प्रिय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी,
आज के पत्र में हम आपकी विदेश नीति के बारे में चर्चा करेंगे और बताएंगे कि आप कितने असफल रहे हैं। 2014 में सत्ता प्राप्त करने के बाद तुरंत ही आपने विदेश नीति पर ध्यान दिया। आपकी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी, जिनकी विदेशों से संबंध बनाने की ज़िम्मेदारी थी, की यात्राएं घर से दफतर तक सीमित रहीं लेकिन आपने 2014 से इस महीने, यह पत्र लिखा जा रहा है तब तक 12 साल में 99 दौरे किये हैं|
58 दौरे आपके 2014 – 2019 के पहले कार्यकाल में दर्ज़ हुए हैं। शपथविधि के तीन हप्ते में आपने 15 जून 2014 से आपकी यात्रा-शृंखला शरू की जो 15 नवंबर को ब्राज़िल के दौरे के साथ समाप्त हुई। इसमें आठ बार आपने एयर फॉर्स के हवाई जहाज़ का इस्तेमाल किया,जिसका ख़र्च नहीं मिला है इसे छोड़ कर बाकी सब दौरे पर चार्टर्ड फ्लाइट का ख़र्च ₹5,73,61,20,763(पाँच अरब तिहत्तर करोड़ इकसठ लाख बीस हज़ार सात सौ तिरसठ रुपया) आया।
कोविड के दरमियान आप विदेश नहीं जा पाए लेकिन मार्च 2021 से फिर से यात्राएं शुरू हुईं और इस महीने तक आप 41 यात्राएं कर चुके हैं।
मोटे तौर पर कहें तो, 2014 से 2019 के पहले कार्यकाल में आपने हर महीने क़रीब 1 यात्रा की और प्रतियात्रा नौ करोड, अठ्ठासी लाख रुपये से ज़्यादा ख़र्च हुआ। आपकी यात्राओं और ख़र्च के आँकड़े हमने आपकी सरकारी वेबसाइट https://www.pmindia.gov.in/en/details-of-foreigndomestic-visits/ से लिए हैं। दुर्भाग्य से इस वेबसाइट पर 2021 के बाद हर यात्रा के ख़र्च का विवरण उपलब्ध नहीं है। लेकिन मुद्रास्फीति को भी हिसाब में लें तो हम मान सकते हैं कि शायद इन 41 यात्राओं का ख़र्च भी क़रीबन उतना ही आया होगा, जितना पहले कार्यकाल की 58 यात्राओं का। अंदाज़न, आपने 12 साल में लगभग 10 अरब रुपये अपनी यात्राओं पर ख़र्च किया है। दुनिया में शायद ही कोई प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति होगा जिसने इतनी यात्राएं की होगी। हमारा सवाल यह है कि उन यात्राओं का नतीजा क्या निकला?
मेक इन इंडिया का प्रचार
प्रधानमंत्री बनने के तीन महीने के अंदर, 14 सितंबर को आपने ‘मेक इन इंडिया’ योजना जारी की।आपकी यात्राओं का मुख्य उद्देश्य भी ‘मेक इन इंडिया’ का नारा दुनिया की बड़ी कंपनियों को बेचने का था। आप देश में विदेशी पूँजीनिवेश को आकर्षित करने के लिए खुलेआम कहते थे कि भारत आईए और हमारे सस्ते श्रम का फ़ायदा उठाईए। विदेश की भूमि पर देश को बदनाम करना आपको पसंद नहीं है न? फिर भी. आप ख़ुद हर देश में यही कहते रहे कि हमारी लेबर को तो आप आसानी से ख़रीद लेंगे! आपने तो विदेशी कंपनियों को भरोसा भी दिया कि वे अपना मुनाफ़ा भी पूरा भारत से बटोर कर ले जा सकती थी।
2008 के विश्वव्यापी ‘मेट डाउन के बाद UPA 2011 में ‘नेशनल मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी’ का प्रस्ताव रखा गया था। इसका मकसद 2022 तक (1) GDP में इस सेक्टर की हिस्सेदारी को कम से कम 25% तक बढ़ाना और (2) मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 10 करोड़ (100 मिलियन) अतिरिक्त नौकरियां पैदा करना था। 2014 में इस पॉलिसी को नया नाम दिया गया – ‘मेक इन इंडिया’। इसके उद्देश्यों की तुलना UPA सरकार की मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी के उद्देश्यों से करें? (1) मध्यम अवधि में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की वृद्धि को सालाना 12-14% तक बढ़ाना। (2) 2022 तक देश की GDP में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी को 16% से बढ़ाकर 25% करना; और (3) 2022 तक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 10 करोड़ (100 मिलियन) अतिरिक्त नौकरियां पैदा करना।
प्रधानामंत्री जी, आप खुले दिल से UPA की पॉलिसी पर चल सकते थे लेकिन नाम बदलना आपके लिए ज़रूरी था, ताक़ि आपके प्रशंसक ख़ुश रहे।
आज ‘मेक इन इंडिया’ बुरी तरह पिट गई है। विदेशी पूँजी तो आई लेकिन आकर्षित करना था। 2022 तक इस क्षेत्र में इसकी वृद्धि दर जी डी पी के 16 प्रतिशत से 25 प्रतिशत करने का लक्ष्य था लेकिन वृद्धि 12-13 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं हुई और 2022 का लक्ष्य चुपचाप 2025 कर दिया गया।
पिछले 11 वर्षों (2014-25) में भारत में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) 748.78 बिलियन अमेरिकी डॉलर रहा, जो 2003-14 के दौरान प्राप्त 308.38 बिलियन अमेरिकी डॉलर की तुलना में 143% अधिक है। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को अप्रैल 2014 और मार्च 2025 के बीच, 184.15 बिलियन (केवल 21 प्रतिशत) अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्राप्त हुआ। (pib.2) दूसरी ओर, सेवा क्षेत्र विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता बना हुआ है। वित्त वर्ष 2023 से 2025 के दौरान कुल एफडीआई प्रवाह में इसका औसत हिस्सा 80.2 प्रतिशत रहा, जो महामारी-पूर्व अवधि (वित्त वर्ष 2016 से 2020) के 77.7 प्रतिशत से अधिक है। (pib.PressRelease)
2022-23 के दौरान सबसे ज़्यादा FDI इक्विटी इनफ़्लो सर्विस सेक्टर (फाइनेंस, बैंकिंग, इंश्योरेंस, इत्यादि) में रहा (16%), कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर और हार्डवेयर (15%), ट्रेडिंग (6%), टेलीकम्युनिकेशन (6%) और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री (5%)।
केवल पाँच देशों ने सबसे अधिक पूँजीनिवेश कियाः मॉरिशस (26%), सिंगापुर (23%), USA (9%), नीदरलैंड (7%) और जापान (6%) (makeinindia)
आपने भी मेक इन इंडिया को छोड़ दिया है। जरूरत थी UPA की इस योजना को ठीक से लागू करने की, लेकिन आप आसमान में ऊडते रहे, धरती पर टिके ही नहीं। इतने सारे देशों में से केवल पांच देश आगे आए, और मोरिश्यस की कंपनियों का हाल क्या है, हम जानते हैं। वहाँ से आई पूँजी देश की ही पूँजी हो ऐसी पूरी संभावना है।
विदेश नीति में व्यापार की बड़ी भूमिका रही है। और आपके पास मेक इन इंडिया के नारे के सिवा कोई ठोस कार्यक्रम नहीं था और आज भी नहीं है।
इसमें कोई शक़ नहीं कि निजी संपर्क से कई समस्याओं का हल आसान हो जाता है। लेकिन सभी देश व्यक्तिगत मित्रता से उपर अपने देश के व्यापारी और सुरक्षा हितों को रखते हैं। डिप्लोमैसी की भाषा में सच मित्रता के शब्दों में लपेटा जाता है। देश में चुनावों में विजय हासिल करने के कई हथकंडों के अलावा आपका व्यक्तित्व भी असरदार रहा है, लेकिन विदेशों में आपका जादू केवल इंडियन डायस्पोरा पर चलता है। हमारे पास आपकी असफलताओं के कई उदाहरण हैंः
1. बिरयानी डिप्लोमैसीः 25 दिसंबर 2015 को अफ़ग़ाजिस्तान और रूस की यात्रा से वापस आते आप तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की 66वीं सालगिरह मनाने अचानक से लाहौर पहुँच गये। दुनिया में सनसनी फैल गई थी।लोग एक उम्मीद से इस मुलाकात को देखने लगे। “बिरयानी डिप्लोमैसी” की बड़ी तारीफ़ भी हुई। कई साल पहले अमेरिकी फोरेन सेक्रेटरी हेनरी किसिंजर भारत और पाकिस्तान के दौरे पर आए थे और पाकिस्तान से सीधे ‘अचानक’ चीन पहुंच गये। उनकी मुलाक़ात के बाद अमेरिका और चीन के संबंधों में नाट्यात्मक सुधार हुआ।
भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंध सुधारने की अच्छी भावना से ही आप गये थे, इसमें कोई शक़ नहीं है। लेकिन ऐसी तथाकथित ‘अचानक’ मुलाक़ातें भी पूर्वनियोजित होती हैं, जैसे, किसिंजर का चीन पहुँचना दुनिया के लिए आश्चर्यकारी था, लेकिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन के लिए नहीं। आप के पास तो ऐसा कोई प्लान नहीं था। शायद आपको ख़ुशफ़हमी थी कि आपका चुंबकीय व्यक्तित्व नवाज़ शरीफ़ को मोहपाश में झकड़ लेगा और, भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती हो जाएगी।
विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान के किसी विशेषज्ञ से आपको पाकिस्तान तीन रूप में दिखाई दिया होता। पाकिस्तान की अवाम, आर्मी और सरकार तीनों अलग चीज़ हैं। अवाम को भारत से दुश्मनी नहीं है, आर्मी का वजूद भारत से दुश्मनी पर टिका है और सरकार इतनी कमज़ोर होती है कि आर्मी को नाराज़ नहीं कर सकती। नतीजे हम देख रहे हैं।
दूसरी बात, आप सच में पाकिस्तान से दोस्ती चाहते थे तो आपको ‘अचानक’ मुलाक़ात से पहले माहौल बनाना चाहिए था। सबसे पहले तो हिन्दू वोटों को बटोरने के लिए मुसलमानों और पाकिस्तान को सोते- पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी आई. एस. आई. का भारत में स्वागत
बिरयानी का मज़ा एक ही हप्ते में किरकिरा हो गया। 2015 के अंतिम हप्ते में आप लाहौर पहुँचे और 2016 का वर्ष अभी शुरू ही हुआ था कि 2 जनवरी 2016 को तड़के 3:30 बजे पंजाब के पठानकोट में वायु सेना के बेस के अंदर चार आतंकवादी सेना के यूनिफॉर्म में घुस गये। शायद वे दो दिन पहले ही पठानकोट में आ चुके थे। उनके पास भारी मात्रा में असलहा बारूद था। से लैस आतंकवादियों ने आक्रमण कर दिया।
मुठभेड़ में 2 जवान शहीद हो गये जबकि 3 अन्य घायल सिपाहियों ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। सभी आतंकवादी भी मारे गये। हालांकि किसी संभावित बचे हुए आतंकी के छुपे होने की स्थित में खोज अभियान 5 जनवरी को भी चल रहा था।
भारत सरकार ने जैश-ए-महम्मद को आतंकी हमले के लिए ज़िम्मेदार बताया और कुछ प्रमाण भी दिये जिसके आधार पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने जैश के सरगना अज़हर मसूद को हिरासत में ले लिया। इसी मसूद को तत्कालीन वाजपेयी सरकार के विदेश मंत्री जसवंत सिंह स्वयं ख़ास हवाई जहाज़ में कंधार छोड़ने गये थे।
लेकिन पाकिस्तानी आर्मी को आपकी सराकार के दिये हुए प्रमाण काफ़ी नहीं लगे और उसने भारत आ कर जाँच करने का निर्णय लिया। आप तैयार हो गये। पाकिस्तानी आर्मी की टीम ने पठानकोट एयर बेस की मुलाक़ात ली। इसमें आतंकियों को प्रशिक्षण देने वाली गुप्तचर संस्था आई एस आई के मुखिया भी थे।
आपने कैसे माना कि आई एस आई भारत में अधिकृत रूप से दौरे पर आ सकती है? आप पर कोई दबाव था या आपको पाकिस्तान के बारेमें समझ ही नहीं थी? ख़ैर, आप किसी भी दबाव या अपने निर्णय से आई एस आई की मुलाक़ात के लिए तैयार हो गये, इसे आपकी विदेश नीति की घोर असफलता ही माना जाएगा।
3. ऑपरेशन सिंदूर
22 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान से आए तीन आतंकियों ने कश्मीर में पहलगाम के बैसारन टूरिस्ट स्थान में भयानक हत्याकांड किया। AK 47 से सज्ज आतंकियों ने पर्यटकों के धर्म पूछे और हिन्दू नाम सुनते ही गोली से उड़ा दिया। इस हमले में 24 पर्यटक, जिसमें एक ईसाई पर्यटक भी था और एक घोड़े वाला, और एक नेपाली पर्यटक – 26 निर्दोष लोग मारे गये। आतंकवादी पहले ही पास के जंगलों में छुपे थे और जैसे आये थे, वैसे ही वापस चले गये। अब बताया जा रहा है कि वे मारे गये। 2008 के मुंबई हमले के बाद का यह सबसे क़ातिलाना हमला था।
आपने कईयों के ललाट से सिंदूर मिट जाने का बदला लेने के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के नाम से फौजी कार्रवाई शुरू की। भारतीय सेना के पाँच जवान शहीद हुए, दूसरी ओर 155 पाकिस्तानी सैनिक मारे गये। आपने भी युद्ध संबंधी कोई भी निर्णय लेने की पूरी आज़ादी सेना को दी थी और भारतीय सेना ने भी बहुत बहादुरी दिखाई। हमारे मीडिया ने तो सेना से भी ज़्यादा बहादुरी दिखाई और कराची पर कब्ज़ा कर लिया। मीडिया ने तो भरोसा दिलाया कि उसके जाँबाज़ ऍंकरों का रणकौशल देख कर पाकिस्तान सरेंडर कर देगा।
सब ठीक चल रहा था, तब ट्रम्प का फोन आ गया। बस युद्ध का स्विच ‘ऑफ’ हो गया! शुरू में तो आपने ट्रम्प के दावे को अनसुना कर दिया। लेकिन ट्रम्प ने कम-से-कम 90 अलग-अलग मौकों पर अपना दावा दोहराया। आपका मौन इस बात का समर्थन कर रहा था कि ट्रम्प ने सचमुच लड़ाई रुकवा दी। देश और विदेश में ज़्यादातर लोग मानते हैं कि ट्रम्प ने कम-से-कम इस बार सच कहा है। ट्रम्प के दावे को आपने सिरे से नकारा नहीं है। संसद में आपने बयान दिया तब भी इतना ही कहा कि युउद्ध विराम किसी तीसरे पक्ष ने नहीं करवाया1 आप तो ट्रम्प का नाम तक नहीं ले पाये। लेकिनआपने अपनी बात ही उपर रखी – ऑपरेशन सिंदूर वापस नहीं लिया गया, स्थगित कर दिया गया है!
अराउंड दी वर्ल्ड
ट्रम्प के दबाव की झेंप मिटाने के लिए आपने पहली बार विपक्ष को सम्मान दिया और मई 2025 में 59 सांसदों को 30 देशों की यात्रा पर भेजा।आज तक पता नहीं चला कि किस देश ने साफ शब्दों में पाकिस्तान की आलोचना की और कौन भारत के साथ रहा। मोटे तौर पर आतंकवाद की आलोचना करना या दोनों देशों को संयम बरतने की सलाह देना, भारत का समर्थन नहीं है। संयुक्त राष्ट्र में तत्कालीन स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने टाइम्स ऑफ इण्डिया में एक लेख में इसे प्रिवेंटिव डिप्लोमैसी बताया है। इसका मतलब यह कि स्थिति हाथ से बाहर निकल जाए उससे पहले सबको आग़ाह कर देना। आम आदमी की भाषा में कुछ ऐसाः “ देखो, पाकिस्तान ने ऐसे किया, अगर उसने दुबारा किया तो देख लेंगे”।
आपके मित्र ट्रम्प और पाकिस्तान
मोदी जी, वे दिन याद कीजिए जब “अबकी बार ट्रम्प सरकार”, “नमस्ते ट्रम्प”, “हाउडी मोदी” जैसे नारों से देश में आपके प्रशंसक गदगद हो रहे थे और विदेशों में सुखसुविधा से रहने वाले इंडियन डायस्पोरा में आपके समर्थक फूले नहीं समाते थे। ट्रम्प दूसरी बार राष्ट्रपति बने तब आपको उद्घाटन समारोह के लिए आमंत्रण नहीं दिया गया।
2025 में 19 जून को ट्रम्प ने पाकिस्तानी सेना के मुखिया फील्ड मार्शल असीम मुनीर को व्हाइट हाउस में लंच के लिए आमंत्रित किया। मुनीर ने लंच लिया इसे ट्रम्प ने अपना सम्मान (I am honoured) माना।
पाकिस्तान को 2025 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (तालिबान) प्रतिबंध समिति का अध्यक्ष और रूस व फ्रांस के साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आतंकवाद-रोधी समिति का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
मई 2025 में IMF ने पाकिस्तान के लिए $2.3 बिलियन से ज़्यादा की आर्थिक मदद को मंज़ूरी दी । भारत ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया; उसने सुधार लागू करने के मामले में पाकिस्तान के पुराने रिकॉर्ड और फंड के मिलिट्री या आतंकवादी गतिविधियों में इस्तेमाल होने की आशंका को लेकर गंभीर चिंता जताई। भारत के वित्त मंत्रालय ने पाकिस्तान के बार-बार बेलआउट (आर्थिक मदद) पर निर्भर रहने और उसकी आर्थिक नीतियों पर सेना के बड़े असर का ज़िक्र किया। लेकिन IMF ने नहीं माना।
सच तो यह है कि दुनिया में आज भारत की साख गिर गई है।
प्रधानमंत्री जी, विदेश नीति में आपकी असफलताएं, नासमझी और आत्ममुग्धता की दास्तान एक पत्र में पूरी नहीं हो सकती। 11 वें पत्र में हम चीन, अन्य पड़ोसी देशों के साथ भारत के रिश्ते की बात करेंगे। आपकी विदेश नीति भारत के आर्थिक हितों को बढ़ावा तो नहीं दे पाई है, बल्कि अमेरिका का पल्लू पक्ड़े रखने के कई नुकसान हुए हैं । हमआर्थिक संकट में फँसे हैं और देश की सुरक्षा और प्रभुसत्ता भी ख़तरे में है। आज हमारा कोई दोस्त नहीं है। इस पर हम अगले पत्र में बात करेंगे, आज पाकिस्तान पुराण ही काफ़ी है।
धन्यवाद
आनंद कुमार
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