लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान गत शनिवार को अमेरिका और इज़राएल द्वारा ईरान पर किये गये ज़बरदस्त हमले का सख़्त विरोध करता है। यह लड़ाई चरम दक्षिण पंथी अमेरिकी राष्ट्रपति और इज़राएल के प्रधानमंत्री की साम्राज्यवादी भूख का ही नतीजा है।
अमेरिका ने इस हमले को ‘एपिक फ्यूरी’ (प्रचंड क्रोध) नाम दिया है, तो इजराएल इसे ‘लॉयन्स रोअर’ (सिंह की गर्जना) बताता है। ईरान के सर्वोच्च धर्मगुरु आयतुल्लाह ख़ामेनेई इस हमले में मारे गये हैं, और शहरों में भारी तबाही मची है फिर भी, आज तीसरे दिन भी लड़ाई रुकने के आसार नहीं हैं। हमलावर देशों की ईरान को शराणागति की भीख माँगने पर मजबूर करने की ख़्वाहिश पूरी नहीं हुई है। आयतुल्लाह ख़ामेनेई की मृत्यु के बावजूद ईरान थमा नहीं है और उसने अरब देशों में अमेरिका के सैनिक ठिकानों पर ज़बरदस्त जवाबी कार्रवाई की है।
अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु हथियारों के मामले में एक अर्से से तनातनी बढ़ रही थी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प, जो दुनिया में युद्ध रोकने के अपने दावे के इनाम के रूप में नोबेल पुरस्कार की खूली माँग कर रहे थे, ने अब अमेरिका को एक ऐसे युद्ध में धकेल दिया है जो सबसे ज़्यादा ख़तरनाक है। आज अमेरिका की सैन्य शक्ति विएतनाम युद्ध के समय से कहीं ज़्यादा बढ़ी हुई है, और वह अपना एक भी सैनिक मैदान में उतारे बिना ही मिसाइलों और ड्रॉन की मदद से हमले कर सकता है। लेकिन अमेरिकी जनता को भी दाद देनी पड़ेगी, जो अपने ही शासक की युद्ध नीति के ख़िलाफ़ प्रदर्शनें कर रही है। यह भावना वियेतनाम युद्ध के दिनों में अमेरिकी जनता के कड़े विरोध की याद दिला रही है। रूस और चीन अमेरिका को रोकने के लिए आगे आते तो हम तीसरे महायुद्ध के बहुत क़रीब पहुँच गये होते, लेकिन अभी रूस युक्रेन में उलझा हुआ है और चीन ने राजनयिक रास्ता अपनाया है।
कुछ ही समय़ पहले ईरान में आयतुल्लाह ख़ामेनेई के कठोर ईस्लामिक शासन के ख़िलाफ़ जन आक्रोश भड़क उठा था। ट्रम्प ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के तमाम उसूलों को ताक़ पर रख कर ख़ामेनेई शासन का तख़्ता पलट देने में हर तरह से मदद करने का भरोसा दिलाया। ख़ामेनेई की मौत पर ईरानी जनता की क्या प्रतिक्रिया है यह जानने का कोई स्रोत नहीं है लेकिन लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण का ख़याल है कि ख़ामेनेई की मौत को ईरान की जनता शहादत के रूप में देखे, ऐसी संभावना अधिक है। आंतरिक विरोध होना और बाहरी आक्रमण को झेलना एक ही बात नहीं है। हमें डर है कि अब ईरान धार्मिक कट्टरता की चंगूल से आसानी से बाहर नहीं आ पाएगा।
इज़राएल के लिए भी पश्चिमी एशिया में अपना पूरा रोबदाब जमाने का यही मौका था क्योंकि अब अरब देशों ने फिलिस्तीनियों के समर्थन में बोलना बंद कर दिया है और इज़राएल के साथ औपचारिक या अनौपचारिक रूप से समझौता कर लिया है। एक ईरान उसके सामने अडिग रहा है। एशिया में इज़राएल की भूमिका अमेरिका के लठैत की रही है। अरब देशों के तेल पर क़ब्ज़ा करने की अमेरिका की मंशा रही है, जिसमें उसके स्थानीय फौजदार की भूमिका वह बख़ूबी निभाता रहा है।
आज घर के नज़दीक़ महा भयंकर युद्ध चल रहा है तब भारत की विदेश नीति ने अपना दिवालियापन दिखा दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ईरान के ख़िलाफ़ हमले शुरु हुए उससे एक ही दिन पहले इज़राएल के दौरे पर थे। हम नहीं जानते कि नेतन्याहू ने उन्हें ईरान पर आक्रमण के बारे में बताया या नहीं। अगर नहीं बताया तो इसे प्रधानमंत्री की निजी चुप्पी से भी ज़्यादा ख़राब मानना चाहिए क्योंकि नहीं बताना भारत को कमतर समझने बराबर है। वहाँ प्रधानमंत्री ने आतंकवाद के विरोध में बोलते हुए 2023 में हमास के द्वारा इज़राएल पर किये गये आतंकवादी हमले में मरने वालों को श्रद्धांजलि दी लेकिन उसके बाद गाज़ा में हो रहे नरसंहार का उल्लेख तक नहीं किया। भारत में मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले को तो याद किया लेकिन पुलवामा में मारे गये जवानों को या पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले मरने वाले सैलानियों को श्रद्धांजलि देना भूल गये। ऐसा समझ में आता है कि प्रधानमंत्री आतंकवाद को अच्छे और बुरे आतंकवाद में बाँट रहे हैं।
न केवल विदेश नीति, भारत की व्यापार नीति भी अमेरिका द्वारा थोपे जा रहे व्यापारी समझौते के आगे झुक गई है। ट्रम्प के टेरिफ नीति के विरुद्ध कई देशों ने अवाज़ उठाई है लेकिन भारत के नागरिकों को यह सब सहते रहने के लिए सरकार मजबूर करती रही है।
ईरान पर अमेरिका और इज़राएल द्वारा किये गये हमले का भारत द्वारा मौन समर्थन हमारी संप्रभुता पर सवालिया चिह्न लगा रहा है। यह दुःख की बात है कि दुनिया के लगभग सभी नवस्वाधीन देशों को रूस और अमेरिका की छावनियों में जाने की मजबूरी की जगह आत्म सम्मान का सबक सिखाने वाला देश आज एक महासत्ता के ईशारों पर नाच रहा है।
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