बढ़ती कट्टरता से आखिर कौन लड़ेगा?

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— अरुण कुमार त्रिपाठी —

स साल भारत ने लंबा किसान आंदोलन और उसकी माँगों को स्वीकार किये जाने की महान लोकतांत्रिक परंपरा के दर्शन किये। हालांकि उस आंदोलन के भीतर भी कट्टरता और उग्रवाद के तत्त्व थे लेकिन जनांदोलन होने के कारण उसने उसे हावी नहीं होने दिया। उससे यह उम्मीद भी बनी कि हम भावनात्मक मुद्दों से हटकर वास्तविक मुद्दे उठाने, शक्तिशाली राजसत्ता के समक्ष साहस के साथ असहमति व्यक्त करने और जटिल से जटिल मुद्दों का हल निकालने की सामर्थ्य रखते हैं। लेकिन पंजाब में धार्मिक अपवित्रता के नाम पर दो लोगों की पीट-पीट कर हत्या, हरिद्वार की धर्म संसद में अल्पसंख्यकों के नरसंहार का आह्वान, भगवा संविधान की माँग और फिर रायपुर की धर्म संसद में गांधी की निंदा और गोडसे की प्रशंसा ने यह संकेत दे दिया है कि वह खुशी स्थायी नहीं है

देश तेजी से कट्टरता की ढलान पर फिसल रहा है। धर्म परिवर्तन और विदेशी सहायता पर रोक के बहाने अल्पसंख्यकों के जायज हक भी छीने जा रहे हैं जिन्हें दिलाने में सरदार वल्लभभाई पटेल आगे थे। हिंदू अपने को उदार कहते कहते कट्टर होता जा रहा है। चाहे उसके लिए पाकिस्तान और तालिबान से प्रेरणा लेनी पड़े।

कट्टरता के इस भस्मासुर से लड़ने का विचार, रणनीति और तैयारी न तो राजनीतिक संगठनों में दिखती है और न ही समाज के भीतर। पंजाब के ज्यादातर राजनीतिक दल धार्मिक स्थलों को अपवित्र किये जाने को साजिश बताते हुए उसकी निंदा तो कर रहे हैं लेकिन उस कुकृत्य की निंदा करने से बच रहे हैं जो अपराध साबित होने और मुकदमा चलाये जाने से पहले ही एक व्यक्ति को पीट-पीट कर मार डालता है। हत्या करनेवालों पर कार्रवाई करने की बात तो दूर रही। इसी तरह धर्म संसद में हिंसा भड़कानेवाले भाषण देनेवालों पर या तो कार्रवाई नहीं होती या फिर मामूली धाराओं के तहत मुकदमा किसी नामालूम व्यक्ति पर दर्ज कर दिया जाता है। चिंता की बात यह है कि इतने गंभीर बयानों व आयोजनों पर न तो सूबे के मुखिया की कोई प्रतिक्रिया आती है और न ही देश के मुखिया की।

सत्तारूढ़ दल जो कि संविधान की शपथ लेकर शासन कर रहा है वह उसके अनुरूप आचरण करता हुआ नहीं दिखता। वह आधे मन से संविधान की शपथ लेता है और आधे मन से उसे बदल देने  या खारिज करने के बारे में सोचता रहता है। उसके तमाम विचारक और चिंतक संविधान की समीक्षा करने की माँग करते और सुझाव देते हुए पुस्तकें लिखने में लग गये हैं ताकि 2024 से पहले संविधान को बदल देने का एक माहौल बनाया जा सके। उन्हें संविधान का सेक्यूलर(धर्मनिरपेक्ष) शब्द बहुत खटकता है और साथ ही समाजवादशब्द भी अप्रिय है। धर्मनिरपेक्ष शब्द साझी संस्कृति की बात करता है तो समाजवाद शब्द गरीबी मिटाने और बराबरी लाने पर जोर देता है।

कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी हिंदू बनाम हिंदुत्व की बहस चलाते हुए अपने को हिंदू बता रहे हैं लेकिन उनकी पार्टी भी कट्टरता से लड़ने के लिए तैयार नहीं है। उसके तमाम नेताओं ने अतीत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया है और आज भी रक्षात्मक मुद्रा में रहते हैं। अन्य क्षेत्रीय पार्टियों की रणनीति यह है कि इस कट्टरता से सीधे टकराने की जरूरत नहीं है। क्योंकि उससे सीधे मुठभेड़ करने से वह ताकतवर हो जाती है। यह बहुसंख्यकवाद का प्रतिनिधित्व करनेवाले दल की चुनावी रणनीति है। कई राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं इसलिए देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए यह सब जरूरी है। खामोश रहोगे,  चुनाव निकल जाएगा और वे सब शांत हो जाएंगे।

लेकिन वास्तव में वैसा है नहीं। जो कट्टरता असुरक्षा के बहाने पनप रही थी वह अब पूरी व्यवस्था को निगल लेने की तैयारी कर रही है। सन 2014 में गुजरे प्रसिद्ध लेखक यूआर अनंतमूर्ति का `हिंदुत्व आर हिंद स्वराजशीर्षक से लिखा गया वह लंबा लेख फिर से प्रासंगिक हो रहा है जो उन्होंने नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना पर अपनी आशंकाएँ व्यक्त करते हुए लिखा था। उन्होंने कहा था कि आनेवाले समय में हिंदुत्व और हिंद स्वराज की विचारधारा के बीच टकराव होना तय है। अनंतमूर्ति का यह संकल्प था कि वे उस भारत में नहीं रहेंगे जिसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होंगे। संयोग से उन्हें वैसी मृत्यु मिल गयी। लेकिन न तो सभी लोग वैसे संवेदनशील और भावुक लेखक जैसा संकल्प ले सकते हैं और ले भी लें तो वैसा कर पाना संभव नहीं होता।

इसलिए अंतिम उपाय कट्टरता और सांप्रदायिकता से वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष ही है। इसी अनिवार्यता को अनंतमूर्ति के मार्गदर्शक डा राममनोहर लोहिया ने हिंदू बनाम हिंदूके रूप में व्यक्त किया था। उनका कहना था कि भारत में उदार हिंदू बनाम कट्टर हिंदू की लड़ाई पिछले पाँच हजार साल से चल रही है। लेकिन वह निर्णायक मुकाम पर पहुँची नहीं है। पश्चिमी देशों ने इस लड़ाई का एक हद तक हल निकाल लिया है लेकिन भारत में वह हल नहीं निकल पाया है। वे चाहते थे कि इस लड़ाई का उदारता के पक्ष में निर्णायक हल निकले। इसीलिए उनका कहना था कि महात्मा गांधी की हत्या कट्टरता और उदारता की लड़ाई की सबसे भयानक परिणति थी।

आज जब फिर गांधी के हत्यारे का महिमामंडन किया जा रहा है तो स्पष्ट है कि कट्टरता उदारता को निगलने के लिए आतुर है। ऐसा इसलिए भी हो पा रहा है कि उस कट्टरता को सत्ता से कहीं न कहीं संरक्षण भी मिल रहा है। आज देश में कायरता को शौर्य बताया जा रहा है और वीरता और करुणा को कायरता कहा जा रहा है। जो धर्म संसद 79 साल के निहत्थे बुजुर्ग की हत्या को बहादुरी बताए और जो संगठन पाँच सौ साल पहले के ढाँचे को गिराने को शौर्य बताए उसके नैतिक मूल्य भारतीय तो नहीं हो सकते और अगर उन्हें कोई भारतीय सिद्ध भी कर दे तो वो मानवीय नहीं हो सकते। 

गांधी एक सनातनी हिंदू होते हुए राजनीति और धर्म को अलग करने के हिमायती थे। उनका कहना था,  “धर्म राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं है। बल्कि मनुष्य और ईश्वर के बीच का मामला है।….यह प्रत्येक व्यक्ति का निजी मामला है और इसका राजनीति या राष्ट्रीय मामलों के साथ घालमेल नहीं किया जाना चाहिए। हम हिंदुओं, पारसियों, ईसाइयों और जैनियों की बात न करें। हमें यह बात समझनी चाहिए कि हम केवल भारतीय हैं और धर्म निजी मामला है।…..हमें यह बात माननी होगी कि भारत केवल हिंदुओं का नहीं है और न ही पाकिस्तान केवल मुसलमानों का।…धर्म परिवर्तन से राष्ट्रीयता नहीं बदलती। मैं जितना हिंदुस्तान का हूँ उतना पाकिस्तान का।

अंतिम दिनों में राजनीति और धर्म के रिश्तों के बारे में गांधी के  विचार नेहरू की धर्मनिरपेक्षता के काफी करीब थे।  नेहरू ने कहा था,  “धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म का विरोध या ऐसा शासन नहीं है जो धर्म को हतोत्साहित करता हो। इसका अर्थ है धर्म और चेतना की आजादी, जिसमें उन लोगों की आजादी शामिल है जिनका कोई धर्म नहीं है।’’ इसी बात को गांधी 16 नवंबर 1947 को हरिजनमें इस तरह से कहते हैं,  “धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक शासन वह है जो प्रत्येक व्यक्ति को वह धर्म अपनाने की छूट देता है जो उसे सबसे ज्यादा अपील करता है। यदि कोई पंथ या धर्म सिद्धांत दूसरों को एक जैसी धार्मिक प्रथाओं का अनुसरण करने के लिए जबरदस्ती करता है तो वह केवल नाम का धर्म है। क्योंकि सच्चा धर्म किसी तरह की जबरदस्ती की अनुमति नहीं देता।’’

गांधी को मौजूदा खतरे का अहसास था क्योंकि वे विभाजन की विभीषिका को देख रहे थे, उसे भोग रहे थे और रोकने की कोशिश भी कर रहे थे। एक बड़ी घटना हो चुकी थी लेकिन वे उसके पार भी देख रहे थे। उन्होंने सांप्रदायिकता से लड़ने के लिए साझी विरासत को हथियार बनाया था। इसीलिए उन्होंने चेतावनी दी थी,  “यदि भारत विफल हुआ तो यह एशिया की मृत्यु है। इसे ठीक ही बहुत सी मिश्रित संस्कृतियों और सभ्यताओं की नर्सरी कहा गया है। चाहे एशिया हो या अफ्रीका या दुनिया का कोई और हिस्सा, भारत दुनिया की शोषित जातियों की आशा का केंद्र बना रहे।’’ लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या गांधी, नेहरू और लोहिया के विचारों के सहारे भारत इस कट्टरता से लड़ पाएगा और अपनी मिश्रित सभ्यताओं और संस्कृतियों की नर्सरी को बचा पाएगा?

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