सिटिज़न्स फॉर डेमोक्रेसी उन सभी नागरिकों, छात्रों, नागरिक समाज संगठनों और लोकतांत्रिक समूहों के साथ खड़ा है जो भारत निर्वाचन आयोग से जवाबदेही की माँग को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं, साथ ही उन राजनीतिक दलों के साथ भी जो इस लोकतांत्रिक संघर्ष में भाग ले रहे हैं।
देश के सामने सवाल केवल एक पदाधिकारी के इस्तीफे का नहीं है। सवाल हमारी मतदाता सूचियों की विश्वसनीयता और प्रत्येक नागरिक के उस मूल लोकतांत्रिक अधिकार का है कि उसका नाम मतदाता सूची में हो और वह स्वतंत्र रूप से अपना मत दे सके।
द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित जाँच-पड़ताल ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दो निर्वाचन आयुक्तों ने दस महीने की अवधि में कम-से-कम 14 अवसरों पर मतदाता सूचियों और विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ी प्रक्रियाओं पर आपत्तियाँ दर्ज की थीं। जाँच में यह भी सामने आया कि 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में प्रारूप मतदाता सूचियों से अब तक 13 करोड़ से अधिक नाम बाहर हो गए थे।
इसके बाद निर्वाचन आयोग द्वारा उन मतदाताओं की पहचान और पुनः नामांकन के लिए विशेष अभियान चलाने का निर्णय, जिन्हें सूची से बाहर कर दिया गया हो सकता है, इन सवालों को केवल राजनीतिक आरोप कहकर खारिज करना असंभव बनाता है। इतने बड़े पैमाने पर नाम बाहर होने की प्रक्रिया कैसे हुई, इसकी पारदर्शी जानकारी अब आवश्यक है।
मतदाताओं के नाम हटाने के लिए बड़ी संख्या में आवेदन दिए जाने की चिंताजनक खबरें भी सामने आई हैं। कुछ मामलों में FIR दर्ज हुई हैं और जाली दस्तावेजों तथा झूठे दावों के आरोपों की जाँच चल रही है।
सड़कें बोल रही हैं
कई दिनों से नागरिक, छात्र, विभिन्न वैचारिक धाराओं से जुड़े राजनीतिक दल और विपक्षी दल दिल्ली तथा देश के अन्य हिस्सों में प्रदर्शन कर रहे हैं। राजधानी में इस लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को स्वीकार करने के बजाय प्रतिक्रिया में बैरिकेडिंग, हिरासत, प्रतिबंध और भारी सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ती गई है।
जंतर-मंतर, मध्य दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने तथा प्रदर्शनों और मार्च को रोकने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती की खबरें गंभीर चिंता का विषय हैं। पिछले प्रदर्शनों से जुड़े हजारों लोगों पर निगरानी रखे जाने की खबर भी विशेष रूप से चिंताजनक है।
CFD प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों के साथ दिल्ली पुलिसकर्मियों के अनुचित और कथित दुर्व्यवहार की शिकायतों को लेकर भी गंभीर रूप से चिंतित है। 3 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान तीन महिला पत्रकारों द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप भी लगाए गए हैं। इन शिकायतों की जाँच क्राइम ब्रांच को सौंपी गई है और इसकी निष्पक्ष जाँच आवश्यक है।
गंभीर सुरक्षा और सीमा संबंधी दायित्वों के लिए प्रशिक्षित बलों को राष्ट्रीय राजधानी के बीचोंबीच भीड़ नियंत्रण के लिए तैनात किया जाना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है:
क्या अब नागरिक को ही राज्य के लिए खतरा समझा जाने लगा है?
दिल्ली को रणक्षेत्र न बनने दें
10 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शनों के आसपास जिस तरह का वातावरण बनाया जा रहा है, CFD उसे लेकर चिंतित है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को संभावित अपराधी मानकर राज्य को टकराव की स्थिति पैदा नहीं करनी चाहिए। सत्याग्रह का सार अहिंसा और अनुशासित सविनय अवज्ञा है—अन्यायपूर्ण प्रतिबंधों के आगे समर्पण नहीं।
पिछले प्रदर्शनों में भी प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। प्रदर्शनकारियों ने हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया; पुलिस की कार्रवाई में हुए कथित अत्यधिक बल प्रयोग की स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए।
विशेष चिंता की बात यह भी है कि ऐसी रिपोर्टें और आरोप सामने आए हैं कि अनधिकृत व्यक्तियों और आपराधिक तत्वों को प्रदर्शन स्थलों में प्रवेश करने दिया गया हो सकता है, जिससे टकराव की स्थिति पैदा हुई। ऐसे तत्वों और कानून-व्यवस्था से जुड़ी एजेंसियों के बीच किसी भी मिलीभगत की जाँच होनी चाहिए। किसी भी प्रशासन को बाहरी या vigilante तत्वों को हिंसा भड़काने की अनुमति नहीं देनी चाहिए और न ही उस हिंसा को लोकतांत्रिक असहमति दबाने के बहाने के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
CFD दिल्ली पुलिस से संयम, व्यावसायिकता और जवाबदेही के साथ काम करने; महिला प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने; किसी भी समूह द्वारा हिंसा रोकने; तथा पुलिस कार्रवाई को आनुपातिक और कानूनसम्मत रखने का आह्वान करता है।
निर्वाचन आयोग को जवाब देना होगा
भारत निर्वाचन आयोग किसी सरकार या राजनीतिक दल की जागीर नहीं, न ही किसी का निजी क्षेत्र है। वह एक संवैधानिक संस्था है, जिसे जनता के लोकतांत्रिक मताधिकार की रक्षा का दायित्व सौंपा गया है।
उसे स्पष्ट रूप से और सार्वजनिक रूप से जवाब देना होगा:
• प्रारूप मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम कैसे गायब हुए?
• दो निर्वाचन आयुक्तों ने गंभीर आपत्तियाँ क्यों दर्ज कीं?
• नाम हटाने से पहले कौन-सी सुरक्षा व्यवस्थाएँ और प्रक्रियाएँ अपनाई गईं?
• गलत ढंग से बाहर किए गए प्रत्येक पात्र मतदाता का नाम मतदाता सूची में वापस सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र व्यवस्था क्या होगी?
• नागरिकों को यह विश्वास कैसे दिलाया जाएगा कि अंतिम मतदाता सूचियाँ पूर्ण, पारदर्शी और विश्वसनीय हैं?
लोकतंत्र अपने नागरिकों से केवल चुनावी प्रक्रिया पर विश्वास करने को नहीं कह सकता। उसे ऐसा विश्वास करने का आधार भी देना होगा।
CFD केंद्र सरकार, निर्वाचन आयोग, दिल्ली प्रशासन और दिल्ली पुलिस से आह्वान करता है कि 10 अक्टूबर के प्रदर्शनों को शांतिपूर्ण ढंग से और बिना किसी भय या दबाव के होने दिया जाए।
हम सभी लोकतांत्रिक शक्तियों से आह्वान करते हैं कि वे पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग पर एकजुट रहें और अहिंसक लोकतांत्रिक प्रतिरोध के मार्ग पर चलें।
मतपेटी और सड़क—दोनों लोकतंत्र के क्षेत्र हैं।
यदि नागरिक यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि उनका नाम मतदाता सूची में बना रहेगा और वे शांतिपूर्वक उन लोगों से सवाल भी नहीं कर सकते जो इसके लिए जिम्मेदार हैं, तो संकट केवल चुनावी नहीं है।
यह स्वयं लोकतंत्र का संकट है।
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