— डॉ संजय जोठे —
कोई तीस बरस पहले की बात है। चौबीस साल का एक उत्साही नवयुवक दिल्ली से चलकर भोपाल से 36 किलोमीटर दूर ओबेदुल्लागंज के पास एक आदिवासी गाँव नीलगढ़ में आता है। अपने एक रिसर्च प्रोजेक्ट के सिलसिले में खोजबीन करते हुए कुछ ग्रामीणों से मिलता है। ग्रामीणों के सहज प्रेम और ग्राम जीवन के सौंदर्य से अभिभूत यह युवक स्थानीय लोगों से सहज ही जुड़ जाता है। बातचीत के दौरान युवक गाँव के मुखिया ‘रमा दादा’ से एक सवाल पूछता है। ‘अगर कोई एक समस्या जिसका हल आप चाहते हैं तो वह क्या है?’ जवाब मिलता है ‘बच्चों के लिए स्कूल’!
उस नवयुवक के लिए ये जवाब अपने आप में एक नया सवाल बन जाता है। 1991-92 का ये दौर है और राजधानी भोपाल के पास इस गाँव में स्कूल तक नहीं है। अपनी पीएचडी का सपना और रिसर्च का काम छोड़कर यह युवक कुछ समय बाद वहीं आकर बस जाता है। यहाँ वह आदिवासी बच्चों के लिए एक छोटा सा स्कूल बनाता है। ना कोई पक्का भवन है ना रहने खाने का इंतज़ाम ना किसी तरह की आर्थिक मदद है। आज इस घर में दाल रोटी खानी है। कल किसी दूसरे घर में कुछ कच्चा पक्का खाकर सो जाना है। आज किसी घर में कोई बीमार है तो किसी घर में कोई तकलीफ़ है। गाँव के लोगों के सभी दुख सुख में साथ निभाते हुए अपने स्कूल को चलाये रखना उस युवक की पहली प्राथमिकता है।
शहर में अपने बचपन में जिस तरह से स्कूलों को चलते देखा है और शिक्षा को जिस तरह से समझा और जाना है – वह समझ इस गाँव की ज़रूरतों के सामने बौनी साबित होती है। ग्रामीण आदिवासी बच्चों की सीखने-सिखाने की अपनी ही शैली होती है। मुर्दा और मनहूस ब्लैक बोर्ड की बजाय जंगल में नदी किनारे चट्टान पर लिखकर सीखना और चिड़िया-तितली-मछली के साथ खेलते हुए पाठ दोहराना उनका अपना तरीक़ा है। ये तरीक़ा धीरे धीरे विकसित होता है।
अपनी आँखों में बदलाव का सपना लिये वह नवयुवक इन बच्चों को सिखाते हुए स्वयं बहुत कुछ सीखता है। यह सीख आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के बड़े कार्यक्रमों, अभियानों और अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन व कई नामचीन विकास संस्थानों और विश्वविद्यालयों को नयी रोशनी देती है। साल 2021 में इसी रोशनी को समेटे एक किताब आती है जिसमें नीलगढ़ और धुँधवानी गाँव में हुए शिक्षा और सह-जीवन के प्रयोगों का विस्तृत ब्योरा मिलता है। किताब में हमें ना केवल उन प्रयोगों का पता चलता है बल्कि इन प्रयोगों की पृष्ठभूमि में घट रही घटनाओं की ज़िंदा तस्वीरें भी उभरती है। इन तस्वीरों में जो उजागर होता है वह शिक्षा और शिक्षण की प्रचलित बहस से कहीं आगे जाता है। शिक्षा और सीखने-सिखाने से जुड़े प्रयोगों और उनकी सफलता-असफलता की चर्चा में गहराई से डूबी हुई ये किताब शिक्षा की बहस को एक ख़ास ऊँचाई पर ले जाती है। लेकिन इससे कहीं आगे बढ़कर ये किताब भारत के ग्रामीण आदिवासियों और दलितों के जीवन के एक ख़ास पहलू को उजागर करती है जिसका ज़िक्र अक्सर ही सामने नहीं आता है।
शिक्षा और विकास से जुड़ी हुई इबारतों में अक्सर ही ज़रूरतमंद और दानदाता के दो खाँचों में रखकर मुद्दों को समझा जाता है। लेकिन इस किताब में जो आख्यान उभरता है वह शिक्षा और शिक्षा के लिए किए गये प्रयोगों के नज़रिए से विकास, सभ्यता, नैतिकता और आधुनिकता सहित ग्रामीण शहरी जीवन के अंतर आदि पर नयी रोशनी डालता है। इस रोशनी में सबसे ज़्यादा उभरकर जो सच्चाई सामने आती है वो है भारत के गहरे और परेशान करने वाले विरोधाभास।
‘सब मज़ेदारी है ! कथा नीलगढ़’नाम की ये किताब भारत के बहुत सारे विरोधाभासों का एक आईना है। ख़ास तौर से जब बात आदिवासी जीवन, ग्रामीण जीवन और शहर सहित आधुनिकता से ग्रामीणों और आदिवासियों के संबंधों की आती है तब ये विरोधाभास ज़िंदा हो जाते हैं। शायद और कोई सीधा तरीक़ा नहीं है इन संबंधों की जटिलताओं को समझने का।
इस किताब का नाम ही एक बड़े विरोधाभास की झलक देता है। ‘सब मजेदारी है’ – आदिवासी ग्रामीणों के बीच आपस में बोला जाता है। कोई पूछे कि क्या हाल है? तो जवाब होता है ‘भैया सब मज़ेदारी है’। अब ये सच में मज़ेदार बात है। एक गाँव जहां ना बिजली है, सड़क है, स्कूल है ना हस्पताल है, वहाँ सब मजेदारी है। शायद मज़ेदारी और हमारे शहरी विकास में विरोध का संबंध है। यही इस किताब के शीर्षक और शेष किताब में फैली हुई अंतर्वस्तु सहित इसके कुल जमा संदेश की चाबी है।
आधुनिकता के फल चखने वाली शहरी पीढ़ी और इस फल के स्वाद से अनजान ग्रामीण पीढ़ी एक ही समय में जब आपस में संवाद करती है, तब बहुत कुछ उभरता है। वह बहुत कुछ स्वाभाविक रूप से आश्चर्य और विरोधाभासों का पुलिंदा बन जाता है। इस किताब के कवर पेज और टाइटल से ही सवाल कौंधने लगता है कि यह मज़ेदारी क्या बला है? और क्यों है? क्या ये एक शहरी युवक की आँखों में ग्रामीण जीवन की रूमानी तस्वीर का उपोत्पाद है? या फिर ये किसी पीछे छूटी जा रही और दम तोड़ रही जीवन व्यवस्था की आख़िरी कराह है? क्या ये गाँव और जंगल में बसे लोगों की दीन-दुनिया से बेख़बर ज़िंदगी का तकिया क़लाम है? या फिर ये ‘जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया’ वाले फ़लसफ़े के सहारे ज़िंदगी गुज़ार लेने का और अपने आप को समझा लेने का एक परंपरासिद्ध उपाय है?
ये किताब बहुत सारे स्तरों पर बहुत सारे नये सवाल खड़े करती है। इनका उत्तर पाठकों को खोजना है। इस किताब के हर अध्याय में आपको नए नए मुद्दों पर शहरी समझ और ग्रामीण समझ के बीच अंतर दिखाई देता है। दो क़िस्म की समझदारियाँ आपस में संवाद करके कहीं पहुँचने की कोशिश करती हैं। इस कोशिश में ही वे विरोधाभास उभरते हैं जिसकी इबारत कवर पेज से आख़िरी पेज तक फैली हुई है।
नीलगढ़ और इससे लगे गाँव धुँधवानी गाँव के आदिवासी बच्चे अपने युवा ‘गुरुजी’ के साथ पढ़ने-पढ़ाने की नयी शैली को आकार देते हैं। जंगल पहाड़ की मौजूदगी में पक्षियों-तितलियों को देखते हुए आम इमली अमरूद जैसे शब्द सीखते हैं। गाय, भैंस, मोर, कबूतर आदि के साथ वे शब्दों और ध्वनियों में तालमेल बिठाते हैं। जब बोर हो जाते हैं तो अचानक उठकर जंगल की हरियाली में खेलने लगते हैं। खेलते-खेलते वे शब्दों को नये अर्थ और अर्थों को नये शब्द देते हैं।
इन सबके बीच बहुत ही सहजता से 24-25 साल के ‘गुरुजी’ अपने बच्चों के साथ स्वयं भी ‘सिखाना’ सीखते हैं। पेड़ पौधों, जानवरों और मवेशियों के बीच हर तरह के मौसम के सुख-दुख इकट्ठे भोगते हुए सीखने-सिखाने की दुनिया का विस्तार होने लगता है। गाँव के बच्चों और उनके परिवारों के दुख-दर्द, उनके सपने, उनकी कमज़ोरियाँ और ताक़त – सब एकसाथ उजागर होने लगती हैं।
‘सब मज़ेदारी है’ के ठीक समानांतर ग्रामीण आदिवासियों, हरिजनों, मज़दूरों किसानों और महिलाओं और उनके सह-वासियों के जीवन के परस्पर विरोधी पहलू सामने आते हैं। फूल सिंह गोंड पर शेर का हमला होता है जो एक आदिवासी के जीवट की दारुण कथा बन जाता है, उसी शेर से बचकर भागते हुए ‘अनिरुद्ध सरकार’ हैं जो शेर को देखकर इंगलिश छोड़कर हिन्दी बोलने लगे और ग्रामीणों के सहज हास्य का विषय बन गये। एक तरफ़ सबके आपस में मिल-जुलकर रहने की परंपरा है, इसी में सामंती ज़मींदारों की क्रूरता का आतंक शामिल है।
एक तरफ़ बेहतर मज़दूरी माँगने के बदले ‘कमलेश हरिजन’ के दोनों हाथ काट देने वाले एक ठाकुर और गाँव पटेल मिनिस्टर सिंह हैं, वहीं अपने ढंग से लोगों को डरा धमकाकर पढ़ना-पढ़ाना सिखाने वाले और चाँदी सिंह नाम के गुंडे के आतंक से मुक्ति दिलाने वाले ठाकुर विशाल सिंह हैं। मिनिस्टर सिंह जहां कमलेश हरिजन की फ़रियाद के ख़िलाफ़ पुलिस प्रशासन को ख़रीद लेते हैं वहीं चाँदी सिंह के हाथ पैर तोड़कर बाद ठाकुर विशाल सिंह स्वयं रात के अंधेरे में निकलकर मोटरसाइकिल पर आटे की बोरी लादकर उसे हर महीने आटा भी पहुँचते हैं।
एक तरफ़ एक डिप्टी रेंजर साहब हैं जो अपने घोड़े को बांधने और चराने के लिए भरा पूरा गाँव उजाड़ देते हैं और दूसरी तरफ़ भोपाल से आए कंजर्वेटर साहब हैं जो डिप्टी महोदय को बर्खास्त करके फिर से गाँव बसा देते हैं। एक पास के थाने का इंस्पेक्टर है जो आदिवासियों के राशन का तेल चावल शक्कर हड़पने के लिये ‘गुरुजी’ को ही धमकाने लगा है, दूसरी तरफ़ एक एसडीएम है हो तुरंत गाँव में हस्तक्षेप करके सब ठीक करता है। एक तरफ़ स्थानीय पुलिस और प्रशासन है जो हरिजनों आदिवासियों के प्रति क्रूर और असंवेदनशील है, वहीं स्थानीय अदालत के जज साहब हैं जो ग़रीबों के मन में न्याय की रोशनी जगाते हैं।
ये सब बातें एक-साथ एक समय में घटित हो रही हैं और आधुनिक भारत के बहुरंगी जीवन की संपूर्ण तस्वीर उभरती हैं।
ये विरोधाभास न भारत के केवल ग्रामीण जीवन के आंतरिक विरोधाभास हैं बल्कि नवयुवक ‘गुरुजी’ की उभरती छवि के बारे में भी है। किसी के लिये यह नवयुवक एक ‘रोटी-राम’ हैं जो रोटी के बदले बच्चों को पढ़ाते हैं। किसी के लिए ये एक आईएएस हैं जो नौकरी छोड़कर गाँव सुधार करने निकले हैं। किसी दूसरे के लिए ये एक संत हैं जिनके पास बीमारियों का इलाज है। वहीं ये अफ़वाह भी है कि ये महाशय बैंक लूटकर भागे हैं और यहाँ आकर छुपे हैं। किसी दूसरी कहानी में ये एक पाकिस्तानी एजेंट भी हैं। एक तरफ़ ये नवयुवक ‘गुरुजी’ हैं जो शहर से आकर ग्रामीणों के बीच पूजे जा रहे हैं और दूसरी तरफ़ भील आदिवासी समुदाय की रेलम नाम की युवती है जो शिक्षा और अधिकार की बात उठाने पर इलाक़े के दबंगों द्वारा क़त्ल कर दी जाती है। एक तरफ़ ‘गुरुजी’ तीन सालों की मेहनत से रत्ती-रत्ती करके शिक्षक और सखा के रूप में अपनी पहचान बनाते हैं, दूसरी तरफ़ के धार्मिक आयोजन में बाबाजी की तरह अनमना सा प्रवचन देने पर वे तत्काल ‘महात्मा’ बन जाते हैं।
ऐसे बहुत सारे विरोधाभास हैं जो इस किताब में समांतर चलते हैं। ये किसी बड़ी पहेली के टूटे हुए हिस्सों की तरह हैं। इन्हें एकसाथ रखकर देखा जाये तो धुँधला सा ही सही लेकिन एक समाधान उभरता है। यह समाधान किसी समस्या को सुलझाने के अर्थ में नहीं उभरता, बल्कि ग्रामीण और शहरी जीवन के अंतर की पृष्ठभूमि में शिक्षा और विकास के मुद्दों को सही ढंग से समझने के तरीक़े के अर्थ में उभरता है। एक गहरी संवेदनशीलता के साथ इन विरोधाभासों के बीच काम करने पर यह समझ पैदा होती है। दुर्भाग्य से यह समझ हमारे शासन प्रशासन में अब तक नहीं आ सकी है। यहाँ तक कि शिक्षा, विकास और विकास अध्ययन सिखाने वाले महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी इसका अभाव है।
इस व्यापक चिंता के साथ रखकर अगर ये किताब पढ़ी जाये तो ये नये रास्ते खोलती है। निश्चित ही शिक्षा तक सीमित रखकर भी इसे देखा ही जा सकता है, इसे ऐसे देखा भी जा रहा है। लेकिन केवल इसी तरह से देखना इस किताब के साथ अन्याय होगा।
इस बिंदु पर आकर इस किताब की आंतरिक संरचना और इसमें दर्ज प्रयोगों के महत्व को हम समझ पाते हैं। इससे भी आगे बढ़कर, जिस भाषा और शैली में ये प्रयोग दर्ज हुए हैं, वह भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। अभाव और वंचना सहित ग़रीब-अमीर और शोषक-शोषित की बहस के केंद्र पर खड़े होकर इस किताब को पढ़ना एक नया अनुभव है। यहाँ हम देख पाते हैं कि इन प्रचलित ‘बाइनरी’ में सोचकर या देखकर हम समाधान निर्मित करना तो बहुत दूर, मौजूदा विरोधाभासों का सही ढंग का विश्लेषण भी नहीं कर सकते। विकास और विकास अध्ययन के नज़रिए से यह एक बहुत ज़रूरी किताब है। सरल उदाहरणों और कहानियों मुहावरों के साथ बहती जाती ये किताब भारत के बारे हमारी समझ और पूर्वाग्रहों को बार-बार तौलती है।
भारत जैसे देश में जहां हम जाति-वर्ण-धर्म और कर्मकाण्डीय आग्रहों के सख़्त खाँचों में पैदा होते हैं और उन्हीं में जीते मरते हैं – वहाँ सभी खाँचों का अतिक्रमण करके ‘बदलाव का बावर्ची’ बनकर संवाद करना सिखाने वाली ये किताब हर बच्चे और हर इंसान को पढ़ाई जानी चाहिए।
किताब का नाम: ‘सब मज़ेदारी है! कथा नीलगढ़’
लेखक: श्री अनंत गंगोला
प्रकाशक: एकलव्य फ़ाउंडेशन भोपाल
प्रकाशन वर्ष: सन 2021
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