हिंदी साहित्य सम्मान का नाम बदलना साहित्यिक विरासत पर आघात : साहित्यकारों, पत्रकारों और चिंतकों में रोष

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नई दिल्ली। दिल्ली सरकार द्वारा हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित सम्मान का नाम बदलकर ‘वीर सावरकर साहित्य सम्मान’ किए जाने के निर्णय को लेकर साहित्यिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक जगत में तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही है। अनेक साहित्यकारों, वरिष्ठ पत्रकारों और सामाजिक चिंतकों ने इस कदम को हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा और उसकी स्वतंत्र पहचान पर आघात बताया है।

वरिष्ठ पत्रकार उमेश जोशी ने इस निर्णय की कड़ी आलोचना करते हुए कहा, “यह सम्मान की असीम गरिमा को सीमित दायरे में समेटने जैसा है। साहित्य और संस्कृति के नाम पर राजनीतिक विचारधारा थोपी जा रही है। साहित्यिक संस्थाओं और सम्मानों की गरिमा को राजनीतिक विचारधाराओं की भेंट चढ़ाया जा रहा है।”

राष्ट्रीय विचारक एवं वरिष्ठ पत्रकार विजय शंकर चतुर्वेदी ने कहा, “साहित्य किसी सत्ता, दल या विचारधारा की जागीर नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत दस्तावेज होता है। साहित्यिक सम्मानों की पहचान बदलना केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि उस विरासत और परंपरा को कमजोर करने का प्रयास है जिसे पीढ़ियों के साहित्यकारों ने अपने श्रम, चिंतन और सृजन से निर्मित किया है। इतिहास को सम्मान दीजिए, लेकिन साहित्य को राजनीति का अखाड़ा मत बनाइए।”

चतुर्वेदी ने आगे कहा कि “जब सरकारें साहित्यिक संस्थाओं की स्वायत्तता और ऐतिहासिक पहचान में हस्तक्षेप करती हैं, तब यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रह जाता, बल्कि सांस्कृतिक विमर्श और बौद्धिक स्वतंत्रता का विषय बन जाता है।”

गांधीवादी नेता रमेश चंद शर्मा ने कहा कि साहित्य समाज को जोड़ने और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने का माध्यम है। उन्होंने इस निर्णय को सांस्कृतिक विरासत के साथ अन्याय बताते हुए कहा कि साहित्यिक पुरस्कारों की ऐतिहासिक पहचान को समाप्त करना उचित नहीं है।

महान चिंतक एवं विचारक बी.आर. चौहान ने भी इस फैसले की कड़ी निंदा करते हुए कहा, “साहित्य समाज की आत्मा है। इसे राजनीतिक आग्रहों और वैचारिक प्रतिस्पर्धाओं का माध्यम बनाना लोकतांत्रिक मूल्यों और बौद्धिक स्वतंत्रता के लिए गंभीर चुनौती है।”

साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत के अनेक प्रतिनिधियों ने इस निर्णय को “सांस्कृतिक विरासत पर प्रहार”, “साहित्य के राजनीतिकरण का प्रयास” और “बौद्धिक स्वतंत्रता के लिए खतरा” बताते हुए सरकार से पुनर्विचार की मांग की है। उनका कहना है कि साहित्य समाज को जोड़ने का कार्य करता है और उससे जुड़े निर्णय व्यापक संवाद, संवेदनशीलता और सहमति के आधार पर लिए जाने चाहिए।


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