— अरुण कुमार त्रिपाठी —
स्वतंत्र भारत के इतिहास में कई बार विपक्ष की स्थिति कमजोर रही है। वह निष्प्रभावी रहा है और वैचारिक और सांगठनिक विखराव का शिकार रहा है। लेकिन जब भी मौका आया तो उसने अपनी प्रभावी भूमिकाओं का निर्वहन किया। बल्कि स्वयं पंडित जवाहर लाल नेहरू का यह कथन भी आज के संदर्भ में मौजूं है कि अगर विपक्ष नहीं है तो हमें विपक्ष पैदा करना पड़ेगा। इसीलिए वे स्वयं छद्म नामों से भी लेख और संपादकीय लिखा करते थे। ताकि प्रतिपक्ष का शरीर भले अनुपस्थित हो लेकिन उसकी आत्मा तो जिंदा रहे। एक दौर तो ऐसा आया जब कुछ अखबार मालिकों और संपादकों ने तय किया कि अगर संसद में विपक्ष नहीं है तो पत्रकारिता को प्रतिपक्ष की भूमिका निभानी होगी और उन्होंने वह भूमिकाएं निभाईं। आज चिंता की बात यह है कि आपातकाल को छोड़कर सत्तापक्ष और भारतीय राज्य का ऐसा चरित्र कभी नहीं रहा। सत्तापक्ष न तो कभी इतना क्रूर और निर्लज्ज था और न ही राज्य नामक संस्था इतनी प्रतिबद्ध और पक्षपाती। यहां तक कि आपातकाल के बाद भी राज्य का चरित्र ऐसा था कि उस इंदिरा गांधी की चुनावी हार हो गई जिन्होंने सोचा था कि आपातकाल लगाए जाने के बाद जनता उनकी मुट्ठी में आ चुकी है। लोकतंत्र के समक्ष इतनी प्रतिकूल स्थितियां कभी नहीं थीं जितनी आज हैं। क्योंकि तब एक गणित था कि अगर विपक्ष अपने मतों को एकजुट कर ले जाए तो सत्तापक्ष यानी कांग्रेस पार्टी को हटाकर विपक्ष अपनी सरकार बना सकता है। आज वह गणित फेल हो चुका है। अब लोकतंत्र या तो बीजगणित से चल रहा है या कैलकुलस से या फिर कुछ अदृश्य शक्तियां हैं जो बाजार के अदृश्य हाथ की तरह भारत को चला रही हैं।
तुलसीदास ने एक जगह कहा है कि ‘‘उमा दारु जोसित की नाईं।सबहिं नचावत राम गुसाईं।।” यानी जिस प्रकार मदारी बंदर को नचाता है वैसे ही प्रभु सभी को नचाते रहते हैं। वह प्रभु कौन हैं यह कई बार शोध और अनुसंधान का विषय लगता है और कई बार कुछ महाशक्तियों के बयानों और अपने महाप्रभुओं के प्रकट और अप्रकट भावों से पता चल जाता है। इसलिए राजनीति के कई जानकार कहते हैं कि इस देश के सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष दोनों को कोई और चला रहा है तो अतिश्योक्ति नहीं लगती। वह संचालन पूंजी के माध्यम से हो रहा है, राजनीतिक एजेंडा के माध्यम से हो रहा है या फिर खुफिया एजेंसियों के माध्यम से हो रहा है यह विवेचन का विषय है। एक बार इस स्तंभकार ने नर्मदा आंदोलन पर मोनोग्राफ लिखते समय लिख दिया था कि विडंबना है कि सरदार सरोवर बांध बनवाने के लिए वही विश्व बैंक आर्थिक सहायता दे रहा है और वही विश्व बैंक आंदोलनकारी एनजीओ को अनुदान भी देता है। यानी बांध समर्थन और विरोध दोनों में एक ही शक्ति का हाथ है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की हार और तमिलनाडु में एक के स्तालिन की पार्टी द्रमुक की हार और केरल में यूडीएफ की विजय के बाद अगर कहीं सर्वाधिक ऊहापोह और खींचतान की स्थिति है तो वह है इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इनक्लूसिव अलायंस यानी इंडिया में। हालांकि यह कहने और लिखने वाले भी हैं कि देखो किस तरह राहुल गांधी ने ममता की हार से प्रसन्न हो रहे कांग्रेसियों को समझाने की कोशिश की और ममता का समर्थन किया, सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ने उन्हें फोन किया और अखिलेश यादव तो मिलने तक गए। और ममता बनर्जी ने भी कहा कि अब तो वे आजाद पंक्षी हैं और उन्हें कोई पद नहीं चाहिए, वे तो इंडिया समूह को मजबूत करेंगी। उससे विपक्षी एकता मजबूत होती दिख रही है। लेकिन दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी की ओर से टीवीके पार्टी के अभिनेता से राजनेता बने टी.विजय को सरकार बनाने के लिए समर्थन दिए जाने के बाद द्रमुक और समाजवादी नेता अखिलेश यादव की जो प्रतिक्रिया आई है उससे तो यही लगता है कि अब विपक्ष में दरार और गहरी हो गई है। कम से कम दक्षिण की एक पार्टी उससे छिटक गई लगती है। द्रमुक के प्रवक्ता ने तो कांग्रेस पर पीठ में छुरा घोंपने का आरोप लगाया है तो पार्टी की नेता कनिमोझी ने लोकसभा अध्यक्ष को लिखकर दे दिया है कि वे द्रमुक के लिए सदन में इंडिया समूह से अलग बैठने की व्यवस्था कर दें। अखिलेश ने तो एक्स पर कांग्रेस पर तंज कसते हुए लिख दिया है कि वे संकट में किसी मित्र का साथ नहीं छोड़ते। यह तात्कालिक टिप्पणियां हैं जिनकी अपने अपने ढंग से व्याख्याएं हो रही हैं। लेकिन समझदारी वाली व्याख्याओं के अलावा नामसझी भरी टिप्पणियां और अतीत के गड़े मुर्दे उखाड़ने वाले भाव भी कम नहीं प्रकट हो रहे हैं। यह व्याख्याएं और टिप्पणियां महज हालिया चुनाव और उसके गुणा गणित तक सीमित नहीं हैं बल्कि गैर भाजपावाद के निर्माण के लिए पूरे गैर-कांग्रेसवाद के इतिहास के औचित्य पर ही सवाल उठाए जाने तक फैल गई हैं।
समस्या शासक दल और राज्य नामक संस्था के अहंकार की ही नहीं है, समस्या विपक्षी दलों के अपने अपने अहंकार और भ्रम की भी है। अगर राहुल गांधी यह कहते हुए घूम रहे हैं कि नोट करके जेब में रख लीजिए कि भाजपा से सिर्फ कांग्रेस ही लड़ सकती है तो कम्युनिस्ट साथियों का यह बयान भी कम गलतफहमी वाला नहीं है कि संघ की विचारधारा से असली लड़ाई तो वामपंथ ही लड़ रहा है। जबकि क्षेत्रीय दलों और समाजवादी विरासत का दावा करने वाले दलों का अब भी दावा है कि भाजपा और संघ की विचारधारा के विस्तार को तो उन्होंने ही रोक रखा है। यानी कृष्ण की तरह गोवर्धन पर्वत तो उन्हीं की उंगली पर सधता है। इस बीच में यह ग्रंथि पाले कांग्रेसी बौद्धिक भी बैठे हैं कि संघ और भाजपा को आगे बढ़ाने का काम तो समाजवादियों ने किया और कम से कम दो बार यानी 1967 और 1977 में जनसंघियों को सत्ता दिलाने में उन्हीं का योगदान रहा। इसीलिए डॉ राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण को कोसने और सीआईए और इजराइल का एजेंट बताने वालों की तादाद भी कम नहीं है। निश्चित तौर पर उन लोगों की कमियां हो सकती हैं या फिर इतिहास के तात्कालिक प्रवाह में उनकी कांग्रेस विरोधी भूमिकाएं हो सकती हैं लेकिन एक बात दावे के साथ कही जा सकती है कि आज उस वजन का कोई नहीं है जो प्रतिपक्ष को जोड़ सके और गैर भाजपावाद के विचार को विपक्ष को जोड़ने वाले सीमेंट के गारे की तरह तैयार कर सके। भारतीय विपक्ष के पुनर्जीवन और भारतीय लोकतंत्र के पुनर्जीवन का एक ही उपाय है कि हम सब अतीत की ग्रंथियों से बाहर निकलें और नए युग के अनुरूप उपस्थित चुनौतियों को पहचानें।
अतीत का गैर-कांग्रेसवाद और आज का गैर-भाजपावाद महज रणनीतियां हैं, वे सकारात्मक विचार नहीं हैं। असली चुनौतियां आज के दौर के लोकतांत्रिक ताने बाने और राष्ट्रीय अखंडता के बिखराव को रोकने की है। विपक्षी दल इस बात को समझ नहीं रहे हैं या अगर समझ रहे हैं तो वैसा व्यवहार नहीं कर रहे हैं कि अगर मतदान से सत्ता परिवर्तन की स्थितियां रहेंगी तभी उन्हें सत्ता मिलेगी। अगर खेल का वह नियम ही समाप्त हो जाएगा और हर चुनाव में विपक्षी दलों का मुकाबला, पहले मीडिया, फिर ईडी-सीबीआई, फिर चुनाव आयोग फिर भारतीय सुरक्षा बल और आखिर में अथाह पूंजी और प्रचार से सज्ज भाजपा से होगा तो वे कभी चुनाव नहीं जीत सकते। एसआईआर और परिसीमन ने नई जनता और नए मतदाता चुनने का नियम बना दिया है। लोकतंत्र उस व्यवस्था का नाम है जहां पर मतदाता अपनी सरकार चुनते हैं। यहां उल्टा हुआ है। यहां सरकार ने अपने मतदाता चुने हैं और फिर उनसे मुहर लगवा कर अपनी विजय घोषित कर दी गई है।
भारतीय समाज और राष्ट्र के समक्ष इस समय दो प्रमुख चुनौतियां हैं। पहली चुनौती है राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बचाने की। दूसरी चुनौती है लोकतंत्र की व्यवस्था को कायम रखने और उसे समाज के भीतर तक ले जाने की। 1946 में जब मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त को सीधी कार्रवाई का आह्वान किया था तो उनका साफ कहना था कि हम हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते। हमें अलग राष्ट्र चाहिए। आज अगर पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनने और संविधान की शपथ लेने से पहले ही भाजपा नेता यह आह्वान कर रहा है कि हमें वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा कि इजराइल ने गज़ा में किया और अब सबका साथ सबका विकास का नारा नहीं चलेगा, जो हमारे साथ है उसी का विकास होगा तो आप सोच सकते हैं कि इस देश की एकता कितने दिनों तक बचेगी। दूसरी चुनौती लोकतंत्र को बचाने की है। अगर लोकतंत्र है तो इस देश में राजनीति, विचार और सामाजिक सौहार्द का कोई मतलब है। अगर वही नहीं है तो फिर स्वाधीनता संग्राम और भारत की आर्थिक तरक्की का क्या मतलब है वह तो महज चंद लोगों और शक्तियों का शगल हो जाएगा। इसलिए विपक्ष पहले अपना लक्ष्य तय करे, अहंकार से मुक्त हो और फिर सांगठनिक एकता कायम करे। अगर विपक्ष उस भूमिका का निर्वहन नहीं कर सकता तो आखिरी उम्मीद जनता से बचती है लेकिन असंगठित जनता असंगठित विपक्ष से अधिक अराजक और खतरनाक होती है।
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