भारतीय क्रान्ति के मौलिक प्रश्न – पंडित रामनंदन मिश्र

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Pandit Ramnandan Mishra

क्रान्ति-कार्य की शिक्षा

क्रान्ति का मुख्य प्रश्न व्यवहार का है, सिद्धान्त का नहीं। लेनिन ने ही कहा है –

“इस युग में विद्यार्थी मार्क्स में दिलचस्पी लेने लगे थे। परन्तु वे सिद्धान्त से ज्यादा यह जानना चाहते थे कि “क्या करना चाहिये।”

क्रान्तिकारी कार्य का पथ निर्धारण जितना ही कठिन है, अफसोस है कि लोगों ने उसे उतना ही आसान समझ लिया है। टेबुल बनाना सीखना हो तो दो या तीन वर्ष की ट्रेनिंग लेने की जरूरत है, पर देश निर्माण कार्य में, लोग समझ बैठे हैं. ट्रेनिंग की कोई आवश्यकता नहीं। लेनिन ने 1902 में कहा थाः-

“व्यावहारिक शिक्षा की कमी, संस्था चलाने की योग्यता का अभाव, हम सब में रहा है, उनमें भी जो शुरू से ही क्रान्तिकारी मार्क्सवाद में विश्वास रखते रहे हैं।”

इसी का नतीजा होता है हमारे ज्यादातर काम नौसिखुओं की तरह होते हैं। केवल अग्रगामी कहने से या उसका प्रोग्राम बनाने से काम नहीं चलता। अपनी योग्यता, कार्यकर्ताओं की योग्यता बढ़ाने की जरूरत है। तभी उत्साह और प्रेरणा किसी लम्बे अर्से तक कायम रक्खी जा सकती है और संस्था संघका सिलसिला, दृढ़ता और जोश को बनाये रख सकती है। ऐसा नहीं होने का नतीजा होता है कि कहीं पथ का निर्धारण बिना, कहीं रुपये बिना, कहीं उत्साह बिना काम बन्द होते रहते हैं और धीरे-धीरे जनता भाग्य भरोसे जीने की भावना में लौट जाती है। 1902 में लेनिन ने कहा था-

“एक तो जनता इसकी आवश्यकता बराबर स्पष्टतया नहीं समझती कि उनका काम निरी भावुकता से नहीं चल सकता, उसके लिये ट्रेनिंग पाये हुए पेशेवर क्रान्तिकारी चाहिये। दूसरे हम भी अपने व्यवहार से इस भावना को जागृत करने के बदले कमजोर कर देते हैं।”

“इस आवश्यकता की मांग तो बहुत नीचे गिर गई है। इसके चलते सबसे बड़ा पाप हमने यही किया है कि रूसी क्रान्तिकारियों की प्रतिष्ठा गिरा दी है। वह व्यक्ति जो सैद्धान्तिक प्रश्नों पर कमजोर है, जो दूर तक देख नहीं पाता, जो अपनी सुस्ती और अकर्मण्यता को जनता के सर पर लादता है, जो बड़ा और साहसिक प्लैन देकर विरोधियों की भी श्रद्धा को नहीं खींच सकता, जो अपने हुनर में अनुभवहीन और फूहर है, वह क्रान्तिकारी नहीं-निकम्मा नौसिखुआ है।”

“कोई कार्यशील कार्यकर्त्ता मेरी आलोचना से नाराज न हो ! जहाँ तक ट्रेनिंग के अभाव का प्रश्न है, वह सबसे ज्यादा मुझ पर लागू है। जिस जमात में मैं काम करता था, वह जमात अपने लिये बड़े शानदार कार्यक्रम बनाया करती थी। परन्तु हम सभी व्यथित होते थे जब देखते कि कुछ कर नहीं पाते थे वह भी ऐसे समय में जब परिस्थिति पुकार कर कहती थी ‘क्रान्तिकारियों का सच्चा संगठन हो तो हम रूस को उलट देंगे!’ उस समय की पीड़ा और शर्म जितनी ही मुझे याद आती हैं, उतना ही मुझे ऐसे निकम्मे क्रान्तिकारियों पर गुस्सा आता है जो क्रान्ति की कला को नौसिखुओं और फुहरों के दर्जे में लाकर गिरा देते हैं।”

इसलिये पहले हम पिछले अनुभवों पर गौर करें, फिर परिस्थिति का अध्ययन कर निश्चय करें कि किस रास्ते से भारतीय क्रान्ति को ले जाना चाहिये।

पिछले अनुभवों में सबसे बड़ा स्थान 1942 की अगस्त क्रान्ति का है।

संदर्भ ग्रंथ – रामनंदन मिश्र ग्रंथावली ( प्रोफेसर रामचंद्र प्रधान)


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