शायद हम सब 27 फरवरी से जुड़ी दो खास घटनाओं को भूल गये. हो सकता है, उनमें से एक याद रहने पर भी किसी साथी को उसे याद दिलाना बेमानी लगा हो. पहली घटना दुख, मगर गर्व से याद करने वाली है. क्रांतिकारी चंद्रशेखर ‘आजाद’ की शहादत 27 फरवरी, 1931 को हुई थी. उनका संकल्प था (वे मानते थे कि सभी क्रांतिकारियों का यही संकल्प होना चाहिए) कि हम जिंदा गिरफ्तार नहीं होंगे- और वे इस संकल्प पर खरे उतरे! जब इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क (जिसका नाम अब ‘चंद्रशेखर आजाद पार्क’ है) में पुलिस ने उनको घेर लिया, तो उन्होंने गोलियों से जवाब दिया. देर तक मुकाबला किया. आखिर बच सकने की उम्मीद न देख कर खुद को गोली मार ली थी.
उस पार्क में जाना, उनके समाधि स्थल पर कुछ देर रहना, उनकी प्रतिमा को करीब से देखना, मेरे जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है! नमन!!
उसके लगभग एक माह बाद 23 मार्च 1931 को शहीद भगत सिंह ने भी अपने दो साथियों- सुखदेव और राजगुरु- के साथ फांसी का फंदा चूम लिया था!
—इंकलाब जिंदाबाद!
दूसरी घटना 27 फरवरी, 2002 की है
उस दिन गोधरा (गुजरात) स्टेशन के पास मुसलिमों की एक उग्र भीड़ द्वारा ‘साबरमती एक्सप्रेस’ की एक बोगी में आग लगा देने से 56 यात्रियों (‘कारसेवकों’) की मौत हो गयी थी. वैसे कुछ लोगों का अब भी मानना है कि आग उस भीड़ ने नहीं लगायी थी; वहीं कुछ का मानना है कि कथित कारसेवकों ने गोधरा स्टेशन पर मुसलिम भेंडरों के साथ बदसलूकी की थी, भड़काऊ नारे लगाये थे, जिस कारण उनमें झड़प हुई थी. नतीजतन आसपास से मुसलमानों की भीड़ जमा हो गयी, जो उग्र होती गयी; उसी दौरान आग लगा दी गयी. सच जो भी हो, वह दुखद और निंदनीय घटना थी. गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी (वर्तमान प्रधानमंत्री) ने बिना किसी जांच के उसे आतंकवादी घटना और विदेशी साजिश बता दिया. अगले दिन 28 फरवरी को शवों का पोस्टमार्टम करने से पहले खुले वाहन में अहमदाबाद शहर में घुमाया गया. नतीजा? हिंसा भड़की. पूरे गुजरात में दंगों भड़क गये; या भड़काये गये. उसके बाद जो हुआ, वह आजाद भारत के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है और रहेगा. कुल मिला कर ‘गोधरा’ के कारण, भारत की राजनीति में पहले से जारी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के प्रक्रिया तेज होती गयी, गुजरात ‘हिंदू राष्ट्र’ का प्रयोग स्थल बना, जिसका विस्तार पूरे देश में करने का प्रयास जारी है. और हम देख रहे हैं- आज पूरा देश उन्माद और धर्मांधता की आग में जल रहा है.
‘गोधरा’ के बाद एक ऐसे नेता का कद लगातार बढ़ता गया, जो ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देते हुए, चुनाव दर चुनाव जीतने के बाद भी देश का सर्वमान्य प्रातिनिधि होने का जिसका दावा संदिग्ध है; और उसे इस बात की चिंता भी नहीं है. उसने साबित कर दिया है (जिस पर उसके मुरीदों को गर्व भी है) कि देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को राजनीति में हाशिये पर रख कर, उसकी चिंता किये बिना भी देश पर राज किया जा सकता है!
गोधरा और गुजरात दंगों पर बनी बीबीसी की जिस डाक्यूमेंट्री के प्रदर्शन पर भारत में रोक लगा दी गयी, उसमें बीबीसी की रिपोर्टर ने मोदी जी से एक सवाल किया था- आपको लगता है कि गुजरात दंगों के दौरान आपसे कोई चूक हो गई थी? मोदी जी ने जवाब दिया था- हां, मैं प्रेस को मैनेज नहीं कर सका था!
और हम देख सकते हैं कि उसके बाद उन्होंने उस चूक को बखूबी सुधार लिया है. आज अपवादों को छोड़ कर मीडिया में उनकी जय जयकार हो रही है! ढोल पीटा जा रहा है कि पूरी दुनिया में भारत और मोदी जी का डंका बज रहा है. यह और बात है कि मोदी जी के ‘फ्रेंड’ ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनने के बाद मोदी जी की फजीहत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, जो दरअसल भारत का भी अपमान है!
एक बार फिर चंद्रशेखर आजाद की शहादत को नमन और याद करते हुए यह आशा करना चाहता हूं कि यह देश जल्द ही इस अंधेरे दौर से मुक्त हो जायेगा. आमीन!
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