डॉ. राजेंद्र प्रसाद: चंपारण से राष्ट्रपति भवन तक ‘सादगी’ का सफर

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Dr. Rajendra Prasad

भारतीय राजनीति के आकाश में डॉ. राजेंद्र प्रसाद एक ऐसे नक्षत्र हैं, जिनकी चमक उनकी सादगी और विद्वत्ता से निर्धारित होती थी। 15 अप्रैल, 1917 की वह काली स्याह रात, जब चंपारण के आंदोलन की नींव पड़ रही थी, मुजफ्फरपुर स्टेशन पर तीसरे दर्जे के डिब्बे से उतरते एक मुसाफिर (गांधी) ने न केवल भारत का इतिहास बदला, बल्कि बिहार के एक मेधावी वकील राजेंद्र प्रसाद के जीवन दर्शन को भी सदा के लिए रूपांतरित कर दिया।

​एक ‘भूल’ जिसने बदल दिया राजेंद्र बाबू का जीवन

गांधीजी जब पहली बार पटना पहुंचे, तो राजकुमार शुक्ल उन्हें राजेंद्र बाबू के घर ले गए। राजेंद्र बाबू उस समय शहर में नहीं थे। गांधी की साधारण वेशभूषा देख उनके नौकरों ने उन्हें एक सामान्य मुवक्किल समझकर बरामदे में रुकने को कहा। उन्हें कुएं से पानी छूने और शौचालय इस्तेमाल करने तक की अनुमति नहीं दी गई। जब राजेंद्र बाबू लौटे और उन्हें इस घटना का पता चला, तो वे आत्मग्लानि से भर गए। यही वह क्षण था जिसने डॉ. प्रसाद को गांधी का अनन्य शिष्य बना दिया।

​अपनी आत्मकथा में वे लिखते हैं कि गांधी के साथ रहने से उनकी जीवनशैली पूरी तरह बदल गई। कट्टर जातिगत नियमों को मानने वाले राजेंद्र बाबू अब सबके साथ बैठकर भोजन करने लगे। उन्होंने अपने रसोइए और नौकरों को विदा कर दिया और स्वयं अपने कपड़े धोना, बर्तन मांजना और शौचालय साफ करना शुरू किया। यह सादगी केवल प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि एक आंतरिक शुचिता थी जो राष्ट्रपति भवन पहुंचने के बाद भी अडिग रही। 1950 से 1962 तक देश के सर्वोच्च पद पर रहने के बावजूद वे एक ‘ऋषि’ की भांति रहे और सेवानिवृत्ति के बाद पटना के सदाकत आश्रम की एक साधारण कुटिया को अपना अंतिम ठिकाना बनाया।

चंपारण में कागज पर किसानों के बयान लिखने का काम

​गांधीजी चंपारण में वकीलों से उनकी ‘वकालत’ नहीं, बल्कि ‘क्लर्क’ का काम चाहते थे। वे चाहते थे कि हर किसान का बयान दर्ज हो ताकि अंग्रेजों के खिलाफ पुख्ता सबूत रहें। राजेंद्र बाबू जैसे बड़े वकीलों ने अपनी प्रैक्टिस छोड़कर गांधीजी के लिए सादे कागजों पर बयान दर्ज करने का काम शुरू किया।
​यहीं से गांधीजी की कार्यशैली ने प्रशासन को घुटनों पर ला दिया और इसी धरती ने उन्हें ‘बापू’ का संबोधन दिया।

​जनसेवा का अद्वितीय उदाहरण

​राजेंद्र बाबू की निष्ठा का प्रमाण 1934 का बिहार भूकंप है। जेल से छूटने के बाद उन्होंने राहत कार्य के लिए वायसराय से तीन गुना ज्यादा धन इकट्ठा कर दिखाया। 1950 से 1962 तक राष्ट्रपति रहने के बाद भी उनकी सादगी नहीं बदली।

इतिहासकारों और विश्लेषकों का मत

कुछ इतिहासकारों और विश्लेषकों का मत है कि राजेंद्र बाबू की सादगी निर्विवाद थी, लेकिन राष्ट्र के निर्माण में केवल व्यक्तिगत सादगी पर्याप्त नहीं थी। ​राजेंद्र बाबू ने गांधीजी के व्यक्तिगत आचरण (सादगी, चरखा, प्रार्थना) को तो सहर्ष अपनाया, लेकिन गांधीजी की वह ‘वैचारिक स्पष्टता’ (Clarity) कहीं पीछे छूट गई, जो सांप्रदायिकता के मामले में अटूट थी। दरअसल गांधी की हत्या के बाद, जवाहरलाल नेहरू को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा नेता था जो उस सांप्रदायिक विषाणु के खिलाफ खड़ा होने का साहस जुटा पाया, जो समाज की रगों में दीमक की तरह फैल रहा था। उस समय की गांधी की अहिंसक सेना ने इस यथार्थ को पर्याप्त रूप से समझने की कोशिश उस हद तक नहीं की जिस हद तक नेहरू ने की।

सदाकत आश्रम में अंतिम सांस ली

वे 1950 से 1962 तक राष्ट्रपति रहे। राष्ट्रपति पद से हट जाने के बाद राजेंद्र प्रसाद को भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न दिया गया। बिहार के 1934 के भूकंप के समय राजेंद्र प्रसाद जेल में थे. जेल से छूटने के बाद वे भूकंप पीड़ितों के लिए धन जुटाने में तन-मन से जुट गए और उन्होंने वायसराय से तीन गुना ज्यादा धन जुटाया था। अपने जीवन के आख़िरी महीने बिताने के लिए उन्होंने पटना के निकट सदाकत आश्रम चुना। यहां पर ही 28 फ़रवरी 1963 में उनका निधन हुआ। राजेन्द्र बाबू को सादर श्रद्धांजलि।


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