— परिचय दास —
।। एक ।।
कान भरने वाले लोग संसार की सबसे पुरानी और सबसे टिकाऊ प्रजातियों में से हैं। वे किसी खेत में नहीं उगते, किसी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाए जाते, किसी धर्मग्रंथ में उनका पृथक अध्याय नहीं मिलता, फिर भी वे हर युग में, हर समाज में और हर घर में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहते हैं। वे हवा की तरह दिखाई नहीं देते पर उनके प्रभाव से संबंधों के वृक्ष झुक जाते हैं, मित्रता की नदियाँ सूख जाती हैं और विश्वास के पर्वतों में दरारें पड़ जाती हैं।
मनुष्य का कान केवल सुनने का अंग नहीं है। वह उसके भीतर जाने वाला सबसे छोटा और सबसे खतरनाक द्वार भी है। आँखें देखकर संशय करती हैं, बुद्धि तर्क करती है, अनुभव जाँचता है पर कान कई बार बिना पासपोर्ट के शब्दों को भीतर प्रवेश दे देता है। कान भरने वाले लोग इसी दुर्बलता के व्यापारी होते हैं। वे शब्दों के सौदागर हैं। वे तलवार नहीं चलाते, केवल एक वाक्य बोलते हैं और वर्षों का अपनापन घायल हो जाता है।
ऐसे लोग प्रायः मुस्कुराते हुए मिलते हैं। उनके चेहरे पर सद्भावना का लेप लगा होता है। वे किसी की बुराई करने नहीं आते, वे तो केवल “सावधान” करने आते हैं। वे कहते हैं, “मैं तो तुम्हारा हितैषी हूँ, इसलिए बता रहा हूँ।” यह वाक्य सुनते ही मनुष्य का विवेक कई बार छुट्टी पर चला जाता है। फिर शुरू होती है फुसफुसाहटों की वह यात्रा जिसमें तथ्य पीछे छूट जाते हैं और अनुमान घोड़े पर सवार हो जाता है।
कान भरने वाले लोग नदी में विष नहीं डालते, वे केवल एक बूंद संशय टपका देते हैं। बाकी काम मनुष्य का मन स्वयं कर लेता है। संदेह एक ऐसा बीज है जो मिट्टी खोजने नहीं जाता, वह जहाँ गिरता है वहीं जड़ जमा लेता है। एक बार यदि किसी के मन में यह भाव बैठ जाए कि शायद सामने वाला वैसा नहीं है जैसा दिखाई देता है तो संबंधों का पूरा भूगोल बदलने लगता है।
परिवारों के इतिहास में झाँकिए। कितने ही भाई वर्षों तक साथ रहे, फिर किसी ने कान में धीरे से कहा कि संपत्ति के मामले में तुम्हारे साथ अन्याय हो रहा है। किसी ने बताया कि माता-पिता का स्नेह बराबर नहीं है। किसी ने कहा कि तुम्हारी उपेक्षा की जा रही है। धीरे-धीरे घर के आँगन में दीवारें उग आईं। जिन हाथों ने साथ खेला था, वे कागजों पर हस्ताक्षर करते हुए पराये हो गए। आश्चर्य यह है कि घर टूटने के बाद कान भरने वाला व्यक्ति कहीं दिखाई नहीं देता। वह अगले किसी घर की ओर निकल चुका होता है।
इनकी एक विशिष्ट जाति मिलती है। वे स्वयं बहुत कम काम करते हैं पर दूसरों के संबंधों पर निरंतर शोध करते रहते हैं। कौन किससे मिला, किसने किसकी प्रशंसा की, किसे कौन-सा दायित्व मिला, इन सबका उनका निजी अभिलेखागार होता है। वे सूचना को सूचना नहीं रहने देते, उसे संकेत में बदल देते हैं। फिर संकेत को संदेह में और संदेह को संघर्ष में।
राजनीति का एक बड़ा हिस्सा भी कभी-कभी इसी कला पर टिका दिखाई देता है। राजा और मंत्री के बीच, नेता और कार्यकर्ता के बीच, जनता और शासन के बीच, इतिहास में अनगिनत बार ऐसे लोग सक्रिय रहे हैं जिन्होंने शब्दों की छोटी-सी चिंगारी से बड़े-बड़े अग्निकांड खड़े कर दिए। युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, वे कई बार कानों के भीतर भी लड़े जाते हैं।
सबसे विचित्र बात यह है कि कान भरने वाला व्यक्ति अक्सर स्वयं को निर्दोष मानता है। वह सोचता है कि उसने तो केवल बात कही थी। जैसे कोई व्यक्ति सूखे जंगल में जलती तीली फेंककर यह कहे कि आग तो पेड़ों ने पकड़ी, मेरा क्या दोष। शब्दों की भी जिम्मेदारी होती है। वे हवा में उड़ जाने वाली वस्तुएँ नहीं हैं। वे मनुष्य के भाग्य तक को बदल सकते हैं।
लोकजीवन में ऐसे लोगों के लिए अनेक कहावतें बनीं। गाँवों के बुजुर्ग जानते थे कि झगड़े अचानक नहीं होते। उनके पीछे कोई न कोई अदृश्य जिह्वा काम करती रहती है। इसलिए वे सुनने से पहले सोचने की सलाह देते थे। वे जानते थे कि जो व्यक्ति आपके सामने किसी तीसरे की निंदा करता है, वह तीसरे के सामने आपकी भी करेगा। निंदा उसका धर्म नहीं, उसकी आदत होती है।
फिर भी दोष केवल कान भरने वालों का नहीं है। दोष उन कानों का भी है जो बिना जाँचे सब कुछ स्वीकार कर लेते हैं। यदि मनुष्य अपने अनुभव, अपने विवेक और अपने प्रत्यक्ष संबंधों पर विश्वास करना सीख जाए तो कान भरने वालों की पूरी दुकान बंद हो जाए। कोई भी व्यक्ति तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक सामने वाला सुनने के लिए तैयार न हो।
जीवन के लंबे रास्ते पर चलते हुए धीरे-धीरे समझ में आता है कि संबंधों को बचाने का सबसे सरल उपाय है संवाद। यदि किसी के बारे में कोई बात सुनाई दे तो उससे सीधे पूछ लेना चाहिए। फुसफुसाहटों की दुनिया में प्रकाश का प्रवेश आवश्यक है। अँधेरे में ही अफवाहें पनपती हैं, उजाले में वे अपना आकार खो देती हैं।
कान भरने वाले लोग कल भी थे, आज भी हैं और शायद कल भी रहेंगे। वे मानव स्वभाव की उन छायाओं में से हैं जो पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं पर मनुष्य यदि अपने भीतर विश्वास, धैर्य और विवेक का दीप जलाए रखे तो ये छायाएँ बड़ी नहीं हो पातीं। संबंधों को शब्द नहीं, अनुभव बचाते हैं; और अनुभव की अदालत में फुसफुसाहटों की गवाही बहुत देर तक टिक नहीं पाती। मानव हृदय की सबसे बड़ी गरिमा यही है कि वह संदेह से ऊपर उठकर विश्वास का चयन कर सकता है। वही चयन जीवन को टूटने से बचाता है और वही चयन कान भरने वालों की सबसे बड़ी पराजय है।
।। दो ।।
कान भरने वालों की कथा केवल आज के समाज की कथा नहीं है। यह मनुष्य की सभ्यता जितनी पुरानी है। भारतीय महाकाव्यों से लेकर विश्व साहित्य तक, इतिहास से लेकर मिथकों तक, ऐसे असंख्य प्रसंग मिलते हैं जहाँ किसी व्यक्ति के कान में डाले गए शब्दों ने युगों का भाग्य बदल दिया। विचित्र बात यह है कि कई बार युद्ध तलवारों से नहीं, कानों से शुरू हुए हैं।
भारतीय परंपरा में यदि सबसे प्रसिद्ध उदाहरण खोजा जाए तो रामायण की मंथरा सामने आती है। अयोध्या में सब कुछ शांत था। राम के राज्याभिषेक की तैयारी हो रही थी। नगर उत्सव में डूबा था। कैकेयी राम से प्रेम करती थीं। पर एक दासी मंथरा ने धीरे-धीरे कैकेयी के कान भरे। उसने कोई शस्त्र नहीं उठाया। उसने केवल आशंकाएँ बोईं। उसने कहा कि राम राजा बनेंगे तो भरत की स्थिति कमजोर हो जाएगी। उसने प्रेम के बीच भय का बीज रख दिया। वही भय बढ़ता गया और परिणाम यह हुआ कि राम को वनवास मिला, दशरथ की मृत्यु हुई और समूचे आर्यावर्त का इतिहास बदल गया। यदि मंथरा न होती तो संभव है कि रामायण का स्वरूप ही दूसरा होता। एक दासी की फुसफुसाहट ने चौदह वर्षों का वनवास रच दिया।
महाभारत में शकुनि का चरित्र कान भरने की राजनीति का विराट उदाहरण है। दुर्योधन के भीतर ईर्ष्या थी, पर उस ईर्ष्या को निरंतर हवा देने का काम शकुनि करता रहा। वह दुर्योधन को समझाता रहा कि पांडव उसके शत्रु हैं, उसका अधिकार छीन लेंगे। उसने संदेह को नीति और द्वेष को धर्म बना दिया। जुए की सभा, द्रौपदी का अपमान और अंततः कुरुक्षेत्र का महासंग्राम केवल हथियारों से नहीं बने; उनके पीछे वर्षों तक चलने वाली मानसिक कूटनीति थी। शकुनि ने दुर्योधन के कान में जो विष डाला, वह अंततः लाखों लोगों के रक्त में बदल गया।
महाभारत में ही धृतराष्ट्र का चरित्र भी ध्यान देने योग्य है। वे बार-बार विदुर की बुद्धिमत्ता सुनते थे, पर पुत्रमोह और दुर्योधन के प्रभाव में रहते थे। जब मनुष्य सत्य की अपेक्षा प्रिय बात सुनना चाहता है, तब कान भरने वाले अधिक सफल हो जाते हैं। यही धृतराष्ट्र की त्रासदी थी।
भागवत की कथा में कंस का उदाहरण भी उल्लेखनीय है। देवकी और वसुदेव का विवाह हो रहा था। सब कुछ मंगलमय था। तभी आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवाँ पुत्र कंस का वध करेगा। उसके बाद भय ने कंस के कानों में स्थायी निवास बना लिया। भय भी एक प्रकार का कान भरने वाला तत्व है। उसने कंस को इतना अस्थिर कर दिया कि वह अपनी ही बहन का शत्रु बन गया।
भारतीय इतिहास में भी अनेक बार दरबारों के भीतर बैठे चाटुकारों और षड्यंत्रकारियों ने राजाओं के निर्णय प्रभावित किए। कई राज्य युद्धभूमि में नहीं, परामर्श कक्षों में हार गए। जहाँ सत्य बोलने वालों की जगह ऐसे लोगों ने ले ली, वहाँ पतन दूर नहीं रहा।
विश्व साहित्य और इतिहास में भी ऐसे उदाहरण कम नहीं हैं।
अंग्रेज़ नाटककार William Shakespeare के प्रसिद्ध नाटक Othello में इयागो (Iago) कान भरने की कला का शायद सबसे बड़ा कलाकार है। ओथेलो अपनी पत्नी डेस्डेमोना से प्रेम करता है। इयागो उसके मन में संदेह पैदा करता है कि उसकी पत्नी विश्वासघात कर रही है। कोई प्रमाण नहीं, केवल संकेत। कोई सत्य नहीं, केवल शंका। धीरे-धीरे ओथेलो का मन विषाक्त हो जाता है और वह उसी स्त्री की हत्या कर देता है जिससे वह सबसे अधिक प्रेम करता था। बाद में सत्य सामने आता है, पर तब तक सब कुछ नष्ट हो चुका होता है। यह दिखाता है कि संदेह का एक वाक्य प्रेम के हजारों प्रमाणों पर भारी पड़ सकता है।
यूनानी मिथकों में भी ट्रॉय के युद्ध के पीछे अनेक प्रकार की सलाहों, उकसावों और छलपूर्ण संवादों की भूमिका रही। मानव इतिहास में युद्ध प्रायः किसी एक तलवार से नहीं, अनेक कानों में डाले गए विचारों से शुरू हुए हैं।
रोमन इतिहास में जूलियस सीजर की हत्या के पीछे भी राजनीतिक षड्यंत्रों और निरंतर मानसिक प्रभावों की लंबी प्रक्रिया थी। ब्रूटस जैसे लोग सीधे शत्रु नहीं थे, पर उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि सीज़र गणराज्य के लिए खतरा हैं। विचारों के बीज ने मित्रता को हत्या में बदल दिया।
रूसी साहित्य में लियो टॉलस्टॉय और फ्योदाेर दोस्तोवस्की के अनेक पात्रों में यह दिखाई देता है कि बाहरी शब्द मनुष्य के भीतर कैसी उथल-पुथल पैदा कर देते हैं। कई बार एक वाक्य व्यक्ति के पूरे नैतिक संसार को बदल देता है।
इन सभी उदाहरणों का सार एक ही है। कान भरने वाला व्यक्ति प्रायः स्वयं युद्ध नहीं लड़ता। वह केवल मन में युद्ध पैदा करता है। मंथरा वनवास नहीं जाती, शकुनि कुरुक्षेत्र में नहीं मरता, इयागो स्वयं पत्नी की हत्या नहीं करता; वे केवल दूसरे के मन को दिशा देते हैं। विनाश का वास्तविक कार्य फिर वही व्यक्ति करता है जिसके कान भरे गए होते हैं।
इसलिए भारतीय मनीषा ने बार-बार विवेक पर बल दिया। उपनिषदों से लेकर संत साहित्य तक यह आग्रह मिलता है कि सुनी हुई बात को तुरंत सत्य मत मानो। उसे परखो, अनुभव से मिलाओ, बुद्धि की कसौटी पर रखो। क्योंकि संसार में तलवार से अधिक घातक वस्तु कभी-कभी एक फुसफुसाहट भी हो सकती है।
रामायण की मंथरा, महाभारत का शकुनि और शेक्सपीयर का इयागो, तीनों अलग-अलग सभ्यताओं के पात्र हैं पर तीनों एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं: मनुष्य का पतन प्रायः वहाँ से शुरू होता है जहाँ वह अपने अनुभव की जगह दूसरे की फुसफुसाहट पर विश्वास करने लगता है। यही कान भरने वालों की असली शक्ति है और यही उनकी सबसे बड़ी छलना।
भारतीय ग्रंथों और विश्व इतिहास में कान भरने वालों के उदाहरण इतने अधिक हैं कि मानो मानव सभ्यता का एक समानांतर इतिहास ही तैयार हो जाता है। मनुष्य के जीवन में शब्दों का प्रभाव इतना गहरा है कि कई बार एक सलाह, एक अफवाह, एक संकेत या एक चुगली साम्राज्यों का भविष्य बदल देती है।
रामचरितमानस में मंथरा का प्रसंग तो प्रसिद्ध है ही पर उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि तुलसीदास ने मंथरा को केवल एक दासी के रूप में नहीं देखा। वह मनुष्य के भीतर बैठे उस विकार का प्रतीक बन जाती है जो दूसरे के सुख को देखकर बेचैन हो उठता है। मंथरा स्वयं राजा नहीं बनना चाहती थी, न भरत को राज्य मिलने से उसका कोई प्रत्यक्ष लाभ था। फिर भी वह प्रसन्न नहीं रह सकी। यह कान भरने वालों की एक विशेषता है कि वे कई बार लाभ के लिए नहीं बल्कि दूसरों के बीच दूरी देखकर मिलने वाले विचित्र सुख के लिए ऐसा करते हैं।
महाभारत में नारद और विदुर जैसे पात्र भी हैं, जो सलाह देते हैं पर उनके और शकुनि में अंतर है। विदुर का उद्देश्य सत्य की रक्षा है जबकि शकुनि का उद्देश्य विनाश। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हर सलाह कान भरना नहीं होती। कान भरना वह है जिसमें सत्य की जगह स्वार्थ छिपा हो।
महाभारत का एक और उदाहरण कर्ण का है। दुर्योधन के आसपास बैठे लोग बार-बार उसके मन में यह भावना जगाते रहे कि पांडव उसके शत्रु हैं। उसी प्रकार कर्ण के भीतर भी अपमान की स्मृतियों को बार-बार कुरेदा गया। जब मनुष्य को उसकी पीड़ा बार-बार याद दिलाई जाती है, तब वह प्रतिशोध का बंदी बन सकता है।
बौद्ध साहित्य में देवदत्त का प्रसंग भी उल्लेखनीय है। देवदत्त ने बार-बार संघ में विभाजन पैदा करने की कोशिश की। उसने अनेक भिक्षुओं के मन में असंतोष उत्पन्न करने का प्रयास किया। यहाँ भी हथियार नहीं, शब्द ही मुख्य साधन थे।
पंचतंत्र और हितोपदेश की अनेक कथाएँ इसी विषय पर आधारित हैं। “सिंह और सियार”, “बंदर और मगरमच्छ”, “कौआ और साँप” जैसी कहानियों में चुगलखोर, कपटी और भेद डालने वाले पात्र बार-बार दिखाई देते हैं। भारतीय लोकबुद्धि जानती थी कि समाज को सबसे अधिक क्षति वही लोग पहुँचाते हैं जो दो व्यक्तियों के बीच अविश्वास बोते हैं।
विश्व इतिहास में रासपुतिन का उदाहरण अक्सर दिया जाता है। रूस के शाही परिवार पर उसका प्रभाव इतना बढ़ गया था कि दरबार के अनेक निर्णय उसके परामर्श से प्रभावित होने लगे। इतिहासकारों में मतभेद हो सकते हैं कि उसका वास्तविक प्रभाव कितना था पर जनमानस में वह ऐसे व्यक्ति के रूप में स्थापित हुआ जिसने सत्ता के कानों तक पहुँच बना ली थी।
चीन के इतिहास में भी अनेक राजवंश ऐसे दरबारियों और हिजड़ों (eunuchs) के कारण संकट में पड़े जिन्होंने सम्राटों को वास्तविक स्थिति से दूर रखा। जब शासक केवल वही सुनता है जो उसे अच्छा लगता है, तब कान भरने वालों का स्वर्णयुग शुरू हो जाता है।
यूनानी दार्शनिक सुकरात को मृत्युदंड दिलाने में भी अफवाहों, आरोपों और जनमत को प्रभावित करने वाली बातों की भूमिका थी। किसी समाज में यदि झूठ बार-बार दोहराया जाए, तो वह सत्य जैसा दिखने लगता है।
धार्मिक परंपराओं में भी यह विषय उपस्थित है। बाइबिल में सर्प का प्रसंग केवल प्रलोभन का नहीं, बल्कि मनुष्य के कान में संदेह डालने का भी प्रसंग है। उसने हव्वा से कहा कि जो कहा गया है, वह पूरा सत्य नहीं है। एक प्रश्न ने पूरी कथा की दिशा बदल दी।
लोकजीवन में ऐसे लोगों को कई नाम दिए गए हैं। कहीं उन्हें चुगलखोर कहा गया, कहीं भेदिया, कहीं आग लगाने वाला, कहीं घरफोड़वा। भोजपुरी क्षेत्र में भी कहा जाता है कि “आगि से कम, कान के बात से जियादा घर उजड़ेला।” यह केवल कहावत नहीं, पीढ़ियों के अनुभव का निष्कर्ष है।
सबसे रोचक तथ्य यह है कि कान भरने वाला व्यक्ति अक्सर स्वयं को बुद्धिमान समझता है। उसे लगता है कि वह लोगों की आँखें खोल रहा है। पर वास्तव में वह कई बार विश्वास की आँखें बंद कर रहा होता है। वह मित्रता के बीच दीवार बनाता है और फिर दूर खड़ा होकर उस दीवार को बढ़ते हुए देखता है।
मानव सभ्यता का बड़ा अनुभव यही कहता है कि मंथरा, शकुनि, इयागो, देवदत्त और ऐसे अनगिनत पात्र अलग-अलग नाम हैं पर उनका स्वभाव एक है। वे सीधे युद्ध नहीं करते, वे मनुष्य के भीतर युद्ध पैदा करते हैं। और जब मनुष्य अपने अनुभव, प्रेम और विश्वास से अधिक किसी फुसफुसाहट पर भरोसा करने लगता है, तब इतिहास फिर एक नई त्रासदी लिख देता है। इसलिए भारतीय परंपरा में “श्रवण” के साथ “मनन” को जोड़ा गया। केवल सुनना पर्याप्त नहीं है। सुनी हुई बात पर विचार करना आवश्यक है। बिना मनन का श्रवण वही भूमि है जहाँ मंथरा, शकुनि और इयागो आज भी जीवित रहते हैं।
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