— Premkumar Mani —
17 मई की तारीख मन में एक झुर-झुरी पैदा करती है. यह वह तारीख है जिस रोज 1934 में कुछ उत्साही युवाओं ने पटना के एक छोटे-से सभागार में भारतीय राजनीति के आंगन में समाजवाद का बिरवा लगाया था. ये नौजवान बोल्शेविक क्रांति, मार्क्स और लेनिन के विचारों से प्रभावित और इतिहास की एक नवीन दृष्टि से लबरेज थे. 1920 में ताशकंद में मानवेंद्रनाथ राय और अवनि मुखर्जी ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का एक संगठन बनाने की खानापूर्ति कर ली थी और 1925 में कानपुर में सिंगरावेलु की अध्यक्षता में कम्युनिस्टों का एक राष्ट्रीय सम्मलेन भी हुआ था. लेकिन 1934 का समाजवादी सम्मेलन इसलिए महत्वपूर्ण था कि इसे राष्ट्रीय आंदोलन के मुख्य संगठन कांग्रेस के एक मंच के तौर पर गठित किया गया था. हम इतिहास का एक विहंगावलोकन करें तो चीजें अधिक स्पष्ट होंगी.
1930 का दशक भारत में राजनीतिक सक्रियताओं और वैचारिक आवेगों से भरपूर था. गाँधी जी कांग्रेस के सर्वमान्य नेता जरूर थे, लेकिन उनके प्रतिक्रियावादी विचारों की कांग्रेस में ही आलोचना शुरू हो गई थी. भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में समाजवादी रुझान वाले नौजवानों के एक ग्रुप ने हिंदुस्तानी समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना का गठन कर लिया था. भगत सिंह की शहादत के बाद भारतीय नौजवानों में इसके प्रति जबरदस्त आकर्षण अनुभव किया गया था. जवाहरलाल और सुभाष बोस जनसभाओं में समाजवाद की चर्चा लगातार कर रहे थे. 1930 के पूर्व ही जवाहरलाल अपने राजनीतिक गुरु गांधी से इसके लिए झिड़की भी सुन चुके थे. लेकिन नेहरू माने नहीं. इसी दौर में जेल के भीतर से लिखे अपने साहित्य में समाजवादी रुझानों को वह स्पष्ट करते रहे. 1934 की फरवरी में जवाहरलाल जी की एक छोटी-सी किताब आती है “व्हेदर इंडिया”, इसमें उन्होंने अपनी वामपंथी वैचारिक स्थिति और गांधीवाद से मतभेदों को प्रकट किया. नेहरू तब 45 से कम उम्र के युवा थे.
लेकिन इसके पूर्व 1933 में ही नासिक जेल में कुछ नौजवान दोस्तों ने खेल-खेल में एक बड़ी बात कर डाली थी. जयप्रकाश नारायण, युसूफ मेहर अली, अशोक मेहता, अच्युत पटवर्धन और मीनू मसानी ने कांग्रेस पार्टी के भीतर ही एक समाजवादी ग्रुप बनाने का संकल्प लिया, जिसका उद्देश्य कांग्रेस को वामपंथी विचारों के रास्ते पर ले आना था. 1934 के मई महीने में गया में कांग्रेस अधिवेशन था. इसमें वे सभी नेता आये हुए थे, जिन्होंने नासिक में समाजवाद विषयक विमर्श में हिस्सा लिया था. गया से लौट कर सब को पटना में जुटना था. गया में पहली दफा कांग्रेस अधिवेशन को नरेन्द्रदेव ने सम्बोधित किया था. वे भी इस युवा मंडल के साथ थे. 17 मई 1934 के दिन पटना के एक छोटे-से अंजुमन इस्लामिया हॉल में आचार्य नरेन्द्रदेव के सभापतित्व में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी, जिसे संक्षेप में सी एस पी कहा गया, की स्थापना हो गयी. इसे भारत में समाजवादी आंदोलन का प्रस्थान बिंदु कहा जा सकता है.
अंजुमन इस्लामिया हॉल आज भी पटना में अवस्थित है. तीन सौ से अधिक लोगों के बैठने की व्यवस्था वहां नहीं है. इसलिए अनुमान किया जा सकता है कि कुल जमा कितने लोग उस सम्मेलन में रहे होंगें. भाग लेने वालों में सबसे वरिष्ठ पैंतालीस वर्षीय नरेन्द्रदेव थे. जेपी,जो कि आयोजक थे, तब बत्तीसवें साल में थे. यानि यह नौजवानों का प्रयास था. इसी वर्ष मुंबई में इस संस्था का प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन धूम-धाम से आयोजित हुआ. लाल झंडों और मार्क्स व लेनिन की तस्वीरों से सजे सभागार में जब समाजवादी संकल्पों का उद्घोष हुआ तब वातावरण उत्साह से भर गया.
सी एस पी को लेकर कांग्रेस के दक्षिणपंथी नेता बेचैन हो गए. हालांकि, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने मार्क्सवादी होते हुए भी कम्युनिस्टों से इसलिए अपने को अलग रखा कि कम्युनिस्ट गाँधी और कांग्रेस से सहयोग करना नहीं चाहते थे, क्योंकि उनकी नजर में ये बुर्जुआ थे. जबकि सोशलिस्ट लोग कांग्रेस को राष्ट्रीय पार्टी मानते थे और गाँधी के विचारों के न सही, उनके व्यक्तित्व की सराहना करते थे. सोशलिस्टों केलिए राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और राष्ट्र निर्माण में फर्क था. अंग्रेजी साम्राज्यवाद का विरोध तो वे करते ही थे, देश के भीतर ज़मींदारों और पूंजीपतियों का भी विरोध करते थे. वे किसान-मजदूरों के हित के साथ होना चाहते थे. उनके इस रूप से दक्षिणपंथियों को परेशानी थी. कॉंग्रेसी दक्षिणपंथियों केलिए गाँधी की अहिंसा और उनके सामाजिक प्रतिगामी ख्याल बड़े काम के थे. जून 1934 में ही, यानि सी एस पी की स्थापना के अगले ही महीने, कांग्रेस वर्किंग कमिटी में इस नयी पार्टी का नाम लिए बिना इसके कार्यक्रमों की आलोचना की गयी और कहा गया कि निजी सम्पति का उन्मूलन और वर्ग संघर्ष अहिंसा की नीति के विरुद्ध है.
सी एस पी ने किसानों और मजदूरों के सवाल को लेकर कुछ कार्यक्रम बनाये. बिहार में सहजानंद सरस्वती की किसान सभा के साथ सी एस पी के लोग सक्रिय हुए. आंध्रा के समुद्रतटीय इलाकों में सोशलिस्टों ने किसानों में राजनीतिक चेतना के प्रसार हेतु किसान यात्रायें की. ज़मींदारी प्रथा खत्म करने केलिए सभाएं की. सी एस पी नेता एन जी रंगा ने आंध्रा के निडुब्रोल में एक इंडियन पेजेंट इन्स्टीच्यूट की स्थापना की. लेकिन गाँधी इन सब से खुश नहीं थे. आचार्य नरेन्द्रदेव ने अपनी पुस्तक राष्ट्रीयता और समाजवाद में अपनी पीड़ा दर्ज़ की है –
” कांग्रेस के नेताओं ने एक वर्ष के भीतर स्वराज स्थापित करने का वायदा किया था. किसान समझने लगे थे कि स्वराज की स्थापना होने पर हमको लगान न देना पड़ेगा. लेकिन महात्मा जी ज़मींदारों और किसानों की लड़ाई नहीं चाहते थे. ” (पृष्ठ 35 )
उत्तर प्रदेश और बिहार में समाजवादियों ने रैयत किसानों से हमदर्दी जताने और उनके शोषण का प्रतिकार करने की कोशिशें की, लेकिन कांग्रेस में बैठे ज़मींदारों के बगल-बच्चों ने इन कार्यक्रमों का हर संभव विरोध किया.
सी एस पी के सक्रिय सदस्यों की संख्या भले ही कम थी, लेकिन अपनी वैचारिकता से इनलोगों ने देश भर में हल-चल मचा दी. जवाहरलाल नेहरू और सुभाष बोस सीधे तौर पर सी एस पी में नहीं रहे, लेकिन कांग्रेस के भीतर वामपंथी तेवर बनाये रखने में यदा-कदा अपने प्रकट किये गए विचारों से मदद की. ये दोनों स्वयं को समाजवादी कहा जाना पसंद करते थे. कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के पटना अधिवेशन के समय नेहरू जेल में थे. उन्ही दिनों नरेन्द्रदेव को लिखे एक पत्र में गाँधी जी ने लिखा -” वे ( नेहरू ) जेल के बाहर होते तो उधर का ही रुख करते. ”
राष्ट्रीय आंदोलन के आख़िरी चरण में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया इस दौर में कुछ उसी तरह नौजवानों के राष्ट्रीय नायक बने जिस तरह 1930 के दशक में जवाहरलाल और सुभाष थे.
यह अजीब-सी बात लगती है कि देश की आजादी के साथ ही 1948 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी कांग्रेस पार्टी से अलग हो गयी. इस तरह नेहरू के सबसे निकट के लोग उनसे अलग हो गए. बची हुई कांग्रेस पर दक्षिणपंथियों का प्रभाव बढ़ गया. हालांकि उनके प्रधानमंत्री जवाहरलाल थे, लेकिन कांग्रेस समाजवादियों से लगभग खाली हो गई थी. इसके प्रभावों का समुचित आकलन अब तक इतिहासकारों ने नहीं किया है.
समाजवादी पार्टी एक पृथक राजनीतिक पार्टी के रूप में संगठित हुई और भारत की लोकतान्त्रिक राजनीति को लम्बे समय तक समृद्ध करती रही. कालांतर में इसके नेताओं में मतभेद भी खूब हुए. जयप्रकाश नारायण और लोहिया का मार्क्सवाद की द्वंद्वात्मकता वाले सिद्धांत से विश्वास हिल गया था. नरेन्द्रदेव अपने मार्क्सवादी ख्यालों पर अपने जीवन के आखिर तक अडिग रहे. इस बीच समाजवादियों के अनेक नेता इस आंदोलन से दूर हुए. कुछ नए जुड़े भी. लेकिन धीरे-धीरे देखा गया कि समाजवादी धारा-सभाओं की भागीदारी यानि संसदीय राजनीति को अधिक महत्त्व देने लगे. इस कारण दो बड़े समझौते इन्होंने अपने वैचारिक विरोधियों के साथ किए. पहला था 1952 के आखिर में कृपलानी के साथ समझौता, जिसके फलस्वरूप प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनी और फिर 1970 में चरण सिंह के साथ का समझौता, जिसके कारण समाजवादी स्थायी तौर पर जातिवादी जोड़-तोड़ की पार्टी बन कर रह गए.
आज समाजवादियों का नाम भले हो, उनके आदर्श समाप्त हो गए हैं. अखिलेश यादव ने लाल टोपी भले पहन रखी हो, समाजवाद का ककहरा भी नहीं जानते. तमाम पुराने समाजवादी नेता दिग्भ्रमित और पस्त-हाल हैं. ऐसे में समाजवादी आंदोलन को याद किया जाना एक पीड़ा का ही अनुभव कराता है, लेकिन 17 मई की ऐतिहासिक तारीख एक स्फुरण तो देता ही है.
1925 में नागपुर में पांच लोगों ने बैठ कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी और अगले सौ वर्ष में हिन्दू राष्ट्र का संकल्प लिया था. उनलोगों ने अपना संकल्प लगभग पूरा कर लिया. समाजवादी अधिक काबिल,मिहनती और ईमानदार थे, जनता ने उन पर अधिक विश्वास भी जताया. लेकिन उनके नेताओं ने ही बारम्बार धोखा दिया. आज समाजवादी तो बिखर ही गए, उन पर यकीन करने वाली जनता भी बिखर गयी. लेकिन इस नैराश्य की स्थिति में भी यही कहा जा सकता है कि न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया केलिए आज भी समाजवाद ही एक उम्मीद है.
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