राही मासूम रज़ा : इतिहास के शोर में मनुष्य की बची हुई आवाज़

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Parichay Das

— परिचय दास —

।। एक।।

पातकाल के विरोधी रहे राही मासूम रज़ा को पढ़ते हुए सबसे पहले जो चीज़ सामने आती है, वह उनकी कथा नहीं, उनकी आवाज़ है। कथा बाद में आती है, आवाज़ पहले। जैसे कोई आदमी अपने गाँव की गली में खड़ा होकर अपने समय को पुकार रहा हो और उस पुकार में घरों के नाम, रिश्तों की गंध, खेतों की नमी, पुरखों की स्मृति, धार्मिक संस्कार, जातिगत दूरी और मनुष्य की निजी असुरक्षा सब एक साथ सुनाई पड़ रहे हों। यही वह बिंदु है जहाँ राही मासूम रज़ा अपने समय के दूसरे कथा-लेखकों से अलग दिखाई देते हैं। उन्होंने समाज को केवल देखा नहीं, उसकी बोलती हुई स्मृति को पकड़ा।

भारतीय कथा-परंपरा में गाँव कोई नया विषय नहीं था। प्रेमचंद के यहाँ गाँव सामाजिक यथार्थ की प्रयोगभूमि है; रेणु के यहाँ वह जीवन की बहुध्वन्यात्मकता और लोक-संवेदना का विराट भूगोल बन जाता है। राही के यहाँ गाँव इन दोनों से अलग एक और रूप ग्रहण करता है। वह स्मृति का ऐसा प्रदेश है जहाँ इतिहास अभी-अभी होकर गुज़रा है, लेकिन उसकी धूल मनुष्यों के कपड़ों पर लगी हुई है। इसीलिए आधा गाँव को केवल ग्रामीण जीवन का उपन्यास कहना उसके वास्तविक अर्थ को छोटा करना है। यह एक ऐसे सामाजिक संसार का आख्यान है जिसकी आंतरिक संरचना इतिहास की बड़ी घटनाओं से टूटती-बनती है।

राही की दृष्टि का यह सूक्ष्म अंतर बहुत महत्त्वपूर्ण है। वे गाँव को बाहर से नहीं देखते। उनके यहाँ लेखक और गाँव के बीच पर्यटक और दृश्य का संबंध नहीं है। लेखक उसी मिट्टी का आदमी है। इसलिए गंगौली का चित्रण किसी नृवंशशास्त्रीय रिपोर्ट की तरह नहीं बनता। वहाँ स्मृति की ऊष्मा है, और इसी ऊष्मा के भीतर आलोचनात्मक दृष्टि भी है। वे अपने समाज से प्रेम करते हैं, इसलिए उसकी कुरूपताओं को छिपाते नहीं। वे उसकी विडंबनाओं को देखते हैं, लेकिन उसे तिरस्कार की दृष्टि से नहीं देखते। यह भीतर से की गई आलोचना है, बाहर से किया गया निर्णय नहीं।

यही कारण है कि आधा गाँव में सांप्रदायिकता को समझने का ढंग भी विशिष्ट है। वहाँ धर्म केवल विचार नहीं है। वह घर की रचना में है, रिश्तों के संबोधन में है, विवाह की व्यवस्था में है, खान-पान में है, मृत्यु की स्मृति में है, और सबसे बढ़कर मनुष्य की आत्म-छवि में है। जब इतिहास विभाजन का समय लाता है, तो केवल राजनीतिक सीमा नहीं बनती; लोगों को अपने ही परिचित संसार में अपनी जगह फिर से तय करनी पड़ती है। राही इस परिवर्तन को नारे की तरह नहीं, रिश्तों के धीरे-धीरे बदलते तापमान की तरह लिखते हैं। यही उनकी कथा की बारीकी है।

उनके यहाँ इतिहास का प्रवेश हमेशा बड़े दरवाज़े से नहीं होता। वह कभी किसी बातचीत में आता है, कभी किसी आशंका में, कभी किसी अनुपस्थित व्यक्ति के बहाने और कभी इस प्रश्न में कि कौन यहाँ रहेगा और कौन चला जाएगा। इसीलिए राही का इतिहास मनुष्य के बाहर घटित होने वाली घटना नहीं रह जाता। वह मनुष्य के भीतर उतरता है। इतिहास का सबसे मार्मिक रूप वही है, जो तारीख़ के रूप में याद न रहे, लेकिन किसी बूढ़े चेहरे, किसी उजड़े घर या किसी टूटे रिश्ते में बचा रहे।

राही की कथा-कला का एक और विलक्षण पक्ष उनका पात्र-संसार है। वे पात्रों को अपने विचारों की कठपुतली नहीं बनाते। उनके पात्र अपने विरोधाभासों के साथ जीवित रहते हैं। कोई व्यक्ति एक साथ प्रेम करने वाला भी हो सकता है और संकीर्ण भी; धार्मिक भी और उदार भी; परंपरा का समर्थक भी और अपने भीतर उससे असंतुष्ट भी। मनुष्य की यही मिश्रित प्रकृति राही के पात्रों को जीवित बनाती है। वे अच्छे और बुरे की सुविधाजनक श्रेणियों में पूरी तरह नहीं बैठते।

यहीं उनकी कथा भारतीय जीवन की उस गहरी सच्चाई को छूती है जिसे हमारी श्रेष्ठ कथा-परंपरा बार-बार पहचानती रही है। मनुष्य किसी एक विचार का प्रतिनिधि नहीं होता। वह अपने समय, परिवार, शरीर, स्मृति और परिस्थितियों से बना हुआ जटिल प्राणी है। राही इस जटिलता को सरल नैतिक निर्णयों में नष्ट नहीं करते। वे पात्र को उसके अँधेरे के साथ भी रहने देते हैं।

टोपी शुक्ला में यह दृष्टि और अधिक तीखी हो जाती है। यहाँ पहचान का प्रश्न केवल सामाजिक नहीं, अस्तित्वगत हो जाता है। टोपी और इफ़्फ़न का संबंध इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं है कि वह दो समुदायों की मित्रता का उदाहरण देता है। उसकी वास्तविक शक्ति इस बात में है कि दोनों की आत्मीयता सामाजिक पहचान की पूर्वनिर्धारित सीमाओं को स्वीकार नहीं करती। दोस्ती यहाँ किसी उपदेश का परिणाम नहीं है; वह मनुष्य की स्वाभाविक निकटता है, जिसे समाज बाद में नाम और पहचान की दीवारों में बाँटने लगता है।

राही की भाषा इस पूरी प्रक्रिया की सबसे गहरी वाहक है। उनके यहाँ भाषा का प्रश्न केवल हिंदी और उर्दू के बीच का प्रश्न नहीं है। उनकी भाषा में पूर्वांचल की बोलियों का जीवन, घरेलू संबोधनों की गर्मी, उर्दू की तहज़ीबी ध्वनि और सामान्य हिंदुस्तानी बोलचाल की सहजता एक साथ आती है। इस मिश्रण को केवल भाषिक प्रयोग कहना कम होगा। यह उनके संसार की सामाजिक संरचना है। जिन मनुष्यों का जीवन मिला-जुला है, उनकी भाषा भी मिली-जुली होगी। भाषा में कृत्रिम शुद्धता थोपना उस जीवन की सच्चाई को काट देना होता।

इसलिए राही की भाषा को पढ़ते हुए लिपि और भाषा के बीच का अंतर भी दिखाई देता है। आधा गाँव का मूल लेखन उर्दू लिपि में हुआ, लेकिन उसकी जीवन-भाषा किसी एक लिपि की कैद में नहीं रहती। यही उनकी रचनात्मक उपलब्धि का एक गहरा संकेत है। मनुष्य बोलता है, लिपियाँ बाद में उसे बाँटती हैं। राही की रचना में बोलता हुआ मनुष्य लिपि की सीमाओं से बड़ा हो जाता है।

उनका गद्य इसी कारण कभी-कभी दस्तावेज़ और स्मृति के बीच झूलता हुआ दिखाई देता है। उसमें कथा की गति है, लेकिन साथ ही एक पुरानी दुनिया को बचा लेने की बेचैनी भी है। वे जानते हैं कि जो दुनिया बदल रही है, वह केवल भौतिक दुनिया नहीं है। उसके साथ संबोधन बदलेंगे, रिश्तों की अर्थवत्ता बदलेगी, घरों की संरचना बदलेगी और भाषा के भीतर से कुछ शब्द धीरे-धीरे गायब हो जाएँगे। राही का लेखन इस क्षय को दर्ज करता है।

यहाँ उन्हें केवल ‘विभाजन के लेखक’ की संज्ञा देना भी पर्याप्त नहीं। विभाजन उनके साहित्य में एक ऐतिहासिक घटना अवश्य है, लेकिन उससे बड़ा है विस्थापन का अनुभव। मनुष्य अपने स्थान से ही नहीं, अपने पुराने अर्थों से भी विस्थापित होता है। जिस गाँव को वह अपना मानता था, वह अचानक राजनीतिक अर्थों में बदल जाता है। जो पड़ोसी कल तक केवल पड़ोसी था, वह किसी नए सामूहिक नाम का हिस्सा बना दिया जाता है। राही की कथा इसी परिवर्तन की आंतरिक पीड़ा पकड़ती है।

उनकी विशिष्टता इसलिए भी है कि वे सामूहिक इतिहास को निजी स्मृति में रूपांतरित करते हैं। बड़ी घटनाएँ उनके यहाँ छोटे-छोटे मानवीय प्रसंगों में टूटकर आती हैं। यही कथा की असली शक्ति है। इतिहास कहता है कि एक समय देश विभाजित हुआ; राही दिखाते हैं कि विभाजन के बाद किसी के भीतर अपने गाँव का अर्थ कैसे बदल गया। इतिहास संख्या और तारीख़ बचा सकता है; कथा उस तारीख़ के भीतर धड़कता हुआ मनुष्य बचाती है।

राही मासूम रज़ा की कथा-दृष्टि में करुणा है, लेकिन वह करुणा भावुक नहीं है। वे पाठक से आँसू माँगने के लिए पात्रों को दुखी नहीं करते। उनका दुख जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया से पैदा होता है। इसीलिए उनकी करुणा देर तक बनी रहती है। वह पाठक को तत्काल रुलाकर समाप्त नहीं होती; वह भीतर एक धीमी खरोंच छोड़ती है।

उनकी कथा की यही धीमी खरोंच उनकी साहित्यिक शक्ति है। वे अपने पाठक को किसी निष्कर्ष तक पहुँचाकर मुक्त नहीं करते। वे उसे अपने भीतर लौटने के लिए विवश करते हैं। आधा गाँव समाप्त हो जाता है, गंगौली समाप्त नहीं होती। टोपी शुक्ला की कथा पूरी हो जाती है, लेकिन पहचान और आत्मीयता का प्रश्न पाठक के भीतर चलता रहता है। श्रेष्ठ कथा का जीवन शायद यही है कि उसकी समाप्ति पुस्तक में होती है, पाठक में नहीं।

इस दृष्टि से राही मासूम रज़ा भारतीय कथा-साहित्य में एक सेतु नहीं, एक स्वतंत्र भूगोल हैं। उन्हें केवल हिंदी और उर्दू के बीच रख देना उनके महत्व को सीमित करना होगा। उनकी वास्तविक भूमि वह हिंदुस्तानी जीवन है जहाँ भाषाएँ पहले साथ रहती हैं और बाद में विद्वान उन्हें अलग-अलग नाम देते हैं। राही उस पूर्ववर्ती जीवन की आवाज़ को साहित्य में सुरक्षित करते हैं।

और शायद यही उनकी सबसे बड़ी विशिष्टता है। उन्होंने मनुष्य को इतिहास का आँकड़ा नहीं बनने दिया। गाँव को केवल दृश्य नहीं बनने दिया। भाषा को केवल माध्यम नहीं रहने दिया। धर्म को केवल पहचान नहीं बनने दिया। स्मृति को केवल अतीत नहीं बनने दिया। इन सबको उन्होंने कथा के भीतर इस तरह मिलाया कि जीवन अपनी समूची जटिलता में उपस्थित हो सके। उनके यहाँ कथा किसी घटना का वर्णन नहीं, एक विलुप्त होती हुई मनुष्यता की पुनःश्रुति है। यही कारण है कि राही मासूम रज़ा को पढ़ना बीते हुए समय को जानना भर नहीं है; यह यह देखना भी है कि मनुष्य अपने टूटते हुए संसार में किस तरह मनुष्य बना रहता है।

।। दो।।

ग़ाज़ीपुर के गंगौली गांव का नाम आते ही राही मासूम रज़ा का “आधा गाँव” उपन्यास याद आता है लेकिन मेरे लिए गंगौली केवल साहित्य का गाँव नहीं है। वह एक निजी स्मृति से जुड़ा हुआ नाम भी है। मेरे मामा श्री त्रिलोकी नाथ श्रीवास्तव वहाँ अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। इसलिए जब राही के गंगौली को पढ़ता हूँ तो उसके पीछे एक वास्तविक भूगोल भी हल्के-हल्के उभरता है। साहित्य की दुनिया और जीवन की दुनिया के बीच शायद यही वह महीन जगह है जहाँ आलोचना अपने सबसे मानवीय रूप में जन्म लेती है।

राही ने गंगौली को खोजा नहीं था, उन्होंने उसे रचा। यह अंतर बहुत महत्त्वपूर्ण है। कोई गाँव अपने खेतों, घरों, गलियों, कुओं, मस्जिदों, चौपालों और रहने वालों के साथ वास्तविक भूगोल में मौजूद होता है; लेकिन उपन्यासकार उसे भाषा में दूसरी बार जन्म देता है। वास्तविक गंगौली एक जगह है, राही का गंगौली एक स्मृति-लोक है। वहाँ ईंट और मिट्टी से अधिक महत्त्व उन आवाज़ों का है जो समय बीत जाने के बाद भी कथा में सुनाई देती रहती हैं।

यहीं आधा गाँव की आंचलिकता अपनी नई पहचान बनाती है। आंचलिकता केवल किसी अंचल की बोली, वेशभूषा, खान-पान और रीति-रिवाज का प्रदर्शन नहीं है। वह तो आंचलिकता का बाहरी रंग है। उसकी भी अपनी उपयोगिता है, लेकिन राही उससे आगे जाते हैं। उनके यहाँ अंचल मनुष्य के भीतर बसा हुआ भूगोल बन जाता है। गंगौली को छोड़कर चले जाने पर भी गंगौली आदमी के भीतर बनी रहती है। शायद इसी कारण आधा गाँव का गाँव अपने भौतिक अस्तित्व से अधिक अपनी स्मृति में जीवित है।

रेणु के मैला आँचल में मेरीगंज को पढ़ते हुए अंचल अपनी बहुरंगी सामाजिक गतिशीलता में खुलता है। वहाँ लोकजीवन अपनी अनेक आवाज़ों में बोलता है। राही इस उपलब्धि को स्वीकार करते हुए भी उसे दूसरी दिशा में ले जाते हैं। उनके सामने प्रश्न केवल यह नहीं है कि एक गाँव कैसा है, बल्कि यह भी है कि इतिहास जब गाँव के भीतर आता है तो गाँव का अर्थ क्या रह जाता है। गंगौली इसलिए केवल अंचल नहीं, इतिहास से घायल अंचल है।

यही कारण है कि आधा गाँव की आंचलिकता को केवल ग्रामीण जीवन का रंग समझना उसके साथ अन्याय होगा। गंगौली में जो कुछ घटता है, वह धीरे-धीरे गाँव की सीमा से बाहर निकल जाता है। परिवारों के संबंधों में राजनीति प्रवेश करती है, धार्मिक पहचान सामाजिक संबंधों को नया अर्थ देने लगती है, देश की बदलती हुई स्थिति लोगों की निजी आशंकाओं में उतर आती है। एक दिन जो लोग केवल पड़ोसी थे, इतिहास उन्हें अलग-अलग खानों में रखकर देखने लगता है। राही इस परिवर्तन को किसी राजनीतिक व्याख्यान की तरह नहीं लिखते। वे इसे मनुष्य के रोज़मर्रा के जीवन में पकड़ते हैं।

यहीं उनका गंगौली असाधारण हो जाता है।

क्योंकि गंगौली का दु:ख किसी एक घटना का दु:ख नहीं है। वह एक जीवन-पद्धति के धीरे-धीरे टूटने का दु:ख है। घर बने रहते हैं, लेकिन उनके अर्थ बदलते हैं। लोग रहते हैं लेकिन उनके बीच पुराने संबोधनों की सहजता कम होने लगती है। स्मृतियाँ बचती हैं लेकिन स्मृतियों के भीतर एक नया इतिहास प्रवेश कर जाता है। राही का लेखक-मन इसी टूटन को पकड़ता है।

मुझे गंगौली की यह साहित्यिक उपस्थिति और भी अर्थवान लगती है क्योंकि मेरे मामा श्री त्रिलोकी नाथ श्रीवास्तव वहाँ अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। एक शिक्षक के रूप में किसी गाँव में होना केवल किसी विद्यालय में पढ़ाना नहीं होता। वह उस समाज की अनेक परतों से होकर गुजरना होता है। बच्चे जिन घरों से आते हैं, उनके परिवार, उनकी भाषा, उनकी आकांक्षाएँ, उनकी झिझक और उनका भविष्य, सब शिक्षक के सामने धीरे-धीरे खुलते हैं। इस निजी स्मृति के कारण राही के गंगौली को पढ़ते हुए वह गाँव मेरे लिए किसी दूरस्थ साहित्यिक नक्शे पर बना हुआ बिंदु नहीं रह जाता।

लेकिन आलोचना का सौंदर्य शायद यहीं है कि निजी स्मृति को साहित्यिक सत्य से अलग भी रखना पड़ता है। मेरा गंगौली और राही का गंगौली एक नहीं हैं। वास्तविक गंगौली में मेरे मामा की उपस्थिति रही होगी; राही के गंगौली में उनका रचनात्मक संसार है। दोनों को मिला देना साहित्य के साथ न्याय नहीं होगा बल्कि उनके बीच की दूरी को पहचानना अधिक सुंदर है। एक गाँव जीवन में होता है, दूसरा साहित्य में। जीवन का गाँव समय के साथ बदल जाता है; साहित्य का गाँव अपनी रचना के क्षण में एक स्थायी समय प्राप्त कर लेता है।

इसीलिए राही का गंगौली वास्तविक गंगौली से बड़ा है। साहित्य में आने के बाद वह केवल एक गाँव नहीं रह जाता। वह उन तमाम गाँवों की स्मृति का वाहक बन जाता है जिनके भीतर इतिहास ने अपने अदृश्य हाथ से सीमाएँ खींची थीं। उसकी गलियाँ स्थानीय हैं लेकिन उनकी उदासी सार्वभौमिक हो जाती है।

राही की आंचलिकता की नई रचना यहीं दिखाई देती है। उन्होंने अंचल को बाहर से रंगीन नहीं बनाया; उन्होंने अंचल को भीतर से बोलने दिया। यह बहुत कठिन रचनात्मक उपलब्धि है। अंचल को सजाया जा सकता है, उसका वर्णन किया जा सकता है, उसके लोकगीत और मुहावरे लिखे जा सकते हैं; लेकिन अंचल की आत्मा तभी आती है जब उसके लोग अपने स्वाभाविक स्वर में बोलें और लेखक उनके ऊपर अपनी भाषा का शासन न लगाए।

राही इस मामले में असाधारण हैं। उनकी भाषा में गंगौली की मिट्टी लगी हुई है। वह किसी शब्दकोश से निकली हुई भाषा नहीं है। उसमें रिश्तों के अपने संबोधन हैं, घरेलू ध्वनियाँ हैं, स्थानीय वाक्य-विन्यास है, उर्दू की तहज़ीबी छाया है और यूपी के पूर्वांचल की बोलचाल का जीवंत स्पर्श है। यह मिश्रण केवल भाषिक प्रयोग नहीं है। यह उस समाज की वास्तविक बनावट है जिसमें भाषाएँ अलग-अलग कमरों में नहीं रहतीं।

इसलिए आधा गाँव की आंचलिकता को उसकी भाषा से अलग करके समझना संभव नहीं। गंगौली पहले बोलता है फिर दिखाई देता है। यही राही की बड़ी रचनात्मक सूझ है।

और शायद यही कारण है कि आधा गाँव का शीर्षक भी इतना अर्थपूर्ण है। ‘आधा’ केवल किसी भौगोलिक या जनसंख्या संबंधी कमी का संकेत नहीं है। उसमें एक टूटे हुए संसार की छाया है। जैसे गाँव का एक हिस्सा इतिहास के साथ चला गया हो और दूसरा हिस्सा स्मृति में बचा रह गया हो। ‘आधा’ यहाँ संख्या नहीं, अस्तित्व की स्थिति है।

इस अर्थ में राही की आंचलिकता का नया रूप ‘अंचल का विस्तार’ नहीं, अंचल का आत्मान्वेषण है। वे गंगौली के बहाने यह पूछते हैं कि जब इतिहास किसी स्थान को बदल देता है, तब उस स्थान की असली पहचान कहाँ बचती है। मिट्टी में? घरों में? लोगों में? भाषा में? या स्मृति में?

राही का उत्तर किसी एक जगह नहीं मिलता। उनका पूरा उपन्यास इस प्रश्न की तरह फैला हुआ है।

और तब मेरे लिए गंगौली का अर्थ एक और परत पा लेता है। मेरे मामा वहाँ अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। एक वास्तविक शिक्षक की आवाज़ वहाँ कभी बच्चों के बीच गूँजी होगी। राही ने उसी तरह उस गाँव की असंख्य आवाज़ों को साहित्य में सुरक्षित कर दिया। शिक्षक कक्षा में भविष्य को संबोधित करता है; लेखक स्मृति में अतीत को। दोनों के बीच एक अदृश्य रिश्ता है। एक ज्ञान को आगे ले जाता है, दूसरा जीवन को विस्मृति से बचाता है।

इसलिए आधा गाँव को पढ़ते हुए गंगौली मेरे लिए केवल राही का रचा हुआ गाँव नहीं रह जाता। वह जीवन और साहित्य के बीच खड़ा हुआ वह अंचल बन जाता है जहाँ वास्तविक स्मृति और रचनात्मक स्मृति एक-दूसरे को छूती हैं।

यही आधा गाँव की आंचलिकता की नई रचना है: गाँव का वर्णन नहीं, गाँव की आत्मा का पुनर्निर्माण।

।। तीन।।

राही मासूम रज़ा की भाषा को केवल हिंदी और उर्दू के बीच रखकर देखना वैसा ही होगा जैसे किसी नदी को उसके दो किनारों से पहचानना। नदी की असली सत्ता तो उस बहते हुए जल में होती है जो दोनों किनारों को छूता हुआ अपनी राह बनाता है। राही की भाषा भी ऐसी ही है। उसमें हिंदी है, उर्दू है, पूर्वांचल की बोलचाल है, घरेलू संबोधन हैं, लोक की ध्वनियाँ हैं और उस जीवन की अनगिनत छोटी-छोटी आवाज़ें हैं जिसे किसी एक भाषाई अनुशासन में पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता।

उनकी भाषा की पहली विशेषता उसकी जीवितता है। वह लिखी हुई भाषा होकर भी बोलती हुई लगती है। पाठक को कई बार लगता है कि सामने कोई कथाकार बैठा है जो घटना सुना नहीं रहा, उसे फिर से जी रहा है। वाक्य के भीतर आवाज़ का उतार-चढ़ाव है, संबोधन का अपना ताप है, और संवादों में पात्र की सामाजिक स्थिति अपने आप खुलती जाती है। भाषा यहाँ सूचना का माध्यम नहीं रहती, वह चरित्र का शरीर बन जाती है।

यही वह जगह है जहाँ राही की भाषा सामान्य साहित्यिक भाषा से अलग होती है। वे पात्र को अपनी भाषा में बोलने के लिए विवश नहीं करते। पात्र जिस सामाजिक संसार से आया है, उसी की ध्वनि उसके मुँह में रखते हैं। इसीलिए उनके संवादों में कृत्रिमता नहीं आती। भाषा को साहित्यिक बनाने की कोशिश करते ही लेखक अक्सर जीवन को दूर कर देता है; राही जीवन को भाषा के इतने पास रखते हैं कि साहित्य अपने आप जन्म लेता है।

उनकी भाषा की दूसरी बड़ी शक्ति उसका मिश्रित स्वभाव है। लेकिन ‘मिश्रित’ का अर्थ यहाँ बेतरतीब मिश्रण नहीं है। यह उस समाज की स्वाभाविक भाषिक बनावट है जिसमें अनेक भाषिक संस्कार सदियों से एक-दूसरे के साथ रहते आए हैं। गंगौली का जीवन जिस तरह एक ही सामाजिक धरातल पर अनेक सांस्कृतिक स्मृतियों को साथ लेकर चलता है, उसी तरह उसकी भाषा भी कई स्रोतों से जल ग्रहण करती है।

इसलिए राही के यहाँ भाषा कोई राजनीतिक घोषणा नहीं करती कि वह हिंदी है या उर्दू। वह बोलती है और अपने बोलने में अपना परिचय स्वयं देती है। यही उसकी सुंदरता है। भाषा की असली नागरिकता उसके शब्दों में नहीं, उसकी जीवन-संगति में होती है।

उनके गद्य में स्थानीय शब्दों का आना भी इसी कारण महत्त्वपूर्ण है। वे लोकशब्दों को संग्रहालय की वस्तुओं की तरह नहीं रखते। उन्हें वाक्य में ऐसे रखते हैं जैसे वे उसी घर के पुराने सदस्य हों। यही वजह है कि उनका आंचलिक रंग कृत्रिम नहीं लगता। वहाँ अंचल शब्दों से बाहर नहीं, शब्दों के भीतर रहता है।

राही की भाषा का एक गहरा पक्ष उसका स्मृति-संबंध है। कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़ते ही पूरा एक समय खुल जाता है। कोई संबोधन, कोई घरेलू मुहावरा, कोई पुराना नाम, कोई स्थानीय उच्चारण, पाठक को कथा के भीतर से उठाकर उस समाज में पहुँचा देता है जो शायद अब अपने पुराने रूप में मौजूद नहीं। इस तरह भाषा उनके यहाँ केवल वर्तमान को व्यक्त नहीं करती, वह अतीत को भी सुरक्षित रखती है।

यही कारण है कि आधा गाँव में भाषा स्वयं एक प्रकार का स्मृति-भंडार बन जाती है। यदि गंगौली का सामाजिक संसार बदल रहा है, तो उसके बदलने का सबसे सूक्ष्म प्रमाण उसके शब्दों में मिलता है। लोग चले जाते हैं, घर टूटते हैं, संबंध बदलते हैं, लेकिन भाषा में उनकी आवाज़ बची रह सकती है। राही उस बची हुई आवाज़ के लेखक हैं।

यहाँ उनकी भाषा और उनकी कथा-दृष्टि एक हो जाती है। वे जिस समाज को लिखते हैं, उसे केवल विषय की तरह नहीं देखते। उसकी भाषिक आत्मा को पकड़ते हैं। इसलिए उनकी भाषा को हटाकर आधा गाँव की कथा की कल्पना करना लगभग असंभव है। कथा बच सकती है, लेकिन उसका वह ताप नहीं बचेगा जिससे गंगौली पाठक के सामने एक जीवित संसार बनकर आती है।

राही की भाषा में एक और चीज़ बहुत महत्त्वपूर्ण है: हास्य और करुणा का साथ-साथ चलना। जीवन केवल दुख नहीं है। सबसे कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य हँसता है, चुटकी लेता है, व्यंग्य करता है, किसी की नकल करता है, अपनी पीड़ा को मज़ाक में छिपा देता है। राही इस मानवीय स्वभाव को समझते हैं। इसलिए उनके यहाँ करुणा बोझिल नहीं होती। अचानक कोई हल्की-सी बात वातावरण को बदल देती है और उसी हँसी के पीछे जीवन का गहरा दुख दिखाई पड़ने लगता है।

यह गुण उन्हें विशेष रूप से भारतीय कथा-परंपरा से जोड़ता है। यहाँ जीवन को केवल गंभीरता की मुद्रा में नहीं देखा जाता। करुणा और विनोद साथ रह सकते हैं। गाँव का आदमी मृत्यु की चर्चा करते हुए भी हँस सकता है और हँसते-हँसते अपने जीवन की सबसे बड़ी विडंबना कह सकता है। राही ने इस जीवन-सत्य को भाषा में जगह दी।

उनके संवादों में इसी कारण नाटकीयता भी है और घरेलूपन भी। कोई पात्र केवल अपनी बात नहीं कहता, अपने पूरे सामाजिक व्यक्तित्व के साथ बोलता है। शब्दों के बीच उसका अहंकार, भय, प्रेम, संकोच और सामाजिक स्थान झलकता है। इसीलिए राही के संवाद बाद में जब दृश्य और श्रव्य माध्यमों में पहुँचे, तो उनमें स्वाभाविक गति दिखाई दी। जिस लेखक ने भाषा को पहले से ही बोलते हुए सुना हो, उसके संवाद पर्दे पर असहज नहीं होते।

राही की भाषा का सबसे सुंदर पक्ष शायद यह है कि वह भाषाओं के बीच पुल बनाने के लिए पुल बनने का अभिनय नहीं करती। वह किसी सांस्कृतिक समझौते का दस्तावेज़ नहीं है। वह जीवन की सहज परिणति है। जिस समाज में लोग साथ रहते हैं, उनकी भाषा भी एक-दूसरे से कुछ न कुछ ग्रहण करती है। राही ने इसी वास्तविकता को साहित्यिक रूप दिया।

इसलिए उनकी भाषा को ‘गंगा-जमुनी’ कह देना भी पर्याप्त नहीं। ऐसा कहने पर हम फिर एक तैयार विशेषण लेकर बैठ जाते हैं। असली बात यह है कि राही की भाषा जीवन की मिश्रित संरचना को उसकी स्वाभाविक लय में व्यक्त करती है। वह किसी सिद्धांत का उदाहरण नहीं बनती; वह स्वयं अपना सिद्धांत रचती है।

उनकी भाषा में स्मृति है, लेकिन पुरातनता नहीं; लोक है, लेकिन लोक-सजावट नहीं; उर्दू की नफ़ासत है, लेकिन बनावटी तहज़ीब नहीं; हिंदी की सहजता है, लेकिन भाषाई शुद्धतावाद नहीं। इन सबके बीच जो चीज़ सबसे अधिक जीवित रहती है, वह है मनुष्य की आवाज़।

और यही राही मासूम रज़ा की भाषा का स्थायी आकर्षण है। वे भाषा को साहित्य के बाहर से लेकर कथा पर आरोपित नहीं करते। उनके पात्रों के जीवन से भाषा निकलती है और भाषा से उनका जीवन। गंगौली को उन्होंने केवल स्थान नहीं बनाया; उसकी बोलती हुई स्मृति को साहित्य बना दिया। शायद इसीलिए उनके शब्दों में गाँव समाप्त होने के बाद भी गाँव बचा रहता है।

।। चार।।

राही मासूम रज़ा के भारतीय उपन्यास में अचूक योगदान को केवल इस आधार पर नहीं आँका जा सकता कि उन्होंने कितने अच्छे उपन्यास लिखे। उनकी असली उपलब्धि यह है कि उन्होंने उपन्यास के भीतर गाँव, समुदाय, भाषा, इतिहास और व्यक्ति के संबंध को एक नई संरचना दी। प्रेमचंद और रेणु के बाद भारतीय उपन्यास जिस ग्रामीण संसार को पहचान चुका था, राही ने उसी संसार के भीतर एक ऐसी दरार दिखाई जिसमें पूरा आधुनिक भारत दिखाई देने लगा।

उनके यहाँ गाँव केवल जीवन की पृष्ठभूमि नहीं है। वह इतिहास का अनुभव करने वाली इकाई है। आधा गाँव में गंगौली इसी कारण महत्त्वपूर्ण है। वह अपनी मिट्टी, अपने खानदानों, अपने धार्मिक संस्कारों और अपनी स्थानीय भाषा के साथ उपस्थित है, लेकिन उसके भीतर धीरे-धीरे एक बड़ा ऐतिहासिक परिवर्तन प्रवेश करता है। देश का विभाजन किसी दूर राजधानी में घटने वाली राजनीतिक घटना नहीं रह जाता; वह गाँव के रिश्तों और स्मृतियों में उतर आता है। भारतीय उपन्यास में इतिहास को इस तरह निजी और सामुदायिक जीवन के भीतर उतारना राही की बड़ी उपलब्धि है।

उनका दूसरा निर्णायक योगदान मुस्लिम ग्रामीण जीवन को उसकी आंतरिक जटिलता के साथ उपन्यास का विषय बनाना है। यहाँ सावधानी आवश्यक है। उन्होंने केवल ‘मुसलमानों का जीवन’ नहीं लिखा। उन्होंने उस जीवन के भीतर वर्ग, खानदान, स्त्री-पुरुष संबंध, धार्मिक संस्कार, सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक स्थिति, प्रेम, ईर्ष्या और विघटन की अनेक परतें खोलीं। इसलिए उनका मुस्लिम समाज किसी बाहरी दृष्टि से देखा गया ‘दूसरा समाज’ नहीं बनता। वह भारतीय समाज की ही एक जटिल अंतर्धारा के रूप में सामने आता है।

यही बात उन्हें विशेष बनाती है। भारतीय उपन्यास में किसी समुदाय को विषय बनाना और उसे जीवित सामाजिक संसार में बदल देना दो अलग बातें हैं। राही दूसरी उपलब्धि तक पहुँचते हैं।

उनका तीसरा योगदान भाषा के स्तर पर है। उन्होंने उपन्यास की भाषा को कृत्रिम साहित्यिक अनुशासन से मुक्त करके पात्रों की वास्तविक सामाजिक आवाज़ के करीब पहुँचाया। उर्दू, हिंदी, पूर्वांचली बोलचाल और स्थानीय शब्द-संसार उनके यहाँ किसी भाषाई प्रदर्शन की तरह नहीं आते। वे जीवन की स्वाभाविक परिणति हैं। इसीलिए उनकी भाषा में अनुवादित जीवन नहीं, बोला हुआ जीवन मिलता है।

यहाँ राही भारतीय उपन्यास को एक महत्त्वपूर्ण बात सिखाते हैं: भाषा केवल कथा कहने का साधन नहीं, कथा के समाज की संरचना भी है। जिस समाज के भीतर अनेक भाषिक संस्कार साथ रहते हैं, उसकी कथा एकरंगी भाषा में पूरी नहीं कही जा सकती।

उनका चौथा योगदान स्मृति को उपन्यास की रचनात्मक शक्ति बनाना है। आधा गाँव में अतीत केवल पीछे छूटा हुआ समय नहीं है। वह वर्तमान के भीतर लगातार उपस्थित है। पुरखे, घर, रिश्ते, संबोधन, सामाजिक प्रतिष्ठा और पुरानी जीवन-पद्धति सब मिलकर एक ऐसी स्मृति बनाते हैं जो बदलते समय के सामने धीरे-धीरे क्षीण होती है। राही इस क्षरण को केवल नॉस्टेल्जिया में नहीं बदलते। उनकी स्मृति आलोचनात्मक है। वे जिस संसार को याद करते हैं, उसकी कमजोरियाँ भी देखते हैं।

यही कारण है कि आधा गाँव को केवल विभाजन का उपन्यास कहना भी उसके साथ न्याय नहीं होगा। विभाजन वहाँ निर्णायक ऐतिहासिक संदर्भ है, लेकिन राही का विषय उससे बड़ा है: मनुष्य अपने बदलते हुए सामूहिक संसार में स्वयं को कैसे पहचानता है।

टोपी शुक्ला में यह प्रश्न और अधिक व्यक्तिगत रूप ग्रहण करता है। यहाँ सामुदायिक पहचान के सामने मित्रता और मनुष्यता का प्रश्न खड़ा होता है। राही किसी आदर्शवादी समाधान की ओर नहीं भागते। वे दिखाते हैं कि समाज की बनाई हुई पहचानें व्यक्ति के निजी जीवन में किस तरह प्रवेश करती हैं। इसीलिए उनका उपन्यास केवल सामाजिक समस्या का आख्यान नहीं रहता; वह व्यक्ति के भीतर पैदा होने वाली बेचैनी का भी आख्यान बन जाता है।

भारतीय उपन्यास में उनका एक और अचूक योगदान सामाजिक यथार्थ को नैतिक जटिलता के साथ प्रस्तुत करना है। उनके पात्रों को खाँचों में रख देना संभव नहीं। कोई पूरी तरह खलनायक नहीं, कोई पूरी तरह निर्दोष नहीं। मनुष्य परिस्थितियों, संस्कारों और इच्छाओं का मिला-जुला परिणाम है। राही इस मिश्रण को बचाए रखते हैं। यही उनके उपन्यासों को विचारधारात्मक सरलीकरण से बचाता है।

उनकी दृष्टि में गाँव भी न तो पवित्र है, न पिछड़ा हुआ। उसमें आत्मीयता है तो संकीर्णता भी; सामुदायिकता है तो सत्ता भी; स्मृति है तो अंधविश्वास भी। यह भीतर से की गई सामाजिक आलोचना है। शायद यही कारण है कि उनके गाँव को पढ़ते हुए पाठक उसके प्रति प्रेम भी महसूस करता है और उससे असहमति भी।

और फिर उनके उपन्यासों में भारतीयता का एक अलग रूप दिखाई देता है। भारतीयता यहाँ किसी सांस्कृतिक नारे या सजावटी प्रतीक का नाम नहीं। वह लोगों के साथ रहने, एक-दूसरे को संबोधित करने, साझा स्मृतियाँ बनाने और फिर इतिहास द्वारा उन संबंधों को बदलते हुए देखने की प्रक्रिया है। राही ने भारतीय समाज को किसी एक धार्मिक या भाषिक पहचान में समेटने के बजाय उसकी मिश्रित और संघर्षशील वास्तविकता में देखा।

यही उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है।

यदि प्रेमचंद ने भारतीय उपन्यास को व्यापक सामाजिक यथार्थ दिया और रेणु ने अंचल को उसकी बहुध्वन्यात्मक जीवन-लय के साथ प्रतिष्ठित किया, तो राही मासूम रज़ा ने अंचल के भीतर इतिहास की दरार और उस दरार में फँसी हुई मनुष्य की स्मृति को अपना विशिष्ट कथाक्षेत्र बनाया।

इसलिए भारतीय उपन्यास में उनका योगदान किसी एक तकनीक, विषय या भाषा-प्रयोग में नहीं है। उन्होंने गाँव को स्मृति बनाया, स्मृति को इतिहास से जोड़ा, इतिहास को व्यक्ति के भीतर उतारा और व्यक्ति की आवाज़ को उसकी अपनी भाषा में बोलने दिया।

यही वह उपलब्धि है जिसके कारण आधा गाँव केवल एक सफल आंचलिक उपन्यास नहीं रहता। वह भारतीय उपन्यास की उस यात्रा का महत्त्वपूर्ण पड़ाव बन जाता है जहाँ स्थान धीरे-धीरे इतिहास में और इतिहास मनुष्य के भीतर बदल जाता है।

।। पांच ।।

राही मासूम रज़ा का सिनेमा में योगदान केवल इतना नहीं है कि उन्होंने कुछ फ़िल्मों के संवाद लिखे। उनकी असली उपलब्धि यह है कि उन्होंने साहित्यिक संवेदना को पर्दे की बोलचाल में बदलने की कला को एक अलग ऊँचाई दी। वे उन लेखकों में हैं जिन्होंने यह समझ लिया था कि फ़िल्म में अच्छा संवाद वह नहीं जो काग़ज़ पर सबसे सुंदर दिखाई दे, बल्कि वह है जो अभिनेता के मुँह से निकलते ही चरित्र, परिस्थिति और दृश्य का अर्थ खोल दे।

राही के लिए संवाद कहानी की व्याख्या नहीं था। वह चरित्र की आंतरिक बनावट का श्रव्य रूप था। आदमी क्या कहता है, उससे कम महत्त्वपूर्ण कई बार यह होता है कि वह किस तरह कहता है, कहाँ रुकता है, किस शब्द को चुनता है और किस बात को कहकर भी अधूरा छोड़ देता है। उपन्यासकार की यही सूक्ष्म दृष्टि जब सिनेमा में आई, तो संवादों में साहित्यिकता के साथ जीवन की स्वाभाविक ध्वनि भी बनी रही।

उनकी पृष्ठभूमि यहाँ निर्णायक थी। जो लेखक आधा गाँव में सामाजिक जीवन की अनेक आवाज़ों को पकड़ चुका था, उसके लिए फ़िल्मी संवाद लिखना केवल भाषा बदलने का काम नहीं था। वह बोलती हुई सामाजिक संरचना को पर्दे पर स्थानांतरित करना था। उनके संवादों में पात्र का वर्ग, संस्कार, शिक्षा, क्षेत्र, मानसिकता और संबंधों की दूरी तक दिखाई देने लगती है।

राही ने लोकप्रिय सिनेमा को कभी साहित्य से बाहर का क्षेत्र नहीं माना। यह दृष्टि अपने समय में महत्त्वपूर्ण थी। साहित्यकार अक्सर लोकप्रिय माध्यमों को संदेह की निगाह से देखते रहे हैं, और लोकप्रिय माध्यम साहित्यिक भाषा से डरते रहे हैं। राही ने दोनों के बीच ऐसी जगह बनाई जहाँ साहित्य की गहराई और जनभाषा की सहजता साथ रह सकीं।

उनके संवादों की एक विशेषता उनकी संक्षिप्तता में अर्थ की बहुलता है। एक अच्छा सिनेमाई संवाद दृश्य से बड़ा नहीं होता; वह दृश्य के भीतर छिपे अर्थ को खोलता है। राही के यहाँ वाक्य अकेला नहीं चलता। उसके पीछे पूरा सामाजिक अनुभव चलता है। इसलिए उनका संवाद पढ़ने की वस्तु होने के साथ-साथ सुनने की वस्तु भी है।

यही गुण उन्हें केवल संवाद लेखक नहीं, दृश्य-चेतना वाला लेखक बनाता है। उन्हें मालूम था कि सिनेमा शब्दों का माध्यम होते हुए भी केवल शब्दों पर निर्भर नहीं है। अभिनेता की देह, कैमरे की दृष्टि, मौन, वातावरण और दृश्य की गति संवाद के अर्थ को बदलते हैं। इसलिए उनके लिखे संवादों में वह खुलापन मिलता है जिसमें अभिनय अपनी जगह बना सकता है।

उनकी सिनेमा-यात्रा का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्होंने अलग-अलग प्रकार की फ़िल्मी कथाओं के लिए लिखा और स्वयं को एक ही साहित्यिक मुद्रा में बंद नहीं किया। यह उनकी व्यावसायिक क्षमता से अधिक उनकी रचनात्मक अनुकूलनशीलता का प्रमाण है। गंभीर साहित्य लिखने वाला लेखक लोकप्रिय माध्यम में उतरकर अपनी भाषा को उसके अनुरूप ढाल सके, लेकिन अपनी मानवीय दृष्टि न खोए, यह आसान नहीं।

राही की भाषा का हिंदुस्तानी स्वभाव यहाँ विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हुआ। फ़िल्म का दर्शक किसी भाषिक प्रयोगशाला में बैठा हुआ पाठक नहीं होता। वह संवाद को उसी क्षण ग्रहण करता है। राही ने ऐसी भाषा का उपयोग किया जिसमें सहजता थी, भाव था, मुहावरा था और सामाजिक पहचान की ध्वनि थी। इसीलिए उनके संवादों में कृत्रिम साहित्यिक बोझ नहीं आया।

उनके सिनेमा में एक और चीज़ दिखाई देती है, वह है भावनात्मक अर्थव्यवस्था। वे भावुकता और भावना के बीच का अंतर जानते थे। संवाद पात्र को रोने के लिए मजबूर नहीं करता; वह ऐसी स्थिति बनाता है जिसमें दर्शक स्वयं भाव ग्रहण करता है। यह लेखक की परिपक्वता है। भावनाओं को घोषित करने की बजाय उन्हें परिस्थिति में रहने देना।

यहीं राही मासूम रज़ा की कथा-दृष्टि और उनकी फ़िल्मी दृष्टि एक-दूसरे से मिलती हैं। उपन्यास में वे मनुष्य को उसकी सामाजिक जटिलता के साथ देखते हैं; सिनेमा में उसी जटिलता को आवाज़ और दृश्य के संक्षिप्त तनाव में बदल देते हैं।

और उनके योगदान का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण शायद उनकी व्यापक लोकप्रियता है। उनका लेखन केवल साहित्यिक पाठकों तक सीमित नहीं रहा। फ़िल्म देखने वाले सामान्य दर्शक तक भी उनकी भाषा पहुँची। इस तरह उन्होंने लेखक की सामाजिक भूमिका का विस्तार किया। एक लेखक पुस्तकालय में बैठकर पाठक से संवाद कर सकता है; राही ने वही संवाद सिनेमाघर के अँधेरे में बैठे हजारों दर्शकों तक पहुँचाया।

लेकिन उन्हें केवल लोकप्रिय संवाद लेखक कह देना भी उनके साथ अन्याय होगा। उनकी साहित्यिक पहचान उनके फ़िल्मी लेखन के भीतर लगातार काम करती रहती है। वह मनुष्य को दृश्य में खोने नहीं देती।

यही कारण है कि राही मासूम रज़ा का सिनेमा में योगदान उनकी फ़िल्मों की सूची से नहीं, बल्कि इस परिवर्तन से समझना चाहिए कि उन्होंने साहित्य की सामाजिक भाषा को सिनेमा की जीवित आवाज़ में कैसे बदला।

उपन्यास में उन्होंने गाँव को बोलने दिया था; सिनेमा में उन्होंने चरित्र को बोलना सिखाया। और जब कोई संवाद चरित्र की आवाज़ बन जाता है, तब वह केवल पटकथा का हिस्सा नहीं रहता, दृश्य की स्मृति बन जाता है।

हाँ। राही मासूम रज़ा के सिनेमा में योगदान को समझने के लिए संवादों के उदाहरण देना उपयोगी है, लेकिन उनके लंबे संवाद उद्धृत करने के बजाय उनके संवाद-शिल्प की छोटी मिसालें देखना बेहतर होगा। मानवता ने कॉपीराइट भी बना रखा है, इसलिए साहित्यिक विश्लेषण के लिए हमें छोटे उद्धरणों पर ही संतोष करना पड़ेगा।

‘मैं तुलसी तेरे आँगन की’ में राही का कौशल इस बात में दिखाई देता है कि पारिवारिक संबंधों और भावनात्मक तनाव को संवाद सीधे बयान नहीं करता, बल्कि पात्रों के व्यवहार और संबोधन से खोलता है। यहाँ संवाद कथानक को आगे बढ़ाने के साथ-साथ रिश्तों की छिपी हुई सत्ता को व्यक्त करता है। राही के उपन्यासकार का लाभ यहाँ स्पष्ट है: उन्हें मालूम है कि परिवार केवल प्रेम का स्थान नहीं, अधिकार और असुरक्षा का भी स्थान है।

‘तवायफ़’ में उनका संवाद-लेखन और अधिक सामाजिक हो जाता है। ‘तवायफ़’ शब्द ही समाज द्वारा स्त्री पर चिपकाए गए एक नाम का प्रतिनिधि है। राही की दृष्टि उस नाम और उस स्त्री के बीच का अंतर खोलती है। चरित्र को उसकी सामाजिक पहचान में बंद करने के बजाय वे उसके भीतर मनुष्य को उपस्थित करते हैं। इसीलिए संवाद केवल कथानक की सूचना नहीं देते, वे सामाजिक नैतिकता पर प्रश्न खड़ा करते हैं।

‘लम्हे’ में उनका योगदान बिल्कुल अलग प्रकार का है। वहाँ संबंधों, समय और भावनात्मक उलझनों को संवादों के माध्यम से ऐसी सहजता दी गई कि संवाद साहित्यिक होकर भी बातचीत से दूर नहीं जाते। यह राही की बड़ी क्षमता थी: गंभीर भाव को सामान्य बोलचाल में रख देना।

लेकिन राही के फ़िल्मी लेखन का सबसे सुंदर उदाहरण शायद किसी एक फ़िल्म के संवाद से नहीं, बल्कि उनके पूरे संवाद-शिल्प से मिलता है। उनका पात्र कभी-कभी एक छोटा-सा वाक्य बोलता है और उस वाक्य के पीछे उसका पूरा सामाजिक इतिहास खड़ा हो जाता है।

मसलन, उनके यहाँ संवाद का ढाँचा प्रायः इस तरह काम करता है:

स्थिति → साधारण कथन → छिपा हुआ अर्थ।

पात्र ऊपर से कुछ सामान्य कहता है, लेकिन दर्शक समझता है कि वह वास्तव में अपनी चोट, भय, प्रेम या सामाजिक असुरक्षा व्यक्त कर रहा है। यही अप्रत्यक्षता उनके संवादों को साहित्यिक गहराई देती है।

और यहाँ आधा गाँव का राही तथा फ़िल्मों का राही एक-दूसरे से मिलते हैं। आधा गाँव में वे सामाजिक संबंधों के भीतर छिपी हुई आवाज़ सुनते हैं; सिनेमा में वही आवाज़ अभिनेता के मुँह से निकलती है।

उनके संवादों की सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि वे ‘बोलने वाले आदमी’ को ‘लिखे हुए पात्र’ पर प्राथमिकता देते हैं। यह बहुत मामूली बात लगती है, लेकिन भारतीय सिनेमा में इसका महत्व बहुत बड़ा है। अनेक बार साहित्यिक संवाद पढ़ने में सुंदर होते हैं, पर अभिनेता उन्हें बोलते हुए अस्वाभाविक लगता है। राही के यहाँ वाक्य बोलने योग्य रहता है।

और यही कारण है कि महाभारत के संवादों में उनकी प्रतिभा अपने चरम पर दिखाई देती है। वहाँ उन्हें अत्यंत प्राचीन कथा को आधुनिक दर्शक की श्रवण-संवेदना में उतारना था। उन्होंने संस्कृतनिष्ठ भव्यता और रोज़मर्रा की समझ में आने वाली भाषा के बीच एक संतुलन बनाया। परिणाम यह हुआ कि महाभारत के पात्र दूर के पौराणिक चरित्र न लगकर बोलते हुए मनुष्य लगे।

इसका सबसे अच्छा प्रमाण यह है कि उनके लिखे हुए अनेक वाक्य लोगों की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गए, जबकि बहुत से दर्शकों को शायद यह भी मालूम नहीं था कि उसके पीछे उपन्यासकार राही मासूम रज़ा का लेखन है।

यहीं उनका सिनेमा और टेलीविज़न वाला योगदान असाधारण बनता है:

उन्होंने संवाद को ‘बातचीत’ से उठाकर ‘चरित्र की आत्मा’ बना दिया।

यही वह बिंदु है जिसे राही पर गंभीर आलोचना में विस्तार से खोलना चाहिए।

।। छः।।

टीवी के संदर्भ में राही मासूम रज़ा का योगदान तो उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का शायद सबसे असाधारण और अभी भी पूरी तरह न आँका गया पक्ष है। महाभारत ने उन्हें केवल लोकप्रिय नहीं बनाया, उसने भारतीय टेलीविजन की भाषा और कथा-क्षमता को ही बदल दिया। 1988 से 1990 के बीच प्रसारित इस धारावाहिक की पटकथा और संवाद उन्होंने लिखे थे। हाल में उपलब्ध उनके निजी अभिलेखों से यह भी पुष्ट हुआ है कि महाभारत की पटकथा और संवाद मूलतः उर्दू में लिखे गए थे।

राही मासूम रज़ा का टेलीविजन में प्रवेश किसी लेखक के माध्यम बदल लेने की साधारण घटना नहीं थी। यह उस समय हुआ जब टेलीविजन भारत में घर के भीतर प्रवेश कर रहा था और उसके पास अभी अपनी कोई परिपक्व कथाभाषा नहीं थी। महाभारत ने उस भाषा को जन्म दिया और राही ने उसके भीतर साहित्य की स्मृति, कविता की लय और संवाद की सामाजिक बुद्धि भर दी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने महाभारत को केवल पुरानी कथा के रूप में नहीं लिखा। उन्होंने उसे बोलने योग्य बनाया। महाकाव्य में जो कुछ वर्णित था, उसे टेलीविजन पर पात्रों के बीच घटित होना था। कथा अब पढ़ी नहीं जा रही थी, वह चेहरे, आवाज़, विराम और संवाद के माध्यम से घरों में घट रही थी। यही वह परिवर्तन था जिसमें राही की साहित्यिक प्रतिभा सबसे अधिक चमकती है।

इसका सबसे विलक्षण उदाहरण आरंभिक सूत्र-वाक्य की अवधारणा है, जिसमें कथा का वक्ता स्वयं ‘समय’ बनता है। राही ने कथा को केवल भूतकाल की घटना न रहने देकर उसे समय की निरंतरता में रख दिया। हाल के अभिलेखीय विवरण में बी. आर. चोपड़ा के संस्मरण के आधार पर बताया गया है कि इसी अवधारणा ने धारावाहिक की पूरी दृष्टि को प्रभावित किया। आरंभ में 52 कड़ियों की स्वीकृति थी, जिसे बाद में 92 कड़ियों तक बढ़ाया गया।

यहाँ राही की मौलिकता समझनी चाहिए। वे महाभारत को देवताओं और राजाओं की कथा भर नहीं बनाते। उनके संवादों में सत्ता, परिवार, स्त्री की स्थिति, उत्तराधिकार, अहंकार, राजधर्म, व्यक्तिगत स्वार्थ और नैतिक दुविधाएँ ऐसी दिखाई देती हैं जैसे वे हमारे अपने समय की समस्याएँ हों। इसी कारण दर्शक पात्रों को केवल पौराणिक पात्रों के रूप में नहीं देखता, उनमें अपने समाज की आकृतियाँ पहचानने लगता है। आलोचनात्मक अध्ययनों ने भी धारावाहिक की लोकप्रियता में राही द्वारा समकालीन प्रश्नों की सूक्ष्म प्रतिध्वनि को महत्वपूर्ण माना है।

उनका दूसरा बड़ा काम था पात्रों को एक ही नैतिक रंग में रंगने से बचाना। महाभारत की शक्ति ही उसके नैतिक धुंधलके में है। कोई पात्र पूर्णतः देवत्व का प्रतिनिधि नहीं और कोई केवल दुष्टता का। राही ने इस जटिलता को संवादों में बचाए रखा। इसलिए पात्र जब बोलते हैं तो केवल कथा आगे नहीं बढ़ती, उनके भीतर का द्वंद्व भी खुलता है। यह टेलीविजन लेखन की बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि दृश्य माध्यम अक्सर चरित्र को कुछ निश्चित गुणों में सीमित कर देता है।

राही की भाषा का चमत्कार भी यहीं दिखाई देता है। वे संस्कृतनिष्ठ भारी भाषा से दर्शक को भयभीत नहीं करते और न ही आधुनिक बोलचाल की ऐसी भाषा अपनाते हैं जिससे महाकाव्य का गरिमामय वातावरण नष्ट हो जाए। उन्होंने दोनों के बीच ऐसी भाषा निर्मित की जिसे सुनकर सामान्य दर्शक अर्थ ग्रहण कर सके और जिसमें प्रसंग की गरिमा भी बनी रहे। यही कारण है कि उनका महाभारत भाषिक रूप से किसी एक वर्ग का धारावाहिक नहीं बना।

और इसके पीछे एक गहरी विडंबना भी है। एक ऐसे लेखक ने, जिसकी अपनी रचनात्मक जड़ें उर्दू में थीं, करोड़ों भारतीयों के घरों में महाभारत की कथा को ऐसी हिंदी में पहुँचाया जिसे वे सहज रूप से अपनी भाषा समझते थे। हाल के अभिलेखीय अनुसंधान ने विशेष रूप से यह तथ्य सामने रखा है कि महाभारत की पटकथा और संवाद भी राही ने उर्दू में लिखे थे। यह तथ्य उनकी भाषिक दृष्टि को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है: भाषा उनके लिए लिपि का प्रश्न नहीं, जीवन के अनुभव का प्रश्न थी।

उनकी टीवी-लेखन क्षमता केवल महाभारत तक सीमित नहीं थी। नीम का पेड़ और विश्वामित्र जैसे धारावाहिकों से भी उनका जुड़ाव रहा। विश्वामित्र के संवाद भी राही ने लिखे थे। अर्थात टेलीविजन उनके लिए आकस्मिक लोकप्रियता का क्षेत्र नहीं था; वे कथा, संवाद और दृश्य माध्यम के संबंध को लगातार साध रहे थे।

लेकिन महाभारत का महत्व अलग है। वहाँ राही ने साहित्य को टेलीविजन में रूपांतरित नहीं किया, बल्कि टेलीविजन को साहित्यिक संवाद की एक नई क्षमता दी। यह अंतर बहुत बड़ा है। उन्होंने दर्शक को यह अनुभव कराया कि गंभीर विचार भी लोकप्रिय माध्यम में बोले जा सकते हैं, बशर्ते वे उपदेश की तरह नहीं, मनुष्य की आवाज़ की तरह आएँ।

यही राही मासूम रज़ा का टीवी में अचूक योगदान है: उन्होंने पौराणिक कथा को आधुनिक संवेदना से जोड़ा, लेकिन उसे आधुनिक बनाने के लिए उसकी आत्मा को नष्ट नहीं किया। उन्होंने संवाद को सूचना से विचार बनाया, विचार को चरित्र बनाया और चरित्र को घर-घर की स्मृति का हिस्सा बना दिया।

इस अर्थ में उपन्यास में उन्होंने जिस गाँव को बोलने दिया था, टेलीविजन में उन्होंने एक पूरे सभ्यतागत आख्यान को बोलने की आवाज़ दी। आधा गाँव में गंगौली बोलता है; महाभारत में भारतीय स्मृति बोलती है।यहाँ राही के टीवी-साहित्य का सबसे बड़ा मूल्य यही है कि उन्होंने लोकप्रियता और साहित्यिकता के बीच कृत्रिम दीवार स्वीकार नहीं की। महाभारत के असाधारण जन-प्रभाव को देखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि वे 1980 के दशक के सबसे प्रभावशाली टेलीविजन पटकथा-लेखकों में थे।

।। सात ।।

महाभारत के दृश्य-श्रव्य संसार में राही मासूम रज़ा की उपस्थिति सबसे पहले भाषा के रूप में दिखाई देती है, लेकिन धीरे-धीरे पता चलता है कि वह केवल भाषा नहीं, पूरी दृश्य-संरचना के भीतर काम कर रही एक चेतना है। महाभारत मूलतः श्रुति और स्मृति की भूमि से आया हुआ आख्यान है। राही ने टेलीविजन पर उसके इस मूल स्वभाव को पहचाना। उन्होंने कथा को केवल दिखने वाली वस्तु नहीं बनने दिया; उसे सुनाई देने वाला अनुभव बनाया।

टेलीविजन पर किसी पात्र का चेहरा उसके बारे में बहुत कुछ कह सकता है, लेकिन उसकी आवाज़ उसके भीतर का वह हिस्सा खोलती है जिसे चेहरा छिपाए रखता है। राही ने इसी अंतर को पकड़ा। उनके यहाँ संवाद पात्र के मुँह में रखा हुआ वाक्य नहीं है, बल्कि चरित्र की मानसिक और सामाजिक स्थिति का विस्तार है। इसलिए भीष्म, कृष्ण, दुर्योधन, कर्ण, द्रौपदी या धृतराष्ट्र केवल अपने-अपने चरित्रगत गुणों के प्रतिनिधि बनकर नहीं बोलते; बोलते हुए वे अपने समय, अपनी इच्छा और अपनी असमर्थता को भी प्रकट करते हैं।

दृश्य और श्रव्य का यह संबंध विशेष रूप से महाभारत के नैतिक द्वंद्वों में दिखाई देता है। कोई दृश्य केवल यह नहीं बताता कि युद्ध होने वाला है; संवाद उस युद्ध के भीतर छिपे हुए प्रश्न को सामने लाता है। कोई पात्र केवल क्रोधित दिखाई नहीं देता, उसकी भाषा यह बताती है कि क्रोध के नीचे अपमान है, भय है, अधिकार-बोध है या असुरक्षा। इस तरह राही दृश्य को मनोवैज्ञानिक गहराई और संवाद को दृश्यात्मक संदर्भ देते हैं।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह थी कि उन्होंने संवाद को दृश्य का प्रतिद्वंद्वी नहीं बनने दिया। खराब टेलीविजन लेखन में पात्र वह बोलता है जो दर्शक पहले ही देख चुका होता है। राही इस खतरे से बचते हैं। दृश्य एक बात दिखाता है और संवाद उसके भीतर छिपी दूसरी बात खोलता है। यही दृश्य-श्रव्य लेखन का वास्तविक कौशल है। आँख और कान एक ही सूचना नहीं पाते; दोनों मिलकर एक तीसरा अर्थ निर्मित करते हैं।

महाभारत में कथावाचन की संरचना भी इसी कारण महत्वपूर्ण हो जाती है। कथा केवल पात्रों के वर्तमान में नहीं घटती; वह स्मृति, इतिहास और समय के भीतर घटती है। ‘समय’ को कथा की चेतना के रूप में उपस्थित करने की कल्पना ने पूरे धारावाहिक को एक विशेष दूरी दी। घटनाएँ हमारे सामने घटती हैं, लेकिन उनके ऊपर एक ऐसी दृष्टि बनी रहती है जो जानती है कि मनुष्य अपने वर्तमान को इतिहास समझकर नहीं, जीते हुए वर्तमान के रूप में भोगता है। राही ने इस तनाव को श्रव्य बनाया।

यहाँ उनकी साहित्यिक दृष्टि टेलीविजन की तकनीक से मिलती है। कैमरा शरीर को दिखाता है, आवाज़ मनुष्य को खोलती है। युद्ध दिखाई देता है, लेकिन युद्ध की नैतिक कीमत संवाद से सुनाई देती है। राजसभा दिखाई देती है, लेकिन सत्ता का चरित्र भाषा से प्रकट होता है। संबंध दृश्य में उपस्थित होते हैं, लेकिन संबंधों की दरार आवाज़ में सुनाई देती है।

राही की भाषा इस दृश्य-श्रव्य संसार में एक और काम करती है। वह प्राचीन कथा को संग्रहालय की वस्तु बनने से रोकती है। पात्र बहुत पुराने हैं, लेकिन उनकी बोलने की ऊर्जा मृत नहीं है। भाषा में गरिमा है, पर जड़ता नहीं; उसमें महाकाव्य का विस्तार है, पर रोजमर्रा की मनुष्यगत बेचैनी भी है। यही कारण है कि दर्शक उन्हें केवल अतीत के पात्रों की तरह नहीं सुनता।

इस दृष्टि से राही का महाभारत भारतीय टेलीविजन में एक महत्त्वपूर्ण भाषिक प्रयोग भी था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि जनमाध्यम की भाषा को सरल होने के लिए सपाट होना आवश्यक नहीं। वह सुबोध भी हो सकती है और बहुस्तरीय भी। संवाद सुनते समय तत्काल समझ में आ सकता है, लेकिन उसका अर्थ दृश्य समाप्त होने के बाद भी मन में काम करता रह सकता है।

और यही राही की विशिष्टता है। वे दृश्य के पीछे छिपे हुए मनुष्य को सुनते हैं। उनके लिए कैमरा केवल शरीर को पकड़ता है; संवाद उस शरीर के भीतर चल रहे इतिहास को पकड़ता है।

इसलिए महाभारत के दृश्य-श्रव्य रूप में राही मासूम रज़ा को केवल संवाद-लेखक कहना उनकी भूमिका को छोटा करना होगा। वे उस पूरी प्रक्रिया के साहित्यिक वास्तुकारों में थे जिसमें दृश्य ने शरीर दिया, आवाज़ ने चेतना दी और संवाद ने स्मृति को वर्तमान बना दिया।

महाभारत उनके लिए केवल लिखी हुई कथा का टेलीविजन रूप नहीं था। वह भारतीय आख्यान की उस पुरानी श्रव्य परंपरा का आधुनिक पुनराविष्कार था, जिसमें कथा पहले आँखों के सामने नहीं, मनुष्य की आवाज़ में जन्म लेती है। राही ने उसी आवाज़ को कैमरे के युग में फिर से जीवित किया।

।। आठ ।।

राही मासूम रज़ा को पढ़ना किसी लेखक को पढ़ना नहीं, भारतीय मनुष्य की उस आवाज़ को सुनना है जो इतिहास के शोर में बार-बार दब जाती है। उनके यहाँ साहित्य का केंद्रीय प्रश्न यह नहीं है कि इतिहास में क्या घटा, बल्कि यह है कि इतिहास जब घटता है तो वह मनुष्य के भीतर क्या छोड़ जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ गंगौली, आधा गाँव, राही की भाषा, उनका सिनेमा और महाभारत एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

गंगौली उनके लिए कोई गाँव नहीं, स्मृति की वह प्रयोगशाला है जहाँ मनुष्य और इतिहास आमने-सामने आते हैं। गाँव टूटता है तो केवल घर नहीं टूटते; संबोधन बदलते हैं, रिश्तों का अर्थ बदलता है, विश्वासों की पुरानी जमीन खिसकती है और भाषा के भीतर छिपी हुई एक पूरी दुनिया धीरे-धीरे विलुप्त होने लगती है। इसीलिए आधा गाँव की आंचलिकता दृश्य-सज्जा नहीं है। वह जीवन के विघटन की संरचना है। राही अंचल को इतना भीतर तक ले जाते हैं कि वह भूगोल से उठकर मनुष्य की आत्मिक नियति बन जाता है।

यहीं से उनकी भाषा का रहस्य खुलता है। राही की भाषा किसी भाषिक नीति का परिणाम नहीं है। वह उस जीवन की स्वाभाविक आवाज़ है जिसमें अनेक सांस्कृतिक धाराएँ बिना किसी घोषणा के साथ-साथ बहती हैं। उनके यहाँ भाषा पहचान पूछने से पहले मनुष्य को पहचानती है। एक शब्द केवल शब्द नहीं रहता, उसके पीछे पूरा सामाजिक इतिहास आ जाता है। संबोधन में आत्मीयता है, व्यंग्य में सामाजिक दूरी है, मुहावरे में पीढ़ियों की स्मृति है और मौन में कभी-कभी पूरी त्रासदी।

इसलिए राही की भाषा को केवल हिंदी-उर्दू के मेल के रूप में देखना उसके गहरे अर्थ को कम कर देना होगा। वह मूलतः साझे जीवन की भाषा है। उसकी शक्ति इस बात में है कि वह मनुष्य को उसकी घोषित पहचान से अधिक उसके जीए हुए संबंधों में पकड़ती है। यही कारण है कि राही का भाषिक संसार विभाजन की राजनीति के भीतर भी मनुष्य की साझा स्मृति को बचाए रखता है।

उनका साहित्य इतिहास को बाहर से नहीं देखता। इतिहास उनके पात्रों के घरों में प्रवेश करता है। वह भोजन की मेज पर बैठता है, रिश्तों के बीच आता है, संपत्ति और उत्तराधिकार के प्रश्न उठाता है, प्रेम को प्रभावित करता है और अंततः व्यक्ति से यह पूछता है कि वह स्वयं को किस नाम से पहचाने। इस अर्थ में राही के यहाँ इतिहास कोई विशाल पृष्ठभूमि नहीं, व्यक्तिगत जीवन में घटने वाली घटना है।

यही उनकी भारतीय उपन्यास परंपरा में असाधारण स्थिति बनाती है। उन्होंने बड़े राजनीतिक प्रश्न को छोटे मनुष्य की नियति में रूपांतरित किया। उनके यहाँ राष्ट्र किसी भाषण में नहीं, पड़ोस में दिखाई देता है; समुदाय किसी आँकड़े में नहीं, रिश्तों में दिखाई देता है; विभाजन किसी नक्शे पर नहीं, स्मृति में दिखाई देता है। इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह नक्शे पर एक रेखा खींचकर समाप्त हो जाता है, लेकिन मनुष्य के भीतर वह रेखा पीढ़ियों तक बनी रहती है।

सिनेमा में राही इसी मनुष्य को आवाज़ देते हैं। यहाँ उनके सामने एक दूसरी चुनौती थी। उपन्यास में लेखक वर्णन कर सकता है, भीतर उतर सकता है, स्मृति को विस्तार दे सकता है; पर्दे पर यह सब संभव नहीं। वहाँ चेहरा है, देह है, दृश्य है और सबसे बढ़कर आवाज़ है। राही ने समझ लिया था कि संवाद तभी सार्थक है जब वह पात्र की सामाजिक स्थिति और उसके भीतर के छिपे हुए तनाव दोनों को एक साथ वहन करे। इसलिए उनके संवाद केवल बोले नहीं जाते, चरित्र के भीतर से निकलते हुए प्रतीत होते हैं।

टेलीविजन पर यह क्षमता अपने सबसे व्यापक रूप में प्रकट होती है। महाभारत में राही के सामने केवल एक प्राचीन कथा को आधुनिक दर्शक तक पहुँचाने का प्रश्न नहीं था। प्रश्न यह था कि हजारों वर्षों से स्मृति में जीवित कथा जब लाखों घरों में दृश्य-श्रव्य अनुभव बनकर पहुँचेगी तो उसकी आत्मा कैसे बची रहेगी। उन्होंने इसका उत्तर भाषा में खोजा।

महाभारत में दृश्य आँख को कथा देता है, लेकिन संवाद उसे विवेक देता है। राजसभा दिखाई देती है, पर सत्ता का अर्थ संवाद खोलता है। युद्ध दिखाई देता है, पर युद्ध की नैतिक कीमत शब्दों में सुनाई देती है। पात्र सामने खड़े हैं, लेकिन उनके भीतर का इतिहास उनकी आवाज़ से प्रकट होता है। इस प्रकार राही ने दृश्य और श्रव्य को दो अलग माध्यमों की तरह नहीं, एक ही अर्थ-रचना के दो पक्षों की तरह बरता।

और यहाँ राही की सबसे गहरी विशेषता सामने आती है: उन्होंने माध्यम बदला, मनुष्य नहीं।

गंगौली में मनुष्य इतिहास के सामने खड़ा है। उपन्यास में वही मनुष्य स्मृति के भीतर बोलता है। सिनेमा में वही आवाज़ देह और अभिनय के साथ दृश्य बनती है। महाभारत में वही आवाज़ हजारों वर्षों की सांस्कृतिक स्मृति को वर्तमान में पुनः उपस्थित करती है। अलग-अलग माध्यमों के भीतर दिखाई देने वाला यह परिवर्तन वास्तव में एक ही रचनात्मक चेतना की निरंतरता है।

राही की रचनात्मकता का सबसे बड़ा प्रमाण शायद यह नहीं कि उन्होंने कितनी विधाओं में लिखा, बल्कि यह है कि हर माध्यम में उन्होंने मनुष्य की जटिलता को सरल होने से बचाया। लोकप्रियता के दबाव में चरित्र प्रायः अच्छे और बुरे में बाँट दिए जाते हैं, इतिहास विजेताओं और पराजितों में, समाज समुदायों में और भाषा खेमों में। राही इन आसान विभाजनों से असहमत लेखक हैं। उनके पात्र अपने समय की तरह ही मिश्रित, विरोधाभासी और अपूर्ण हैं। उनमें प्रेम भी है, स्वार्थ भी; आस्था भी है, संशय भी; स्मृति भी है, विस्मृति भी।

यही कारण है कि राही की रचनाएँ आज भी केवल पढ़ी नहीं जातीं, उनसे संवाद किया जाता है। वे हमें तैयार निष्कर्ष नहीं देते; वे हमारी अपनी स्मृतियों, पूर्वाग्रहों और पहचानों को प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर देते हैं।

उनकी सबसे बड़ी विरासत इसलिए कोई एक उपन्यास, कोई एक संवाद या कोई एक धारावाहिक नहीं है। उनकी वास्तविक विरासत मनुष्य को उसकी बहुस्तरीयता में देखने की दृष्टि है। उन्होंने दिखाया कि किसी समाज को समझना उसके घोषणापत्रों को पढ़ना नहीं, उसकी बोली सुनना है; उसके इतिहास को समझना केवल घटनाएँ जानना नहीं, यह देखना है कि वे घटनाएँ घरों के भीतर कैसे उतरती हैं; और किसी संस्कृति को समझना उसके प्रतीकों को गिनना नहीं, उसकी स्मृतियों में प्रवेश करना है।

इस दृष्टि से राही मासूम रज़ा भारतीय साहित्य में एक सेतु नहीं, बल्कि एक गहरी सतत धारा हैं। गाँव से शहर तक, उर्दू से हिंदी तक, साहित्य से सिनेमा तक, सिनेमा से टेलीविजन तक और अतीत से वर्तमान तक उनकी यात्रा में कोई कृत्रिम छलाँग नहीं है। हर नया माध्यम उनकी पिछली संवेदना को एक नया शरीर देता है।

और शायद इसी कारण राही को पढ़ते हुए अंत में लेखक पीछे चला जाता है और आवाज़ बची रह जाती है। वह आवाज़ गंगौली की भी है, बिछड़ते हुए घरों की भी, भाषा की भी, पर्दे पर बोलते चरित्रों की भी और उस विराट कथा की भी जिसे भारतीय स्मृति ने सहस्राब्दियों से सँजोया है।

राही मासूम रज़ा का साहित्य इसी आवाज़ की रक्षा का साहित्य है। उन्होंने इतिहास को मनुष्य से बड़ा नहीं होने दिया। यही उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक विजय है।


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