कबीर का ध्वनि-संसार : अनहद नाद, शब्द, ध्वनि और संगीत आदि

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Kabir

Parichay Das

— परिचय दास — 

।। एक।।

बीर की कविता को केवल पढ़ा नहीं जा सकता, उसे सुना भी नहीं जा सकता। उसे उस तीसरी अवस्था में प्रवेश करके ग्रहण करना पड़ता है, जहाँ सुनना भी समाप्त हो जाता है और केवल ध्वनि का अनुभव शेष रह जाता है। यही कारण है कि कबीर का काव्य शब्दों से आरम्भ होकर शब्दातीत की यात्रा करता है। उनकी कविता का सबसे बड़ा आश्चर्य यह नहीं कि वह निर्गुण की बात करती है बल्कि यह कि वह ध्वनि को आत्मा का सबसे सूक्ष्म स्पर्श बना देती है। उनके यहाँ ध्वनि केवल भाषा का उपकरण नहीं है। वह अस्तित्व की धड़कन है, चेतना की कंपन-रेखा है और उस विराट मौन की सीमा है, जिसके आगे भाषा स्वयं अपने चरण रोक देती है।

संसार का प्रत्येक मनुष्य ध्वनियों के बीच जन्म लेता है। माँ की धड़कन, वर्षा की टपकन, पक्षियों का स्वर, नदी की लय, हवा का स्पर्श, मंदिर की घंटी, मस्जिद की अज़ान, खेतों की पुकार, बाज़ार का कोलाहल। मनुष्य धीरे-धीरे इन ध्वनियों को संसार समझने लगता है। पर कबीर कहते हैं कि इन सबके पीछे एक ऐसी ध्वनि भी है जो किसी वस्तु से उत्पन्न नहीं होती। जिसे किसी वाद्य ने नहीं बजाया। जो दो वस्तुओं के टकराने से नहीं बनी। वही अनहद है। वही वह संगीत है जो सृष्टि के पहले भी था और मनुष्य के बाद भी रहेगा।

भारतीय दर्शन में “शब्द” को ब्रह्म की अभिव्यक्ति माना गया है किन्तु कबीर इस अवधारणा को केवल दार्शनिक वाक्य नहीं रहने देते। वे उसे अनुभव का विषय बनाते हैं। उनके लिए शब्द पुस्तक में नहीं रहता। वह साधना में जागता है। वह गुरु के स्पर्श से खुलता है। वह श्वास के भीतर उतरता है। वह चेतना के सबसे गहरे प्रदेश में अपना घर बनाता है। इसीलिए कबीर के यहाँ शब्द का अर्थ केवल बोला गया वाक्य नहीं, बल्कि वह आंतरिक शक्ति है जो मनुष्य को स्वयं से मिलाती है।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है। सामान्य भाषा सूचना देती है। कबीर का शब्द रूपांतरण करता है। सामान्य ध्वनि कान तक पहुँचती है। कबीर की ध्वनि आत्मा तक उतरती है। सामान्य संगीत मनोरंजन देता है। कबीर का संगीत मनुष्य के भीतर छिपे मौन को जाग्रत करता है। यह वही स्थिति है जहाँ संगीत समाप्त नहीं होता, बल्कि मौन में परिवर्तित हो जाता है। इसीलिए कबीर के ध्वनि-संसार का अंतिम लक्ष्य सुनना नहीं, सुनने वाले का बदल जाना है।

अनहद नाद की चर्चा करते समय अधिकांश व्याख्याएँ उसे रहस्यवाद का विषय बनाकर छोड़ देती हैं किन्तु अनहद केवल योगिक अनुभूति नहीं है। वह मनुष्य की भीतरी एकाग्रता का चरम बिंदु है। जब मन की असंख्य आवाज़ें शांत होने लगती हैं, तब एक ऐसी लय अनुभव में आती है जो बाहर से नहीं आती। उसका स्रोत स्वयं चेतना होती है। कबीर इसी अनुभव को अनेक प्रतीकों में व्यक्त करते हैं। उनके लिए अनहद किसी चमत्कार का नाम नहीं बल्कि अंतर्मन की निर्मलता का स्वाभाविक संगीत है।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि कबीर के यहाँ ध्वनि और मौन परस्पर विरोधी नहीं हैं। वे एक-दूसरे की पूर्णता हैं। जितना गहरा मौन होगा, उतनी ही स्पष्ट ध्वनि सुनाई देगी। और जितनी सूक्ष्म ध्वनि होगी, उतना ही विशाल मौन जन्म लेगा। यह संबंध भारतीय संगीत की उस परंपरा से भी जुड़ता है जहाँ स्वरों के बीच का विराम स्वयं एक अर्थ रखता है। कबीर इसी विराम को आध्यात्मिक अनुभूति का द्वार बना देते हैं।

कबीर की कविता का लय-विधान उनके ध्वनि-दर्शन का अंग है। उनकी साखियाँ छोटी हैं पर उनमें ध्वनि का संकेंद्रण अत्यंत तीव्र है। उनके पद गेय हैं, पर उनका गेयत्व केवल संगीतात्मक नहीं, अनुभवात्मक है। शब्दों का क्रम, ध्वनियों की पुनरावृत्ति, लघु और दीर्घ स्वरों का संतुलन, सब मिलकर ऐसी आंतरिक लय रचते हैं जो पाठक को केवल अर्थ नहीं देती, बल्कि उसे एक विशेष मानसिक स्थिति में ले जाती है। इस दृष्टि से कबीर का काव्य भारतीय ध्वनि-संरचना का अत्यंत परिष्कृत उदाहरण है।

आधुनिक युग में मनुष्य ध्वनियों से घिरा हुआ है पर सुनने की क्षमता खोता जा रहा है। मशीनों का शोर, सूचना का विस्फोट, निरंतर बोलती हुई स्क्रीनें और थक चुकी चेतना। ऐसे समय में कबीर का ध्वनि-संसार एक वैकल्पिक आध्यात्मिक प्रस्ताव प्रस्तुत करता है। वे मनुष्य को बाहर की आवाज़ों से भागने के लिए नहीं कहते, बल्कि भीतर की उस ध्वनि को पहचानने के लिए प्रेरित करते हैं जो किसी बाज़ार की वस्तु नहीं, किसी तकनीक की उपलब्धि नहीं और किसी धार्मिक प्रदर्शन का हिस्सा भी नहीं है।

कबीर के यहाँ संगीत का अर्थ रागों की विद्वत्ता नहीं है। उनके लिए सबसे बड़ा वाद्य स्वयं मनुष्य है। श्वास उसकी बाँसुरी है। हृदय उसका मृदंग है। चेतना उसकी वीणा है। जब ये तीनों संतुलित होते हैं, तब जीवन स्वयं एक गान बन जाता है। यही कारण है कि कबीर का संगीत किसी मंच पर नहीं जन्म लेता। वह खेत में भी उपस्थित है, करघे पर भी, नदी के किनारे भी, साधना में भी और श्रम में भी। यह लोक और अध्यात्म का अद्भुत संयोग है।

कबीर का ध्वनि-दर्शन मनुष्य को यह बताता है कि ब्रह्मांड शब्दों से नहीं, स्पंदनों से बना है। प्रत्येक जीव, प्रत्येक वृक्ष, प्रत्येक नदी और प्रत्येक तारा अपनी-अपनी लय में अस्तित्व का गान गा रहा है। मनुष्य तभी तक अकेला है, जब तक वह इस विराट संगीत से कटा हुआ है। जैसे ही वह अपनी भीतरी ध्वनि को पहचानता है, वह समूची सृष्टि के संगीत में सम्मिलित हो जाता है। तब अनहद नाद कोई रहस्यमय अवधारणा नहीं रह जाता बल्कि जीवन की सबसे स्वाभाविक अनुभूति बन जाता है।

कबीर के ध्वनि-संसार का महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि सत्य देखा कम जाता है और सुना भी कम जाता है। वह सबसे पहले भीतर स्पंदित होता है। वही स्पंदन शब्द बनता है, वही शब्द मौन में विलीन होता है और उसी मौन में मनुष्य अपनी सबसे प्राचीन, सबसे निर्मल और सबसे व्यापक पहचान प्राप्त करता है।

।। दो ।।

कबीर के ध्वनि-संसार का एक अत्यंत सूक्ष्म पक्ष यह है कि वहाँ शब्द कभी अकेला नहीं चलता। प्रत्येक शब्द अपने पीछे एक अदृश्य प्रतिध्वनि लेकर आता है। यह प्रतिध्वनि केवल ध्वनि की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि अर्थ की दूसरी यात्रा है। कबीर के पदों को यदि केवल भाषा के स्तर पर पढ़ा जाए, तो उनका एक अर्थ मिलता है; यदि उन्हें ध्वनि के स्तर पर सुना जाए, तो दूसरा; और यदि उन्हें साधना के स्तर पर जिया जाए, तो तीसरा। यही त्रिस्तरीय संरचना कबीर को सामान्य कवि से अलग करती है।

कबीर के लिए शब्द का मूल्य उसके उच्चारण में नहीं, उसके जागरण में है। संसार में असंख्य शब्द प्रतिदिन बोले जाते हैं, पर उनमें से अधिकांश केवल वायु को स्पर्श करते हैं। वे मनुष्य के भीतर प्रवेश नहीं कर पाते। कबीर ऐसे शब्द की खोज करते हैं जो हृदय के सबसे गहरे प्रदेश में उतरकर चेतना को झकझोर दे। इसलिए उनकी भाषा में अलंकारों का वैभव नहीं, अनुभव का ताप अधिक है। उनके शब्द चमकते कम हैं, जलते अधिक हैं। वे सजावट नहीं, साधना के उपकरण हैं।

यहाँ ध्वनि का संबंध स्मृति से भी जुड़ता है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर कुछ ऐसी ध्वनियाँ रहती हैं जो कभी नष्ट नहीं होतीं। बचपन की पुकार, माँ की आवाज़, किसी नदी की कलकल, किसी वर्षा की पहली बूँद, किसी संध्या का मंदिर-घंटा। कबीर इन मानवीय स्मृतियों से आगे जाकर उस आदिम स्मृति की ओर संकेत करते हैं, जहाँ आत्मा अपने मूल स्वर को पहचानती है। यह पहचान किसी इतिहास की नहीं, अस्तित्व की स्मृति है। मानो मनुष्य अपने भीतर बहुत पहले से बज रही किसी वीणा को अचानक सुन ले।

कबीर की काव्य-भाषा में ध्वनि और श्वास का संबंध भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। श्वास केवल जैविक क्रिया नहीं है। वह जीवन का अनवरत छंद है। प्रत्येक श्वास एक लघु मंत्र है, प्रत्येक निःश्वास एक सूक्ष्म विसर्जन। योग की परंपरा में श्वास और नाद का जो संबंध स्थापित हुआ, कबीर उसे लोकभाषा में रूपांतरित कर देते हैं। इसीलिए उनके यहाँ साधना किसी गूढ़ ग्रंथ का विषय नहीं बनती, बल्कि साँस लेने जितनी स्वाभाविक प्रक्रिया बन जाती है।

कबीर की दृष्टि में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य शब्दों से प्रेम करता है पर अर्थ से नहीं; संगीत से प्रेम करता है पर मौन से नहीं। वह स्वर को पकड़ना चाहता है, पर उस स्रोत तक नहीं जाना चाहता जहाँ से स्वर जन्म लेता है। इसलिए कबीर बार-बार मनुष्य को भीतर लौटने का संकेत देते हैं। यह लौटना किसी संप्रदाय में प्रवेश करना नहीं, बल्कि अपनी ही चेतना की ओर वापस आना है। वहाँ पहुँचकर ध्वनि का अर्थ बदल जाता है। वह कान का विषय नहीं रहती, आत्मा का अनुभव बन जाती है।

यदि भारतीय काव्यशास्त्र की दृष्टि से देखा जाए तो कबीर ध्वनि को केवल श्रव्य तत्त्व नहीं रहने देते। वह व्यंजना का भी आधार बन जाती है। उनके शब्द जितना कहते हैं, उससे कहीं अधिक संकेत करते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता का वास्तविक अर्थ उसके प्रत्यक्ष कथन में नहीं, उसकी आंतरिक अनुगूँज में छिपा रहता है। कबीर को पढ़ना वस्तुतः उनके शब्दों के बीच के मौन को पढ़ना है। वहाँ अर्थ धीरे-धीरे खुलता है, जैसे भोर का प्रकाश बिना किसी घोषणा के फैलता है।

कबीर का ध्वनि-दर्शन आधुनिक सभ्यता पर भी एक मौन प्रश्नचिह्न है। आज मनुष्य ने ध्वनि को शक्ति बना लिया है। लाउडस्पीकर, प्रचार, भाषण, घोषणाएँ और डिजिटल संसार की निरंतर बोलती हुई मशीनें। ध्वनि जितनी बढ़ी है, संवाद उतना ही क्षीण हुआ है। कबीर मानो इस युग से कहते हैं कि ऊँची आवाज़ सत्य का प्रमाण नहीं होती। सत्य की अपनी एक धीमी, किंतु अविनाशी ध्वनि होती है। उसे सुनने के लिए कानों से अधिक अंतःकरण की आवश्यकता होती है।

कबीर का ध्वनि-संसार मनुष्य को बोलना नहीं, सुनना सिखाता है और यह सुनना भी बाहरी नहीं, आंतरिक है। जब भीतर का कोलाहल शांत होने लगता है, तब अनहद की पहली झिलमिलाहट अनुभव में आती है। उसी क्षण कविता दर्शन बन जाती है, दर्शन संगीत बन जाता है और संगीत अंततः उस मौन में विलीन हो जाता है, जहाँ कबीर का समूचा काव्य अपने सबसे शुद्ध रूप में स्पंदित होता रहता है।

।। तीन ।।

कबीर की ध्वनि का सबसे अनदेखा पक्ष यह है कि वे ब्रह्मांड को एक विराट वाद्य की तरह देखते हैं। यह वाद्य किसी कारीगर ने नहीं बनाया, किसी राजदरबार में नहीं बजाया गया और किसी कलाकार की निजी प्रतिभा का परिणाम भी नहीं है। यह स्वयं अस्तित्व का स्वाभाविक संगीत है। पृथ्वी उसकी मंद्र ध्वनि है, आकाश उसका विस्तार है, वायु उसका स्पर्श है और जीवन उसकी निरंतर चलती हुई लय। मनुष्य जब तक स्वयं को इस महा-संगीत से अलग समझता है, तब तक वह अकेला रहता है। जैसे ही वह इस लय का अंश बनता है, उसका समस्त भय धीरे-धीरे विलीन होने लगता है।

कबीर की कविता में बार-बार दिखाई देने वाला “शब्द” वस्तुतः एक दार्शनिक सेतु है। वह दृश्य और अदृश्य के बीच पुल बनाता है। शब्द का एक सिरा भाषा में है, दूसरा अनुभव में। एक सिरा ध्वनि में है, दूसरा मौन में। यही कारण है कि कबीर के यहाँ शब्द कभी स्थिर नहीं रहता। वह बहता है, रूप बदलता है, भीतर उतरता है और अंततः स्वयं को भी पार कर जाता है। यह शब्द की आत्म-अतिक्रमण की प्रक्रिया है। भारतीय काव्य में इसका इतना सघन रूप विरल है।

कबीर की पूरी काव्य-यात्रा ध्वनियों के परिष्कार की यात्रा है। आरंभ में मनुष्य संसार की आवाज़ों में उलझा रहता है। फिर वह धर्म, परंपरा और कर्मकांड की आवाज़ों में प्रवेश करता है। उसके बाद वह अपने मन की अशांत ध्वनियों से जूझता है। इन सबको पार करने के बाद ही वह उस सूक्ष्म स्पंदन तक पहुँचता है जिसे कबीर अनहद की संज्ञा देते हैं। इस दृष्टि से अनहद कोई प्रारंभिक उपलब्धि नहीं, बल्कि दीर्घ आंतरिक अनुशासन का परिणाम है।

कबीर का संगीत इसलिए भी अद्वितीय है कि उसमें प्रदर्शन का कोई आग्रह नहीं है। भारतीय संगीत की बड़ी परंपरा मंच, श्रोता और प्रस्तुति से जुड़ती रही है, पर कबीर के यहाँ संगीत का सबसे बड़ा श्रोता स्वयं साधक है। यहाँ गायक और श्रोता अलग-अलग नहीं रहते। जो गा रहा है, वही सुन भी रहा है। यह आत्म-संवाद का संगीत है। इसमें ताली की आवश्यकता नहीं, तल्लीनता की आवश्यकता है। इसमें प्रशंसा का कोई स्थान नहीं, केवल उपस्थिति का महत्व है।

कबीर ध्वनि को नैतिकता से भी जोड़ते प्रतीत होते हैं। मनुष्य जैसा बोलता है, वैसा ही धीरे-धीरे बनता भी है। वाणी केवल विचारों की अभिव्यक्ति नहीं करती, वह व्यक्तित्व का निर्माण भी करती है। कटु भाषा पहले बोलने वाले को घायल करती है, फिर दूसरे को। इसी प्रकार सत्य और करुणा से निकला हुआ शब्द पहले स्वयं वक्ता को निर्मल करता है। इस अर्थ में कबीर का ध्वनि-दर्शन भाषा के नैतिक अनुशासन का भी दर्शन है। शब्द केवल अर्थ नहीं ढोते, वे चरित्र भी निर्मित करते हैं।

उनकी कविता यह भी संकेत करती है कि प्रत्येक मौन समान नहीं होता। भय का मौन अलग है, अहंकार का मौन अलग, पराजय का मौन अलग और समाधि का मौन अलग। कबीर जिस मौन की ओर ले जाते हैं, वह रिक्तता का नहीं, पूर्णता का मौन है। उसमें ध्वनि अनुपस्थित नहीं होती, बल्कि इतनी सूक्ष्म हो जाती है कि वह अलग से सुनाई नहीं देती। जैसे नदी समुद्र में मिलकर अपनी अलग पहचान खो देती है, वैसे ही शब्द उस मौन में विलीन होकर अपनी अंतिम सार्थकता प्राप्त करता है।

कबीर की भाषा में करघे की खटखट भी है, चाक की घूमती हुई लय भी, नाव की धीमी गति भी और श्रम करते हुए मनुष्य की साँसों का संगीत भी। इसलिए उनका ध्वनि-संसार केवल आध्यात्मिक नहीं, श्रम-संस्कृति का भी संसार है। वे बताते हैं कि श्रमहीन अध्यात्म अंततः खोखला हो जाता है। जो हाथ श्रम करते हैं, वही भीतर की लय को अधिक सहजता से पहचानते हैं। इसीलिए कबीर का संगीत राजमहलों में नहीं, जनजीवन के बीच जन्म लेता है।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में कबीर का ध्वनि-दर्शन एक नई आलोचनात्मक दृष्टि भी देता है। आज मनुष्य सूचना से भरा हुआ है, पर अनुभूति से रिक्त होता जा रहा है। शब्दों की संख्या बढ़ रही है, अर्थ की गहराई घट रही है। ध्वनियाँ बढ़ रही हैं, श्रवण घट रहा है। संचार तीव्र हो रहा है, संवाद क्षीण हो रहा है। ऐसे समय में कबीर हमें स्मरण कराते हैं कि सभ्यता की वास्तविक उन्नति शब्दों की अधिकता में नहीं, उनके सत्य और उनकी आंतरिक अनुगूँज में निहित है।

कबीर की कविता में ध्वनि किसी अलंकार की तरह नहीं आती बल्कि अस्तित्व की मूल लय बनकर उपस्थित होती है। उसी लय में मनुष्य स्वयं को सुनता है, संसार को सुनता है और अंततः उस अनश्वर स्पंदन को पहचानने लगता है, जिसके लिए कबीर ने शब्दों का सहारा लिया, पर जिसकी अंतिम पहचान शब्दों के पार ही संभव है।

।। चार ।।

कबीर के ध्वनि-संसार का एक और विलक्षण पक्ष यह है कि वे ब्रह्मांड को किसी वस्तु की तरह नहीं बल्कि एक सतत घटित होती हुई घटना की तरह देखते हैं। यह घटना दृश्य से अधिक श्रव्य है। आँखें आकार देखती हैं पर कान गति को पहचानते हैं। इसी कारण कबीर के यहाँ सत्य किसी मूर्ति की तरह स्थिर नहीं है, वह एक निरंतर स्पंदित होती हुई उपस्थिति है। उसे पकड़ना संभव नहीं, केवल उसके साथ लयबद्ध हुआ जा सकता है।

ध्वनि का स्वभाव है कि वह अपने स्रोत से निकलकर दूसरे तक पहुँचती है। वह अपने लिए नहीं जीती। कबीर इस स्वभाव को आध्यात्मिक अर्थ प्रदान करते हैं। उनके लिए मनुष्य भी तब तक अधूरा है, जब तक वह केवल अपने भीतर बंद है। जिस प्रकार ध्वनि अपने को बाँटकर ही पूर्ण होती है, उसी प्रकार चेतना भी अपने विस्तार में ही अपनी सार्थकता प्राप्त करती है। इसीलिए कबीर का शब्द आत्मकेंद्रित नहीं, लोकाभिमुख है। उसमें आत्मानुभूति है पर आत्ममुग्धता नहीं।

कबीर की कविता में ध्वनि और प्रकाश का एक गहरा अंतर्संबंध दिखाई देता है। भारतीय दार्शनिक परंपरा ने प्रकाश को ज्ञान का प्रतीक माना, पर कबीर संकेत करते हैं कि प्रकाश का भी अपना संगीत होता है। भोर का फैलना, संध्या का उतरना, दीपक की लौ का काँपना, चाँदनी का निःशब्द बहना। ये सब ऐसी घटनाएँ हैं जिन्हें आँखें देखती हैं किन्तु उनका अनुभव भीतर एक सूक्ष्म ध्वनि की तरह होता है। इसीलिए कबीर के यहाँ ज्ञान केवल प्रकाश नहीं, एक आंतरिक अनुगूँज भी है।

यदि कबीर की भाषा का ध्वन्यात्मक अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट होगा कि वे ऐसे शब्दों का चयन करते हैं जिनमें अनावश्यक आडंबर नहीं है। उनकी भाषा में लोकजीवन की सहज ध्वनियाँ हैं। वे संस्कृतनिष्ठ वैभव की अपेक्षा जनभाषा की जीवित लय को स्वीकार करते हैं। यह केवल भाषिक निर्णय नहीं, सांस्कृतिक घोषणा भी है। शब्द जितना जीवन के निकट होगा, उतना ही वह आत्मा के निकट पहुँचेगा।

कबीर का ध्वनि-दर्शन स्मृति और भविष्य के बीच भी एक अद्भुत सेतु बनाता है। ध्वनि कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होती। वह किसी न किसी रूप में आगे बढ़ती रहती है। इसी प्रकार एक सच्चा शब्द भी समय के साथ नष्ट नहीं होता। वह पीढ़ियों के भीतर नई प्रतिध्वनियाँ उत्पन्न करता रहता है। कबीर की वाणी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उनके शब्द आज भी इसलिए जीवित हैं कि वे किसी युग की राजनीतिक आवश्यकता नहीं, मनुष्य की शाश्वत बेचैनी से उत्पन्न हुए थे। जो शब्द मनुष्य की मूल जिज्ञासा से जन्म लेते हैं, वे काल के क्षरण से बच जाते हैं।

कबीर के यहाँ ध्वनि कभी हिंसक नहीं होती, चाहे उनका कथन कितना ही तीखा क्यों न हो। उनकी भाषा प्रहार करती है, पर उसका उद्देश्य विनाश नहीं, जागरण है। जैसे घंटी की ध्वनि सोए हुए व्यक्ति को जगाती है, वैसे ही कबीर का शब्द जड़ चेतना को झकझोरता है। उनकी वाणी की कठोरता के भीतर करुणा का एक अदृश्य स्रोत बहता रहता है। यही कारण है कि उनका व्यंग्य मनुष्य को उसके अधिक प्रामाणिक स्वरूप तक पहुँचाने का प्रयास है।

कबीर के ध्वनि-संसार में प्रकृति स्वयं एक महान गायिका है। नदी केवल बहती नहीं, गाती भी है। वायु केवल चलती नहीं, संवाद करती है। वर्षा केवल गिरती नहीं, पृथ्वी के साथ एक प्राचीन संगीत रचती है। पक्षियों का कलरव केवल जैविक व्यवहार नहीं, जीवन के उत्सव का उद्घोष है। कबीर इन ध्वनियों को सजावटी बिंब की तरह नहीं लेते। वे उन्हें इस बात के प्रमाण के रूप में देखते हैं कि सृष्टि का मूल स्वभाव लय है, संघर्ष नहीं। जहाँ लय टूटती है, वहीं से मनुष्य का आंतरिक विखंडन आरंभ होता है।

आधुनिक मनुष्य के लिए कबीर का यह ध्वनि-दर्शन एक गहरी सांस्कृतिक चुनौती भी है। हमने संगीत को उद्योग बना दिया, शब्द को प्रचार बना दिया और संवाद को सूचना में बदल दिया। परिणाम यह हुआ कि ध्वनियाँ बढ़ीं पर आत्मीयता घटती गई। कबीर इस विडंबना का समाधान किसी तकनीक में नहीं खोजते। वे मनुष्य को उसकी अपनी श्वास तक लौटाते हैं। क्योंकि जो अपनी श्वास की लय नहीं सुन सकता, वह संसार की किसी भी महान ध्वनि को नहीं सुन सकेगा।

कबीर का ध्वनि-संसार यह उद् घाटित करता है कि सृष्टि का सबसे बड़ा रहस्य किसी दृश्य में नहीं, किसी स्पंदन में छिपा है। मनुष्य जब इस स्पंदन के साथ अपने जीवन की लय मिला देता है तब धर्म संप्रदाय नहीं रह जाता, कविता अलंकार नहीं रह जाती, संगीत मनोरंजन नहीं रह जाता और शब्द केवल भाषा नहीं रह जाता। वे सब मिलकर अस्तित्व की उस अखंड ध्वनि में रूपांतरित हो जाते हैं, जिसे कबीर ने अनहद कहा और जिसे सुनने के लिए बाहर नहीं, भीतर उतरना पड़ता है।

।। पांच।।

कबीर को पढ़ते समय प्रायः उनके विचार, उनकी निर्गुण साधना, उनके सामाजिक प्रतिरोध और उनकी भाषा पर चर्चा होती है, पर उनकी ध्वनि पर बहुत कम विचार किया गया है। शब्द अर्थ से पहले ध्वनि बनकर जन्म लेता है। कविता पहले सुनाई देती है, बाद में समझ में आती है। कबीर का काव्य भी इसी नियम का अपवाद नहीं है। यदि उनकी वाणी को भोजपुरी के लोक-श्रवण की परंपरा में रखकर सुना जाए, तो एक बिल्कुल भिन्न संसार खुलता है। वहाँ कबीर केवल विचारक नहीं रह जाते, वे बोलने वाले, पुकारने वाले, गाने वाले और संवाद रचने वाले कवि बन जाते हैं।

भोजपुरी का सांस्कृतिक स्वभाव श्रव्य है। वह लिखित भाषा बनने से पहले अनेक शताब्दियों तक कंठ की भाषा रही। खेतों की मेड़, चरखा, नदी का घाट, अखाड़ा, चौपाल, विवाह, कजरी, बिरहा, निर्गुण और सोहर, सब ध्वनि के सहारे जीवित रहे। इस लोक में शब्द का अर्थ उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता जितना उसका उच्चारण, उसका आरोह-अवरोह और उसका सामूहिक कंपन। कबीर की वाणी भी इसी श्रव्य परंपरा में अपना सबसे स्वाभाविक घर पाती है।

कबीर बार-बार संबोधन से अपनी बात आरम्भ करते हैं। “साधो”, “भाई”, “संतो”, “अवधू”, “रे”, “हो” जैसे शब्द केवल व्याकरणिक संबोधन नहीं हैं। वे श्रोता को भीतर से जगाने वाली ध्वनियाँ हैं। भोजपुरी का लोकजीवन भी संवाद की शुरुआत इसी प्रकार करता है। वहाँ वाक्य से पहले आवाज़ आती है। कोई खेत के उस पार से पुकारता है, कोई नाव से आवाज़ देता है, कोई चौपाल पर किसी को बुलाता है। इस पुकार में भाषा से अधिक आत्मीयता होती है। कबीर ने इसी लोक-ध्वनि को अपने काव्य का आधार बनाया।

कबीर की कविता पढ़ने की अपेक्षा सुनने पर अधिक प्रभाव छोड़ती है। उनके शब्दों में छोटे-छोटे ध्वनि-खंड हैं, जिनमें साँस की लय छिपी रहती है। यह लय शास्त्रीय छंद की अनुशासित गति नहीं है, बल्कि लोकजीवन की चलती हुई साँस है। भोजपुरी का गायक जब कबीर गाता है, तो वह छंद का पालन नहीं करता, वह श्वास का अनुसरण करता है। इसी कारण कबीर की वाणी आज भी निर्गुण गायकों के कंठ में जीवित है।

भोजपुरी ध्वनि-संस्कृति में दीर्घ स्वरों का विशेष महत्त्व है। “हो”, “रे”, “ए”, “जी” जैसे विस्तार केवल शब्द नहीं, ध्वनि की खुली जगहें हैं। वे अर्थ को फैलाते हैं। कबीर की वाणी में भी ऐसे अनेक ध्वनि-विस्तार मिलते हैं। जब निर्गुण गायक “साधो…” कहकर रुकता है, तो उस विराम में भी अर्थ पैदा होता है। यह विराम भोजपुरी लोकसंगीत की सबसे बड़ी शक्ति है। कबीर का दर्शन कई बार शब्दों से अधिक उन्हीं विरामों में सुनाई देता है।

कबीर के यहाँ ध्वनि केवल मधुरता का माध्यम नहीं है। वह झटका भी देती है। उनकी भाषा में कठोर व्यंजन बार-बार आते हैं। ट, ठ, क, त, द, भ, घ जैसी ध्वनियाँ उनकी कविता को एक प्रकार की ठोस देह देती हैं। भोजपुरी की बोलचाल भी इसी कारण प्रभावशाली लगती है। उसमें कोमलता के साथ एक ग्रामीण कठोरता भी रहती है। कबीर की वाणी इस कठोरता को सौंदर्य में बदल देती है।

लोकगायन में कबीर के पदों का स्वर कभी स्थिर नहीं रहता। प्रत्येक गाँव, प्रत्येक गायक, प्रत्येक परंपरा अपनी ध्वनि जोड़ देती है। इस प्रकार कबीर की कविता एक निश्चित पाठ नहीं रहती, बल्कि ध्वनि की जीवित परंपरा बन जाती है। भोजपुरी समाज ने कबीर को पुस्तक में नहीं, कंठ में सुरक्षित रखा है। यही कारण है कि अनेक स्थानों पर लोग पूरा पद भूल जाते हैं, पर उसकी ध्वनि नहीं भूलते।

ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि भोजपुरी लोक में कबीर की स्वीकृति उनके विचारों के कारण जितनी नहीं हुई, उससे कहीं अधिक उनकी ध्वनि के कारण हुई। उनकी वाणी सुनने में लोक जैसी लगती है। उसमें आदेश नहीं, पुकार है; उपदेश नहीं, बातचीत है; दार्शनिक गूढ़ता नहीं, जीवन की चलती हुई आवाज़ है। इसी कारण अशिक्षित श्रोता भी कबीर से जुड़ जाता है।

कबीर का अनहद नाद भी ध्वनि का ऐसा ही रूप है जिसे केवल आध्यात्मिक प्रतीक मान लेना पर्याप्त नहीं। भोजपुरी लोक-संस्कृति में अनहद का अनुभव अनेक प्राकृतिक ध्वनियों से जुड़ता है। बैलों की घंटी, चरखे की घरघराहट, चाक का घूमना, नदी की लहर, वर्षा की झिर-झिर, मंदिर की घंटी और मनुष्य की साँस, सब मिलकर उस ध्वनि-लोक का निर्माण करते हैं जिसमें कबीर का ‘शब्द’ जन्म लेता है। यहाँ दर्शन और लोक-संस्कृति अलग नहीं रहते।

कबीर का ध्वनि-संसार इस बात का प्रमाण है कि भोजपुरी केवल एक बोली नहीं, बल्कि सुनने की एक विशिष्ट संस्कृति भी है। कबीर ने इस संस्कृति को शब्दों में नहीं, स्वरों में पकड़ा। इसलिए उनकी कविता पढ़कर जितनी समझ में आती है, उससे कहीं अधिक गाकर और सुनकर खुलती है। भोजपुरी के परिप्रेक्ष्य में कबीर का पुनर्पाठ वास्तव में उनके ध्वनि-ब्रह्म का पुनः आविष्कार है, जहाँ अर्थ कान से होकर हृदय तक पहुँचता है और शब्द, आवाज़ बनकर दर्शन में बदल जाता है।

।। छ:।।

कबीर के काव्य में ध्वनि केवल श्रवण का विषय नहीं बल्कि अस्तित्व का मूल तत्त्व है। उनकी कविता में शब्द, नाद, अनहद, मौन और संगीत अलग-अलग अवधारणाएँ नहीं हैं बल्कि एक ही आध्यात्मिक और काव्यात्मक प्रक्रिया के विविध आयाम हैं। कबीर शब्द से आरंभ करते हैं पर उनका लक्ष्य शब्द के पार स्थित उस अनुभव तक पहुँचना है जहाँ भाषा समाप्त हो जाती है और केवल चेतना का स्पंदन शेष रहता है। इसीलिए उनकी वाणी का वास्तविक अर्थ उसके प्रत्यक्ष कथन में नहीं, उसकी आंतरिक अनुगूँज में निहित है।

कबीर का ध्वनि-संसार भारतीय दार्शनिक परंपरा के अनेक स्रोतों से संवाद करता है, किन्तु उसकी अपनी स्वतंत्र पहचान भी निर्मित करता है। वैदिक शब्द-ब्रह्म की अवधारणा, उपनिषदों की मौन-दृष्टि, योग की नाद-साधना और लोकजीवन की सहज लय, इन सबका एक अद्भुत समन्वय उनकी कविता में दिखाई देता है। परंतु वे किसी सिद्धांत के व्याख्याकार नहीं बनते। वे अनुभव के कवि हैं। उनके यहाँ ध्वनि किसी ग्रंथ का निष्कर्ष नहीं, साधना का प्रत्यक्ष बोध है।

इस अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि कबीर के यहाँ अनहद नाद किसी अलौकिक चमत्कार का नाम नहीं है। वह मनुष्य की अंतःचेतना का परिष्कृत स्पंदन है। जब मन बाह्य कोलाहल, अहंकार, भय और वासनाओं के दबाव से मुक्त होता है, तब उसके भीतर एक ऐसी लय जागती है जो किसी बाहरी वाद्य से उत्पन्न नहीं होती। वही अनहद है। इस प्रकार कबीर ध्वनि को आध्यात्मिक अनुभव का माध्यम बनाते हैं, न कि रहस्यवादी प्रदर्शन का।

कबीर का शब्द-दर्शन भी अत्यंत विशिष्ट है। उनके लिए शब्द सूचना का साधन नहीं, रूपांतरण की शक्ति है। वह मनुष्य को बदलने, जगाने और उसकी सुप्त चेतना को सक्रिय करने का माध्यम है। इसलिए उनके शब्दों में भाषिक चमत्कार की अपेक्षा अनुभूति की तीव्रता अधिक मिलती है। उनकी भाषा का सौंदर्य उसकी सरलता में है और उसकी शक्ति उसकी आंतरिक प्रतिध्वनि में। यही कारण है कि कबीर की कविता का प्रभाव उसके अर्थ से अधिक उसकी लय और उसके अनुभव में निहित है।

ध्वनि और मौन के संबंध की दृष्टि से भी कबीर की काव्य-दृष्टि अत्यंत मौलिक है। वे मौन को ध्वनि का विरोध नहीं मानते, बल्कि उसकी परिपूर्णता मानते हैं। जिस प्रकार नदी समुद्र में विलीन होकर अपनी अंतिम पहचान प्राप्त करती है, उसी प्रकार शब्द भी मौन में प्रवेश करके अपनी सर्वोच्च सार्थकता प्राप्त करता है। यह मौन निष्क्रियता का नहीं बल्कि चेतना की पूर्ण जागरूकता का मौन है।

कबीर का ध्वनि-संसार केवल आध्यात्मिक विमर्श तक सीमित नहीं है। उसमें श्रम की लय, लोकजीवन का संगीत, प्रकृति का स्पंदन, मानवीय करुणा और नैतिक वाणी का अनुशासन भी समान रूप से उपस्थित है। करघे की खटखट, श्वास की गति, नदी की धारा और श्रमिक के श्रम में भी कबीर उसी ब्रह्मांडीय संगीत की अनुभूति करते हैं, जिसे वे अनहद कहते हैं। इस प्रकार उनका ध्वनि-दर्शन जीवन-विमुख नहीं बल्कि जीवन-सापेक्ष है।

समकालीन संदर्भ में यह ध्वनि-दर्शन और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। आज का मनुष्य अभूतपूर्व शोर, सूचना और संचार के बीच रहते हुए भी भीतर से नितांत निःसंग होता जा रहा है। ध्वनियों की वृद्धि के साथ श्रवण की क्षमता घट रही है, शब्दों की अधिकता के साथ अर्थ का क्षरण हो रहा है। ऐसे समय में कबीर मनुष्य को बाहरी संसार से पलायन का नहीं बल्कि अपनी ही भीतरी लय से पुनः जुड़ने का मार्ग सुझाते हैं। उनका ध्वनि-संसार आधुनिक सभ्यता के कोलाहल के विरुद्ध आत्मिक संतुलन का एक गंभीर सांस्कृतिक प्रस्ताव है।

कबीर की कविता में ध्वनि अस्तित्व का व्याकरण है, शब्द चेतना का सेतु है, संगीत आत्मा की गति है और मौन उस अंतिम सत्य का निवास है जहाँ सभी ध्वनियाँ अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करके अनंत में विलीन हो जाती हैं। इसी बिंदु पर कबीर की कविता केवल कविता नहीं रह जाती बल्कि मनुष्य और ब्रह्मांड के बीच घटित होने वाला एक अनश्वर संवाद बन जाती है।


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