— परिचय दास —
।। एक ।।
नाथ परंपरा को केवल वैदिक, तांत्रिक, योगिक और श्रमण तत्त्वों का मिश्रण कह देना पर्याप्त नहीं है। प्रश्न यह है कि ऐसा कौन-सा आंतरिक तत्त्व था जिसने इन परस्पर भिन्न परंपराओं को एक साथ बाँध दिया? इसी प्रश्न की तह में उतरने पर नाथ परंपरा का वास्तविक स्वरूप सामने आता है।
वास्तव में नाथ परंपरा का मूल आग्रह किसी शास्त्र, सम्प्रदाय या मत की रक्षा नहीं बल्कि साधना की रक्षा है। यह बात अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैदिक परंपरा का केंद्र वेद है, बौद्ध परंपरा का केंद्र धम्म है, जैन परंपरा का केंद्र तीर्थंकरों की परंपरा है, किंतु नाथ परंपरा का केंद्र साधना का प्रत्यक्ष अनुभव है। यहाँ सत्य पुस्तक में नहीं, अनुभव में स्थित है। इसीलिए नाथ साहित्य में बार-बार शरीर, प्राण, चित्त, गुरु और साधना की चर्चा मिलती है, पर शास्त्रीय प्रमाणों की अपेक्षा कम दिखाई देती है।
गोरखनाथ के चिंतन में एक प्रकार का आध्यात्मिक लोकतंत्र दिखाई देता है। वे ज्ञान को जन्माधिकार नहीं मानते। यदि कोई व्यक्ति साधना करता है तो वह सत्य का अधिकारी हो सकता है। यह विचार अपने समय के लिए अत्यंत क्रांतिकारी था। ब्राह्मण परंपरा में वेदाधिकार सीमित था, जबकि नाथ परंपरा में साधनाधिकार अपेक्षाकृत व्यापक था। यहाँ योगी का मूल्य उसकी जाति से नहीं, उसकी साधना से निर्धारित होता है।
इस दृष्टि से नाथ परंपरा श्रमण परंपरा के निकट दिखाई देती है। किन्तु एक महत्वपूर्ण अंतर भी है। श्रमण परंपराएँ प्रायः संसार को दुःख, बंधन या त्याज्य स्थिति के रूप में देखती हैं। नाथ योगियों में संसार के प्रति इतना तीखा निषेध नहीं मिलता। वे शरीर को भी अस्वीकार नहीं करते। उनके लिए शरीर मोक्ष का विरोधी नहीं, मोक्ष का उपकरण है। यही कारण है कि नाथ साधना में शरीर के प्रति अद्भुत गंभीरता दिखाई देती है।
भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में शरीर को लेकर तीन प्रमुख दृष्टियाँ दिखाई देती हैं। पहली, शरीर को यज्ञ और कर्म का उपकरण मानती है। दूसरी, उसे बंधन मानकर उससे विरक्ति की ओर बढ़ती है। तीसरी, जो नाथों में विकसित हुई, शरीर को एक सूक्ष्म ब्रह्माण्ड के रूप में देखती है। नाथ योगियों के लिए मानव शरीर केवल मांस, रक्त और अस्थि का ढाँचा नहीं है; वह चेतना का मंदिर है। जो कुछ बाहर है, वह सब भीतर भी है।
यहीं से नाथ परंपरा की सबसे मौलिक अवधारणा जन्म लेती है कि मनुष्य स्वयं एक चलता-फिरता तीर्थ है। उसे सत्य के लिए किसी बाहरी माध्यम पर पूर्णतः निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं। उसका अपना शरीर, अपना प्राण और अपना चित्त ही साधना का क्षेत्र है।
यह विचार भारतीय धार्मिक संरचना में एक सूक्ष्म क्रांति जैसा था। क्योंकि इससे धार्मिक सत्ता का केंद्र बाहर से भीतर की ओर स्थानांतरित हो जाता है। मंदिर, यज्ञ, तीर्थ और कर्मकाण्ड का महत्त्व समाप्त नहीं होता, लेकिन वे अनिवार्य भी नहीं रह जाते। साधक अपने भीतर यात्रा आरम्भ कर सकता है।
नाथ परंपरा की एक और गहरी विशेषता है उसका सीमाओं के प्रति अविश्वास। गोरखनाथ बार-बार द्वैतों को तोड़ते हुए दिखाई देते हैं। वे केवल गृहस्थ या केवल संन्यासी नहीं हैं। केवल शास्त्रीय या केवल लोकधर्मी नहीं हैं। केवल ब्राह्मणीय या केवल श्रमण नहीं हैं। ऐसा लगता है मानो नाथ दृष्टि हर स्थिर पहचान को अस्थायी मानती है।
यही कारण है कि नाथ साहित्य में विरोधाभासी प्रतीत होने वाले कथन मिलते हैं। योगी संसार में भी है और संसार से बाहर भी। वह शरीर में भी है और शरीरातीत भी। वह बोलता भी है और मौन भी रहता है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि उस अनुभव को व्यक्त करने का प्रयास है जिसे साधारण तर्क की भाषा पूरी तरह पकड़ नहीं सकती।
नाथ परंपरा के भीतर तंत्र का प्रभाव भी इसी बिंदु पर समझा जाना चाहिए। तंत्र का एक मूल विचार यह था कि शक्ति हर जगह उपस्थित है। नाथों ने इस विचार को स्वीकार किया, लेकिन उसे योग के अनुशासन से जोड़ दिया। उनके यहाँ शक्ति कोई केवल देवी-संबंधी धार्मिक अवधारणा नहीं रह जाती, बल्कि साधक की चेतना में जागृत होने वाली जीवंत ऊर्जा बन जाती है।
इसी प्रकार उपनिषदों का प्रभाव भी नाथ चिंतन में देखा जा सकता है। उपनिषदों ने कहा था कि ब्रह्म को बाहर नहीं, भीतर खोजो। नाथों ने इस विचार को शरीर और योग की भाषा में पुनः व्यक्त किया। उपनिषदों का आत्मविद्या का मार्ग नाथों में प्राणविद्या और योगविद्या का रूप ग्रहण कर लेता है।
बारीकी से देखें तो नाथ परंपरा किसी मध्य मार्ग की परंपरा नहीं है। वह दो ध्रुवों के बीच समझौता नहीं करती। बल्कि वह उन ध्रुवों को ही अप्रासंगिक बना देती है। ब्राह्मण और श्रमण उसके लिए अंतिम पहचानें नहीं हैं। अंतिम सत्य साधना है। यदि सत्य की प्राप्ति किसी ब्राह्मण को होती है, तो उसका स्वागत है। यदि किसी चर्मकार, जुलाहे या चरवाहे को होती है, तो भी उसका स्वागत है। साधना की दृष्टि से दोनों समान हैं।
यही कारण है कि नाथ परंपरा को भारतीय इतिहास में केवल धार्मिक आंदोलन नहीं कहा जा सकता। वह ज्ञान के सामाजिक पुनर्वितरण का आंदोलन भी थी। उसने यह स्थापित किया कि आध्यात्मिक उपलब्धि किसी विशेष वर्ग की निजी संपत्ति नहीं है।
और शायद यही उसका सबसे बड़ा ऐतिहासिक महत्त्व है। उसने भारतीय समाज के सामने यह संभावना रखी कि मनुष्य की अंतिम पहचान उसकी जाति, उसका सम्प्रदाय, उसका शास्त्र या उसका बाहरी रूप नहीं, बल्कि उसकी साधना और उसकी चेतना है। इसीलिए नाथ परंपरा को पढ़ते हुए बार-बार अनुभव होता है कि हम किसी संप्रदाय के भीतर नहीं, बल्कि भारतीय आत्मचेतना की उस प्रयोगशाला में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ अनेक परंपराएँ अपना अहंकार छोड़कर एक व्यापक आध्यात्मिक अनुभव में विलीन हो जाती हैं। वहाँ ब्राह्मण और श्रमण दो किनारे भर रह जाते हैं; बीच में बहती धारा योगी की है, जो किसी सीमा को अंतिम सत्य नहीं मानती।
।। दो ।।
नाथ परंपरा भारतीय आध्यात्मिक इतिहास की उन विलक्षण धाराओं में है, जिसे किसी एक खाँचे में रखकर समझना कठिन है। उसे केवल हिन्दू, केवल योगिक, केवल तांत्रिक अथवा केवल श्रमण परंपरा कह देना उसके वास्तविक स्वरूप को सीमित कर देना होगा। नाथ परंपरा वस्तुतः भारतीय चेतना की उन अनेक धाराओं का संगम है, जो सदियों तक परस्पर संवाद, संघर्ष और समन्वय के बाद एक विशिष्ट रूप में विकसित हुईं। यही कारण है कि नाथ परंपरा को समझना केवल एक धार्मिक संप्रदाय को समझना नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के भीतर चल रहे गहरे वैचारिक संवाद को समझना है।
प्राचीन भारत में वैदिक-ब्राह्मण परंपरा और श्रमण परंपरा दो प्रमुख वैचारिक धाराएँ थीं। ब्राह्मण परंपरा यज्ञ, वेद, वर्णाश्रम और सामाजिक व्यवस्था को महत्त्व देती थी। दूसरी ओर श्रमण परंपरा संसार-त्याग, तप, योग, ध्यान और व्यक्तिगत साधना को प्राथमिकता देती थी। बुद्ध, महावीर, आजीवक और अनेक परिव्राजक इसी व्यापक श्रमण संसार का हिस्सा थे। दोनों धाराओं के बीच अनेक बार वैचारिक संघर्ष भी हुआ। एक ओर यज्ञ था, दूसरी ओर ध्यान; एक ओर पुरोहित था, दूसरी ओर संन्यासी; एक ओर सामाजिक कर्तव्य था, दूसरी ओर मुक्ति की व्यक्तिगत खोज।
नाथ परंपरा का उदय इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में हुआ। इसके प्रवर्तक माने जाने वाले मत्स्येन्द्रनाथ और गोरखनाथ ने ऐसी साधना-पद्धति विकसित की जिसमें वैदिक, तांत्रिक, योगिक और श्रमण तत्व एक साथ उपस्थित दिखाई देते हैं। यह किसी एक परंपरा की विजय नहीं, बल्कि अनेक परंपराओं के रचनात्मक संलयन का परिणाम है।
नाथ साधना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष योग है। किन्तु यह केवल पतंजलि के दार्शनिक योग तक सीमित नहीं है। इसमें शरीर को साधना का माध्यम माना गया। शरीर को केवल माया या बंधन नहीं समझा गया, बल्कि मुक्ति की प्रयोगशाला माना गया। हठयोग की पूरी परंपरा इसी दृष्टि से विकसित हुई। प्राण, नाड़ी, चक्र, कुण्डलिनी, मुद्रा और बन्ध जैसी अवधारणाएँ नाथ साधना में केंद्रीय स्थान रखती हैं। यहाँ शरीर त्याज्य नहीं है, बल्कि रूपांतरण का क्षेत्र है।
यह दृष्टि श्रमण परंपराओं से भिन्न भी है और उनसे जुड़ी हुई भी। बौद्ध और जैन साधना में भी तप और ध्यान का महत्त्व था, किन्तु नाथ योगियों ने शरीर की आंतरिक शक्तियों के विकास पर अधिक बल दिया। वे केवल संसार से पलायन नहीं चाहते थे, बल्कि जीवन के भीतर रहते हुए चेतना का विस्तार करना चाहते थे। इसीलिए नाथ योगी जंगलों, पहाड़ों, गुफाओं और ग्रामों में समान रूप से दिखाई देते हैं।
नाथ परंपरा में तांत्रिक प्रभाव भी अत्यंत गहरा है। तंत्र की मूल मान्यता यह रही कि परम सत्य तक पहुँचने के अनेक मार्ग हैं और शरीर तथा प्रकृति को अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। नाथ योगियों ने तंत्र से अनेक साधनात्मक विधियाँ ग्रहण कीं। कुण्डलिनी, शक्ति, चक्र और सूक्ष्म शरीर की अवधारणाएँ इसी प्रभाव की ओर संकेत करती हैं। किन्तु नाथों ने तंत्र को केवल कर्मकाण्ड या गूढ़ अनुष्ठान तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उसे योग की अनुशासित साधना के साथ जोड़ा।
यहीं नाथ परंपरा की विशिष्टता प्रकट होती है। जहाँ तंत्र कभी-कभी अत्यधिक रहस्यवादी हो जाता है, वहीं नाथ योग उसे व्यावहारिक अनुशासन में बदल देता है। साधना किसी विशेष जाति, वर्ग या पुरोहित की संपत्ति नहीं रह जाती। वह व्यक्तिगत अनुभव का विषय बन जाती है।
ब्राह्मण परंपरा के साथ नाथों का संबंध भी जटिल है। नाथ संप्रदाय ने वेदों का पूर्ण निषेध नहीं किया, किन्तु वेदों को अंतिम प्रमाण भी नहीं माना। उन्होंने प्रत्यक्ष साधना और अनुभव को अधिक महत्त्व दिया। यह दृष्टि उपनिषदों के उस ज्ञानमार्ग से जुड़ती है जहाँ सत्य की खोज व्यक्तिगत अनुभव के माध्यम से की जाती है। इस प्रकार नाथ परंपरा वैदिक परंपरा के भीतर मौजूद ज्ञान और योग की धारा को ग्रहण करती है, परन्तु कर्मकाण्ड की अनिवार्यता को स्वीकार नहीं करती।
सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि नाथ परंपरा ने जाति-व्यवस्था की कठोर सीमाओं को भी चुनौती दी। नाथ योगियों में अनेक ऐसे साधक हुए जो सामाजिक दृष्टि से निम्न मानी जाने वाली जातियों से आए थे। उनके लिए साधना का आधार जन्म नहीं, साधकत्व था। यही कारण है कि ग्रामीण भारत में नाथ योगियों को व्यापक सम्मान मिला। वे केवल धार्मिक व्यक्ति नहीं थे; वे लोकजीवन के साथ जुड़े हुए मार्गदर्शक, चिकित्सक, योगी और जनसंपर्क के केंद्र भी थे।
मध्यकालीन भारत में नाथ परंपरा का प्रभाव भक्ति आंदोलन पर भी पड़ा। अनेक संत कवियों में नाथों की योगिक और अनुभववादी दृष्टि की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। कबीर की वाणी में, गुरु नानक के चिंतन में और अनेक निर्गुण संतों के साहित्य में नाथ परंपरा के प्रभाव के संकेत मिलते हैं। आत्मानुभव, गुरु की महत्ता, बाह्य कर्मकाण्ड की आलोचना और आंतरिक साधना पर बल जैसी प्रवृत्तियाँ इस संवाद की ओर संकेत करती हैं।
नाथ परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सांस्कृतिक योगदान यह भी है कि उसने भारतीय आध्यात्मिकता को केवल संस्कृत की सीमाओं में नहीं रहने दिया। नाथ योगियों ने लोकभाषाओं में संवाद किया। उन्होंने गाँवों, कस्बों और जनसामान्य तक साधना की भाषा पहुँचाई। इस प्रकार वे ज्ञान के लोकतंत्रीकरण के वाहक बने। ज्ञान केवल शास्त्रों में बंद नहीं रहा; वह लोकगीतों, कहावतों, संवादों और लोककथाओं में भी प्रवाहित हुआ।
यदि भारतीय इतिहास को केवल ब्राह्मण और श्रमण के द्वंद्व के रूप में देखा जाए, तो नाथ परंपरा उस द्वंद्व के पार जाने का प्रयास प्रतीत होती है। वह न तो पूर्णतः वैदिक है, न पूर्णतः अवैदिक; न केवल तांत्रिक है, न केवल योगिक; न केवल संन्यास है, न केवल लोकजीवन। वह उन सीमाओं को पार करती है जिन्हें इतिहासकार अक्सर अलग-अलग श्रेणियों में बाँट देते हैं।
वास्तव में नाथ परंपरा भारतीय सभ्यता की उस अद्भुत क्षमता का उदाहरण है, जिसमें विरोधी प्रतीत होने वाली धाराएँ भी एक दूसरे को आत्मसात कर लेती हैं। यहाँ यज्ञ और योग, तंत्र और तप, लोक और शास्त्र, शरीर और आत्मा, संन्यास और संसार के बीच कोई अभेद्य दीवार नहीं है। नाथ दृष्टि इन सबके बीच एक जीवंत सेतु निर्मित करती है।
इसी कारण नाथ परंपरा को केवल एक संप्रदाय के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक संश्लेषण की महान परियोजना के रूप में देखना चाहिए। वह बताती है कि परंपराएँ स्थिर नहीं होतीं; वे संवाद करती हैं, रूपांतरित होती हैं और नए अर्थों का सृजन करती हैं। गोरखनाथ की परंपरा इसी सतत सृजनशील भारतीय चेतना का एक विराट उदाहरण है, जहाँ ब्राह्मण और श्रमण की कठोर रेखाएँ धुंधली पड़ जाती हैं और उनके बीच से एक नई आध्यात्मिक भूमि जन्म लेती है।
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