
अधिकांश कालखंड में परिवर्तन का एक नया दौर होता है। लेकिन जब यह परिवर्तन नकारात्मक भाव से पल्लवित और पुष्पित होता है, तो यह संकट काल की गाथा लिखता है। 2014 में आई सरकार न जाने कितने सपनों की एक आशा बनी थी और आज, जब 2026 का पाँचवाँ महीना खत्म हो रहा है, तब पलटकर उन सपनों की हकीकत को देखने से एक अवसाद महसूस होता है। इस परिस्थिति को एक निरपेक्ष भाव से समझने की जरूरत है। खासकर तब जब भारत विश्वगुरु होने का डंका पीट रहा है। और इसी दौर में, जहाँ संप्रभुता का मूल्य क्षीण हो गया है। हम अमेरिका के आगे घुटने टेक रहे हैं। स्वदेशी का सपना, संप्रभु राष्ट्र बनने का गौरव और दक्षिण एशिया में एक मजबूत राष्ट्र बनने का सपना हमने खो दिया है।
भाजपा अपने नेतृत्व में लगातार अनपढ़ और कम पढ़े-लिखे लोगों को ज्यादा मौका दे रही है। खासकर बिहार, दिल्ली, बंगाल और असम के नेतृत्व को देखने के बाद ऐसा लगता है मानो भाजपा ने यह तय कर लिया हो कि उसे बौद्धिक, संवैधानिक और भारतीय सोच रखने वाले पढ़े-लिखे लोगों को नेतृत्व में नहीं लाना है। इससे भले ही भाजपा को लाभ न मिलता हो, लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे लोगों को लाभ मिलता है। इस परिघटना को आप राजनीति के विभिन्न पक्षों को समझने के माध्यम से देख सकते हैं।
राजनीतिक प्रक्रिया को समझने वाले लोग इस रणनीति को इस रूप में देखते हैं कि नरेंद्र मोदी ऐसे लोगों को मुख्यमंत्री बना रहे हैं, जो मोदी-शाह की दया पर जीवित रहें। 2014 के बाद से ऐसा देखा गया है कि आडवाणी से लेकर गडकरी तक, जो भी उनके प्रतिद्वंद्वी नजर आते हैं, उन्हें हाशिये पर डाल दिया जाता है। इसमें संघ की भी बड़ी भूमिका होती है, जिससे भाजपा के मुख्य नेतृत्व का कोई चुनौतीकर्ता पैदा न हो।
राजनीतिक रूप से यह एक सोची-समझी साजिश मानी जा सकती है, ताकि मोदी और शाह के सामने यह सवाल कोई न उठाए कि “मोदी और शाह के बाद कौन?” इसीलिए वे इन प्रक्रियाओं के माध्यम से अपने नेतृत्व के भरोसे को प्रतिस्थापित करना चाहते हैं। इसके साथ ही, भ्रष्टाचार में लिप्त और आरोपित नेताओं को बड़े पदों पर मनोनीत किया जाता है, जिसमें असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा तथा तत्कालीन बंगाल नेतृत्व के कुछ नाम प्रमुख रूप से लिए जाते हैं।
यह प्रक्रिया लोकतंत्र के लिए केवल हानिकारक ही नहीं, बल्कि खतरनाक भी है। क्योंकि इसके माध्यम से नेतृत्व निर्माण की सहज प्रक्रिया लम्बे समय के लिए गर्त में चली जाती है। भारतीय राजनीति के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जहाँ विपक्ष में राहुल गांधी के बाद एक लंबा राजनीतिक गैप दिखाई देता है, वहीं भाजपा की राजनीति में मोदी और शाह के बाद भी एक लंबा गैप नजर आता है। आरएसएस भी इस तरह की राजनीति को सहयोग करता है, क्योंकि वह प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न राजनीति के विघटन की तुलना में तानाशाही प्रवृत्ति को उपयुक्त मानता है।
बंगाल, बिहार से लेकर महाराष्ट्र तक जिस तरह के राज्य स्तरीय नेतृत्व को पैदा किया जा रहा है, उसमें ज्यादातर लोग आपराधिक प्रवृत्ति के दिखाई देते हैं। इससे भाजपा की प्रचारित विचार केन्द्रित राजनीति का क्षरण हुआ है। ऐसे लोगों को, जिनकी राजनीति में अपराधी छवि है, नेतृत्व देने पर उन्हें आसानी से नियंत्रित या गुलाम बनाया जा सकता है।
नरेंद्र मोदी की उम्र 75 वर्ष पार कर चुकी है। भारतीय अर्थव्यवस्था और विदेश नीति धूल में उड़ रही है। मणिपुर से लेकर कश्मीर तक तमाम तरह के संकट मौजूद हैं। सरकार की कुछ कर पाने की हैसियत नहीं दिख रही है। तब राजनीति के इस संकटपूर्ण काल में, सरकार को दोषी ठहराने से कैसे बचा जा सकता है?
उपर्युक्त कारकों को ध्यान में रखते हुए यहाँ तीन बातें कही जा सकती हैं। पहली, राजनीतिक दृष्टि से भाजपा की तुलना में सिर्फ नरेंद्र मोदी का नेतृत्व अधिक शक्तिशाली होता जा रहा है। शक्तिशाली नेता कमजोर राष्ट्र । दूसरी, केंद्रीकरण को मजबूत करने की प्रक्रिया से लोकतांत्रिक ऊर्जा का नुकसान हो रहा है। इसके कारण व्यक्ति-केंद्रित राजनीति बढ़ रही है और विचार-केंद्रित राजनीति हाशिये पर जा रही है। तीसरी, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीति एक तरह से अधिनायकवादी (Authoritarian) और सर्वसत्तावादी (Totalitarian) प्रवृत्तियों को बढ़ाने का काम कर रही है।
इसके साथ ही, विपक्ष की राजनीति को कमजोर करने की कोशिश सत्ता पक्ष द्वारा लगातार की जा रही है। महाराष्ट्र चुनाव से लेकर आम आदमी पार्टी को तोड़ने तक — इसके अनेक उदाहरण मौजूद हैं। विपक्ष की कमजोर होती उपस्थिति भारतीय राजनीति के गहरे संकट की ओर इशारा करती है।
उपर्युक्त तमाम तरह की प्रक्रियाएँ, जो भाजपा में जन्म लेकर विकसित हो रही हैं, और 12 वर्षों के दौरान जिस तरह की प्रवृत्तियाँ प्रबल होती जा रही हैं, उन्हें समाजशास्त्र की भाषा में पैरेटो के सिद्धांत के मुताबिक *सत्ताधारी के गुणधर्म में हो रही गुणात्मक गिरावट* की संज्ञा से अभिव्यक्त किया जा सकता है। भारत के लोकतंत्र के संकट के रूप में निम्नलिखित परिस्थितियां उत्पन्न हुई हैं—
• चुनावी राजनीति में विकल्प का अभाव
• चुनावी मर्यादा का विखंडन
•अच्छे लोगों में चुनावी राजनीति के प्रति उदासीनता का भाव
• सेवा, संकल्प और परमार्थ की राजनीति का क्षरण या विलोपन
जब हम कांग्रेस और भाजपा की सत्ता का मूल्यांकन करते हैं, तो भाजपा दो अर्थों में कांग्रेस से स्पष्ट रूप से अलग और गलत दिखाई देती है— एक, सांप्रदायिक राजनीति और दूसरा, एंटी-इंटेलेक्चुअलिज्म।
भारतीय राजनीति में स्वतंत्रता संग्राम के बाद कुछ मूल्य निर्धारित होते गए थे। कि राजनीति में परमार्थी लोग होंगे, जो सेवा के साथ राष्ट्र-निर्माण के सपने को साकार करेंगे और भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का संवर्धन करेंगे। लेकिन आज की राजनीति को निरपेक्ष भाव से देखने पर ऐसा लगता है कि अब उन सब मर्यादाओं को धूलि-धूसरित और धूमिल करने का यह एक षड्यंत्र बन गया है।
पूरी नाउम्मीदी शायद ही कभी होती हो। आशा की किरणें भी कुछ प्रक्रियाओं के माध्यम से देखने को मिल रही हैं। सुरजीत भल्ला ने आर्थिक नीति के उदारीकरण के माध्यम से सरकार के राष्ट्र-निर्माण संबंधी हस्तक्षेप को बाजार की प्रक्रियाओं के लिए खोल देने की आवाज उठाई और पूरी जिंदगी इस सरकार की वैचारिक पैरवी करने में अपनी बौद्धिक ऊर्जा दी। लेकिन आज वे भी पलटकर देख रहे हैं। कि देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है, देश की सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत कमजोर हो रही है और हम देश को संकटों से उबारने की हालत में भी नहीं हैं। विदेशी संकटों के सामने हम घुटने टेक रहे हैं।
ऐसे बौद्धिक, जो कभी मोदी का गुणगान कर रहे थे, एक अवसादपूर्ण इकोसिस्टम पैदा कर रहे हैं। और उस इकोसिस्टम के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने लगातार देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाली गलतियाँ कीं।
आज जब जॉबलेस ग्रोथ और यूथ डिसइल्युजनमेंट से निकला “कॉकरोच मूवमेंट” सामने आया है, तो तमाम तरह के बुद्धिजीवी, जो इस सरकार को समर्थन कर रहे थे, अब अपना पिंड छुड़ाने, पल्ला झाड़ने का काम कर रहे हैं। स्वयं भारतीय जनता पार्टी जिन आंदोलनों से निकली है, उनमें राम मंदिर आंदोलन को छोड़ दें तो स्वदेशी आंदोलन और एंटी- अमेरिका के स्वर हमेशा देश की पृष्ठभूमि में रहे हैं। लेकिन स्वदेशी आंदोलन के सपने को अगर सबसे ज्यादा किसी ने कमजोर किया है, तो वह आज की सरकार ही है।
राष्ट्रीयता से लेकर सांप्रदायिकता तक के मुद्दे लगातार लोगों की मनोदशा को दुखी और चिंतित कर रहे हैं। आज जब लाखों मुसलमानों ने यह घोषणा की कि वे बकरीद में गाय नहीं खरीदेंगे, तो अनेक हिंदू लोगों की आर्थिक स्थिति पर संकट दिखाई देने लगा। इस स्थिति को देखते हुए बंगाल सरकार ने कहा है कि 14 वर्ष से ऊपर की गौमाता की हत्या वैध है।
ईरान युद्ध के बाद जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की दखल कमजोर हुई है, उससे उस विदेश नीति की भी हवा निकल गई, जिसका दम यह सरकार हमेशा भरती रही है। इस महंगे राष्ट्रवाद का भुगतान कौन करेगा, जिसमें हमने ईरान और रूस जैसे सहयोगियों को खोकर अमेरिका के आगे घुटने टेक दिए? मोदी की विदेश नीति की विफलताओं के बाद जो संकट उभरा है, उसे जनता कैसे भुगतेगी ? इससे भी बड़ा सवाल है कि जनता क्यों भुगतेगी?
मनमोहन सिंह के समय अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमत आज से भी ज्यादा महंगी थी, फिर भी जनता ₹60 में पेट्रोल खरीदती थी। आज जनता ₹100 में पेट्रोल खरीदने के लिए लाइन में लगी हुई है। यह सौदा जनता क्यों भुगते?
12 साल बाद, जब डॉलर की कीमत लगातार बढ़ती जा रही है, तो इसका दोष सरकार को न दें तो किसे दें?
12 वर्षों के दौरान जो पूंजीपति अरबपति बने, वे आज भारत के बाजार से अपनी पूंजी निकालकर विदेशी बाजारों में लगा रहे हैं। ऐसे महंगे और धोखेबाज कथित राष्ट्रवाद का क्या फायदा? गैरबराबरी और गरीब बढ़ाकर हजारों अरब खरबपति पैदा किए गए। और अब वे भारतीय बाजार में पैसा न लगाकर विदेशी बाजारों की ओर जा रहे हों, तो इसका दोष सरकार को क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? फर्जी देशभक्ति की यह नाव डूबती हुई दिखाई दे रही है। और इसके डूबने से हमारे सशक्त राष्ट्र के सपने भी डूब रहे हैं।
उपरोक्त तमाम चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आम लोगों को अपनी नागरिक चेतना विकसित करते हुए सक्रिय नागरिक की भूमिका निभानी चाहिए। तमाम जन आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी करके परिवर्तनकारी राजनीति को समर्थन देना चाहिए। आज भी पूरे भारतवर्ष में हजारों ऐसे नेतृत्व मौजूद हैं, जिन्होंने अपना जीवन देशसेवा और राष्ट्र-निर्माण में लगाया है। उनका समर्थन करना चाहिए । जिस प्रकार का प्रयास उन्होंने किसान आंदोलन, अरावली आंदोलन में किया, तमाम जनविरोधी कानूनों को हटाने के लिए किया, उसी तरह के प्रयासों की आज जरूरत है।
राजनीति राष्ट्र-निर्माण की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसीलिए तमाम तरह के लोग, जो निरपेक्ष भाव से भी अपने को जोड़ते हैं, उन्हें भी आगे आकर लोकतंत्र पर आए संकट के खिलाफ अपने प्रतिरोध का स्वर देना चाहिए। इसके लिए भले ही वे प्रत्यक्ष रूप से सामने न आएँ, लेकिन तमाम तरह के मंच और संगठन हैं, जिन्हें वे आर्थिक सहयोग देकर अपना योगदान दे सकते हैं।
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