तारीफों का गुणनफल

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— सेवाराम त्रिपाठी —

वैसे तारीफ कोई आज की चीज नहीं है या वह कोई नयी परिघटना भी नहीं है। तारीफ पूर्व में भी होती थी और अब भी हो रही है। हां, फिलहाल उसकी धातु बदल गयी है। वह एक तरह से तथाकथित राष्ट्रवाद में बहते हुए काफी मजबूत, धारदार, असरदार और अष्टधाती हो गयी है।

वह बिना किसी मतलब के भी की जाती है ताकि सनद रहे और वक्त पर स्वार्थ साधना के काम आए? यह सही है कि उसकी वास्तविकता का अंजर-पंजर ढीला हो गया है। किसी ने फरमाया है- “यही फितरत है हम इंसानों की/मोहब्बत ना मिले तो सब्र नहीं कर पाते/और मिल जाए तो/उसकी कद्र नहीं कर पाते/”

सच का सामना करने की ताकत के परम क्षरण के दौर में भक्त ज्यादा पैदा हुए हैं। हम भक्ति के अनंत कोलाहलों के बीच हैं। प्रसाद जी ने बताया भी था -“तुमुल कोलाहल कलह में की बात रे मन। “जिसे अधम भक्तगिरी भी कहा जा सकता है? लज्जा -शर्म और हया की सीमाओं से एकदम अलहदा चीज है यह। ये किस धातु से निर्मित हैं। कहना मुश्किल है। यही नहीं, निर्लज्जतापूर्वक मानवताविहीन पहाड़ा पढ़ने का भरपूर चलन भी तेजी से विकसित हुआ है। यानी अटकर पंचे चार सौ बीस।इसको किस नजरिए से आकलित किया जाए। यह चिंता की बात है।

इधर तारीफ के नए-नए कोचिंग सेंटर भी खुल गए हैं। वैसे उसमें कुछ भी सच्चा नहीं होता। लेकिन आख़िर कुछ न कुछ तो होता ही है। कोई असलियत नहीं होती फिर भी? क्योंकि तारीफ को हमने अपनी स्वार्थपूर्ति का अच्छा-खासा मुकाम बना लिया है। इससे स्वर्ग तक चढ़ने की नसैनी भी बना लिया गया है। जब हम धुएं में लट्ठ मार सकते हैं तो स्वर्ग तक नसैनी क्यों नहीं?

एक नया ट्रेंड यह भी बना है कि जो हमारी स्वार्थ साधना की प्रतिपूर्ति करे। हमको आकाश पाताल और चौदह भुवन तक चमकाए, हमारी यश पताका को उड़ाने में सहयोग दे। वही उनकी नजर में अच्छा आदमी है। सच में अच्छे बुरे का कोई खास गणित नहीं है। इसलिए इस कोटे में डोमा जी उस्ताद भी हो सकते हैं, चमचमाते उत्कृष्ट जन, तड़ीपार, माफिया, उचक्के और हत्यारा भी। लबरों- झूठों, लुच्चे-लफंगों का सरताज भी। यही नहीं, तस्कर और हिंसाजीवी भी। इधर हम चुनावजीवी भी होते भए। सबकुछ बेच देनेवाले महारथी भी और सबकुछ लूट-खसोट लेनेवाले लुटेरे भी। उसमें धर्म और सांप्रदायिकता का कोटा विकसित करने की अभूतपूर्व तंत्रसाधना भी जारी है।

इसमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या करनेवाला भी शान के साथ शामिल है। उसके मंदिर भी हैं। पंडे-पुजारी भी। उसके जायज-नाजायज घर भी हैं। उसका पुख्ता प्रशंसा पुराण भी विकसित कर लिया गया है और उसका तथाकथित अक्षय पुण्य कोश भी।

झुट्ठों के सामने सच्चाई की कोई कीमत नहीं बची। झुट्ठे इतिहास की पुंगी बजा-बजाकर सही को गलत और गलत को झूठ झांसों के कोटे में फेंकते-फांकते रहते हैं। सब प्रभु की माया है। इसलिए कहीं धूप कहीं छाया है?

मुझे लगता है कि तारीफ भी एक साजिश है। तारीफ एक नशा भी तो है। यह एक तरह का एक अदद करिश्मा है। तारीफ मालामाल भी कर देती है। कुछ ऐसे ही तानते रहते हैं कि प्रजातंत्र भी एक साजिश के रूप में निर्मित हो रहा है। क्या निर्मित हुआ है प्रजातंत्र का असीमित संसार। आजादी तो पहले से ही दांव पर लगा दी गयी है। इसमें हर्ज ही क्या है? स्वतंत्रता आंदोलन भी सट्टा बाजार में पुलिस की प्राथमिकी की तरह दर्ज हो चुका है। सब चलता है की स्टाइल में।

स्वार्थ के लिए कभी भी कहीं भी मत्था टेका जा सकता है? जैसे दादुर ध्वनि चहुं ओर सुनाई पड़ती थी, अब जहां तक आपकी नजर जाएगी तारीफ ध्वनि का व्यंजना व्यापार सुनाई पड़ता है। रामराज्य के दिन आ गए? तारीफ में बड़े -बड़े गुण हैं। वे दिन विदा हुए जब अपने हत्यारे या कुकर्मी पुत्र को पिताजी दंड दे दिया करते थे या पकड़वा दिया करते थे। परिदृश्य बदला तो पिता के ऐश्वर्य में डूबे पुत्र ने अपनी गाड़ी से कइयों को रौंद डाला और उन्हें सीधे स्वर्ग भेज दिया। उन्होंने वही किया जो उनके मन भाया।

चुनाव में हर हाल में जीतना तय है। ईवीएम लूटने में कैसी शर्म? अब मन की उड़ान जारी है। मन की बातें बाबाओं की भभूत की तरह झर रही हैं थोक में। हर माध्यम में और हर तरह के इलाकों में। उसे झरना ही झरना है। इससे उसकी यश कीर्ति की फुहारें टिकाऊ हुआ करती हैं?

अब इस देश में गिरावट का कोई पैमाना नहीं है। देश की सीमाओं को लांघकर गिरावट अंतरराष्ट्रीय इलाकों मेंअपनी प्रशंसा की कीर्ति रश्मियां रच रही है। यह अपने आप में एक विशेष प्रकार का झुठ्ठा युग है। जिसे टहलू बड़े धड़ाके से लबार युग कहता है। इतिहास की चिलम पीते हुए कोई भी मिथक नए सिरे से कहीं भी फेक न्यूज की तरह आसन जमा सकता है? हत्यारों को शहीद में बदला जा सकता है और शहीद को हत्यारे में? जिनकी कोई औकात नहीं, जो सुपर घटिया है उनके सामने कितने मुकुट और सिर चरणों में भूलुंठित हैं। इसलिए न पतन देखा जाना चाहिए न पतन की पराकाष्ठाओं का विस्तीर्ण संसार। सब चलता है की स्टाइल में उसे स्वीकार कीजिए बस। यही इस जमाने का युग सत्य है। और तानाशाही मनोविज्ञान की हवा।

कल एक मित्र से मूल्यों के संदर्भ में चर्चा हो रही थी। वे बोले, पुराने मूल्य गए भरसारी की होरी में। अब जो मूल्यों पर चलेगा या मूल्यों की चर्चा करेगा, उसकी निश्चय ही लुटिया डूब जाएगी और जो मूल्यविहीन होगा वही राष्ट्र का प्रधान होगा और खूब गर्जना करेगा। क्योंकि सही में वही राष्ट्र का सिरमौर बनने की कूबत रख सकने में सक्षम है। अब वह समय शुरू हो रहा है जब अच्छा इंसान होना लज्जास्पद होगा। निर्भीकता, सच्चाई, मूल्य, चरित्र और आचरण को बीमारी मान लिया गया है क्योंकि अब हमारी इच्छाएं पापियों-हत्यारों-सिरफिरों और मूल्यहंताओं की चौखट पर सिर घिस रही हैं। चलते -चलते चीजों को तलाशते-तलाशते उनके जूते पहले ही फट गए हैं।

पूरा समाज बदल रहा है। सब कुछ धृतराष्ट्रपने में स्वाहा हो रहा है। राजनीति बदल रही है,ज्ञसंस्कृति की चीख-पुकार सुनाई पड़ रही है। मूल्य सिर पीट रहे हैं। सबने अपनी भूमिकाएं बदल दी हैं और हमारा राष्ट्र प्रधान और पहरा देनेवाला रक्षक रक्षक न होकर भक्षक बनेगा और निरंतर अपनी लीलाएं रचता रहेगा। कुछ फितरती तो मुंह के जुकाम से पीड़ित हैं और वे किसी को कुछ भी प्रमाणपत्र बांटते घूम रहे हैं। उनके पास राष्ट्र के सामने उठ रहे सवालों का सक्षम तो क्या कोई भी उत्तर नहीं है? चरित्र फरित्र की जरूरत ही क्या है? इसलिए वह चरित्रहनन के इलाके में ठेके से लगा है। उसकी सबसे बड़ी कूबत जहर की खेती करना है।

यह समय सब को साधने का है। हमारा कुछ भी सामने आए जो हमारी तारीफ करता है, हमें इज्जत देता है उसके बदले हम घटिया से घटिया चीजों की इज्जत करते हैं और तारीफ भी करते हैं। इसी से समझा जा सकता है यह एक विशेष अर्थ में तारीफ का युग है। हमें किसी की कमियों को नहीं निकालना चाहिए बल्कि चाहे जो घटिया हो या सुपर घटिया हो केवल उसकी तारीफ और तारीफ करना है। इसके अलावा कुछ नहीं। कोई सत्ता में हो या संस्कृति में हो या अन्य इलाकों में हो, कोई प्रश्न नहीं करना है? मात्र तारीफ करना है? तारीफ के अलावा कुछ नहीं। तारीफ इस जमाने का अमरफल है। रसास्वादन कीजिए और अपने भक्तों को बनाए रखें। यह भी तय है कि हम न तारीफों से बच सकते और न फितरतों से। ये इस दौर की अनिवार्यताएं हैं। हैं कि नहीं?

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