जापान के गांधी कौन? – श्रीनाथ मोदी

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Shri Nath Modi

ई 1914 कोबे का एक गिरजाघर आज ख़ूब सजा हुआ है। पादरी डॉक्टर मेयर्स और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती मेयर्स बड़ी खुशी में इधर-से-उधर घूम रहे हैं। आज उनके एक जापानी शिष्य और मित्र का विवाह है। गिरजे में सुंदर-से-सुंदर पुष्प इकट्ठे किए गए हैं। फूल बेचने वाली लड़कियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने हुए एक पंक्ति में खड़ी हैं। वह देखिए दूल्हा और दुलहिन भी आ पहुँचे। वैवाहिक शपथ की क्रिया समाप्त हुई। बाजे बजने लगे! चारों ओर हर्ष का साम्राज्य है। दूल्हे के चेहरे से प्रकट होता है कि वह दृढ़प्रतिज्ञ पुरुष है और दुलहिन के मुख पर विनम्रता तथा आज्ञाकारिता झलक रही है। दो रिक्शा-कुली इस दंपति को घर पहुँचाने के लिए बुलाए गए।

दूल्हे ने रिक्शेवालों से कहा—”चलो भाई, ले चलो शिकावा बस्ती को।” रिक्शेवालों के आश्चर्य की सीमा न रही। उन्होंने एक बार सुशिक्षित दूल्हे को देखा और फिर दुलहिन को, और तब सोचने लगे—’कहाँ ये भले आदमी और कहाँ शिकावा की गंदी बस्ती, जहाँ निर्धन मज़दूर, वेश्याएँ, चोर उठईगीरे और उचक्के रहते हैं! मामला ज़रूर कुछ गड़बड़ है।’ रिक्शेवालों ने एक दूसरे की ओर देखा और साफ़ मना कर दिया! पर यह दंपति शिकावा को ही गए। दुल्हे का नाम था कागावा और दुलहिन का स्प्रिंग (बसंती देवी)।

श्रीमती बसंती देवी ने आकर पति की कोठरी देखी। उसका विस्तार था 6 फीट लंबाई x 6 फीट चौड़ाई! और उनकी सुसराल में कितने व्यक्ति थे? 70 वर्ष का एक बूढ़ा और 60-65वर्ष की एक बुढ़िया 11 वर्ष का एक अपराधी लड़का, एक अनाथ माता और उसके चार बच्चे और एक भिखारिन! वहाँ तो खड़े होने को भी जगह नहीं थी। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह सारा कुटुंब ‘उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत के अनुयायी कागावा का परिवार था। किसी नई बहु के सामने ऐसी जटिल समस्या शायद ही उपस्थित हुई हो।

शिकावा की एक झलक

कागावा की आमदनी कुल जमा तीन पौंड यानी क़रीब पैंतालीस रुपए थी, और इतने ही में 11 प्राणियों को पेट भरना था। सबसे पहला काम बसंती देवी ने यह किया कि बाज़ार से सस्ते से सस्ते दर के चावल लाई और बिना माँड निकाले उन चावलों को सस्ती तरकारियों के साथ भोजन के समय देना प्रारंभ किया। अब ज़रा शिंकावा बस्ती का हाल भी सुन लीजिए। चारों तरफ़ गंदगी और दुर्गंधि का राज्य था। पाख़ाना एक था और उसका प्रयोग सौ आदमियों द्वारा होता था! कपड़ों को एक छोटी सी गली में धोना पड़ता था और उनके सुखाने के लिए कोई जगह नहीं थी। खटमलों की भरमार थी, और वे अमर थे—जितने ही मारो, उतने ही बढ़ते थे।

भिखारी हर वक़्त दरवाज़े पर खड़े ही रखते थे। कभी कोई गुंडा शराब पिए उधर से आ निकलता था, तो कभी कोई बदमाश छुरी खींचकर कहता था कि इतने रुपए धर दो, नहीं तो तुम्हारा अभी ख़ातमा करता हूँ! कागावा के लिए उन लोगों को समझाना बुझाना कठिन हो जाता था, और वे कुछ दे-दिलाकर अपना पिंड छुड़ाते थे। अतिथियों का क्या पूछना। कभी कागावा किसी ग़रीब को अपने घर ले आते, तो कभी किसी बीमार को; कभी कोई अपराधी बालक आता, तो कभी जेल से छूटी हुई कोई चिड़िया; कभी बीमार वेश्याएँ आश्रय लेतीं, तो कभी कोई पागल था बिराजता। एक मुश्किल और भी थी। कागावा Strict vegetarian (पूर्णतया शाकाहारी) हैं, और दूसरे जापानी उनके इस सिद्धांत के अनुयायी नहीं थे। पर पतिव्रता बसंती देवी ने कभी चूँ तक नहीं की, और सहृदयतापूर्वक वे अपना सारा काम करती रहीं। वे आसपास के ग़रीब पड़ोसियों के घर पर जातीं, बीमारों की सेवा-शुश्रूषा करतीं, प्रसूति के समय माताओं की मदद करती, नन्हें-नन्हें बच्चों की देखभाल करती और इसके सिवा समय-समय पर उन्हें उपयोगी सलाह-मशविरा भी देतीं बसंती देवी यद्यपि शिक्षित थीं; पर उनको उच्चशिक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था। अब उन्होंने इस कमी को भी पूरा करने का प्रयत्न किया। कागावा दो मज़दूर विद्यार्थियों को प्राप्तः काल में 6 से 7 बजे तक और शाम का 5 से 6 बजे तक अंकगणित, रेखागणित, बीजगणित तथा अन्य विषय पढ़ाते थे। श्रीमती कागावा इस कक्षा में शामिल हो गई और तीसरे पहर को कोबे स्त्री-समाज के स्कूल में जाकर बाइबिल पढ़ने लगीं। आगे चलकर उन्होने बड़ी उम्र में मैट्रिक परीक्षा पास की और याकोहामा में तीन वर्ष अध्ययन करके ग्रेजुएट बन गई। उन्होंने दो पुस्तकें भी लिखी हैं। एक में तो उन्होंने फ़ैक्टरी में काम करने वाली लड़कियों का हाल लिखा है और दूसरी में गंदे मुहल्लों का चित्र खींचा है। इन गंदे मुहल्लों में जो भयंकर वेश्यावृत्ति चलती है, उसके विषय में उन्होंने एक लेख किसी पत्र में लिखा था। इससे किसी वेश्यालय के स्वामी को क्रोध आ गया और मौक़ा देखकर वह कागावा के घर पर आया और श्रीमती कागावा को अकेली पाकर ख़ूब पीटा!

साधना का परिणाम

अपने जीवन के पंद्रह वर्ष कागावा ने इस कोठरी में बिताए थे, और उसका परिणाम जो हुआ, वह भी सुन लीजिए। कागावा के ग्रंथों को पढ़कर, उनके व्याख्यानों को सुनकर और उनके जीवन का देखकर जापान की जनता का ध्यान इन गंदे मुहल्लों की ओर आकर्षित हुआ। सन् 1926 में जापान सरकार ने यह निश्चय किया कि 2 करोड़ 40 लाख रुपए ख़र्च करके जापान के ‘6 बड़े-बड़े नगरों के (टोक्यो, असाका, याकोहामा, कोबे, क्योटो और नागोया के) गंदे मुहल्लों को साफ़ कर दिया जाय। आज इन नगरों में से किसी में गंदे मुहल्लों का नामो-निशान नहीं रहा। कागावा की वह 6 वर्ग फीट की कोठरी चली गई और अपने साथ ही 6 महानगरों के गंदे मुहल्लों को भी लेती गई! उस महान साधक का, जिसकी तपस्या ने यह सब संभव किया, पुण्यचरित संक्षेप में ‘ज्ञान-माला’ के पाठकों को सुनाया जाता है।

जन्म और बाल्यावस्था

कागावा का जन्म 10 जुलाई सन् 1888 को कोबे में हुआ था। उनका पूरा नाम है टोयोहिको कागावा। उनके पिता पहले अवा प्रांत में उन्नीस गाँवों के मुखिया थे, और बाद में बढ़ते-बढ़ते वे प्रिवी कौंसिल के सेक्रेटरी बना दिए गए। उनका यह पद उतना ही उच्च समझा जाता था, जितना मंत्रिमंडल के किसी सदस्य का। इस पद पर रहते हुए उनका परिचय बड़े-बड़े लोगों से हुआ, पर भाग्य के वे ओछे थे। थोड़े दिनों बाद उन्होंने व्यापार करना शुरू किया और परिणामस्वरूप पास की जमा-पूँजी भी गँवा बैठे। कागावा का चरित्र उस ज़माने के बड़े आदमियों की तरह का था। पंचमकार के वे बड़े प्रेमी थे उन्होंने अपनी पत्नी को तो घर पर रख छोड़ा था और कोवे में कई औरतें रख ली थीं। इन रखेलियों में एक स्त्री बड़ी सुंदर थी। इससे उनके चार संतानें हुईं, जिनमें एक का नाम पड़ा टोयोहिको। टोयोहिको बड़ा होनहार बालक था, इसलिए पिता-जीने उसे जराज संतान बनाए रखना पसंद न किया और क़ानूनन गोद ले लिया। भोगविलासंपूर्ण जीवन का जो परिणाम होना था, वही हुआ। जब यह बालक चार वर्ष को ही था कि पिता जी का देहांत हो गया और माता भी उसी समय चल बसी। कागावा अपनी बड़ी बहन के साथ अपनी सौतेली माँ तथा दादी के पास रहने के लिए गाँव को भेज दिए गए।

दादी का निर्दय शासन

ये दोनों स्त्रियाँ बिलकुल एकांत में नीरस जीवन व्यतीत कर रही थीं। घर क्या था, उजड़ा हुआ बग़ीचा था। पुत्रहीन माँ और विधवा पत्नी की दशा दयनीय थी। उन दोनों को इन भाई-बहन का आना भार-स्वरूप प्रतीत होने लगा। सौतेली माँ तो कभी कागावा से बोलती ही नहीं थी, और दादी की गाली-गलौज के मारे दोनों बच्चों की जान आफ़त में थी। कभी कागावा सोते में बिस्तर पर ही पेशाब कर देता था। इसके लिए बेचारे चार वर्ष के बच्चे की काफ़ी पिटाई होती थी, और किसी गर्म चीज़ से वे झुलसाए भी जाते थे, जिससे उनकी यह आदत छूट जाए। बहन कुछ झक्की-सी थी। घर के पिछवाड़े कोने में बैठे-बैठे आँसू बहाना उसका नित्यप्रति का काम था। वह निरंतर बीमार रहा करती थी। कागावा को बेचारी प्रेम भी क्या कर सकती थी। दादी उसे मज़दूरनी समझकर कठोर से कठोर काम लेती थीं और हर रोज़ उसे पीटती भी थीं। बहन को निर्दयतापूर्वक पिटते देखकर कागावा का हृदय विचलित हो उठता था, नतीजा यह होता था कि दादी उसे घर के बाहर की अँधेरी कोठरी में बंद कर देती थीं! उन जेलख़ानों की याद कागावा को इतने दिनों बाद भी आ जाती है। उन दिनों बेचारा कागावा घर से भागकर पास के वेणु-कुंज में आश्रय लेता अथवा नदी तट पर घूम-घूमकर अपना वक़्त काटता। हाँ, जब कभी कोई अतिथि घर पर आता, तो सौतेली माँ और दादी दिखावट के लिए उनके सामने कागावा को बड़ा प्रेम करने लगतीं। उस समय तो वे दया की अवतार बन जातीं। कागावा के अंधकारमय जीवन में उन दिनों प्रकाश की एक किरण झलक जाती।

स्कूल में चार वर्ष नौ महीने की उम्र में वे एक प्रारंभिक पाठशाला में भर्ती कराए गए और वहाँ अन्य बच्चों के साथ पढ़ने लगे। चूँकि घर पर उनके साथ अत्यंत कठोरता का बर्ताव किया जाता था, इसलिए उनके हृदय में अपने को अत्यंत क्षुद्र समझने की भावना इतनी छोटी उम्र में ही पैदा हो गई थी, जिसका परिणाम यह हुआ कि वे अन्य बच्चों के साथ हिल-मिल नहीं सके। हाँ, एक किसान के लड़के से, जो उनसे दो वर्ष उम्र में बड़ा था, उनकी मित्रता अवश्य हो गई। इस लड़के का पिता कागावा की ज़मीन पर ही खेती करता था और वहीं एक कच्चे मकान में रहता भी था। यद्यपि सांसारिक पोज़ीशन के ख़्याल से दोनों में महान अंतर था; पर आत्माओं के राज्य में इस प्रकार की असमानता का अस्तित्व ही नहीं रहता। कन्फ्यूशियस के ग्रंथ पढ़ने के लिए वे बौद्ध मंदिरों में भेजे जाते थे, और उनके जीवन पर इस शिक्षा का काफ़ी प्रभाव पड़ा है।

जब कभी कोई बौद्ध त्यौहार आता, तो उन्हें एकाध पैसा मिल जाता। आज भी कागावा उस प्रसन्नता का स्मरण कर लेते हैं, जो उन्हें पैसा मिलने पर होती थी। वे भागते हुए मंदिर पर जाते और कोई खिलौना ख़रीद लेते। बच्चों को मिठाई का शौक़ हुआ ही करता है, कागावा को भी था। इसलिए वे चोरी से दियासलाई की डिबिया शक्कर भरकर ले जाते और किसी खेत में जाकर खाते! यद्यपि कागावा को स्कूल की पढाई का काम पसंद था; पर उनकी रुचि खेती की ओर थी, और धान की बुआई के वक़्त वे बराबर किसानों के लड़कों के साथ ही रहते थे। धान की कटाई के समय भी छोटा-सा हँसिया लिए हुए वे बराबर मौजूद रहते थे। धान के पौधों से वे खड़ाऊँ बनाते थे और अपने पहनने के लिए कपड़ा भी बुन लेते थे। मछली पकड़ना और पक्षियों का पालना भी उनके ही सपुर्द था। घर के घोड़े के लिए घास खोदने को कागावा ही भेजे जाते थे, और यह काम उन्हें पसंद भी था। घोड़े से उन्हें प्रेम था, और सिर पर घास का गट्ठा लादे हुए जब वे घर लौटते थे तब उनके मन में स्वभावतः यह इच्छा उत्पन्न होती थी कि शाबाशी का एक शब्द भी उन्हें माता या दादी के मुँह से सुनने को मिल जाता; पर वहाँ तो इसका भी टोटा था।

निर्दोष पर अपराध

इन दिनों कागावा के जीवन में एक ऐसी दुर्घटना हुई कि उसकी याद वे अभी तक नहीं भूले। पड़ोस की एक लड़की के कहीं ज़ोर की चोट आ गई थी और वह उसकी वजह से मृत्यु- शय्या पर लेटी हुई थी। गाँववालों ने झूठ-मूठ को कागावा को नाम ले दिया। इस सोलह आने असत्य समाचार के—अनभ्र बज्रपात से—कागावा के हृदय को बड़ा धक्का लगा। उनके कोमल हृदय में मानो किसी ने पैनी कटारी चुभा दी। उन्हें पता लग गया कि घरवाले ही नहीं, गाँव वाले भी उनसे घृणा करते हैं। एक दिन तो उन्होंने खाना छुआ भी नहीं और तीन दिन तक बराबर रोते रहे। कागावा के पास उस समय सात-आठ रुपए थे, सो उन्होंने जाकर उस लड़की को दे दिए, यद्यपि वे जानते थे कि वे सर्वथा निरपराध हैं। लड़की के माता-पिता से उन्होंने क्षमा-याचना भी की। कागावा उस समय दस-ग्यारह वर्ष के थे; पर अड़तीस उनतालीस वर्ष पहले की यह दुर्घटना उन्हें आज भी याद है। बेकसूर होने पर जो इलज़ाम उन पर लगाया था, उसने उसके हृदय को घायल कर दिया, और आज भी वह घाव पूरा नहीं है।

कागावा के एक बड़ा भाई भी था; पर वह ज़मींदारी के व्यसनों में फँसा हुआ था, और थोड़े ही दिनों में उसने सारी ज़मीन-जायदाद फूँक डाली। कागावा ने अपने भाई से कहा—”मुझे आज्ञा दीजिए कि मैं इस ग्राम को छोड़कर बाहर जा रुकूँ। यहाँ मेरा मन नहीं लगता।” आज्ञा मिलने पर कागावा निकट के टोकूशिमा नामक नगर को चले आए।

मिडिल स्कूल में अवा छोड़कर कागावा टोकोशिमा के मिडिल स्कूल में भर्ती हो गए। यहाँ भी उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उनकी उम्र अन्य लड़कों की आपेक्षा कई वर्ष कम थी, इसलिए उन्हें मज़ाक़ का पात्र बनना पड़ता था। बड़े लड़कों की चारित्रिक कमज़ोरियों को देखकर उनके हृदय में घृणा का संचार हो गया। कागावा ने सोचा था कि स्कूल में नए-नए लड़कों से मित्रता करने का सौभाग्य प्राप्त होगा, और इस प्रकार उनकी आत्मा को प्रेम की भूख वर्षों से लगी हुई थी, उसकी तृप्ति कुछ अंशों में तो हो ही जाएगी; पर यहाँ मामला उल्टा ही हुआ! अपने ग्राम पर उन्हें प्रकृति माता की गोद में रहने का अवसर तो प्राप्त होता था, वहाँ वह भी हाथ से चला गया और छात्रालय के लड़कों से भी प्रेमपूर्ण संबंध भी स्थापित न हो सका। यह काल कागावा के जीवन में अत्यंत निराशा का था।

पादरियों का प्रेमपूर्ण व्यवहार

इन दिनों कागावा का परिचय अपने स्कूल के ईसाई शिक्षक श्री काटायामा से हुआ, और कुछ दिनों बाद उनको संबंध डॉक्टर मायर्स और डॉक्टर लौगन से हो गया। दोनों पादरियों ने कागावा के जीवन में एकदम क्रांति ही उत्पन्न कर दी। इन दोनों पादरियों के यहाँ कागावा का हृदय से स्वागत होता था। पादरी साहब बड़े प्रेम के साथ उन्हें चाय पिलाते, रोटी खिलाते और गाने भी सुनवाते। कहाँ तो छात्रालय का शुष्क जीवन और कहाँ पादरियों के घर का प्रेमपूर्ण व्यवहार! यहाँ कागावा बाइबिल भी पढ़ने लगे। जब यह समाचार उनके चाचा को लगा (कागावा अब उन्हीं के अतिथि थे), तो उन्होंने कागावा को बहुत समझाया-बुझाया, डराया-धमकाया कि अगर तुम ईसाईयों के चक्कर में पड़े, तो पिता की बची कूची जायदाद से भी वंचित कर दिए जाओगे। पर कागावा ने उनकी एक न सुनी और चाचा ने उन्हें अपने घर से निकाल दिया!

कॉलेज में अध्ययन

सन् 1905 में कागावा टोक्यो के प्रेसबीटेरियन कॉलेज में भर्ती हो गए। उन्हें पढ़ने का ख़ब्त था, और दो वर्ष के भीतर उन्होंने कॉलेज की लाइब्रेरी के प्रायः सभी महत्वपूर्ण ग्रंथ पढ़ डाले। क्लास में उनकी उपस्थिति से अनेक शिक्षक घबराते थे, क्योंकि कई विषयों पर उनका ज्ञान अनेक अध्यापकों की अपेक्षा अधिक था। कागावा के साथी विद्यार्थी तो उन्हें देखकर आश्चर्य करते थे। कागावा जुंगी आदमी थे, जिस विषय से प्रेम होता उसे पढ़ते और जिस विषय के प्रति रुचि न होती उसे छोड़ देते। नतीजा यह होता कि किसी-किसी विषय में वे क्लास में फिसड्डी रह जाते। इसके सिवा कागावा में एक बात और भी थी; जो सद्भाव उनके मन में आते, उन्हें वे कार्य रूप में परिणत करने के लिए भी उद्यत रहते थे। कहीं पर एक बिल्ली का बच्चा मोरी में डूब रहा था। आप उसे उठा लाए और नहलाकर उसे अपने कमरे में रख लिया! एक मरघिल्ले कुत्ते को भी, जो न घर का था और न घाट का, आपने अपनी संरक्षकता में ले लिया! जब साथ के छात्रों ने इस पागलपन का विरोध किया, तो आप ने कहा—’किसी सुंदर और हृष्ट-पुष्ट कुत्ते को तो चाहे जो प्रेम कर सकता है; पर इस अभागे लेंडी कुत्ते की चिंता कौन करेगा?” कुत्ते और बिल्ली तक तो ग़नीमत थी; पर अबकी बार कागावा ने एक और भी अधिक आपत्तिजनक काम किया। आप रास्ते पर से एक भिखारी को ले आए और उसे अपने कमरे में स्थान दे दिया और उसे अपने पास से भोजन भी कराने लगे, मानो वह उनका भाई ही हो। जो थोड़े से रुपए उन्हें मिलते थे, उनमें से भी वे दान दे देते थे; यहाँ तक कि अपने जूते और कपड़े भी दे डालते थे। अपने से भी ग़रीब विद्यार्थियों की सेवा करने के लिए वे उद्यत रहते थे।

विद्यार्थियों द्वारा मरम्मत

टॉल्सटाय के ग्रंथों को पढ़कर कागावा अहिंसावादी बन गए। उन दिनों रूस-जापान का युद्ध हो रहा था। कॉलेज की मीटिंग में कागावा ने युद्ध का विरोध और शांति का समर्थन किया। नतीजा यह हुआ कि साथी विद्यार्थियों ने उन्हें देशद्रोही की उपाधि दे डाली और उनसे सब संबंध तोड़ दिया। विद्यार्थियों को यह आशा थी कि कागावा दब जाएँगे; पर वे दबने वाले नहीं थे। आख़िर उन्होंने एक षड्यंत्र किया। रात के वक़्त वे कगावा को भरमाकर कॉलेज के बाहर खेलने की जगह पर ले गए; और वहाँ बीस विद्यार्थियों ने उनकी अच्छी तरह मरम्मत की। “इस विश्वासघाती” ‘देशद्रोही’, ‘शांतिवादी’ की अच्छी तरह ख़बर लो।” कहकर जब उनके साथी उन पर घूसों की बौछार कर रहे थे, उस समय कागावा हाथ जोड़े हुए खड़े थे और कह रहे थे—”परमपिता! इन्हें क्षमा करो, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं?” इन पीटने वालों में धर्म-विज्ञान-कक्षा के विद्यार्थी भी थे!

क्षयरोग

कॉलेज में जब वे द्वितीय वर्ष में थे, तब उन्हें क्षय की बीमारी हो गई। मुँह से ख़ून गिरने लगा, इसलिए उन्हें कॉलेज छोड़कर समुद्रतट के एक ग्राम में जाकर रहना पड़ा। वहाँ रहते हुए उन्होंने अपने प्रथम उपन्यास का प्रारंभ किया। जिस उपन्यास ने आगे चलकर उन्हें जापान के सर्वश्रेष्ठ लेखकों की श्रेणी में बिठला दिया, वह अत्यंत निर्धनता की दशा में लिखा गया था, यहाँ तक कि उस समय उनके पास लिखने के लिए कागज़ भी नहीं था। पुराने रद्दी मासिक पत्रों के पृष्ठों पर कूची से यह उपन्यास लिखा गया था। अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण ही कागावा क्षय-जैसी भयंकर बीमारी के चक्कर से छूट सके।

गंदी बस्ती की ओर

सन् 1906 का बड़ा दिन कागावा के जीवन का एक महत्वपूर्ण दिवस है। उस दिन उन्होंने अपनी गठरी उठाकर गाड़ी पर रख दी और कॉलेज से सीधे शिंहकावाकी गंदी बस्ती की ओर चल पड़े। जिस कोटरी को उन्होंने अपना निवास स्थान बनाया, उसका क्षेत्रफल था 36 वर्ग फीट, यानी वह दो गज लंबी थी और दो गज चौड़ी। उस कोटरी में कुछ दिन पहले एक ख़ून हो चुका था। लोगों में यह भी अफ़वाह फैली हुई थी कि उसमें भूत रहते हैं, और वह इसीलिए ख़ाली पड़ी हुई थी।

व्यापार में मंदी आ जाने के कारण भिखमंगों की संख्या और भी बढ़ गई थी। उन्होंने कागावा को घेरना शुरू किया। कैसे-कैसे आदमियाँ को कागावा ने आश्रय दिया, उनको ब्यौरा भी सुन लीजिए:—

एक लड़के के तमाम शरीर पर खुजली हो रही थी। उसने शरण ली। कागावा ने उसे अपनी कोठरी में रख लिया। नतीजा यह हुआ कि कागावा को भी खुजली हो गई।

एक शराबी आदमी कई महीने इस कोठरी में रहा।

एक हत्यारा था जो जेल भी काट चुका था और जिसके दिल में यह भय बैठ गया था कि मेरे द्वारा मारा हुआ आदमी भूत बनकर पीछा कर रहा है। यह कागावा के पास ही सोता था और डर के मारे कागावा का हाथ किचकिचा के पकड़ लेता था!

एक आदमी ने आकर कहा कि कई दिन से मुझे पानी के सिवा कुछ भी नहीं मिला। उसे भी कागावा ने आश्रय दिया।

इस प्रकार कागावा के कुटुंब में चार आदमी हो गए। उन्हें अपने धर्म-विज्ञान-कॉलेज से कुल जमा 22 शिलिंग यानी सोलह रुपए प्रति मास का वज़ीफ़ा मिलता था उसमें चार आदमियों की गुज़र करना मुश्किल हो गया। इसलिए उन्हें 15 शिलिंग महीने पर लालटेन साफ़ करने का काम करना पड़ा।

एक बार तो इस कोठरी में दस आदमी आ घुसे! कहीं बैठने को भी जगह नहीं रही। आख़िर एक दीवार तोड़ डाली गई। एक आदमी तो उनमें क्षय के रोग से पीड़ित था, और उसके कपड़े कागावा ख़ुद अपने हाथ से धोते थे। एक का दिमाग़ ठिकाने नहीं रहा था; गोकि वह काफ़ी पढ़ा-लिखा था, पर उसके घरवालों ने तथा दोस्तों ने भी उसे छोड़ दिया था। एक बीमार वेश्या थी, जिसे सिफलिस का रोग था।

एक भिखारी था, जिसकी आँखों में ट्रेकोमा की बीमारी थी। कागावा को भी यह भयंकर बीमारी लग गई और इससे उनकी दृष्टि अत्यंत मंद पड़ गई है!

एक भिखारी ने आकर कहा—”तुम बड़े ईसाई बनते हो! तब तो मैं जानूँ, जब अपना कुर्ता मुझे दे दो!” कागावा ने उसे अपना कुर्ता दे दिया। दूसरे दिन अपना कोट और पाजामा भी उसके हवाले कर दिया। किसी ने यह झूठी ख़बर फैला दी कि कहीं से कागावा को बहुत-सा रुपया ग़रीबों की सेवा में ख़र्च करने के लिए मिला है। बस, फिर क्या था, जुआरियों के सरदार ने उनकी कोठरी पर धावा बोल दिया और 45 रुपए माँगे। कागावा कुछ बहाना बनाकर बाहर निकले और वहाँ से भागे। उस धूर्त ने पाँच गोली कोठरी के दीवार में दागीं और एक भिखारी से कहा—“जब कागावा लौटकर आवे, तो कह देना कि मैं व्यर्थ की धमकी नहीं देता था।”

एक बार कागावा बुरी तरह फँस गए। एक गुंडे ने कहा—”तीस शिलिंग दो, नहीं तो अभी तुम्हारे प्राण लेता हूँ।” कागावा ने 30 शिलिंग देकर जान बचाई।

कागावा के आसपास की कोठरियों में दुराचारों के अड्डे थे। उन्हें वेश्यालय कहना अधिक उपयुक्त होगा। कागावा ने वेश्यागमन के विरुद्ध व्याख्यान देना शुरू किया। कई वेश्याओं ने पश्चात्ताप किया और अपना पेशा छोड़ मेहनत-मजूरी करने का वचन दिया। जिन धूर्तों को वेश्यालयों से लाभ होता था, वे बड़े नाराज़ हुए, और एक ने आकर कागावा को धमकाया और उनके खाने-पीने के सारे बर्तन ही तोड़ डाले!

शिकावा की गंदी बस्तियों में ज़िंदगी का कोई मूल्य ही नहीं था। हत्या कर डालना तो एक मामूली सी बात थी। जो हत्या कागावा की कोठरी में उनके आने के पूर्व हुई थी, उसका कारण थी सिर्फ़ पाँच आने की रक़म! कागावा को पहले वर्ष में ही सात हत्याएँ अपने आसपास ही देखनी पड़ीं! एक हत्या मुर्ग़ी के बच्चे के लिए की गई थी। दो आदमियों में औरत के लिए झगड़ा हुआ; एक कहता था मेरी है, दूसरा कहता था मेरी। इसी में एक का क़तल हो गया। तेरह बरस के एक बच्चे ने इसी उम्र के दूसरे बच्चे को मार डाला।

इन गंदी बस्तियों का अधिक विवरण देने की आवश्यकता नहीं। इनमें प्रायः रिक्शा खींचने वाले, सड़क खोदने वाले, मज़दूर, कुली, सस्ती मिठाई बेचने वाले, छोटे-मोटे ज्योतिषी, हत्यारे, वेश्याएँ और उनके दलाल रहा करते थे। चोरों और जुआरियों के अड्डे भी यहीं थे।

कागावा ने जब 21 वर्ष की उम्र में शिकावा की गंदी बस्ती में प्रवेश किया, उस समय उन्होंने अपने मन में कहा था—’मुझे किसी बात का डर नहीं है; न बीमारी का, न मारे जाने का और न चोर-डकैतों का। आख़िर मरना तो है ही, मेरी उम्र भी ज़्यादा नहीं होगी, भय किसका करूँ?’ एक अहिंसावादी वीर योद्धा—की भाँति वे इस क्षेत्र में उतर पड़े और उनके 15 वर्ष तक युद्ध करने का परिणाम क्या हुआ, उसे पाठक पढ़ ही चुके हैं।

ग्रंथकार

अपनी अनुभूतियों को कागावा ने लिखना प्रारंभ किया। क्षयरोग से पीड़ित अवस्था में उन्होंने जो उपन्यास लिखा था, उसे उन्होंने कैजो नामक मासिक पत्र के प्रकाशक को दिखलाया। प्रकाशक महोदय को उसमें प्रतिभा के बीज दीख पड़े, और उन्होंने उसे 250 पौंड में ख़रीद लिया। पहले तो वह मासिक रूप में निकला और फिर पुस्तकाकार छपा। पुस्तक की लोकप्रियता का इसी से अनुमान हो सकता है कि थोड़े समय में ही उसकी ढाई लाख कापियाँ बिक गई!

1932 ई० तक वे पचास ग्रंथ लिख चुके थे और उनकी बारह लाख प्रतियाँ खप चुकी थीं। तीस पुस्तिकाएँ उन्होंने लिखी थीं और 35 पर्चे, जिनमें पहले की तीन लाख और दूसरे की 50 लाख प्रतियाँ निकल चुकी थीं। दस किताबें उस समय उनके सामने थीं, कोई आधी लिखी हुई, कोई तिहाई, तो कोई चौथाई। इन पुस्तकों के विषय हैं—धर्म, दर्शनशास्त्र, कविता, अर्थशास्त्र, राजनीति, मज़दूर-आंदोलन, जीव-विज्ञान इत्यादि। उनके कई ग्रंथों ने तो खपत के क्षेत्र में सबसे ऊँचा स्थान पाया है।

Across the Death line की ढाई लाख प्रतियाँ बिकीं, The Shooter at the Sun की एक लाख ग्यारह हज़ार, Passing from Star-to-Star की एक लाख, और A grain of Wheat की एक लाख।

सफलता का कारण

कागावा की सफलता का मुख्य कारण यह है कि वे जो—कुछ लिखते हैं, हृदय से लिखते हैं, दिल खोलकर लिखते हैं और एक उच्च उद्देश्य को लेकर लिखते हैं। अपने भाषणों के संग्रह की भूमिका में उन्होंने लिखा है—

“मेरी पुस्तकों के पढ़ने वाले बहुतेरे हैं; पर ग्रंथ-रचना ही मेरे जीवन का उद्देश्य नहीं। मैं तो एक सिपाही हूँ, और सर्व-साधारण के अंतःकरण को जाग्रत करने के लिए आंदोलन करना ही मेरा काम है। मेरे ग्रंथों में मेरी अंतरात्मा रोती है, और उसके रोने को जो कोई सुनता है, वही मेरा सच्चा मित्र है।”

“जापान के साढ़े पाँच सौ वेश्यालयों को दफ़न करना है, 15 करोड़ पौंड की शराब की धारा को रोकना है, 64 लाख मज़दूरों का उद्धार करना है और 2 करोड़ किसानों को स्वाधीन बनाना है। यही मेरे जीवन की आशा है, और इसी आशा से मैं अपनी पुस्तक सर्वसाधारण की सेवा में अर्पित कर रहा हूँ।”

“मनुष्य की आत्मा ही राजनीति है, अर्थशास्त्र है, शिक्षा है और विज्ञान है, इसलिए अंतरात्मा को सुसंस्कृत बनाना ही सबसे अधिक आवश्यक है। यदि हम अंतरात्मा को सुसंस्कृत बना लें, तो राजनीति, अर्थशास्त्र, शिक्षा और विज्ञान के प्रश्न स्वयं ही हल हो जाएँगे। मेरे ये भाषण अंतरात्मा की पुकार हैं।”

अपरिग्रही कागावा

यद्यपि कागावा को अब तक तीन लाख रुपए से अधिक अपनी पुस्तकों से रायल्टी के रूप में मिल चुका है; पर उन्होंने उसका पैसा अपनी तीन संस्थाओं पर ही व्यय किया है। अपना ख़र्च उन्होंने नहीं बढ़ाया। इस वक़्त वे सौ रुपए महीने में अपनी स्त्री तथा तीन बच्चों का पालन-पोषण करते हैं। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि इसमें सिर्फ़ कुटुंब की गुज़र ही हो पाती है। टोक्यो महानगरी के एक बाहरी स्थान पर उन्होंने अपने हाथ से काठ का मकान बना लिया है। जब जापान में महान भूकंप आया था, उस समय निराश्रित लोगों के लिए जो काम चलाऊ मकान बने थे, उन्हीं के बचे-खुचे काठ कबाड़ को ख़रीदकर ढाई सौ रुपए में उन्होंने अपने हाथ से अपना मकान तैयार कर लिया है। टोक्यो का ही नहीं, जापान का सर्वश्रेष्ठ नागरिक सस्ते-से-सस्ते काठ के मकान में रहता है। यद्यपि कागावा को अपने ग्रंथों से कभी-कभी 30 हज़ार रुपए साल की आमदनी हो जाती है, पर वे अपने ऊपर उसे ख़र्च नहीं करते। जीवन-निर्वाह के विषय में उनके विचार सुन लीजिए—

“जीवन-निर्वाह का सर्वोत्तम तरीक़ा यह है कि आदमी इतनी सादगी के साथ रहे कि उसे किसी दूसरे की सेवा न लेनी पड़े, अपनी सेवा वह ख़ुद कर सके। यदि कोई आदमी अपने हाथ से बनाई हुई झोपड़ी में रहे, स्वयं ही उसमें अपना रसोईघर बनावे, अपने हाथ से उगाई हुई तरकारियाँ खावे, अपने करघे पर बुना हुआ कपड़ा पहने और सादगी के साथ अपने घर का प्रबंध ख़ुद ही करे, तो उसे कितनी स्वाधीनता मिल सकती है! इस प्रकार के जीवन में मनुष्य न तो किसी को अपना ग़ुलाम बनाता है और न किसी को अपना शासक। वह ख़ुद ही अपना शासक, रसोइया, कलाकार और मज़दूर बन जाता है। इस प्रकार के जीवन से दुनिया के उलझे हुए प्रश्न सुलझ सकते हैं। यदि कोई मनुष्य किसी तालाब के किनारे मित्रतायुक्त वृक्षों की सघन छाया में अपनी झोपड़ी बनावे और पशु-पक्षी और वृक्ष-जगत से अपना नित्य प्रति का संबंध रखे, तो उसके लिए असह्य शोरगुल वाले नगरों के जीवन का क्या आकर्षण रह सकता है?”

अमेरिका में शिक्षा

गंदी बस्तियों में काम करते-करते कागावा के मन में यह ख़याल आया कि समाज-सेवा के कार्य में अन्य लोगों ने जो-जो प्रयोग किए हैं, उनका अध्ययन करने की ज़रूरत है। इसी विचार से सन् 1914 में वे अमेरिका के लिए रवाना हुए और दो वर्ष तक प्रिंसटन विश्वविद्यालय में अमेरिका की सामाजिक सेवा करने वाली संस्था का अध्ययन करते रहे। इन दो वर्षों में उनके जापान के स्कूल की तीन लड़कियाँ फुसलाकर वेश्याएँ बना दी गई और तीस लड़के गठकटे बन गए, जिसके कारण उन्हें जेल की हवा खानी पड़ी। गंभीर विचार करने के बाद कागावा इस परिणाम पर पहुँचे कि जब तक मज़दूरों को स्वाधीनता नहीं मिलती, तब तक गंदी बस्तियों का प्रश्न हल हो ही नहीं सकता।

मज़दूर-संगठन

जापान में मज़दूरों के लिए एक संस्था क़ायम हो चुकी थी, जिसका नाम था ‘मज़दूर हितकारिणी सभा कागावा ने पहले इस संस्था को विकसित कराके ‘जापान-मज़दूर संघ’ की स्थापना कराई, और तब अपने स्थान के मज़दूरों की समिति को उसकी शाख़ा बना दिया। सन् 1921 में कोबे के 30 हज़ार जहाज़ी मज़दूरों ने हड़ताल कर दी। कागावा ने उनका नेतृत्व ग्रहण किया। पुलिस ने यह हुक्म जारी कर दिया था कि मज़दूर लोग सभा न करें। कागावा ने पुलिस की आज्ञा का उल्लंघन करके मज़दूर-यूनियन की स्थापना की। जापान की यह पहली ही मज़दूर यूनियन थी। कागावा की इस कार्रवाई से पुलिस को बड़ा क्रोध आया और ख़ुफ़िया विभाग के आदमी निरंतर उनका पीछा करने लगे। वे पकड़े गए। पुलिस के एक आदमी ने उनका कपड़ा फाड़ डाला और उनके दो-चार डंडे भी जमा दिए। उनको हथकड़ियाँ पहनाई गई और बिना टोपी के नंगे पाँव वे थाने पर ले जाए गए। जज साहब रहम दिल आदमी थे, उन्होंने कागावा को सिर्फ़ तेरह दिन की सज़ा दी। इन तेरह दिनों में उन्होंने अपने एक नवीन उपन्यास का पूरा-पूरा प्लाट अपने मस्तिष्क-पटल पर लिख डाला!

तेरह दिन बाद जब कागावा का जेल से छुटकारा हुआ, तो उन्होंने उसका उत्सव बड़े विचित्र ढंग से मनाया। अपनी बस्ती के 100 ग़रीब बच्चों को वे समुद्र-तट पर दिन-भर के लिए हवा खिलाने ले गए। वहाँ बड़ी दिल्लगी रही। कुछ को अपनी माँ की याद आई और रोने लगे। कितने ही कूदते-फाँदते फिरे और पेटभर के खाना तो सभी ने खाया।

किसान संघ

गंदी बस्तियों के प्रश्नों को हल करते समय कागावा का ध्यान किसानों के सवालों की ओर गया। कागावा का मस्तिष्क वैज्ञानिक ढंग पर काम करता रहा है, और वे उन बस्तियों को अपनी प्रयोगशाला समझते रहे हैं। कागावा को तुरंत ही पता लग गया कि गंदी बस्तियों के अधिकांश निवासी ग्रामों से आते हैं। खेती से गुज़र न होने के कारण बेचारे बड़े-बड़े शहरों में आते हैं और यहाँ धक्के खा-खाकर आख़िर इन बस्तियों में आ पड़ते हैं। कागावा को वेश्यागमन का स्रोत भी ग्रामों में ही मिला। वेश्यालयों के लिए मालिक ख़ासतौर से किसान लड़कियों को ही बहका-बहकाकर शहरों में लाते हैं, और फ़ैक्टरियों के मालिक भी इन्हीं को अपना शिकार बनते हैं। जापान में जो लगभग लाखों की संख्या के क्षय के रोगी हैं, उनमें से अधिकांश ग्रामों के ही निवासी हैं। सन् 1921 में कागावा के घर पर किसान-सभा की स्थापना हुई और उसकी शाख़ाएँ जापान के भिन्न-भिन्न स्थानों में खोली गई। ज़मींदारों के साथ किसानों के जो झगड़े होते थे, उनमें इस सभा के द्वारा किसानों की सहायता की जाती थी। उन्हीं दिनों ‘भूमि और स्वाधीनता’ नामक एक मासिक पत्र भी निकाला गया। सन् 1921 के अंत में ‘अखिल जापानी किसान संघ’ का अधिवेशन हुआ। इससे जापान सरकार तथा ज़मीदारों के कान खड़े हो गए। कागावा ने किसानों के हित के लिए देश-भर में घूमना शुरू किया। कहीं-कहीं तो उन्हें बोलने ही नहीं दिया गया और अनेक स्थलों पर उनके भाषणों की रिपोर्ट पर पुलिस ने अपनी कैंची चलाई। एक जगह पर तो पुलिस ने उन्हें पकड़कर हिरासत में रख दिया। कागावा ने किसानों की जो महत्वपूर्ण सेवा की है, उसका वर्णन करने के लिए यहाँ स्थान नहीं।

बीसवीं शताब्दी की तीन बीमारियाँ

कागावा के मतानुसार बीसवीं शताब्दी संपर्ककी बीमारियाँ तीन हैं:—

(1) बड़े-बड़े नगरों में बहुसंख्यक आदमियों का जमघट।
(2) मशीनों का बाहुमूल्य और मनुष्य पर मेशीनों का प्रभुत्व।
(3) पूँजी का थोड़े से आदमियों के हाथ में केंद्रित रहना।

कागावा लिखते हैं:—

“पहली बीमारी—नगरों में जनसंख्या की बढ़ती के साथ-ही-साथ मनुष्यों के लिए शारीरिक नैतिक और मनोवैज्ञानिक ख़तरे भी बढ़ जाते हैं। उन स्थानों में दृढ़ व्यक्तित्व और बुलंद आवाज़ वाले आदमी पैदा ही नहीं हो सकते, जहाँ मनुष्यों को मित्रतायुक्त वृक्षों के संसर्ग से वंचित रखा जाता है, जहाँ वे नई ताज़ी घास की सुगंधि से अपने दिमाग़ को तरोताज़ा नहीं कर पाते, जहाँ वे कीट-पतंगों की मधुर ध्वनि को सुन नहीं पाते और जहाँ शीतल-मंद-सुगंध वायु उन्हें अपना संगीत नहीं सुना सकती। जहाँ मनुष्य शांतिपूर्ण जलाशयों के निकट रहकर एकांत में उनके स्वास्थ्यप्रद संपर्क में नहीं आ सकता, जहाँ वह घाटियों, पहाड़ियों और पर्वत दीप फैलने वाली धूप में स्नान नहीं कर सकता और जहाँ वह प्रकृति को रहस्यवादी छटाओं के साथ हार्दिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता, वहाँ दृढ़ व्यक्तित्व का विकसित होना संभव नहीं।

“नगरों की आबादी अधिक-से-अधिक चालीस हज़ार होनी चाहिए, और दो लाख से ऊपर की आबादी के नगर तो मानव समाज के लिए अत्यंत भयंकर हैं।”

दूसरी बीमारी—मनुष्य पर मशीनों का प्रभुत्व है। इससे आदमी की क्रियात्मक शक्ति नष्ट हो जाती है और वह ख़ुद मशीन बन जाता है। इससे उसमें स्वयं सोचकर किसी कार्य को प्रारंभ
करने की शक्ति नहीं रहती, एक दूसरे से आगे बढ़ने का उत्साह नष्ट हो जाता है, उन्नति की इच्छा का विनाश हो जाता है और अंततोगत्वा मशीन बनकर आदमी महकमा बेकारी में जा पड़ता है।

तीसरी बीमारी है—थोड़े से आदमियों के हाथ में पूँजी का इकट्ठा होना। इससे धन का उपयुक्त विभाजन नहीं होता, ग़रीबों और निर्बलों का शोषण शुरू हो जाता है और निर्धनता बढ़ती जाती है।

कागावा का मूलमंत्र

सैकड़ों मीटिंगों में कागावा इस बात को कह चुके हैं कि—”सब से अधिक आवश्यक कार्य है किसान के जीवन का पुनर्निर्माण।”

कागावा के जीवन पर एक दृष्टि

कागावा का जीवन भारतीय युवकों के लिए आदर्श है। जिन लोगों को अपनी अस्वस्थता से कुछ निराशा उत्पन्न होती हो, वे इस बात पर विचार कर सकते हैं कि कागावा आधे अंधे हैं, उनको गुर्दे की बीमारी है, फेंफड़े उनके कमज़ोर हैं और दिल वक़्त-बेवक़्त फेल करने की धमकी दिया करता है! पर कागावा क्षत्रिय हैं। वे कहते हैं—”कई बार में मरते-मरते बचा; अब जो ज़िंदगी मुझे मिली है, वह तो मुनाफ़े में है। खा टपर पड़कर नहीं मरना चाहता। दौड़ के आख़िरी मील तक मैं चलता ही रहूँगा, बीच में नहीं बैठने का। रेल पर सफ़र करते हुए या समुद्र-यात्रा में परलोक से मुझे बुलावा आवेगा, यह मैं नहीं जानता। मेरा काम निरंतर चलना है। बाक़ी बात ईश्वर के हाथ में है।”

कागावा से बहुत से लोगों ने कहा कि वे मज़दूर दल की ओर से पार्लियामेंट की मेंबरी के लिए खड़े हो जाएँ; पर उन्होंने इसे सदा अस्वीकार ही किया है। मज़दूर दल की एकता के लिए वे तन-मन-धन से प्रयत्न करते हैं। जो कुछ पैसा उनके पास बचता है, वे उसे इस दल को दे देते हैं; लेकिन जब मेंबरी के लिए कहा जाता है, तो वे यही उत्तर देते हैं—”शक्तिशाली पुरुषों की पंक्ति में मैं नहीं बैठना चाहता, क्योंकि उससे मेरे और ग़रीब आदमियों के बीच में, जिनकी मैं सेवा करना चाहता हूँ, एक दीवार खड़ी हो जाएगी।”

जब सन् 1930-31 में टोक्यो के मेयर ने उन्हें दो हज़ार रुपए मासिक वेतन (और मोटरकार अलग) पर समाज-सेवा करने का अनुरोध किया, तो उन्होंने कहा—”मैं बिना वेतन के ही काम करूँगा, नगर पर मैं अपने वेतन का बोझ नहीं डालना चाहता।” और उन्होंने अवैतनिक ही कार्य किया। उस समय की उनकी बनाई हुई योजनाएँ देशभर के लिए आदर्श सिद्ध हुईं। कागावा के जीवन का सबसे आकर्षक गुण उनका भोलापन है घर से ओवरकोट पहने हुए निकले हैं, रास्ते में कोई भिखारी मिल गया। उसने सर्दी से बचने के लिए कपड़ा माँगा, आपने ओवरकोट दे दिया। इस प्रकार न-जाने कितने ओवरकोट वे दान कर चुके हैं। वे कहते हैं—”छोटे-छोटे बच्चे नक्षत्रों से बातचीत करते हैं; पुष्पों से मित्रता करते हैं, तालाबों की अंतरात्मा से सम्भाषण करते हैं, वृक्षों को अपना दोस्त बनाते हैं और टिड्डियाँ तथा तितलियाँ उन पर ख़ास तौरपर कृपा भाव रखती हैं। क्या ही अच्छा हो, यदि मैं एक बार फिर वैसा ही बालक बन जाऊँ!” और दरअसल कागावा अब भी बालक ही बने हुए हैं—46 वर्ष के बालक!

निस्संदेह कागावा जापान की ही नहीं, संसार की एक विभूति हैं। यदि आप ऐसे महापुरुषों के सदृश बनना चाहते हों तो जीवन-निर्माण के असली रहस्य को बताने वाली ये पुस्तकें अवश्य पढ़िए (1) निपुण कैसे बनें? (2) 101 वर्ष कैसे जीवें? (3) कार्य करने का बढ़िया तरीक़ा कौन सा?


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