आजादी बचाओ आंदोलन के प्रणेता बनवारी लाल शर्मा

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— रामबाबू अग्रवाल —

नवारी लाल शर्मा ( 20 मई 1935 – 26 सितम्बर 2012) एक प्रसिद्ध गांधीवादी, जाने-माने गणितज्ञ, पूर्व प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष – गणित, इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा आजादी बचाओ आंदोलन के संस्थापक और राष्ट्रीय संयोजक थे। डॉ. बनवारी लाल शर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश राज्य के जिला आगरा में टूण्डला के पास नगला सदा गांव में हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा गांव में तथा आगे की शिक्षा इलाहाबाद में हुई। डॉ. शर्मा ने पेरिस यूनीवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की और अन्तरराष्ट्रीय गणित परिषद के छह वर्ष तक अध्यक्ष भी रहे। वे आजादी बचाओ आन्दोलन के प्रखर वक्ता थे, देश भर में भ्रमण करते थे और विभिन्न आर्थिक-सामाजिक विषयों पर भाषण देते थे। अपना पूरा जीवन उन्होंने विदेशी कंपनियों के विरोध में और स्वदेशी विचार के प्रचार में लगाया।

घटना वर्ष 1989 की है। उस साल 5 जून की भीषण गर्मी में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गांधी भवन में संपूर्ण क्रांति दिवस मनाने के लिए बुद्धिजीवियों, समाजकर्मियों और युवाओं की गोष्ठी हुई उसमें देश के बिगड़ते हालात की समीक्षा करते हुए यह सवाल गर्मजोशी से उठाया गया कि आखिर देश के हालात बदलने के लिए जेपी आंदोलन हुआ, बहुत से लोग समाज परिवर्तन में लगे हुए हैं फिर भी देश की दशा व दिशा बद से बदतर क्यों होती जा रही है?

लम्बी चली बैठक और विचारों के मंथन में तरह-तरह के कारण निकल कर सामने आए, उनमें से एक महत्त्वपूर्ण कारण निकाला गया कि देश की अर्थव्यवस्था में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की नाजायज घुसपैठ और देश के धन का बाहर ले जाना।

इसी विचार ने लोक स्वराज अभियान (आजादी बचाओ आंदोलन) का सूत्रपात किया जिसके संस्थापक डॉ. बनवारीलाल शर्मा थे। अठारह महीने बाद सेवाग्राम आश्रम में जनवरी 1991 में आयोजित पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में नाम बदलकर आजादी बचाओ आंदोलन तय हुआ, पर कार्यकर्ताओं की एक जुझारू व कर्मठ टीम बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सूची बनाने के लिए 5 जून 1989 से ही जुट गयी थी।

यहां एक बात का उल्लेख करना बहुत जरूरी है। आजादी बचाओ आंदोलन की गतिविधियां शुरू होने के बाद में पता चला कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कुकृत्यों के बारे में दुनिया में कुछ संगठन अध्ययन व लेखन कर रहे थे और उनके द्वारा प्रकाशित जर्नल ‘मल्टीनेशनल मॉनिटर’ और मलेशिया में प्रोफेसर मोहम्मद इदरीश और डॉक्टर मार्टिन खोर कोर पोंग का समूह ‘थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क’ और उसके द्वारा प्रकाशित ‘थर्ड वर्ल्ड’ और ‘टीडब्ल्यूएम फीचर’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 1993 में डेविड कॉटन की अद्भुत पुस्तक when corporation rool the world प्रकाशित हुई जिसने बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद (कॉरपोरेट कॉलोनियलिज़्म) का अत्यंत गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया जिसका हिंदी अनुवाद प्रो. बनवारीलाल शर्मा जी ने किया जिसका शीर्षक था “जब दुनिया में निगमों का राज चले”। और कॉरपोरेट के खिलाफ सीधी लड़ाई आजादी बचाओ आंदोलन ने शुरू की।

आगे चलकर इन अभियानों का भरपूर लाभ न केवल आंदोलन को मिला बल्कि आंदोलन ने साहित्य,पोस्टर, पत्रिका, व्याख्यान, कैसेट द्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के वर्चस्व का एहसास कराया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा जारी शोषण, लूट और अपसंस्कृति के प्रसार से लोगों को आगाह किया और उन्हें विदेशी उत्पादों के बहिष्कार का कार्यक्रम दिया। आजादी बचाओ आंदोलन देश का पहला आंदोलन था जिसने गैट-डंकल प्रस्तावों के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

23 मार्च 1992 को आंदोलन ने दिल्ली के बोर्डर पर भूमंडलीकरण व उदारीकरण की नीतियों के खिलाफ विशाल रैली का आयोजन किया; 3 मार्च 1994 को अन्य जमीनी संगठनों के साथ मिलकर डंकल समझौते के विरुद्ध दिल्ली के लाल किले पर एक और विशाल रैली की। 14 दिसंबर 1993 को आंदोलन ने दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में बड़ी सभा की जिसमें राज्यसभा के विरोधी दलों के सांसदों और समाजकर्मियों ने ऐलान किया कि राज्यसभा में सभी पेटेंट कानून का संशोधन पारित होने नहीं देंगे। यह बिल चार साल तक रुका रहा। सरकार ने इस बिल को पारित करा लिया है पर आंदोलन ने अन्य संगठनों के साथ इसके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है।

आंदोलन की साढ़े तीन साल की कानूनी लड़ाई के बाद दिल्ली के पुलिस आयुक्त ने 7 जुलाई 1999 को आदेश जारी किया कि दिल्ली में कोई अश्लील पोस्टर चिपकाने नहीं दिया जाएगा। दूरदर्शन के खिलाफ आजादी बचाओ आंदोलन की याचिका पर 3 जुलाई 1996 को दिल्ली के चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट श्री प्रेम कुमार ने आदेश जारी किया कि दूरदर्शन पर एडल्ट फिल्में तथा अश्लील कार्यक्रम बंद किए जाएं और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। भारत सरकार ने आंदोलन के इस प्रयास को निष्फल कर दिया।

बनवारीलाल जी 70 के दशक में जेपी आन्दोलन में बहुत ही करीब से जुड़े रहे और हजारों लोगों के साथ जेल भी गए। गांधीवादी विचारों के साधक, असहयोग और सीधी कार्रवाई में विश्वास रखनेवाले बनवारीलाल जी ने स्वार्थ रहित और सादगी भरा जीवन व्यतीत किया। अपनी धुन के पक्के नब्बे के शुरूआती दशक में जब आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हो रहा था तब सर्व सेवा संघ, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम), छोटे उद्योगों के संगठन आदि के साथ मिलकर गैट, डब्ल्यू टीओ, विश्व बैंक और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पुरजोर विरोध किया। कोका कोला, मोंसंतो, कारगिल और अन्य विदेशी कंपनियों के खिलाफ उन्होंने जबरदस्त मोर्चा पूरे देश में खोला।

इसी सिलसिले में 1 फरवरी 2001 को 300 किलोमीटर लंबी मानव श्रृंखला इलाहाबाद से वाराणसी, वाराणसी से जौनपुर और जौनपुर से इलाहाबाद का आयोजन किया, जिसमें स्कूल के बच्चों, शिक्षकों के अलावा कार्यकर्ता और आम जन शामिल हुए। मानव श्रृंखला ने सथारिया के पेप्सी प्लांट और राजातालाब में कोका कोला के प्लांट को घेरा जो कि बढ़ते वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद के प्रतीक थे।
भारत के परमाणु हथियार के कार्यक्रम और परमाणु उर्जा के संयत्र का उन्होंने हमेशा विरोध किया और लोगों को लामबंद करने की कोशिश की। पिछले कुछ सालों में उन्होंने विभिन्न यात्राओं के द्वारा जैतापुर, कुडानकुलम, फतेहाबाद, चुटखा परमाणु परियोजनाओं के खिलाफ वहाँ चल रहे संघर्षों को समर्थन ही नहीं दिया बल्कि सरकार के ऊपर एक दवाब भी बनाया।

अन्याय के प्रति लड़ने को हमेश तत्पर बनवारी लाल जी ने शांति और न्याय यात्रा के जरिये छत्तीसगढ़ में हो रही हिंसा के विरोध में भी आवाज़ उठाई और शांति की पहल की।

एनएपीएम के साथ बनवारी लाल जी का शुरुआती दौर से ही साथ रहा। शुरुआत के दिनों में वे राष्ट्रीय समन्वयक भी रहे और एनरान के विरुद्ध संघर्ष, पलाचीमाड़ा कोका कोला संघर्ष, नर्मदा बचाओ आंदोलन आदि कई संघर्षों में साथ रहे और हाल में जन संसद की प्रक्रिया में साथ-साथ रहे।

1991 में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ आजादी बचाओ आंदोलन की शुरुआत करने वाले डॉ. शर्मा ने अपनी चेतना बेच देने वाली शिक्षा के बरक्स स्वराज विद्यापीठ (सन् 2004) बनाया जो पीपुल्स सेक्टर में उच्च शिक्षा का अभिनव प्रयोग है। वह कहा करते थे कि स्वराज विद्यापीठ में आकर छात्र कम से कम ‘सवाल तो पूछ रहा है’।
निजी सेक्टर के द्वारा महंगी बिजली के बरक्स उन्होंने झारखंड में पीपुल्स सेक्टर के द्वारा खुद की बिजली स्थानीय कार्यकर्ताओं के सहयोग से बनाने की शुरुआत की, तो दूसरी तरफ कीटनाशक खाद्य पदार्थों के समांतर जैविक खेती को बढ़ावा देने की कोशिश की और उसके उत्पाद आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यालय “स्वराज परिसर” में लाकर आम जन तक पहुंचाने का काम किया।

बनवारी लाल जी एक समाजसेवी के साथ-साथ गणित के माने हुए विद्वान भी थे। अपने पीछे वे एक तैयार की हुई कार्यकर्ताओं की पूरी टोली छोड़ गये। बलाश नाम से वे ‘नई आज़ादी’ मुखपत्र में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखते और जन संसाधनों की सुरक्षा और समुदायों के हक़ के लिए लड़ते। साम्प्रदायिकता विरोधी आंदोलन में बढ़ चढ़ कर उन्होंने अपनी भूमिका निभाई।

इसके अतिरिक्त वे आम लोगों एवं विद्यार्थियों के साथ मिलकर बहुराष्ट्ररीय कम्पनियों के विरुद्ध आन्दोलन एवं विरोध प्रदर्शन भी करते थे। उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन में 19 माह जेल में भी गुजारे और अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखीं। प्रो बनवारी लाल शर्मा ‘नई आजादी उदघोष’ नामक पत्रिका के सम्पादक थे। ‘नई आजादी उदघोष’ पत्रिका देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खिलाफ आन्दोलन की सर्वाधिक प्रसार वाली पत्रिका थी जो हिन्दी के अलावा अंग्रेजी में भी प्रकाशित होती थी।

प्रो शर्मा ने ‘ग्लोबल कान्सपिरेसी’ (लेखक.निकोला एम निकोलोव), ‘ह्नेन कॉरपोरेशन रूल्स द वर्ल्ड’ (लेखक. डेविड कार्टन) आदि पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद भी किया और आज ये पुस्तकें देशभर में आन्दोलनकारियों की पसन्दीदा पुस्तकों में शुमार है। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि अन्तिम समय में प्रो शर्मा के अन्तिम वाक्य थे- ‘‘धोखेबाजों से सावधान रहना, देश के स्वाभिमान की रक्षा अपने प्राणों से भी ज्यादा जरूरी हैं।’’

प्रो. शर्मा हरियाणा, चंडीगढ़, पंजाब, हिमाचल प्रदेश के आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं को एकजुट करने की यात्रा पर निकले थे। हरियाणा की अपनी यात्रा पूरी करने के बाद शर्मा हरियाणा के कार्यकर्ता यशवीर आर्या के साथ चंडीगढ़ पहुंचे थे, जहां अचानक तबीयत बिगड़ने पर उन्हें चंडीगढ़ पीजीआई में भर्ती कराया गया । जहाँ दिनांक 26 सितम्बर 2012 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

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