नाना पाटेकर : आवाज के पीछे का आदमी

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Nana Patekar

Parichay Das

— परिचय दास —

कुछ आवाजें कान से सुनाई देती हैं और कुछ सीधे स्मृति में उतर जाती हैं। नाना पाटेकर की आवाज ऐसी ही थी। वह केवल संवाद बोलने की आवाज नहीं थी। उसमें जीवन की खुरदरी जमीन थी, गुस्से की आग थी, करुणा की नमी थी और कहीं बहुत भीतर दबा हुआ अकेलापन भी। आज जब नाना पाटेकर हमारे बीच नहीं हैं, उनकी सबसे पहले याद उनकी आवाज के रूप में आती है। फिर चेहरा आता है। फिर आँखें। और अंत में वह मनुष्य, जो हर भूमिका के भीतर छिपा रहता था।

नाना का अभिनय चमकदार अभिनय नहीं था। उसमें सजावट कम थी, जीवन अधिक। वे पात्र को सुंदर बनाने की कोशिश नहीं करते थे। वे उसकी सच्चाई खोजते थे। इसलिए उनके चेहरे पर कभी-कभी ऐसा लगता था जैसे अभिनेता पीछे हट गया है और पात्र सामने आ गया है। यही अभिनय की वह दुर्लभ अवस्था है, जहाँ कलाकार अपनी उपस्थिति से नहीं, अपनी अनुपस्थिति से बड़ा होता है।

उनकी आँखें बोलती थीं, लेकिन उनकी चुप्पियाँ भी बोलती थीं। संवाद के पहले का क्षण, संवाद के बाद का ठहराव, सामने वाले को देखने का ढंग, गर्दन का थोड़ा झुक जाना, होंठों का तन जाना, अचानक आवाज का धीमा हो जाना, ये सब उनके अभिनय के शब्द थे। वे जानते थे कि मनुष्य हर समय बोलता नहीं। कई बार वह चुप रहकर अपने भीतर का सबसे बड़ा वाक्य कहता है।

‘परिंदा’ में उनका कठोर संसार है, लेकिन उस कठोरता के भीतर भय और टूटन भी है। ‘क्रांतिवीर’ में आक्रोश है, पर वह केवल राजनीतिक या सामाजिक गुस्सा नहीं, एक घायल मनुष्य की बेचैनी है। ‘अब तक छप्पन’ में कठोरता के भीतर थकान दिखाई देती है। और ‘नटसम्राट’ में तो जैसे अभिनय और जीवन की सीमाएँ ही धुँधली हो जाती हैं। वृद्ध रंगकर्मी का मंच से उतरना केवल एक पात्र की कहानी नहीं रह जाता, वह मनुष्य के अपने ही जीवन से धीरे-धीरे विस्थापित होने की कथा बन जाता है।

नाना की विशेषता यह थी कि वे अपने पात्रों को एक ही रंग में नहीं रंगते थे। उनके खल पात्रों में भी मनुष्य बचा रहता था और उनके कठोर पात्रों में भी कहीं न कहीं करुणा की छोटी-सी लौ जलती रहती थी। यही लौ उनके अभिनय को यादगार बनाती है।

सिनेमा में बहुत से अभिनेता आते हैं, लोकप्रिय होते हैं और चले जाते हैं। कुछ अभिनेता पुरस्कार पाते हैं। कुछ सितारे बनते हैं। लेकिन बहुत थोड़े कलाकार ऐसे होते हैं जिनकी कोई भूमिका हमारी अपनी स्मृति का हिस्सा बन जाती है। नाना पाटेकर उन थोड़े कलाकारों में थे।

उनका जाना केवल एक अभिनेता का जाना नहीं है। एक ऐसी अभिनय-भाषा का स्वर धीमा हुआ है, जिसमें शब्दों से अधिक मनुष्य बोलता था। पर्दा अब भी रहेगा, रोशनी अब भी जलेगी, संवाद अब भी बोले जाएँगे। लेकिन नाना की तरह संवाद के भीतर की चुप्पी कौन निभाएगा?

शायद कोई नहीं।

क्योंकि कुछ अभिनेता अभिनय नहीं छोड़ते, वे अपनी आवाज, अपनी आँखों और अपनी चुप्पियों में हमारे भीतर रह जाते हैं। नाना पाटेकर भी अब वहीं हैं, जहाँ अच्छे कलाकार अंततः चले जाते हैं, हमारी स्मृति में।


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