बहुत अंतर है नेहरू-मोदी और उनके युग में – अरुण कुमार त्रिपाठी

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nehru vs modi

Arun Kumar Tripathi
रिवंश राय बच्चन की रचना मधुशाला की कुछ पंक्तियां पंडित जवाहर लाल नेहरू और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल की तुलना पर एकदम सटीक बैठती हैः- ‘अपने अपने युग में सबको अनुपम था अपना प्याला, अपने अपने अपने युग में सबकी अनुपम थी अपनी हाला। लेकिन वृद्धों से जब पूछा, एक यही उत्तर पाया, अब न रहे वे पीने वाले अब न रही वो मधुशाला।’ हालांकि तुलना की यह तैयारी 2014 से ही चल रही थी और आखिरकार 2026 में तथ्य और तर्क को दरकिनार करके उसे करने में सरकार और पार्टी और उनकी तमाम मशीनरी जुट गई है। जब मोदी जी पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने थे तो एक पत्रिका ने अर्धनारीश्वर की तरह ही मोदी नेहरूश्वर का ग्राफिक्स कवर पर बनाया था और उसका जोर यह था कि भाजपा मोदी के रूप में नेहरू जैसा आइकन तैयार कर रही है। उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक नीतियां भले अलग हों लेकिन आर्थिक नीतियों का ढर्रा वही है। आज मोदी जी के प्रशंसक नेहरू के प्रधानमंत्री रहने का रिकार्ड तोड़ने का दावा करते हुए उन्हें बड़ा साबित करने में लगे हुए हैं। जो कि हर लिहाज से अनुचित है। ऐसी तुलना न सिर्फ कांग्रेस के पैमाने से अनुचित है, भाजपा और संघ के पैमाने से भी अनुचित है। इस तुलना से भाजपा और संघ का पिछले दो तीन दशक से चलाया जा रहा पूरा आख्यान भरभरा जाता है।

जिन नेहरू की विफलताओं को गिनाने के लिए कई वेबसाइट बनाई गईं और संसद के लेकर तमाम पत्र पत्रिकाओं में झूठा इतिहास परोसा गया, ऐसे नेहरू से तुलना करने की जरूरत क्यों आन पड़ी? अगर नेहरू इतने बुरे हैं जितना कि भाजपा और संघ परिवार ने लगातार प्रचारित किया है तो उन्हें इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया जाना चाहिए न कि उनसे तुलना की जानी चाहिए। क्या संघ परिवार का कोई सदस्य यह कहने या सुनने का साहस करेगा कि मोदी जी इक्कीसवीं सदी के नेहरू हैं। कोई अखबार या पत्र या चैनल इस बात को ठकुरसोहाती में भी कहने का साहस नहीं कर सकता। क्योंकि यह बात उनके पक्ष को बुरी लगेगी। दूसरी बात यह है कि नेहरू को महज 12 साल तक प्रधानमंत्री बताने वाला तथ्यहीन और अनैतिहासिक दावा नेहरू पर लगाए जाने वाले संघ परिवार के तमाम आरोपों को ही सिरे से खारिज कर देता है—जैसे कि नेहरू पटेल को दरकिनार करके महात्मा गांधी को खुश करके प्रधानमंत्री बन गए थे।

और अगर नेहरू प्रधानमंत्री ही नहीं थे, तो सरदार पटेल आजाद भारत के पहले गृहमंत्री और उपप्रधानमंत्री कैसे कहे जा सकते हैं। फिर तो भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी न तो भारत के औद्योगिक मंत्री थे और न ही पटेल ने भारत का एकीकरण किया और न ही नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद और डॉ आंबेडकर ने मिलकर भारत का संविधान बनाया। फिर तो नेहरू ने 15 अगस्त 1947 को संविधान सभा में भाग्य वधू के साथ की गई प्रतिज्ञा वाला ऐतिहासिक भाषण भी नहीं दिया था। मोदी जी को खुश करने के चक्कर में भारतीय इतिहास को सिर के बल खड़ा करने का यह प्रयास किसी भी सरकार और व्यवस्था को इतिहास में सीधा खड़ा होने लायक भी नहीं छोड़ेगा। वह सरकार अपने कर्मों और विचार में अष्टावक्र की तरह से ही मौजूद रहेगी।
दोनों नेताओं के स्वभाव और युग में जमीन आसमान का अंतर है और उसे खुले दिलो दिमाग से देखने पर ही दोनों के साथ न्याय किया जा सकेगा। जाहिर सी बात है कि नेहरू एक संपन्न परिवार में पैदा हुए थे और मोदी सामान्य परिवार में। पर इसमें उन दोनों का कोई दोष नहीं है और न ही इस आधार पर किसी की आलोचना करने का या किसी को छोटा बताने का कोई औचित्य बनता है। मनुष्य अपने कर्मों से महान बनता है। जन्म से उसे थोड़ी बहुत मदद मिलती है लेकिन अच्छे और ऊंचे कुल में जन्म लेने वाले सारे लोग बड़े काम नहीं कर पाते, बड़े पद पर भले ही पहुंच जाएं। यही बात सामान्य परिवार में पैदा होने वाले लोगों के लिए भी सही है। निश्चित तौर पर सामान्य परिवार में पैदा होने वाले का संघर्ष बड़ा होता है लेकिन इतिहास में वैसे लोग भी सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे हैं और अपना राज्य तक कायम किया है। लेकिन इतिहास उन्हें उनकी न्यायप्रियता और लोकरंजक कामों के लिए ही याद करता है न कि तुगलकी फैसलों के लिए।

लोकतांत्रिक आदर्शों के मुताबिक महानता इस बात में है कि देश और समाज के लिए आप का योगदान क्या रहा और आप ने अपने को कितना वर्गांतरित या डिक्लास किया। शास्वत नैतिक मूल्यों की कसौटी पर आप कितने खरे उतरे हैं। जाहिर सी बात है कि मोदी जी को डिक्लास करने की जरूरत नहीं थी, उन्हें तो अपने अभावग्रस्त वचपन को विस्मृत करने के लिए दस लाख का सूट पहनने और तमाम विलासिता का प्रदर्शन करने का शौक रहा और वह उन्होंने जमकर किया और अब भी कर रहे हैं। लेकिन नेहरू ने गांधी के प्रभाव में अपने को डिक्लास किया। सख्त विस्तरों पर सोना, जमीन पर सोना, साधारण भोजन करना जेल में रहना, यह सब उन्होंने साधा। उनके इन प्रयासों से उनके पिता और देश के बड़े वकील मोतीलाल नेहरू थोड़े परेशान भी रहते थे। नेहरू की हैरो हार्वर्ड की पढ़ाई लिखाई और उनकी बौद्धिक अभिरुचि मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी में कहीं से नहीं दिखती। उसकी अपेक्षा करना उचित भी नहीं है। न तो उन्हें डिस्कवरी आफ इंडिया, विश्व इतिहास की झलक और पिता के पत्र पुत्री के नाम जैसे ग्रंथ लिखने की जरूरत है और न ही अभिरुचि और न ही बौद्धिक बेचैनी। मोजी जी ने ‘एग्जाम वारियर’ जैसी किताब लिखी है और उनके ‘मन की बात’ को भी प्रकाशित किया गया है जिनकी तुलना नेहरू के ग्रंथों से कतई नहीं हो सकता।

लेकिन देश की आजादी के लिए तकरीबन एक दशक तक जेल में बिताने वाले नेहरू का रिकार्ड मोदी जी कैसे तोड़ेंगे? अगर विनायक दामोदर सावरकर को छोड़ दिया जाए तो हिंदुत्व विचार के किसी नेता के खाते में इतनी लंबी जेल यात्रा नहीं है। नेहरू और कांग्रेस पार्टी पर एकहद तक भारत के विभाजन का दोष भी जाता है लेकिन उन्हें इस बात का श्रेय भी जाता है कि उन्होंने एक टूटे हुए देश के बाकी बचे हिस्से को जोड़ने संवारने और बनाने का काम किया। लाखों शरणार्थियों को बसाया और विभाजन के रक्तरंजित समुद्र से निकालकर भारत को एक लोकतांत्रिक गणराज्य बनाया। ‘हम लाए हैं तूफान से कस्ती निकाल के इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के’, शायद यह गीत उन्हीं पर लिखा गया था। नेहरू को चीन से विश्वासघात मिला और मिला देश को पराजय का गहरा जख्म, जिससे संवेदनशील और कवि हृदय नेहरू उबर नहीं पाए और आखिरकार चीन के आक्रमण के एक साल बाद यानी 1964 में दुनिया से विदा हो गए। लेकिन गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से उन्होंने औपनिवेशिक वर्चस्व के विरोध में दुनिया में एक नई चेतना एक नए आख्यान का संचार किया और उसे नेतृत्व दिया। इस नाते नेहरू का अमेरिका से लेकर सोवियत संघ तक गहरा सम्मान था। तीसरी दुनिया तो उन्हें अपना रहनुमा मानती ही थी। नेहरू ने भारत और दुनिया के कई देशों को औपनिवेशिक वर्चस्व से निकाला था और कांगो, कोरिया और वियतनाम जैसे कई विवादों का हल भी निकाला। वे विऔपनिवेशीकरण के वैश्विक अभियान के अगुआ था, इसीलिए भारत के आजाद होने के बाद दुनिया के कम से सौ देश औपनिवेशिक गुलामी से आजाद हुए थे।

जबकि मोदी जी ने भारत की संप्रभुता को अमेरिका जैसे वर्चस्ववादी देश के सामने झुका दिया। अगर नरसिंहराव और मनमोहन सिंह ने उदारीकरण की नीतियों के माध्यम से आर्थिक औपनिवेशीकरण की ओर देश का झुकाया तो नरेंद्र मोदी की सरकार ने उस चक्र को राजनीतिक अंजाम तक पहुंचाया। एक तरह से देखें तो भारत महाशक्तियों के औपनिवेशीकरण अभियान का सहयोगी बन गया है। नेहरू ने 1930 में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव ही नहीं पेश किया, उन्होंने संविधान सभा के महत्त्वपूर्ण सदस्य के तौर पर संविधान का आब्जक्टिव रिजोल्यूशन पेश किया और आखिर में उद्देशिका भी पेश की। नेहरू के नेतृत्व में ही भारत को धर्मनिरपेक्ष संविधान मिला और उसी नाते भारत अब तक एकजुट है अल्पसंख्यकों ही नहीं देश के निरक्षर लोगों को भी वयस्क मताधिकार मिला और सभी को संविधान के समक्ष बराबरी का हक हासिल हुआ साथ ही नागरिकों को गरिमापूर्ण जीवन देने की प्रतिज्ञा भी की गई। जबकि मोदी जी के नेतृत्व में धर्मनिरपेक्षता का ढांचा कमजोर किया गया, अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाया गया और नागरिक अधिकारों को कुचला गया। यह नीतियां भारत को भीतर से तोड़ रही हैं और नागरिक गरिमा को तार तार कर रही हैं। मोदी की सफलता निजी और संघ परिवार की सफलता है, उनके पूंजीपति मित्रों का सफलता है और कट्टर हिंदुओं की सफलता है। जबकि नेहरू की सफलताएं देश, समाज और दुनिया की सफलताएं थीं।

नेहरू और मोदी की इतनी तुलना भी करने का औचित्य नहीं था पर मोदी जी के भक्तों ने माहौल ही ऐसा निर्मित किया है कि कुछ न कुछ कहना मजबूरी बन जाती है। लेकिन असली सवाल यह है कि मोदी जी और उनके भक्त स्वाधीनता संग्राम का वह आर्थिक रूप से विपन्न, राजनीतिक रूप से गुलाम लेकिन बौद्धिक, नैतिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध दौर कहां से लाएंगे? उस समय भारत आर्थिक रूप से विपन्न अवश्य था लेकिन सांस्कृतिक और नैतिक रूप से समृद्ध था। तिलक, गांधी, पटेल, मौलाना, सुभाष, टैगोर, भगत सिंह, आचार्य नरेंद्र देव, सरोजिनी नायडू, राजगोपालाचारी, जयप्रकाश नारायण, विनोबा भावे, ईएमएस नंबूदिरीपाद, डॉ राममनोहर लोहिया जैसे विद्वान, नैतिक और तपस्वी लोग इतिहास मे बार बार नहीं आते। निराला, पंत, प्रसाद, नंदलाल बसु, रामकिंकर वैज, वासुदेव शरण अग्रवाल, काशीप्रसाद जयसवाल जैसे विराट लोगों को आप आज कहां देख रहे हैं। साहित्य और कला के क्षेत्र में भी वैसी प्रतिभाएं आज नदारद हैं जैसी उस समय थीं। हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। वे सब नेहरू और उनके युग उपस्थित थे। क्या मोदी जी नेहरू की तरह अपने युग में वैसे लोगों को उपस्थित कर सकते हैं या वैसे लोगों की सोहबत पा सकते हैं? सोहबत छोड़िए क्या वे उनके दर्शन से वैचारिक संवाद करने को तैयार हैं? वैसे लोग मानव इतिहास में उन विशेष स्थितियों में उत्पन्न होते हैं जिसका जिक्र अर्नाल्ड जे. टायन्बी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘स्टडी आफ हिस्ट्री’ में किया है। मानव इतिहास में कई बार ऐसा अद्वितीय नेतृत्व संकट के समय पैदा होता है और खुशहाली के समय नदारद रहता है। नेहरू के युग में भी आज के ट्रंप और नेतनयाहू की तरह से हिटलर और मुसोलिनी भी थे, लेकिन उनके युग में रूजवेल्ट, ट्रूमैन और कैनेडी भी थे। माओत्से तुंग, चे ग्वेरा और होचीमिन्ह भी थे। उनके युग में बर्टेंड रसेल और अल्बर्ट आइंस्टीन भी थे जिनके नेहरू से गहरे संवाद के संबंध थे और जिनसे मिलकर वे विश्व शांति का अभियान चलाते थे। कुल मिलाकर दोनों व्यक्ति और दोनों युग एकदम भिन्न हैं और उनकी तुलना अनुचित है।


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