— परिचय दास —
।। एक ।।
मानविकी विषयों में विद्यार्थियों के घटते प्रवेश को अगर आप केवल अपने आसपास के कॉलेज या विश्वविद्यालय की समस्या मान रहे हैं, तो यह थोड़ा वैसा ही है जैसे कोई किसान अपने खेत की मिट्टी को दोष देकर जलवायु परिवर्तन से आँख चुरा ले। यह सचमुच एक वैश्विक परिघटना है और इतनी व्यापक कि यूनेस्को तक इसकी चिंता दर्ज कर चुके हैं।
स्थिति को साफ-साफ देखें तो पिछले दो-तीन दशकों में मानविकी के प्रति छात्रों का आकर्षण लगभग हर महाद्वीप में कम हुआ है। अमेरिका के विश्वविद्यालयों में इतिहास, दर्शन, साहित्य जैसे विषयों में नामांकन लगातार गिरा है; ब्रिटेन में भी कला और सामाजिक विज्ञान के कई विभाग या तो सिकुड़ गए या बंद हो गए; भारत में स्थिति थोड़ी जटिल है क्योंकि यहाँ संख्या के स्तर पर नामांकन अभी भी बड़ा दिखता है पर गुणवत्ता, प्राथमिकता और “पहली पसंद” के रूप में मानविकी का स्थान लगातार नीचे खिसका है। यह गिरावट एकदम रैखिक नहीं है बल्कि लहरों की तरह है लेकिन समग्र प्रवृत्ति साफ है।
अब कारणों की बात करें क्योंकि बिना कारण समझे समाधान की बातें करना वैसे ही है जैसे बिना बीमारी पहचाने दवा खा लेना। सबसे पहला कारण है अर्थव्यवस्था का ढाँचा। आज का वैश्विक पूँजीवादी मॉडल “स्किल” को एक संकीर्ण अर्थ में परिभाषित करता है, जिसमें तकनीकी दक्षता, कोडिंग, डेटा विश्लेषण, इंजीनियरिंग, प्रबंधन आदि को प्राथमिकता दी जाती है। इसके सामने साहित्य, दर्शन, इतिहास जैसे विषय “तुरंत नौकरी” नहीं दिलाने वाले, धीमे और “लक्ज़री” ज्ञान के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। जब परिवार अपने बच्चों की शिक्षा पर भारी निवेश कर रहे हों तो वे स्वाभाविक रूप से ऐसे विषय चुनते हैं जो उन्हें सीधा आर्थिक लाभ दिला सकें।
दूसरा कारण है शिक्षा का बाज़ारीकरण। विश्वविद्यालय अब केवल ज्ञान के केंद्र नहीं रहे, वे “करियर फैक्टरी” में बदलते जा रहे हैं। यहाँ तक कि पाठ्यक्रम भी “एम्प्लॉयबिलिटी” के आधार पर डिजाइन किए जाते हैं। ऐसे माहौल में मानविकी विषयों को या तो हाशिये पर डाल दिया जाता है या उन्हें इस तरह बदल दिया जाता है कि उनका मूल स्वभाव ही खो जाए। यह स्थिति केवल भारत की नहीं, बल्कि वैश्विक है।
तीसरा कारण है सामाजिक धारणा। यह धारणा धीरे-धीरे इतनी गहरी हो चुकी है कि विज्ञान या कॉमर्स को “मेधावी” छात्रों का क्षेत्र माना जाता है, और मानविकी को उन छात्रों का विकल्प जो “बाकी कुछ नहीं कर पाए।” यह सोच न केवल गलत है बल्कि खतरनाक भी है क्योंकि यह ज्ञान के एक बड़े हिस्से को हीन बना देती है। लेकिन धारणा, जैसा कि राजनीति में होता है, यहाँ भी वास्तविकता से ज्यादा शक्तिशाली होती है।
चौथा कारण है तकनीकी क्रांति। डिजिटल युग में सूचना की उपलब्धता इतनी आसान हो गई है कि लोग यह मानने लगे हैं कि इतिहास, साहित्य या दर्शन जैसी चीजें तो “गूगल” पर मिल जाएँगी। उन्हें पढ़ने, समझने और आलोचनात्मक रूप से देखने की प्रक्रिया को महत्व नहीं दिया जाता। जबकि विडंबना यह है कि इस सूचना के अतिरेक में आलोचनात्मक सोच की जरूरत और भी बढ़ गई है, जो मानविकी का मूल क्षेत्र है।
पाँचवाँ कारण है नीति-निर्माण। कई देशों में शिक्षा नीतियाँ STEM (Science, Technology, Engineering, Mathematics) को प्राथमिकता देती हैं। भारत में भी नई शिक्षा नीति में बहुविषयकता की बात तो है लेकिन व्यवहार में संसाधनों का बड़ा हिस्सा तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा की ओर जाता है। इससे मानविकी विभागों की स्थिति कमजोर होती है।
तो फिर क्या कर सकते हैं ? पहले तो मानविकी की उपयोगिता को पुनर्परिभाषित करें। यह बताना जरूरी है कि ये विषय केवल “अतीत” या “कविता” तक सीमित नहीं हैं बल्कि वे समाज की संरचना, राजनीति, संस्कृति, नैतिकता और मानव व्यवहार को समझने का आधार प्रदान करते हैं। आज के जटिल विश्व में, जहाँ फेक न्यूज़, सांप्रदायिकता, असमानता और पर्यावरण संकट जैसे मुद्दे हैं, वहाँ मानविकी की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
दूसरा समाधान है पाठ्यक्रम में बदलाव। मानविकी को अपने पारंपरिक ढाँचे से बाहर निकलकर समकालीन मुद्दों से जुड़ना होगा। उदाहरण के लिए, साहित्य को केवल काव्य-शास्त्र तक सीमित न रखकर उसे मीडिया, सिनेमा, डिजिटल संस्कृति से जोड़ना; इतिहास को केवल राजाओं और युद्धों तक सीमित न रखकर सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास पर जोर देना; दर्शन को केवल शास्त्रीय ग्रंथों तक सीमित न रखकर आधुनिक नैतिक और तकनीकी प्रश्नों से जोड़ना।
तीसरा समाधान है अंतर्विषयकता। जब मानविकी और विज्ञान एक-दूसरे से संवाद करते हैं, तो नए ज्ञान के क्षेत्र खुलते हैं। उदाहरण के लिए, डिजिटल ह्यूमैनिटीज, पर्यावरणीय इतिहास, बायोएथिक्स जैसे क्षेत्र इसी संवाद का परिणाम हैं। इससे न केवल मानविकी की प्रासंगिकता बढ़ती है, बल्कि छात्रों के लिए नए करियर विकल्प भी खुलते हैं।
चौथा समाधान है करियर की स्पष्टता। छात्रों और उनके परिवारों को यह बताना जरूरी है कि मानविकी पढ़ने के बाद केवल “शिक्षक” बनना ही विकल्प नहीं है। मीडिया, सिविल सेवा, शोध, लेखन, पब्लिशिंग, नीति-निर्माण, एनजीओ, सांस्कृतिक प्रबंधन जैसे अनेक क्षेत्र हैं जहाँ मानविकी के छात्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समस्या यह है कि इन विकल्पों की जानकारी व्यवस्थित रूप से नहीं दी जाती।
पाँचवाँ समाधान है संस्थागत समर्थन। विश्वविद्यालयों और सरकारों को मानविकी विभागों में निवेश बढ़ाना होगा। अच्छे शिक्षक, शोध के अवसर, लाइब्रेरी, फेलोशिप, ये सब जरूरी हैं। जब तक मानविकी को “कम महत्वपूर्ण” मानकर कम संसाधन दिए जाएँगे, तब तक उसकी स्थिति नहीं सुधरेगी।
छठा समाधान है सामाजिक सम्मान। यह थोड़ा अमूर्त लगता है, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण है। जब समाज में साहित्यकार, इतिहासकार, दार्शनिक, कलाकार को सम्मान मिलेगा, तभी युवा इन क्षेत्रों की ओर आकर्षित होंगे। अभी स्थिति यह है कि एक इंजीनियर या मैनेजर को जो सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है, वह एक शोधकर्ता या लेखक को नहीं मिलती।
एक असुविधाजनक लेकिन जरूरी बात। मानविकी को भी अपने भीतर झाँकना होगा। कई बार इन विषयों की शिक्षण पद्धति इतनी जड़ और नीरस हो जाती है कि छात्र खुद ही दूर भागते हैं। अगर कक्षा में केवल नोट्स डिक्टेशन और पुराने व्याख्यान चलते रहेंगे, तो कोई भी उत्साही छात्र वहाँ क्यों टिकेगा? ज्ञान को जीवंत, संवादात्मक और आलोचनात्मक बनाना होगा।
यह एक विश्वव्यापी परिघटना है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह अपरिवर्तनीय है। इतिहास गवाह है कि ज्ञान के क्षेत्र समय-समय पर बदलते रहे हैं। संभव है कि आने वाले समय में, जब तकनीकी दुनिया अपनी सीमाओं से टकराएगी, तब मानविकी की ओर फिर से लौटने की जरूरत महसूस हो। तब तक, अगर हम इसे बचाना चाहते हैं तो केवल शिकायत करने से काम नहीं चलेगा, थोड़ी समझदारी, थोड़ी ईमानदारी और थोड़ी मेहनत भी करनी पड़ेगी।
।। दो।।
मानविकी को जीविका से जोड़ने की बात आते ही लोग ऐसे चेहरा बनाते हैं जैसे आपने कविता से ट्रैक्टर चलाने को कह दिया हो। लेकिन समस्या विषयों में कम और हमारी कल्पना में ज्यादा है। हमने “रोज़गार” को इतना संकीर्ण बना दिया है कि उसमें केवल वही चीजें फिट बैठती हैं जिनका सीधा, तात्कालिक और मापने योग्य आर्थिक परिणाम हो। मानविकी इस कसौटी पर धीमी पड़ती है, इसलिए उसे अनुपयोगी घोषित कर दिया जाता है, जैसे किसी पेड़ को इसलिए काट दिया जाए कि वह दो महीने में फल नहीं देता।
असल में जीविका और मानविकी का रिश्ता सीधा नहीं, बल्कि जटिल और बहुस्तरीय है। अगर आप इंजीनियरिंग को एक सीधी सड़क मानें, तो मानविकी एक पूरा शहर है जिसमें कई गलियाँ, चौक और रास्ते हैं। समस्या यह है कि छात्रों को केवल “एक नौकरी” का नक्शा चाहिए, जबकि मानविकी “संभावनाओं का मानचित्र” देती है। और यह मानचित्र पढ़ना सिखाया ही नहीं जाता।
सबसे पहले यह समझना होगा कि आज की अर्थव्यवस्था केवल तकनीकी कौशल पर नहीं चलती। किसी भी संस्था, कंपनी या सरकार को ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो समाज को समझ सकें, भाषा में दक्ष हों, जटिल विचारों को स्पष्ट कर सकें, और निर्णयों के नैतिक व सांस्कृतिक आयामों को पहचान सकें। यही मानविकी का क्षेत्र है। लेकिन चूंकि यह “सॉफ्ट स्किल” के नाम से पैक कर दिया गया है, इसलिए इसकी गंभीरता कम करके देखी जाती है, जैसे यह कोई साइड डिश हो, मुख्य भोजन नहीं।
जीविका से जोड़ने का पहला ठोस रास्ता है कौशल की पुनर्पहचान। उदाहरण के लिए, साहित्य पढ़ने वाला छात्र केवल कविता नहीं पढ़ता, वह भाषा की बारीकियों, प्रतीकों, अर्थ-संरचनाओं और मानवीय अनुभव की गहराइयों को समझता है। यही कौशल उसे कंटेंट राइटिंग, एडिटिंग, पब्लिशिंग, मीडिया, विज्ञापन और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर काम करने में सक्षम बनाता है। लेकिन अगर उसे यह कभी बताया ही नहीं गया तो वह खुद को “बेकार” समझने लगेगा, और समाज उसकी इस गलतफहमी को खुशी-खुशी पुष्ट करेगा।
दूसरा रास्ता है पेशेवर क्षेत्रों के साथ सीधा संबंध स्थापित करना। नीति-निर्माण, सामाजिक अनुसंधान, विकास क्षेत्र, सांस्कृतिक प्रबंधन, आर्ट क्यूरेशन, आर्काइविंग, म्यूज़ियम स्टडीज़, ये सब ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ मानविकी के छात्रों की गहरी जरूरत होती है। लेकिन इन क्षेत्रों को शिक्षा से जोड़ा ही नहीं जाता। विश्वविद्यालय अपने आप में बंद द्वीप बने रहते हैं, और छात्र बाहर की दुनिया से अनभिज्ञ। नतीजा यह कि डिग्री हाथ में आती है, और दिशा शून्य।
तीसरा रास्ता है अंतर्विषयक रोजगार। डिजिटल ह्यूमैनिटीज इसका अच्छा उदाहरण है, जहाँ इतिहास, साहित्य और तकनीक मिलकर नए प्रकार के काम पैदा करते हैं। डेटा स्टोरीटेलिंग, सांस्कृतिक एनालिटिक्स, भाषा-प्रसंस्करण, ये सब ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ मानविकी और तकनीक का मेल जीविका के नए अवसर खोल रहा है। लेकिन इसके लिए पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण दोनों में बदलाव चाहिए, केवल भाषण से काम नहीं चलेगा।
चौथा और थोड़ा असुविधाजनक बिंदु है उद्यमिता। मानविकी के छात्र अक्सर नौकरी की तलाश में रहते हैं, जबकि उनके पास ऐसे कौशल होते हैं जिनसे वे खुद भी काम शुरू कर सकते हैं। पब्लिशिंग हाउस, ऑनलाइन मैगज़ीन, सांस्कृतिक प्लेटफॉर्म, लोक-कला आधारित उद्यम, अनुवाद सेवाएँ, ये सब छोटे स्तर से शुरू होकर बड़े हो सकते हैं। लेकिन इसके लिए जोखिम लेने की मानसिकता और संस्थागत समर्थन दोनों चाहिए, जो अभी न के बराबर है।
पाँचवाँ पहलू है राज्य और समाज की भूमिका। अगर सरकारें केवल तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा में निवेश करेंगी, तो मानविकी के छात्रों के लिए अवसर सीमित रहेंगे। सांस्कृतिक संस्थानों, शोध परियोजनाओं, लोक-संस्कृति के संरक्षण, भाषा विकास, इन सब में निवेश बढ़ाना होगा। तभी रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। नहीं तो हम “संस्कृति बचाओ” के नारे लगाते रहेंगे और दूसरी तरफ उन लोगों के लिए कोई जगह नहीं बनाएँगे जो वास्तव में इस काम को कर सकते हैं।
और अब थोड़ा कड़वा सच, जिसे सुनकर लोग अक्सर असहज हो जाते हैं। मानविकी के क्षेत्र में खुद भी एक प्रकार की आत्मसंतुष्टि है। कई बार यहाँ यह मान लिया जाता है कि “हम ज्ञान के उच्चतम क्षेत्र में हैं, हमें बाजार की परवाह नहीं करनी चाहिए।” यह दृष्टिकोण बौद्धिक रूप से आकर्षक लग सकता है, लेकिन व्यवहार में यह छात्रों को बेरोज़गारी की ओर धकेलता है। ज्ञान और जीविका के बीच संवाद जरूरी है, टकराव नहीं।
जीविका से जुड़ने का मतलब यह नहीं कि मानविकी अपनी आत्मा बेच दे। इसका मतलब यह है कि वह अपने ज्ञान को इस तरह व्यवस्थित करे कि वह समाज और अर्थव्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभा सके। जैसे कोई कवि केवल अपने लिए नहीं लिखता, वह अपने समय के अनुभव को भाषा देता है, उसी तरह मानविकी को भी अपने समय की जरूरतों के साथ संवाद करना होगा।
अंततः, समस्या यह नहीं है कि मानविकी में रोजगार नहीं है। समस्या यह है कि रोजगार की हमारी कल्पना सीमित है, और मानविकी की प्रस्तुति कमजोर। जब तक ये दोनों नहीं बदलेंगे, तब तक छात्र विज्ञान और कॉमर्स की ओर भागते रहेंगे, और मानविकी को “अंतिम विकल्प” मानते रहेंगे। और फिर हम बैठकर यह विश्लेषण करते रहेंगे कि आखिर बच्चे इस तरफ क्यों नहीं आ रहे, जैसे जवाब कहीं आसमान में लिखा हो और हमें दिख ही नहीं रहा।
।। तीन ।।
हमें पाठ्यक्रम को नौकरी-उन्मुख बनाना नहीं बल्कि काम-सम्बद्ध बनाना है। फर्क समझें। नौकरी-उन्मुख का मतलब है “किसी एक पद के लिए ट्रेनिंग”, जबकि काम-सम्बद्ध का मतलब है “ऐसे कौशल देना जो कई जगह काम आएँ।” उदाहरण के लिए, हर मानविकी पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से ये मॉड्यूल जोड़ने चाहिए: लेखन (अकादमिक और व्यावसायिक दोनों), अनुवाद, डिजिटल कंटेंट निर्माण, डेटा की व्याख्या, और प्रेज़ेंटेशन स्किल। अभी हालत यह है कि छात्र तीन साल तक कबीर पढ़ते हैं और बाहर निकलकर एक ठीक-ठाक ईमेल भी नहीं लिख पाते। फिर कहते हैं नौकरी नहीं है।
दूसरा, हर विश्वविद्यालय को “इंटर्नशिप अनिवार्य” करनी चाहिए, मज़ाक नहीं, सच में अनिवार्य। और वह भी सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि मूल्यांकन से जुड़ी हुई। मीडिया हाउस, प्रकाशन संस्थान, एनजीओ, लोक-संस्कृति केंद्र, म्यूज़ियम, यहाँ तक कि जिला प्रशासन के दफ्तर तक, हर जगह मानविकी के छात्रों के लिए इंटर्नशिप स्लॉट तय होने चाहिए। जब तक छात्र असली दुनिया में जाकर काम नहीं करेगा, तब तक उसे खुद भी नहीं समझ आएगा कि उसकी पढ़ाई का क्या उपयोग है।
तीसरा, विश्वविद्यालयों में “करियर सेल” नाम की जो औपचारिक चीज़ होती है, उसे सचमुच काम करना शुरू करना होगा। अभी वहाँ पोस्टर लगते हैं और सेमिनार होते हैं, जिनमें चाय अच्छी होती है और जानकारी शून्य। करियर सेल को यह करना चाहिए कि हर साल कम से कम 20-30 ऐसे पेशेवरों को बुलाए जो मानविकी पृष्ठभूमि से हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। छात्रों को यह दिखना चाहिए कि रास्ते मौजूद हैं, बस सीधे नहीं हैं।
चौथा, स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ाव। यह बड़ा व्यावहारिक और अक्सर नजरअंदाज किया गया बिंदु है। उदाहरण के लिए, अगर आप बिहार या झारखंड में हैं, तो यहाँ की लोक-संस्कृति, भाषाएँ, पर्यटन, ऐतिहासिक स्थल, इन सबमें काम की अपार संभावनाएँ हैं। मानविकी के छात्र इन क्षेत्रों में गाइड, शोधकर्ता, कंटेंट डेवलपर, सांस्कृतिक आयोजक, यहाँ तक कि डिजिटल डॉक्यूमेंटेशन विशेषज्ञ बन सकते हैं। लेकिन इसके लिए विश्वविद्यालय और स्थानीय प्रशासन के बीच साझेदारी चाहिए। नहीं तो छात्र दिल्ली और मुंबई के सपने देखते रहेंगे और अपने आसपास की संभावनाओं को “छोटा” समझते रहेंगे।
पाँचवाँ, डिजिटल कौशल को अनिवार्य बनाना। अब अगर कोई मानविकी का छात्र यह कहे कि “मुझे तकनीक से क्या लेना देना”, तो यह थोड़ा वैसा है जैसे कोई मछुआरा कहे कि “मुझे पानी से क्या लेना देना।” बेसिक डिजिटल स्किल, जैसे ब्लॉगिंग, वीडियो एडिटिंग, पॉडकास्ट बनाना, सोशल मीडिया मैनेजमेंट, ये सब सिखाना ही होगा। इससे छात्र खुद भी प्लेटफॉर्म बना सकता है और रोजगार के मौके भी बढ़ते हैं।
छठा, अनुवाद और बहुभाषिकता को रोजगार से जोड़ना। भारत जैसे देश में यह सोने की खान है, लेकिन हम उसे मिट्टी समझकर छोड़ देते हैं। हिंदी, अंग्रेज़ी, भोजपुरी, मैथिली, बंगाली, उर्दू, इन भाषाओं के बीच अनुवाद की भारी मांग है, चाहे वह साहित्य हो, सरकारी काम हो या डिजिटल कंटेंट। विश्वविद्यालय अगर व्यवस्थित अनुवाद प्रशिक्षण और नेटवर्किंग शुरू करें, तो हजारों छात्रों को काम मिल सकता है।
सातवाँ, छोटे-छोटे प्रोजेक्ट आधारित काम। हर छात्र को अपने पाठ्यक्रम के दौरान कम से कम 3-4 प्रोजेक्ट करने चाहिए जो सीधे समाज या बाजार से जुड़े हों। जैसे किसी गाँव की सांस्कृतिक मैपिंग, किसी लोककला का डिजिटल आर्काइव, किसी स्थानीय इतिहास का डॉक्यूमेंटेशन, या किसी सामाजिक मुद्दे पर रिपोर्ट तैयार करना। ये प्रोजेक्ट बाद में उसके पोर्टफोलियो बन सकते हैं। अभी तो हालत यह है कि डिग्री के साथ छात्र के पास दिखाने के लिए कुछ होता ही नहीं, सिवाय मार्कशीट के।
आठवाँ, सरकारी स्तर पर ठोस हस्तक्षेप। University Grants Commission और अन्य संस्थाओं को मानविकी के लिए अलग से रोजगार-लिंक्ड फेलोशिप और प्रोजेक्ट फंडिंग शुरू करनी चाहिए। जैसे STEM में रिसर्च के लिए पैसा मिलता है, वैसे ही सांस्कृतिक और सामाजिक शोध के लिए भी बड़े पैमाने पर निवेश होना चाहिए। जब पैसा आएगा, तो काम भी पैदा होगा। यह कोई रहस्य नहीं है।
नौवाँ, स्कूल स्तर पर बदलाव। जब तक 11वीं में विषय चुनते समय ही मानविकी को “कमजोर छात्रों का विकल्प” कहा जाएगा, तब तक विश्वविद्यालय कुछ भी कर लें, बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। स्कूलों में काउंसलिंग, जागरूकता और सही जानकारी देना जरूरी है। नहीं तो बच्चे शुरू से ही यह मानकर चलेंगे कि वे “सेकंड क्लास” विषय ले रहे हैं।
अब व्यक्तिगत स्तर का सच। मानविकी का छात्र अगर यह सोचकर बैठा रहेगा कि “सिस्टम बदलेगा तब मैं कुछ करूँगा”, तो फिर वह इंतजार ही करता रह जाएगा। उसे खुद भी सक्रिय होना पड़ेगा, अपने कौशल को पहचानना पड़ेगा, नेटवर्क बनाना पड़ेगा और थोड़ा जोखिम लेना पड़ेगा। तो व्यावहारिक समाधान मौजूद हैं लेकिन उनमें मेहनत, समन्वय और ईमानदारी चाहिए।
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