विश्वविद्यालय के भीतर का अकेलापन : ज्ञान का नहीं, मनुष्य का संकट

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indian University

Parichay Das

— परिचय दास —

विश्वविद्यालय की इमारतें दूर से जितनी भव्य दिखती हैं, भीतर से उतनी ही खामोश होती जाती हैं। यह खामोशी किसी ध्यानस्थ ऋषि की नहीं, बल्कि धीरे-धीरे थकते हुए मनुष्यों की है। गलियारों में चलते हुए कदमों की आवाज़ जैसे किसी पुराने कुएँ में गिरकर लौट आती है—खाली, गूँजती हुई, और थोड़ी उदास। यहाँ ज्ञान के इतने स्रोत हैं कि प्यास का कोई तर्क नहीं बचता, फिर भी भीतर कहीं एक सूखा पड़ा रहता है, जैसे पानी की जगह शब्द पी लिए गए हों और शब्दों ने ही भीतर की नमी सोख ली हो।

कक्षाएँ होती हैं—छात्रों से, नोट्स से, सिद्धांतों से—पर उनमें एक अदृश्य रिक्तता भी साथ बैठती है। शिक्षक बोलते हैं, छात्र सुनते हैं और इस पूरे आदान-प्रदान में कुछ ऐसा छूटता रहता है जो किसी पाठ्यक्रम में दर्ज नहीं होता। यह छूटना ही शायद मनुष्य का हिस्सा है, जिसे कोई सिलेबस अपने भीतर जगह नहीं देता। विश्वविद्यालय इस छूटे हुए हिस्से का सबसे बड़ा संग्रहालय है, जहाँ हर कोई कुछ न कुछ खोकर ही आता है और अक्सर वही खोया हुआ उसके साथ सबसे अधिक रहता है।

यहाँ मित्रताएँ बनती हैं पर वे किसी पुराने पेड़ की छाया जैसी नहीं होतीं। वे अधिकतर मौसम के साथ बदल जाती हैं—परीक्षाओं के समय घनी, छुट्टियों में विरल और परिणाम आने के बाद लगभग अदृश्य। लोग साथ बैठते हैं, साथ चाय पीते हैं, साथ हँसते भी हैं लेकिन उनके भीतर जो अकेलापन है, वह किसी निजी कमरे की तरह बंद रहता है। उस कमरे की चाबी शायद किसी के पास नहीं होती या फिर हर कोई अपनी-अपनी चाबी को छुपाकर रखता है, जैसे उसे दिखा देना अपनी कमजोरी का सार्वजनिक उद् घाटन हो।

पुस्तकालय इस अकेलेपन का सबसे सुंदर और सबसे त्रासद रूप है। वहाँ किताबें कतार में खड़ी हैं—इतिहास, दर्शन, साहित्य—हर किताब अपने भीतर एक संसार समेटे हुए। पाठक उन संसारों में प्रवेश करता है, कुछ देर के लिए अपना अकेलापन भूल जाता है पर जैसे ही किताब बंद होती है, वह अकेलापन फिर से सामने आ खड़ा होता है और इस बार थोड़ा और गहरा, थोड़ा और स्पष्ट। जैसे किताबों ने उसे उसकी अपनी अनुपस्थिति का बोध और तीखा कर दिया हो।

शोध-छात्रों का जीवन इस अकेलेपन का सबसे गाढ़ा रंग है। वे अपने-अपने विषयों में डूबे रहते हैं, जैसे कोई गोताखोर समुद्र के तल में किसी खोई हुई चीज़ को खोज रहा हो। ऊपर की दुनिया धीरे-धीरे उनसे दूर होती जाती है—दोस्त, परिवार, उत्सव—सब कुछ किसी धुंध में विलीन होता हुआ। उनके पास शब्द होते हैं, संदर्भ होते हैं, उद्धरण होते हैं पर इन सबके बीच उनका अपना स्वर कहीं दब जाता है। वे दूसरों के विचारों को इतने ध्यान से पढ़ते हैं कि अपने भीतर की आवाज़ सुनने का समय ही नहीं बचता।

शिक्षकों का अकेलापन अलग तरह का है। वे कक्षा में खड़े होकर बोलते हैं पर उनके शब्द अक्सर दीवारों से टकराकर लौट आते हैं। छात्र सुनते हैं पर सुनना और ग्रहण करना दो अलग बातें हैं। शिक्षक के भीतर जो अनुभव है जो जीवन है, वह किसी पाठ्यक्रम की सीमा में समा नहीं पाता। धीरे-धीरे वे भी अपने शब्दों को सीमित करना सीख लेते हैं—जितना पूछा जाए, उतना ही कहना। इससे अधिक कहना जैसे अनावश्यक हो जाता है और अनावश्यक होना किसी भी मनुष्य के लिए सबसे बड़ा भय है।

विश्वविद्यालय में राजनीति भी है और वह इस अकेलेपन को और जटिल बना देती है। समूह बनते हैं, टूटते हैं, फिर बनते हैं। हर कोई किसी न किसी खेमे में खड़ा दिखाई देता है पर इन खेमों के भीतर भी एक दूरी बनी रहती है। लोग साथ होते हुए भी साथ नहीं होते। उनके बीच एक अदृश्य गणित चलता रहता है—कौन किसके साथ है, कौन किसके विरुद्ध। इस गणित में भावनाएँ अक्सर शून्य हो जाती हैं और मनुष्य एक समीकरण में बदल जाता है।

कभी-कभी परिसर में चलते हुए लगता है कि यहाँ पेड़ ही सबसे अधिक जीवित हैं। वे चुपचाप खड़े रहते हैं, बिना किसी अपेक्षा के, बिना किसी प्रतिस्पर्धा के। उनकी छाया में बैठा कोई छात्र शायद पहली बार अपने अकेलेपन को बिना किसी शर्म के महसूस करता है। हवा जब पत्तों को हिलाती है तो वह एक ऐसी भाषा बोलती है, जिसे किसी पाठ्यक्रम में नहीं पढ़ाया जाता पर जो सबसे अधिक सच्ची लगती है।

यह अकेलापन केवल व्यक्ति का नहीं, संस्थान का भी है। विश्वविद्यालय अपने मूल उद्देश्य से धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है। ज्ञान का स्थान सूचना ने ले लिया है, संवाद की जगह प्रस्तुतियों ने और जिज्ञासा की जगह प्रमाणपत्रों ने। इस परिवर्तन में मनुष्य कहीं पीछे छूट गया है। वह अब एक ‘डेटा’ बन गया है—अंक, ग्रेड, प्रकाशन—इन सबके बीच उसका होना धीरे-धीरे धुंधला पड़ता जा रहा है।

फिर भी, इस सबके बीच कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब यह अकेलापन थोड़ा हल्का हो जाता है। कोई छात्र अचानक कोई असामान्य प्रश्न पूछ लेता है, कोई शिक्षक किसी विषय को इस तरह खोल देता है कि वह किताबों से बाहर निकलकर जीवन में फैल जाता है। ऐसे क्षण बहुत छोटे होते हैं पर वे यह याद दिलाते हैं कि विश्वविद्यालय केवल इमारतों और पाठ्यक्रमों का नाम नहीं है, वह मनुष्यों का एक साझा प्रयास है—समझने का, जुड़ने का और शायद अपने अकेलेपन को थोड़ा कम करने का।

शाम के समय जब परिसर धीरे-धीरे खाली होने लगता है, तब यह अकेलापन सबसे स्पष्ट दिखता है। सूरज ढलता है और उसकी रोशनी इमारतों पर एक अंतिम स्पर्श छोड़ जाती है, जैसे किसी ने दिन भर की थकान को हल्के से सहला दिया हो। इस समय विश्वविद्यालय किसी विशाल घर की तरह लगता है, जिसमें बहुत सारे कमरे हैं पर हर कमरे में कोई न कोई अकेला बैठा है—अपने-अपने विचारों के साथ, अपनी-अपनी चुप्पियों के साथ।

यह अकेलापन कोई त्रुटि नहीं है, शायद यह इस पूरे तंत्र का अनिवार्य हिस्सा है। ज्ञान की यात्रा हमेशा थोड़ी अकेली होती है क्योंकि वह भीतर की ओर जाती है पर जब यह अकेलापन मनुष्य को उसके ही भीतर से काटने लगे, तब वह संकट बन जाता है। विश्वविद्यालय का वास्तविक संकट यही है—यहाँ ज्ञान की कमी नहीं, मनुष्यता की कमी होती जा रही है।

इस सबके बीच, कोई एक व्यक्ति—शायद एक शिक्षक, शायद एक छात्र—चुपचाप यह सोचता है कि क्या इस अकेलेपन का कोई उत्तर है। वह किताबों में खोजता है, संवाद में खोजता है, अपने भीतर भी खोजता है। उसे कोई अंतिम उत्तर नहीं मिलता पर खोजते रहने की यह प्रक्रिया ही शायद उसे जीवित रखती है। जैसे अँधेरे में चलते हुए कोई व्यक्ति यह जानता हो कि रास्ता पूरी तरह दिखाई नहीं देगा, फिर भी चलना ही एकमात्र विकल्प है।

विश्वविद्यालय के भीतर का यह अकेलापन एक धीमी जलती हुई लौ की तरह है—जो कभी बुझती नहीं, बस आकार बदलती रहती है। यह मनुष्य को तोड़ता भी है, और कहीं-न-कहीं उसे गढ़ता भी है। इसी द्वंद्व में विश्वविद्यालय की असली कहानी छिपी है—एक ऐसी कहानी, जिसमें ज्ञान के साथ-साथ एक अनकहा, अनसुना पर गहरा मानवीय संगीत भी लगातार बजता रहता है।


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