— परिचय दास —
सुबह मैंने गांधी को देखा। वे लौटे थे। न कोई जुलूस था, न कोई घोषणा। न आकाश से कोई दिव्य प्रकाश उतरा था, न किसी अखबार के पहले पन्ने पर खबर छपी थी। गांधी हमेशा की तरह चुपचाप आए थे। मनुष्य जब सचमुच लौटता है, तो शायद इसी तरह लौटता है।
उनके हाथ में वही लाठी थी।
मैंने पूछा, “बापू, आप फिर क्यों आए?”
उन्होंने कहा, “तुम लोगों ने बुलाया था।”
“हमने?”
“हर साल दो अक्तूबर को।”
मैंने कहा, “वह तो एक औपचारिकता है।”
वे मुस्कराए।
“मनुष्य की सबसे बड़ी विचित्रता यही है। वह जिसे औपचारिकता समझकर करता है, कभी-कभी वही उसकी सबसे गहरी पुकार होती है।”
मैं उन्हें लेकर शहर की ओर चल पड़ा।
सड़क पर कारें थीं, मोटरसाइकिलें थीं, बसें थीं। हॉर्न थे। जल्दी थी। हर आदमी कहीं पहुँचने की जल्दी में था।
गांधी कुछ देर सड़क के किनारे खड़े रहे।
“तुम लोग बहुत तेज़ हो गए हो।”
“जी।”
“कहाँ पहुँच रहे हो?”
मैंने कहा, “आगे।”
उन्होंने पूछा, “आगे कहाँ?”
मैं चुप रहा।
वे हँसे नहीं।
बस बोले, “दिशा के बिना गति कभी-कभी बहुत सुंदर दुर्घटना होती है।”
हम आगे बढ़े।
एक युवक मोबाइल में डूबा हुआ था। चलते-चलते भी उसकी आँखें स्क्रीन पर थीं।
गांधी ने पूछा, “यह क्या है?”
“मोबाइल।”
“इसमें क्या है?”
“पूरी दुनिया।”
गांधी ने युवक से पूछा, “और तुम्हारे पास जो आदमी खड़ा है, वह?”
युवक ने सिर उठाकर देखा। फिर मोबाइल में लौट गया।
गांधी ने मेरी ओर देखा।
“दुनिया सचमुच बहुत छोटी हो गई है।”
मैंने कहा, “यह तो अच्छी बात है।”
“हाँ,” उन्होंने कहा, “लेकिन ध्यान रखना, कहीं पड़ोसी से दूरी कम करने की जगह दुनिया तक पहुँचने की सुविधा ने पड़ोसी को और दूर न कर दिया हो।”
मैंने पूछा, “आप आज सोशल मीडिया पर होते तो?”
“पहले देखता कि वहाँ मनुष्य हैं या केवल उनकी आवाज़ें।”
“और अगर कोई आपको गाली देता?”
“मैं पढ़ता।”
“फिर?”
“सोचता।”
“फिर?”
“यदि उसमें सत्य होता तो उससे सीखता। यदि असत्य होता तो उसे अपने भीतर जगह न देता।”
मैंने कहा, “आज लोग असहमति को सहन नहीं करते।”
गांधी बोले, “तुमने असहमति को शत्रुता का दूसरा नाम बना दिया है।”
हम आगे बढ़े।
एक विश्वविद्यालय आया।
छात्र दौड़ रहे थे। कोई परीक्षा की तैयारी कर रहा था, कोई नौकरी की। कोई विदेश जाने का सपना देख रहा था।
गांधी ने पूछा, “यहाँ क्या पढ़ाया जाता है?”
मैंने कहा, “ज्ञान।”
उन्होंने पूछा, “और जीवन?”
मैंने कहा, “वह तो घर से सीखते हैं।”
“फिर विश्वविद्यालय क्या करता है?”
मैंने कहा, “डिग्री देता है।”
वे कुछ देर चुप रहे।
“डिग्री आदमी के हाथ में कागज रख सकती है,” उन्होंने कहा, “लेकिन शिक्षा उसके भीतर मनुष्य रखती है।”
मैंने कहा, “आज शिक्षा का उद्देश्य रोजगार भी है।”
“रोजगार आवश्यक है।”
“फिर?”
“लेकिन केवल रोजगार के लिए पढ़ा हुआ मनुष्य अपने काम का अच्छा कर्मचारी बन सकता है; अच्छा मनुष्य बनने के लिए उसे अपने भीतर भी पढ़ना पड़ता है।”
हम विश्वविद्यालय की पुस्तकालय में चले गए।
गांधी ने किताबों की कतार देखी।
एक किताब उठाई।
“तुम्हारे पास किताबें बहुत हैं।”
मैंने कहा, “हाँ।”
“पढ़ने वाले?”
मैंने कहा, “वे भी हैं।”
उन्होंने मुस्कराकर पूछा, “समझने वाले?”
मैं फिर चुप हो गया।
वे किताब वापस रखकर आगे बढ़े।
रास्ते में एक मॉल था।
शीशे की दीवारों के भीतर रोशनी चमक रही थी।
गांधी ने पूछा, “यह बाजार है?”
“जी।”
“लोग यहाँ क्या लेने आते हैं?”
“जरूरत की चीज़ें।”
उन्होंने भीतर देखा।
“और जो जरूरत की नहीं हैं?”
“वे भी लेते हैं।”
“क्यों?”
मैंने कहा, “इच्छा।”
गांधी बोले, “इच्छा मनुष्य की शत्रु नहीं है। लेकिन इच्छा जब आवश्यकता का रूप धारण कर ले, तब बाजार केवल वस्तुएँ नहीं बेचता, वह मनुष्य को उसकी अपनी कमी का एहसास बेचता है।”
मैंने कहा, “लेकिन बाजार से समृद्धि आती है।”
“आनी चाहिए।”
“फिर समस्या?”
“समस्या तब है जब समृद्धि का अर्थ वस्तुओं की संख्या हो जाए और जीवन का अर्थ उन्हें पाने की दौड़।”
हम मॉल से बाहर आ गए।
सामने एक किसान बैठा था।
उसके हाथ मिट्टी से भरे थे।
गांधी उसके पास जाकर बैठ गए।
“कितना अन्न उगाते हो?”
किसान ने बताया।
“और कितना बचता है?”
किसान चुप रहा।
गांधी ने उसकी हथेली देखी।
“यह हाथ भारत की सबसे बड़ी किताब है।”
मैंने पूछा, “बापू, आज किसान के पास तकनीक है, मशीनें हैं, बाजार है।”
उन्होंने कहा, “अच्छा है। लेकिन तकनीक का लाभ उस हाथ तक पहुँचना चाहिए जिसने मिट्टी को अन्न में बदला है।”
उन्होंने मिट्टी उठाई।
“मनुष्य जमीन से दूर होकर समृद्ध हो सकता है, लेकिन बहुत देर तक स्वस्थ नहीं रह सकता।”
आगे एक नदी थी।
उसका पानी पहले जैसा नहीं था।
गांधी किनारे बैठ गए।
“यह नदी बीमार है।”
मैंने कहा, “नदियाँ भी बीमार होती हैं?”
उन्होंने मेरी ओर देखा।
“जब नदी में बीमारी दिखाई दे और मनुष्य स्वस्थ होने का दावा करे, तब बीमारी नदी में है या सभ्यता में?”
मैं कुछ नहीं कह सका।
उन्होंने पानी को छुआ।
“तुमने प्रकृति को संसाधन कह दिया है। वह तुम्हारी भाषा की पहली भूल है। माँ को संसाधन कहोगे तो एक दिन घर भी गोदाम लगने लगेगा।”
हम आगे बढ़े।
एक सरकारी कार्यालय के बाहर लंबी कतार थी।
गांधी ने पूछा, “यह क्या है?”
“लोग अपने काम के लिए आए हैं।”
“काम जल्दी होता है?”
“कभी-कभी।”
“और देर?”
“अधिकतर।”
उन्होंने पूछा, “देर क्यों?”
मैंने कहा, “व्यवस्था।”
उन्होंने कहा, “व्यवस्था मनुष्य के लिए होती है। यदि मनुष्य व्यवस्था के लिए खड़ा रहे, तो कहीं कुछ उलट गया है।”
भीतर से एक अधिकारी निकला।
गांधी ने उसे देखा।
“सत्ता क्या है?”
अधिकारी ने कहा, “जिम्मेदारी।”
गांधी मुस्कराए।
“आपने सही उत्तर दिया। अब इसे अपने कमरे में लिखकर मत रखिए। बाहर जाकर भी पढ़िए।”
हम एक अस्पताल के सामने पहुँचे।
लोग कतार में थे।
किसी के हाथ में पर्ची थी, किसी की गोद में बच्चा।
गांधी बहुत देर तक देखते रहे।
“सभ्यता की परीक्षा कहाँ होती है, जानते हो?”
मैंने कहा, “विश्वविद्यालय में?”
“नहीं।”
“संसद में?”
“नहीं।”
“कहाँ?”
उन्होंने अस्पताल की ओर इशारा किया।
“जहाँ कमजोर आदमी सहायता माँगने आता है।”
फिर बोले, “जिस समाज में गरीब आदमी को इलाज के लिए अपनी गरिमा बेचनी पड़े, वहाँ बड़ी इमारतें सभ्यता का प्रमाण नहीं देतीं।”
दोपहर बाद हम एक साहित्यिक कार्यक्रम में पहुँचे।
मंच पर लेखक थे। भाषण थे। पुरस्कार थे। तालियाँ थीं।
गांधी पीछे बैठ गए।
एक लेखक ने कहा, “साहित्य समाज को बदलता है।”
गांधी ने पूछा, “पहले लेखक को बदलता है?”
लेखक चुप हो गया।
गांधी बोले, “जिस शब्द से लेखक स्वयं नहीं काँपता, वह दूसरे को कितनी देर तक जगाएगा?”
मैंने पूछा, “तो साहित्य का उद्देश्य क्या है?”
“उद्देश्य?”
उन्होंने जैसे शब्द को परखा।
“साहित्य का पहला काम शायद यह है कि वह मनुष्य को दूसरे मनुष्य के भीतर प्रवेश करने की क्षमता दे।”
मैंने कहा, “और सुंदरता?”
उन्होंने कहा, “सत्य यदि सुंदरता से बिल्कुल अलग हो जाए तो वह उपदेश बन सकता है। सुंदरता यदि सत्य से अलग हो जाए तो वह सजावट।”
मैंने पूछा, “तो कविता?”
वे मुस्कराए।
“कविता वह है जहाँ शब्द समाप्त होने के बाद भी कुछ देर मनुष्य के भीतर बोलता रहे।”
शाम को हम एक मंदिर के पास से गुजरे। थोड़ी दूर मस्जिद थी। आगे गुरुद्वारा।
गांधी रुक गए।
“धर्म कहाँ है?”
मैंने कहा, “इन सब जगहों में।”
उन्होंने कहा, “और मनुष्य में?”
“वहाँ भी।”
“फिर मनुष्य को धर्म के लिए मनुष्य से लड़ने की आवश्यकता क्यों पड़ती है?”
मैंने कहा, “पहचान।”
उन्होंने कहा, “पहचान आवश्यक है। लेकिन पहचान यदि मनुष्य को बड़ा करने के बजाय दूसरे को छोटा करने लगे तो वह आस्था नहीं, अहंकार की छाया है।”
मैंने पूछा, “क्या धर्म के बिना संस्कृति बच सकती है?”
उन्होंने कहा, “संस्कृति धर्म से बड़ी नहीं, लेकिन केवल धर्म तक सीमित भी नहीं। भाषा, स्मृति, संगीत, भोजन, करुणा, पड़ोसी का दुख, अतिथि के लिए खुलता हुआ दरवाजा—इन सबमें संस्कृति का थोड़ा-थोड़ा घर है।”
“और सभ्यता?”
“सभ्यता तुम्हारे पास क्या है, यह बताती है। संस्कृति बताती है कि तुम उसके साथ करते क्या हो।”
रात हो गई।
हम एक चौराहे पर बैठे।
वहाँ चुनाव का बड़ा-सा पोस्टर लगा था।
मैंने कहा, “बापू, राजनीति बहुत बदल गई है।”
उन्होंने कहा, “राजनीति बदली है या मनुष्य?”
“दोनों।”
“क्या राजनीति में अब भी सत्य की जगह है?”
मैंने कहा, “है, लेकिन कठिन है।”
“सत्य कभी आसान था?”
मैं चुप रहा।
उन्होंने कहा, “लोकतंत्र में सबसे कठिन काम मतदान नहीं है। उससे पहले अपने मन को भीड़ से बचाना है।”
मैंने पूछा, “भीड़ से?”
“हाँ। भीड़ में मनुष्य अपनी जिम्मेदारी किसी और के कंधे पर रख देता है।”
“और नेता?”
“नेता भी मनुष्य ही होते हैं। उन्हें देवता मत बनाओ।”
“क्यों?”
“क्योंकि देवता की आलोचना नहीं की जाती और मनुष्य की करनी चाहिए।”
मैंने पहली बार गौर से उनकी ओर देखा।
उन्होंने कहा, “लोकतंत्र में नागरिक की सबसे बड़ी शक्ति उसकी असहमति है, लेकिन असहमति में भी दूसरे की मनुष्यता बची रहनी चाहिए।”
रात और गहरी हो गई।
मैंने उनसे आखिरी प्रश्न पूछा।
“बापू, आपने इतने वर्षों बाद आज का भारत देखा। आपको क्या सबसे अधिक बदलता दिखाई दिया?”
वे बहुत देर तक चुप रहे।
फिर बोले—
“तुम लोगों ने बहुत कुछ पा लिया है।”
मैंने पूछा, “और खोया?”
उन्होंने मेरी ओर देखा।
“यह तुम अपने भीतर देखो।”
मैंने कहा, “आप बताइए।”
वे धीरे-धीरे उठे।
“तुम्हारी सभ्यता बहुत दूर तक पहुँच गई है। अब उसे अपने भीतर भी पहुँचना है।”
उन्होंने लाठी उठाई।
“तुम्हारे पास दुनिया से बात करने के हजारों साधन हैं। अब किसी एक मनुष्य का दुख सुनने की आदत डालो।”
वे चल पड़े।
मैं पीछे-पीछे गया।
“बापू!”
उन्होंने मुड़कर देखा।
“एक बात और।”
“कहो।”
“आज के मनुष्य के लिए आपकी सबसे बड़ी सीख क्या है?”
उन्होंने कहा—
“अपने विचारों से प्रेम करो, लेकिन मनुष्य को अपने विचारों से बड़ा रहने दो।”
फिर वे चले गए।
सड़क पर रोशनी थी।
मोबाइल की स्क्रीनें चमक रही थीं।
दूर कहीं कोई मंदिर की घंटी बज रही थी। किसी घर से अज़ान की आवाज़ आ रही थी। कोई बच्चा हँस रहा था। कोई रिक्शावाला घर लौट रहा था। कोई विद्यार्थी किताब बंद कर रहा था। कोई किसान अगले दिन की चिंता में सोने जा रहा था।
मैंने सोचा—
शायद गांधी लौटे नहीं थे।
शायद वे कहीं गए ही नहीं थे।
वे हमारी स्मृति में इतने वर्षों से बैठे थे कि हमने उन्हें केवल तस्वीर समझ लिया था।
और उस रात पहली बार समझ में आया—
किसी महापुरुष की सबसे बड़ी मृत्यु उसकी मृत्यु नहीं होती।
उसकी सबसे बड़ी मृत्यु तब होती है, जब हम उसके प्रश्नों को सुनना बंद कर देते हैं।
दो अक्तूबर की रात बीत रही थी।
गांधी जा चुके थे।
लेकिन एक प्रश्न वहीं रह गया था—
हमने सभ्यता तो बना ली, संस्कृति की सर्जना कब करेंगे?
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