
धर्म का कार्य आस्तिक लोग ही कर सकते हैं। राजनेताओं को धर्म के क्षेत्र में हस्तक्षेप करने का मौका देना धर्म का नाश करना है। धर्म का कार्य शांति से होता है। करोड़ों का चंदा इकट्ठा करके वैभव और विलास के साथ शक्ति-प्रदर्शन करते हुए धर्म का विस्तार कभी नहीं होता।
भारतीय ज्ञान-परंपरा में संतों ने कहा है कि जब भी ऐसा माहौल बनेगा, जहाँ शक्ति-प्रदर्शन होगा, वहाँ वासना होगी, गैर-जिम्मेदारी बढ़ेगी और अनैतिकता का विस्तार होगा।
भारत में हजारों वर्षों से मंदिरों की व्यवस्था चली आ रही है। परंपरा-बोध बताता है कि मंदिर में सादगी, शोभा और मर्यादा का मूल्य-बोध होता है। सादगी का अपना एक गौरव होता है। शक्ति-प्रदर्शन करते हुए हजारों करोड़ का मंदिर बनाना एक तरह से मलिन मन से निर्मल कार्य करने जैसा है। अनैतिक चित्त से कभी भी नैतिक कार्य नहीं हो सकता। मंदिर बनाने के लिए पूँजी से अधिक आस्था और श्रद्धा की आवश्यकता होती है।
आस्था के प्रदर्शन और शक्ति के प्रदर्शन में अंतर होता है। जब भी धर्म का उपयोग शक्ति-प्रदर्शन के लिए किया जाता है, तब वह समाज को हिंसा, निराशा और दंड देता है। धर्म जब राजनीति के लिए प्रयुक्त होता है, तब उसमें वासना और अहंकार का बोध होता है, जिससे अध्यात्म की चेतना नष्ट हो जाती है। राजनीतिक आग्रह सात्त्विक मूल्य-बोध को समाप्त कर देता है।
एक बार की बात है। महारानी अहिल्याबाई ने अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए उस समय के पुराने मंदिरों की शोभा बढ़ाने का कार्य प्रारंभ किया। उन्होंने बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर पर सोने की परत चढ़वाने की इच्छा जाहिर की । तब संत समाज ने उनसे कहा, “देवीजी, आप जो कर रही हैं, वह ठीक है, लेकिन इसका कोई लाभ नहीं है। मंदिर में सोने का क्या काम?” संतों ने अहिल्याबाई से कहा कि यदि आप मंदिर को सेवा, ज्ञान, संस्कार, आस्था और श्रद्धा का केंद्र बनाएँगी, तो उसका अधिक महत्व होगा। तब महारानी अहिल्याबाई रुक गईं और उन्होंने सेवा तथा शिक्षा के अनेक कार्य किए, घाट बनवाए, धर्मशालाएँ बनवाईं, लेकिन उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर पर आगे सोना नहीं चढ़वाया और मंदिर को अत्यधिक सजाने का कार्य नहीं किया।
इसी प्रकार, जब अकबर पुत्र-प्राप्ति की मनोकामना लेकर अजमेर की दरगाह गया और पुत्र होने के बाद धन्यवाद देने के लिए पुनः वहाँ पहुँचा, तो उसने दरगाह की देखरेख कर रहे लोगों से पूछा, “मैं दरगाह के लिए क्या करूँ?” उन्होंने कहा, “आप क्या करना चाहते हैं?” अकबर ने उत्तर दिया, “मैं दरगाह की शोभा बढ़ाना चाहता हूँ।” तब मौलवियों ने कहा, “ऐसा मत कीजिए। यहाँ बहुत सारे लोग आते हैं। उनके लिए प्रसाद (लंगर) वितरण हेतु एक बड़ा-सा कड़ाहा बनवा दीजिए, ताकि सबका भोजन एक साथ बन सके और सभी को प्रसाद प्राप्त हो।” तब अकबर ने एक बहुत बड़ा कड़ाहा बनवाया, जो आज भी अजमेर की दरगाह में मौजूद है।
इसी प्रकार, जब चर्चों में अत्यधिक धन और पूँजी लगाई गई, तो बड़े-बड़े चर्च बने। उनके माध्यम से शक्ति-प्रदर्शन होने लगा और उसके साथ अनेक अनैतिक कार्य भी होने लगे। बाद में पादरियों और राजाओं के बीच संघर्ष भी प्रारंभ हो गया।
जब प्रोटेस्टेंट सुधार आंदोलन (Reformation Movement) हुआ, तब यह विचार सामने आया कि इतने दिखावे की क्या आवश्यकता है। चर्च सादगी से भी बनाए जा सकते हैं। इसलिए प्रोटेस्टेंट चर्च सादगी के आधार पर निर्मित किए गए।
इसी प्रकार, जब गुरुद्वारे बने, तो उन्हें लोगों की राहत और सेवा का केंद्र बनाया गया। हिंदू और मुसलमानों के धार्मिक स्थलों में जहाँ कहीं-कहीं निर्माण के माध्यम से दिखावे की प्रवृत्ति बढ़ी, उससे अलग गुरुद्वारों की आधारशिला सादगी और सेवा पर रखी गई। गुरुद्वारों ने कभी इस बात पर बल नहीं दिया कि उनमें कितना हीरा-जवाहरात हो। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि लोगों की भूख कैसे दूर हो, दरिद्रता कैसे कम हो। इस प्रकार उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की आधारशिला रखी।
अतः मैं लोगों से निवेदन करूँगा कि धर्म को शक्ति-प्रदर्शन के बजाय सेवा के लिए सामर्थ्य-बोध के निर्माण का मार्ग बनाया जाए।
धर्म नैतिकता, सेवा और न्याय के प्रश्नों के प्रति संवेदना उत्पन्न करने की प्रक्रिया है। धर्म समाज की शक्ति को जगाने तथा मनुष्य के चरित्र-निर्माण की नैतिक पहल होना चाहिए। इसलिए हमें बुद्ध के विवेक, कबीर के तर्क, इस्लाम के भ्रातृत्व, शंकराचार्य की श्रद्धा और गुरु नानक की सेवा से प्रेरणा लेते हुए धर्म को लोककल्याण के मार्ग के रूप में समझने की आवश्यकता है, न कि शक्ति-प्रदर्शन, अहंकार की तृप्ति और दूसरों को कष्ट पहुँचाने के साधन के रूप में।
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