हूबनाथ की कविता

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dictatorship and democracy
फोटो साभार: The Wire

Hoobnath

सुकरात ने कहा –

जब आप पर
लोकतांत्रिक व्यवस्था ने
ग़लत आरोप लगाए
तो उस सभा में
किसी ने भी
किसी एक ने भी
आगे बढ़कर
प्रतिवाद क्यों नहीं किया

जब आपने
सभी आरोपों की
निरर्थकता प्रमाणित कर दी
तब भी
जो जानते थे
कि आप सत्य की राह पर हो
वे चुप क्यों रहे

इतनी महान परंपरा
उदार संस्कृति के
सम्मानित नागरिक
आपके पक्ष में
क्यों नहीं खड़े हुए

किसी एक ने भी
सत्य का साथ
क्यों नहीं दिया
गुरुवर !

प्रिय अफलातून!

जिसे तुम
लोकतंत्र कह रहे हो
वह उसकी लाश है

लोकतंत्र की आत्मा
सत्य होती है
भीड़ नहीं

उस दिन
सभी जानते थे
कि मैं सत्य के साथ हूं

भीड़ तंत्र
जब लोकतंत्र की
जगह लेता है
तब सत्य उसका
सबसे बड़ा शत्रु होता है

सत्य बेचैन करता है
सत्य उद्वेलित करता है
सत्य तपाता है

मधुर
लोकलुभावन
मसखरियां
चुटकुले
सत्य की आंच
सह नहीं पाते

असत्य और अन्याय को
सत्य से खतरा रहता है

इसलिए
मरी, झुलसी, बिकी, सड़ी
आत्माओं की भीड़
लोकतंत्र में सेंध लगाकर
काबिज़ हो जाती है

अंधों की दुनिया में
आंख का होना
बग़ावत माना जाता है

इसी बग़ावत की सज़ा
मुझे दी गई

किंतु
वे लोग भूल गए थे
कि सूरज के डूबने से
रौशनियां नहीं मरतीं

सुकरात के मरने से
सत्य नहीं मर जाएगा

मरती तो देह है
विचार को मार सके
ऐसा शस्त्र बना ही नहीं

सारा संसार भी
मिलकर एक साथ
झूठ बोल रहा हो
तो वह झूठ
सत्य नहीं हो जाता

अंधेरे के साम्राज्य को
चुनौती देने के लिए
एक जुगनू भी
काफी होता है

तुम मेरी नहीं
सत्य की चिंता करो
सत्य का साथ दो
मैं सदैव तुम्हारे साथ हूं

पूरब में एक कहावत है

सत्यमेव जयते!

ईश्वर और विज्ञान

मानव ने
ईश्वर बनाया
ईश्वर की कहानियां गढ़ीं
किताबें और मूर्तियां गढ़ीं

और अपनी ज़िंदगी
ईश्वर के हवाले कर दी

फिर ईश्वर
जिनके हवाले था
उन्होंने मनुष्य का
जीना दूभर कर दिया

फिर मनुष्य ने
विज्ञान बनाया
प्रौद्योगिकी गढ़ीं
फिर सुविधाएं बढ़ीं

मनुष्य ने
अपनी बची हुई ज़िंदगी
विज्ञान के हवाले कर दी

विज्ञान जिनके हवाले था
ईश्वर जिनके हवाले था

दोनों ने मिलकर
इन्सान का जीवन
नर्क कर दिया
जबकि वे भी
इन्सान ही थे

फ़र्क सिर्फ़ इतना था
कि वे जान गए थे

कि न ईश्वर में शक्ति है
न विज्ञान में

शक्ति
सिर्फ़ पागलपन में है

अब पूरी इन्सानियत
पागलों के हवाले हैं

और ख़ुद को
कोस रही है
कि आखिर उसने

क्यों गढ़ा ईश्वर!
क्यों बनाया विज्ञान!!

भीष्म उवाच!

मैं जानता था
युधिष्ठिर
कि तुम ज़रूर आओगे!

एक तुम ही थे
जिसके प्रश्न मरे नहीं थे

प्रश्न मर जाने पर
ज़िंदा रहने का अर्थ भी
मर जाता है
पांडुश्रेष्ठ!

मैं यह भी जानता हूं
कि तुम क्या जानने आए हो

मेरा विवेक ही
मेरा शत्रु
चिरंतन अभिशाप है

अंधे राजा की
विवेकवान प्रजा
अभिशप्त ही तो होती है

तुम सोच रहे हो
कि यह युद्ध
क्या टल नहीं सकता था!

कोई भी युद्ध
अटल नहीं होता पुत्र

अटल वह ज़िद होती है
जो युद्ध को जन्म देती है
अटल अहंकार होता है
कमीनी सोच होती है
जिसके गर्भ में पलती है
खौलती घृणा
बजबजाता द्वेष
घिनौनी ईर्ष्या
और धर्म की राह पर
होने का खोखला घमंड

और यह सब
दोनों तरफ़ था
कहीं कम
कहीं ज़्यादा

पर था दोनों ओर

उस ओर भी
जिस ओर
ईश्वर के होने का भ्रम था

जो अपनी अनीतियों को
धर्म के रूप में
स्थापित कर दे
वही ईश्वर कहलाता है

जिसके बोलने का आरंभ
और अंत
शंखनाद से हो
उसकी बातें
अक्सर खो जाती हैं
शंखनाद में

लोगों को बातें नहीं
शंखनाद याद रह जाते हैं

बातें तो बाद में लोग
अपनी अपनी औकात से
गढ़ लेते हैं

तुम ख़ुद सोचो
धर्मराज!

तुम्हारी तरफ़
कोई एक भी योद्धा था
जो अकेले दम पर
किसी एक भी
कौरव सेनापति को
ईमानदारी से लड़ कर
पराजित कर सकता था !

मुझे तो छू भी सकने का
सामर्थ्य
पूरी पांडव सेना में
मिलकर भी नहीं था

और मैं
तुम्हारे सामने
शरशैया पर
अपनी मौत की घड़ियां
गिन रहा हूं

फिर भी
तुम कहोगे
कि धर्मयुद्ध में
विजय तुम्हारी हुई

पुत्र युधिष्ठिर!
धर्म की राह पर
युद्ध न कभी हुआ है
न हो सकता है

छल छद्म बेईमानी
घृणा घमंड अहंकार
युद्ध के आधार हैं

यह बात और है
जब व्यास लिखेंगे
इस विनाश की कथा
तो केंद्र में धर्म ही
स्थापित करेंगे

वे कवि हैं
कवि नग्न सत्य को
आदर्श के परिधान में ही
प्रस्तुत करता है
क्योंकि
उस पर दायित्व होता है
भविष्य का
आस्था और विश्वास का

किंतु
सत्य तुम भी जानते हो
सत्य
मैं भी जानता हूं

तुम यह भी सोच रहे हो
कि जब मैं
सब कुछ जानता था
तो मैंने
क्यों नहीं रोका युद्ध!

वत्स!
अनाचारी के नमक ने
मेरी आत्मा को मार दिया था
अपने वचन के अहंकार में
मैं याज्ञसेनी का अपमान भी
बर्दाश्त कर गया
मैं बिक चुका था वत्स
और बिके हुओं की
कोई आवाज़ नहीं होती

इसीलिए
हम सब चुप थे

और वैसे भी
राजा अंधा हो
तो प्रजा गूंगी हो ही जाती है

कल व्यास लिखेंगे
कि मृत्यु मेरे वश में थी
पर सच यह है
कि मैं उसी दिन मर गया था
जिस दिन
मेरी आंखों के आगे
पांचाली को
निर्वस्त्र करने का
दुस्साहस किया गया

और उसी दिन से
तुम भी
धर्म की राह से
हट चुके थे

लाशों के
इस विशाल ढेर पर
कल तुम्हारा
राज्याभिषेक होगा
तब यह याद रखना

कि आने वाले युग में
वही सिंहासन टिकेगा
जिसके नीचे
सबसे अधिक लाशें
दफ़्न होंगी

शासक
और हत्यारे के बीच
कोई फ़र्क नहीं होगा

और सबसे अधिक
अधर्म और अनाचार
धर्म के आवरण में होगा

सबसे लंपट
घोर व्यभिचारी
धन,यश,सत्तालोभी
धर्ममार्तंड कहलाएगा

सामान्य प्रजा
जैसे आज मरी है
वैसे ही
कल भी मरती रहेगी

क्योंकि
उसके पैरों में होंगी
तथाकथित
धर्म की बेड़ियां

जाओ पुत्र
एक नया
रक्तरंजित युग
तुम्हारे स्वागत को
खोपड़ियों की
माला लेकर
तैयार खड़ा है

सार्थक भव !

भंते !
सारा विश्व
जल रहा है
कामना की अग्नि में
वासना की अग्नि में

दशों दिशाएं
धधक रही हैं

अग्निशिखाएं
लील रही हैं वह सब
जो बचनी चाहिए

प्रिय आनंद!

सबसे विकट अग्नि
अहंकार की होती
और सबसे घिनौना सुख
संहार का होता है

जिसका विवेक मर जाए
बुद्धि भ्रष्ट हो जाए
आत्मा बंधक हो
वह धर्म की चादर ओढ़
क्रूर हिंसा की राह पर
चलता है

और दुर्भाग्य से
कायर और
कमज़ोर प्रजा
सबसे कमज़ोर
और कायर हाथों में
सौंप देती है
भविष्य अपना

भंते!
सत्ता पाकर
कायरता
क्रूरता में ढल जाती है
और वह गढ़ती है
अपना सत्य

वह सत्य
जो ज़ोर से
चिल्लाकर बोला जाता है
दिन रात
जिसका ढोल पीटा जाता है
जिसमें करुणा की जगह
घृणा होती है
शांति की जगह
क्रूरता

ऐसा ही सत्य
महामारी की तरह फैलेगा
अहंकार का दावानल
प्राणिमात्र को
भस्म करेगा

बीभत्स पागलों की भीड़
रंग – रंग के परिधानों में
मनुष्यता के आखेट को
निकलेगी

पूरे संसार में
उद्घोषित होगा

युद्धम् शरणम् गच्छामि
मूर्खम् शरणम् गच्छामि
दुर्जनम् शरणम् गच्छामि

तब तुम
इस भयावह अग्नि से
डरना मत
इन नारों से
घबराना मत

यह तात्कालिक सत्य
उसी भांति ढह पड़ेगा
जैसे सूर्योदय होने से
अंधेरा ढह जाता है

किंतु भंते!

इन हालात में
सूर्य को उदित करने
ख़ुद की बलि देनी पड़ती है

यदि असंख्य जीवों के
उजाले की खातिर
तुम्हें जलना भी पड़े
तो तुम झिझकना मत

बहुजन हिताय
बहुजन सुखाय

मात्र शब्द नहीं
दायित्व है
कर्तव्य है

मैं जानता हूं
तुम इस कर्तव्य पथ से
विचलित नहीं होगे

धम्म तुम्हारी रक्षा करे!

सार्थक भव!!

प्रिय धूमिल से क्षमायाचना सहित!

वह कौन-सा
प्रजातांत्रिक नुस्खा है
या राष्ट्रवादी सोच है

कि जिस उम्र में
(यदि ज़िंदा रहा तो)
आम आदमी का चेहरा
सूखी झुर्रियों का बोझ है

उसी उम्र के
मेरे प्रधानसेवक के
चेहरे पर
सोलह साल के
मताए लौंडे के
चेहरे जैसा
लोच है

कभी न ख़त्म होनेवाली
जवानी है

यह कैसी
समाजवादी कहानी है !

जिसमें
सिर्फ़ राजा है
और रानी है

और कीड़े मकोड़े की तरह
रेंगती बिलबिलाती
प्रजा है

आखिर
यह किस जुर्म की
सज़ा है ?

कि धर्म
सिर्फ़ कोढ़ है
जिसमें सियासत की
खाज है

टूटी हड्डियों पर
खाली खोपड़ी का
राज है

मैं पूछता हूं
श्मशान बनी
इस धरती का
ज़िम्मेदार कौन है

फ़िलहाल
सारी दुनिया की
संसद मौन है


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