूल्यांकन भी इसी कसौटी पर होना चाहिए। जो लेखक सुविधा के समय लोकतंत्र की बात करे लेकिन संकट के समय मौन हो जाए, उसकी प्रतिबद्धता संदिग्ध हो जाती है।
साही की आलोचनात्मक दृष्टि हमें यह समझने में सहायता करती है कि साहित्यिक इतिहास केवल महान कृतियों का इतिहास नहीं है। वह लेखकों के नैतिक निर्णयों का इतिहास भी है। आपातकाल ने हिंदी साहित्य के सामने यही प्रश्न रखा था। किसने स्वतंत्रता का साथ दिया? किसने मौन चुना? किसने सत्ता का समर्थन किया? और किसने अपने विवेक को सुरक्षित रखा? ये प्रश्न केवल अतीत के नहीं हैं; वे हर युग में प्रासंगिक बने रहते हैं।
आज जब हम आपातकाल और हिंदी साहित्य को साथ रखकर देखते हैं, तब साही की दृष्टि और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। वे हमें याद दिलाते हैं कि लेखक का मूल्य केवल उसकी रचनाओं से नहीं, बल्कि उसकी बौद्धिक ईमानदारी से भी निर्धारित होता है। साहित्य की प्रतिष्ठा तभी बची रह सकती है जब लेखक सत्ता से उचित दूरी बनाए रखे और सत्य के प्रति अपनी निष्ठा को सर्वोपरि रखे।
इस प्रकार हिंदी साहित्य जगत और आपातकाल का मूल्यांकन करते हुए साही मूलतः एक नैतिक प्रश्न उठाते हैं। उनका प्रश्न यह नहीं है कि कौन किस राजनीतिक दल के साथ था। उनका प्रश्न यह है कि किसने स्वतंत्रता, लोकतंत्र और मनुष्य की गरिमा का साथ दिया। यही कसौटी उनके लिए लेखक की वास्तविक पहचान निर्धारित करती है। इसी दृष्टि से उनका आपातकाल संबंधी चिंतन हिंदी साहित्य की नैतिक स्मृति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय बन जाता है।
।। सात ।।
विजयदेव नारायण साही के चिंतन को यदि एक सूत्र में बाँधना हो, तो वह सूत्र “लोकतांत्रिक चेतना” का होगा। यद्यपि उन्होंने स्वयं को राजनीतिक सिद्धांतकार के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, फिर भी उनकी कविता, आलोचना, निबंध और सार्वजनिक हस्तक्षेपों में लोकतंत्र के प्रश्न बार-बार उपस्थित होते हैं। यह लोकतंत्र केवल चुनाव, संसद या संवैधानिक व्यवस्थाओं का लोकतंत्र नहीं है। साही के लिए लोकतंत्र एक सांस्कृतिक मूल्य है, एक बौद्धिक अनुशासन है, एक नैतिक आचरण है और सबसे बढ़कर मनुष्य की स्वतंत्रता का सम्मान है। यही कारण है कि उनकी आलोचना-दृष्टि को समझे बिना उनके आपातकाल-विरोध, उनकी साहित्यिक मान्यताओं और उनके सार्वजनिक जीवन को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
साही की लोकतांत्रिक समझ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह राजनीति की सीमाओं से आगे जाती है। सामान्यतः लोकतंत्र को शासन-व्यवस्था के रूप में देखा जाता है, लेकिन साही उसे जीवन-पद्धति के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार लोकतंत्र केवल इस बात का नाम नहीं है कि जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करे। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है कि समाज में विचारों की बहुलता का सम्मान हो, असहमति को वैध माना जाए, प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता बनी रहे और किसी व्यक्ति, दल या विचारधारा को अंतिम सत्य घोषित न किया जाए।
यहीं से उनकी आलोचना-दृष्टि का मूल स्वर निर्मित होता है। साही किसी भी प्रकार के बौद्धिक एकाधिकार के विरोधी थे। उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि कोई विचारधारा जीवन के समस्त प्रश्नों का अंतिम उत्तर दे सकती है। चाहे वह वामपंथ हो, दक्षिणपंथ हो, समाजवाद हो या कोई अन्य वैचारिक संरचना, साही हर विचारधारा को आलोचना और पुनर्विचार के लिए खुला रखना चाहते थे। यह प्रवृत्ति मूलतः लोकतांत्रिक है, क्योंकि लोकतंत्र का आधार ही यह विश्वास है कि सत्य पर किसी एक व्यक्ति या समूह का एकाधिकार नहीं होता।
साही के आलोचनात्मक लेखन में संवाद की अवधारणा विशेष महत्व रखती है। वे साहित्य को भी एक प्रकार का संवाद मानते हैं। कवि और पाठक के बीच संवाद, लेखक और समाज के बीच संवाद, वर्तमान और परंपरा के बीच संवाद। उनके लिए साहित्य का जीवन इसी संवादशीलता में निहित है। यदि संवाद समाप्त हो जाए, तो साहित्य भी धीरे-धीरे घोषणापत्र में बदल जाता है। लोकतंत्र के संदर्भ में भी वे यही बात कहते हैं। जहाँ संवाद समाप्त होता है, वहाँ लोकतंत्र कमजोर होने लगता है।
भारतीय परंपरा को देखने का उनका दृष्टिकोण भी इसी लोकतांत्रिक चेतना से प्रभावित है। वे भारतीय संस्कृति को किसी एकरूप, स्थिर और बंद संरचना के रूप में नहीं देखते। उनके अनुसार भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी बहस करने की क्षमता रही है। उपनिषदों के प्रश्नोत्तर, बौद्ध संघों की विमर्श-परंपरा, शंकर और मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ, भक्ति आंदोलन की वैचारिक चुनौतियाँ, कबीर की असहमति, तुलसी की पुनर्व्याख्याएँ, सब मिलकर एक ऐसी परंपरा का निर्माण करते हैं जिसमें प्रश्न पूछना अपराध नहीं बल्कि ज्ञान का साधन है।
साही के लिए लोकतंत्र का अर्थ इसी परंपरा का आधुनिक विस्तार है। वे मानते थे कि यदि कोई समाज अपनी बहस की संस्कृति खो देता है, तो वह धीरे-धीरे बौद्धिक रूप से जड़ हो जाता है। इसीलिए वे विश्वविद्यालयों, साहित्यिक मंचों और सार्वजनिक संस्थाओं में संवाद की परंपरा को अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानते थे। उनके अनुसार विश्वविद्यालय केवल डिग्रियाँ बाँटने की जगह नहीं हैं; वे लोकतांत्रिक समाज के बौद्धिक प्रशिक्षण-केन्द्र हैं। यदि वहाँ प्रश्न पूछने की संस्कृति समाप्त हो जाए, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर पड़ जाती है।
असहमति के प्रश्न पर साही की दृष्टि विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे मानते थे कि असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है। निरंकुश व्यवस्थाएँ असहमति से डरती हैं क्योंकि वे उसे चुनौती मानती हैं। लोकतांत्रिक समाज असहमति का स्वागत करता है क्योंकि वह उसे आत्म-संशोधन का अवसर मानता है। साही का विश्वास था कि कोई भी समाज तब तक जीवित और रचनात्मक बना रहता है जब तक उसके भीतर विरोधी विचारों के लिए स्थान मौजूद रहता है।
यही कारण है कि वे साहित्य में भी विविधता और बहुलता के समर्थक थे। वे किसी एक काव्य-दृष्टि, किसी एक शैली या किसी एक विचारधारा को साहित्य का अंतिम मानदंड नहीं मानते थे। उनकी आलोचना में बार-बार यह आग्रह दिखाई देता है कि साहित्य को उसकी जटिलता और बहुवचनता में समझा जाए। यह आग्रह वस्तुतः लोकतांत्रिक आग्रह है। जिस प्रकार लोकतंत्र अनेक नागरिकों की सहभागिता से बनता है, उसी प्रकार साहित्य भी अनेक अनुभवों और दृष्टियों के सह-अस्तित्व से समृद्ध होता है।
आपातकाल के संदर्भ में यह लोकतांत्रिक दृष्टि और अधिक स्पष्ट हो जाती है। जब सत्ता ने असहमति को नियंत्रित करने का प्रयास किया, तब साही को लगा कि केवल राजनीतिक अधिकार ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति भी संकट में है। उनके लिए समस्या केवल यह नहीं थी कि कुछ नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। समस्या यह थी कि प्रश्न पूछने का अधिकार संदेह के घेरे में आ गया था। यह स्थिति उनकी लोकतांत्रिक संवेदना के बिल्कुल विपरीत थी।
साही का मानना था कि लोकतंत्र का वास्तविक आधार भय-मुक्त नागरिक होता है। यदि नागरिक भयग्रस्त है, यदि वह अपने विचार व्यक्त करने से डरता है, यदि उसे यह आशंका है कि असहमति व्यक्त करने पर दंड मिलेगा, तो लोकतंत्र केवल औपचारिक ढाँचा बनकर रह जाता है। इसलिए वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का केंद्रीय तत्व मानते थे। यह स्वतंत्रता केवल पत्रकारों या लेखकों के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक के लिए आवश्यक है।
उनकी आलोचना-दृष्टि में व्यक्ति की गरिमा का प्रश्न भी लोकतंत्र से जुड़ता है। साही किसी सामूहिकता को व्यक्ति से बड़ा नहीं मानते। चाहे वह राष्ट्र हो, राज्य हो, दल हो या विचारधारा, यदि वह व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा को नष्ट करने लगे, तो साही उसकी आलोचना करते हैं। यह दृष्टि उन्हें उन विचारकों की परंपरा में खड़ा करती है जो लोकतंत्र को व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा का साधन मानते हैं।
साही की लोकतांत्रिक चेतना का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष आत्मालोचना है। वे केवल सत्ता से प्रश्न नहीं पूछते, बल्कि समाज और स्वयं बुद्धिजीवियों से भी प्रश्न पूछते हैं। उनके अनुसार लोकतंत्र तभी जीवित रह सकता है जब हर संस्था अपने भीतर आलोचना की संभावना बनाए रखे। यदि कोई समूह स्वयं को आलोचना से ऊपर मानने लगे, तो वह लोकतांत्रिक नहीं रह जाता। इसीलिए साही किसी भी प्रकार की बौद्धिक कट्टरता के विरोधी थे।
साहित्य और लोकतंत्र के संबंध को लेकर उनकी दृष्टि अत्यंत सूक्ष्म है। वे साहित्य को लोकतंत्र का प्रत्यक्ष उपकरण नहीं बनाते, लेकिन यह मानते हैं कि साहित्य लोकतांत्रिक संवेदना का निर्माण करता है। एक अच्छा उपन्यास पाठक को दूसरे मनुष्य के अनुभवों से परिचित कराता है। एक अच्छी कविता संवेदनशीलता को विस्तृत करती है। एक गंभीर आलोचना स्थापित धारणाओं पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है। इस प्रकार साहित्य नागरिकता की उस भावना को विकसित करता है जिसके बिना लोकतंत्र संभव नहीं।
साही के लिए लोकतंत्र का अर्थ केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है। नागरिक को केवल बोलने का अधिकार नहीं होना चाहिए; उसमें सुनने की क्षमता भी होनी चाहिए। लोकतंत्र केवल अपनी बात कहने का नाम नहीं है; यह दूसरे की बात को सुनने और समझने का भी नाम है। उनकी दृष्टि में यही संवादशीलता लोकतंत्र की आत्मा है।
आज जब हम उनके लेखन को पढ़ते हैं, तो स्पष्ट दिखाई देता है कि वे लोकतंत्र को किसी राजनीतिक फैशन की तरह नहीं, बल्कि सभ्यता की उपलब्धि की तरह देखते थे। उन्हें भय था कि यदि समाज संवाद, असहमति और स्वतंत्र विवेक की परंपरा खो देगा, तो लोकतंत्र केवल एक प्रशासनिक शब्द बनकर रह जाएगा। इसलिए उनकी आलोचना-दृष्टि लगातार हमें लोकतांत्रिक बने रहने की चुनौती देती है।
इस प्रकार साही की आलोचना-दृष्टि में लोकतंत्र कोई बाहरी विषय नहीं है। वह उनके समूचे चिंतन की आधारभूमि है। संवाद, बहुलता, असहमति, स्वतंत्रता, आत्मालोचना और व्यक्ति की गरिमा जैसे मूल्य उनकी आलोचना को लोकतांत्रिक बनाते हैं। यही मूल्य उन्हें आपातकाल के विरोध में खड़ा करते हैं, यही उन्हें साहित्य की स्वायत्तता का समर्थक बनाते है।
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