— राजगोपाल सिंह वर्मा —
मधु लिमये भारतीय जनतंत्र के उन गिने-चुने वैचारिक योद्धाओं में थे, जिन्होंने विचारधारा के साथ नीति, और राजनीति के साथ सिद्धांत के समन्वय की आवश्यकता को बार-बार रेखांकित किया। वे विचारों की निर्भीकता और ऐतिहासिक अंतर्दृष्टि के लिए जाने जाते थे। आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) पर उनके विचार इसी चिंतनशील व्यक्तित्व का प्रतिबिंब है।
मधु लिमये स्पष्ट करते हैं कि संघ की दृष्टि में भारत एक ‘हिंदू राष्ट्र’ है, जिसमें मुसलमान और ईसाई ‘बाहरी’ माने जाते हैं, अर्थात जिन्हें इस भूखंड का प्राचीन उत्तराधिकारी नहीं माना जाता। यह विचार उनके लिए अस्वीकार्य था क्योंकि यह भारत के संविधान, स्वतंत्रता आंदोलन की भावना और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों का विरोध करता है। लिमये के अनुसार, आरएसएस का राष्ट्रवाद ‘वर्गीय’ और ‘सांस्कृतिक रूप से एकांगी’ है। यह राष्ट्र को हिन्दू धर्म और संस्कृति की संकीर्ण परिभाषा तक सीमित करता है, जिससे देश की विविधता, बहुलता और धर्मनिरपेक्षता का क्षरण होता है। वे यह भी चेतावनी देते हैं कि यह विचारधारा अंततः बहुसंख्यकवाद को वैधता देती है जो लोकतंत्र की आत्मा के लिए खतरनाक है।
मधु लिमये मानते हैं कि आरएसएस हिंदुत्व के नाम पर एकरूपता की राजनीति करता है। उसके लिए भारत की पहचान एक ऐसे ‘संस्कृतिक खाँचे’ से तय होती है जिसमें सभी को ढलना पड़ता है, चाहे वह भाषा, पूजा-पद्धति, पहनावा या इतिहासबोध हो। वे इस विचार का विरोध करते हैं और लिखते हैं कि “भारत एक संलयन है, एक संगम है, न कि एक रंग।” वे संघ की इस प्रवृत्ति को ‘ब्राह्मणीय एकाधिकारवादी’ दृष्टिकोण से भी जोड़ते हैं, जिसमें विविध परंपराओं, लोकदेवताओं, क्षेत्रीय धार्मिक संस्कृतियों और जनजातीय परंपराओं के लिए कोई स्थान नहीं होता। संघ का हिंदुत्व उन परंपराओं का निषेध करता है जो उसके वैदिक अनुशासन के बाहर हैं।
लिमये इंगित करते हैं कि संघ और भारतीय जनता पार्टी के बीच जो संबंध है, वह अब केवल विचारों तक सीमित नहीं रहा। संघ अब सत्ता प्राप्ति की परियोजना में एक मुख्य यंत्र बन चुका है। वे कहते हैं कि संघ अपनी ‘गैर-राजनीतिक संस्था’ की छवि को बचाकर रखते हुए भी राजनीतिक प्रभाव का अधिकतम उपयोग करता है। यह दोहरी भूमिका भारतीय लोकतंत्र के लिए चुनौती बन गई है क्योंकि इससे जवाबदेही का अभाव उत्पन्न होता है।
मधु लिमये बार-बार इस बात पर बल देते हैं कि भारत केवल बहुसंख्यक समुदाय की इच्छाओं पर आधारित नहीं हो सकता। मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध; ये सब इस देश के नागरिक हैं, और उन्हें ‘दूसरा’ मानना संविधान के साथ विश्वासघात है। वे आरएसएस के उस तर्क को सिरे से खारिज करते हैं जिसमें यह कहा जाता है कि मुसलमानों को ‘सामूहिक प्रायश्चित’ करना चाहिए या ‘अपने पूर्वजों की भूमि की निष्ठा’ सिद्ध करनी चाहिए। लिमये पूछते हैं कि क्या यही मानदंड सिखों, बौद्धों या पारसियों पर लागू होगा? क्या यह भारतीय राष्ट्रीयता के लिए योग्य विचार है?
लिमये संघ की शिक्षा प्रणाली, इतिहास-बोध और विचार निर्माण की प्रक्रियाओं की भी आलोचना करते हैं। वे कहते हैं कि संघ का लक्ष्य ‘इतिहास का पुनर्लेखन’ है जिसमें मुगलों, अंग्रेजों, और स्वतंत्रता संग्राम की समावेशी धाराओं को मिटाकर केवल ‘हिंदू नायकों’ की गाथा प्रस्तुत की जाती है। यह इतिहास नहीं, बल्कि एक प्रकार का मिथकीय राजनीतिक हथियार है जिसे भावनात्मक उभार के लिए प्रयोग किया जाता है।
वे गांधी की हत्या और सावरकर के विचारों को भी इस संदर्भ में विश्लेषित करते हैं। गांधी की हत्या को ‘राजनीतिक वध’ कहते हुए वे इसे आरएसएस की वैचारिक जमीन का अनिवार्य परिणाम बताते हैं, भले ही संघ ने प्रत्यक्ष रूप से इसे स्वीकार न किया हो। लिमये संघ की ‘एक भाषा, एक राष्ट्र, एक धर्म’ की अवधारणा को ‘जनविरोधी’ और ‘संविधान-विरोधी’ मानते हैं। उनके अनुसार, यह विचार न केवल भारत की बहुभाषिकता, बहुधार्मिकता, बल्कि लोकतांत्रिक विविधता का भी अपमान है। वे बार-बार भारतीय संविधान को ‘राष्ट्र की आत्मा’ कहकर उसका पक्ष लेते हैं। संघ विचारधारा के जरिए एक ऐसी पीढ़ी को तैयार कर रहा है जो तर्क, बहस और संवाद की परंपरा से दूर होती जा रही है और उसकी जगह अंध-भक्ति, नायक-पूजा और संदेहात्मक राष्ट्रवाद ने ले ली है।
लिमये चेतावनी देते हैं कि यदि आरएसएस के विचार पूरी तरह से राजनीतिक सत्ता में समाहित हो गए जैसा कि भारतीय जनता पार्टी के माध्यम से होता दिखाई देता है तो भारत एक ‘बहुसंख्यक तानाशाही’ की ओर बढ़ेगा। वह एक ऐसा देश बन जाएगा जहाँ असहमति देशद्रोह मानी जाएगी, अल्पसंख्यक नागरिकता के दोयम दर्जे में रहेंगे, और न्याय व्यवस्था तक प्रभावित होगी। वे इसे ‘लोकतंत्र का धीरे-धीरे गला घोंटना’ कहते हैं यह एक ऐसी प्रक्रिया होगी जो खुले सैन्य शासन के बजाय विचारधारा के नियंत्रण से होती है।
लिमये यह भी इंगित करते हैं कि संघ आज भी यह स्पष्ट नहीं करता कि वह किस प्रकार का भारत चाहता है। उसका कोई लिखित संविधान नहीं है, न ही कोई पारदर्शी आंतरिक संरचना। उसकी बैठकों, निर्णय प्रक्रियाओं, और प्रचार सामग्री में गुप्तता रहती है। यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता है, क्योंकि एक संगठन जो पूरे देश को प्रभावित कर रहा है, वह स्वयं किसी प्रकार की सार्वजनिक समीक्षा या नियंत्रण के अधीन नहीं है।
मधु लिमये की लेखनी केवल भारतीय लोकतंत्र को बचाने के लिए आलोचना नहीं, चेतावनी है। वे कोई साम्यवादी, नास्तिक या धार्मिक विरोधी नहीं हैं; वे एक समाजवादी हैं जिनकी दृष्टि में भारत ‘विविधता में एकता’ का जीवंत प्रयोग है। उनका विरोध संघ से नहीं, संघ के उस विचार से है जो भारत को ‘एक धर्म, एक जाति, एक भाषा’ में बदल देना चाहता है। उनके शब्दों में “यह देश सभी का है। अगर यह केवल एक समुदाय का हुआ, तो वह न भारत रहेगा, न गणराज्य।”
(मेरी पुस्तक “मधु लिमए: प्रतिरोध का परचम’ का एक संपादित अंश)
Discover more from समता मार्ग
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


















