किशन पटनायक : विकल्प की तलाश जारी रखनी होगी – शिवदयाल

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Kishan Patnaik

कहरा बदन, औसत कद, साधारण पहनावा – आम तौर पर खादी का कुर्ता-पायजामा-आम होने का आभास देता एक बहुत खास व्यक्तित्व! पहली नजर में संभव है किसी समूह में आप उनका नोटिस नहीं ले पाएँ, बशर्ते आपकी उनसे नजरें न मिली हों, उन गहरी, स्थिर आँखों का साक्षात् न हुआ हो। बातचीत में भी वे उतने ही सरल और विनम्र प्रतीत होंगे – आप उस खास को आम समझने लग सकतेे हैं, लेकिन जब आप उनसे विदा लेकर अपने गंतव्य का रुख करेंगे तो अनुभव होगा कि आप कितने भरे-भरे लग रहे हैं। उनकी पानीदार आँखें, विचार-तरंगों में डूबती-उतराती उनकी खनकदार वाणी का

ओज, हाव-भाव में एक ठहराव, व्यवहार में सौभ्यता-सचमुच एक विरल व्यक्तित्व! उनकी अनुपस्थिति का सूनापन कभी-कभी आक्रांत करता है – निजी स्तर पर भी, और सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर भी। किषन पटनायक एक नेता, चिंतक-विचारक ही नहीं, एक योद्धा-व्यक्तित्व का नाम भी है जो आजीवन विषमता और अन्याय के विरुद्ध व्यूह-रचना में लगा रहा।
किषन जी के व्यक्तित्व के कई पहलू हैं जो अलग-अलग स्तरों पर प्रभावित करते हैं। उन्होंने अंततः अपने को एक राजनीतिक व्यक्ति ही माना है क्योंकि राजनीति ही व्यवस्था बदलने का सबसे कारगर और सुलभ औजार है। लेकिन 1952 में सोशलिस्ट पार्टी का कार्यकत्र्ता बनकर राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले किशन पटनायक की रुचि और प्रवृत्ति मूल प्रष्नों से दो-चार होने की थी इसलिए अध्ययन और लेखन को उन्होंने हमेशा

अपने काम का जरूरी अंग माना। आगे चलकर उनकी गिनती देश के चोटी के बुद्धिजीवियों, चिंतकों में होने लगी। बल्कि सन 74 के आंदोलन में शामिल होने के लिए वे पटना आए तो युवाओं का समूह उन्हें चिंतक ज्यादा और नेता कम समझता था, और कहना होगा कि उनके प्रति एक विषेष किस्म का ‘क्रेज’ या झुकाव था। सच तो यह है कि किषन जी के साथ प्रतिभाशाली युवाओं का एक समूह हर समय, हर दौर में उनके साथ लगा रहा। उनमें एक खास बात थी कि वे युवाओं को कुछ नया सोचने और करने के लिए जैसे कभी-कभी ‘प्रोवोक’ करते , उकसाते। प्रायः हर भाषण और वार्लालाप में वे श्रोता के सोच का दायरा बढ़ा देते थे। अपने अकाट्य तर्कों और विशिष्ट वक्तृता के बल पर ऐसा कर पाते थे।

उन्होंने राजनीति के माध्यम से जीवन और जगत-व्यवहार को जानने-समझने की कोशिश की। समाजवाद उनके जीवन का लक्ष्य था – समता और नैतिकता पर आधृत मानव-समाज! यह लक्ष्य उनके जीवन की साध्य-वेला में और भी दुष्कर और अलभ्य होता गया। बीसवीं सदी में देखे गए स्वपन फलित होने के पहले ही चकनाचूर हो गए। विकासशील देशों ने भी पश्चिमी पूँजीवादी मूल्यों को अपनाना शुरू कर दिया। विद्रोहों से प्रेरित और अनुस्यूत देशीय चिंतन-प्रणाली अवरूद्ध होती गई और भूमंडलीकरण का विश्व-चिंतन उसका स्थान लेने लगा। समता, न्याय, समाजवाद – असंभव लक्ष्य बनते गए। मनुष्य की श्रेष्ठता की कसौटी उसका शील-गुण और सृजनशीलता नहीं वरन आधुनिक तकनीक के उपयोग और उपभोग की क्षमता बन गई। समाज में बाजार नहीं रहा, बाजार में समाज समाता गया। यानी – ठीक उल्टी दिषा में मानव-समाज का प्रस्थान। स्वयं किशन जी आशंका व्यक्त करते हैं – ‘‘… विकास

और जीवन-स्तर में बढ़ोतरी की दर बनाए रखने के लिए करोड़ों-करोड़ों लोगों का बलिदान करना होगा। बहुत सारी स्थानीय आबादियों का सफाया करना पड़ सकता है, जिस तरह उत्तरी अमेरिका में एक बार हुआ था (उससे छोटे पैमाने पर सोवियत रूप में भी एक बार हुआ था; जर्मनी में भी एक बार हुआ था… यानी यूरोपीय लोग इस तरह की कार्रवाइयों से अपरिचित नहीं हैं)। महाहत्याओं और नरसंहार की बजाए आर्थिक योजनाएँ ही ऐसी बनाई जाएँगी कि सफाया अपने आप होने लगेगा। कोई प्रतिकार न होने पर लगातार भुखमरी, महामारी या प्यास से झुंड के झुंड लोग तड़प कर स्पष्ट लेकिन धीमी गति या मात्रा (परिमाण) में मरने लगेंगे, तब इक्कीसवीं सदी में इसको दैवी विनाश या विकास की कीमत कहकर चर्चा से ओझल कर दिया जाएगा।’’ यह तो विश्व-परिदृश्य है, लेकिन देष के अंदर भी जो आर्थिक-

राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य बनता गया वह कम विचलित करने वाला नहीं था। नब्बे के दषक में एक ओर आर्थिक सुधारों की शुरुआत हुई तो दूसरी ओर साम्प्रदायिकता एक गंभीर चुनौती के रूप में आ खड़ी हुई। किशन पटनायक ने आरक्षण-आंदोलन को इसकी एक काट या जवाब के रूप में देखा लेकिन सत्ता-शीर्ष पर पहुँचे शुद्र नेतृत्व ने इन्हें बहुत निराश किया। मंडल आंदोलन ने उत्तर भारत की राजनीति तो बदल डाली लेकिन ऐसा नेतृत्व खड़ा न कर सका जो पिछड़ों-दलितों की चेतना को सिर्फ सत्ता-प्राप्ति का माध्यम भर न बनाकर एक बड़े सामाजिक-आर्थिक बदलाव का औजार बनाता। उल्टे भ्रष्टाचार और अपराध ने शुद्र राजनीति की रही-सही संभावनाओं को भी धूमिल बना डाला। इन आंतरिक परिस्थितियों ने वैश्विक स्तर पर जारी अमेरीकी और पश्चिमपरस्त नीतियों को ही प्रकारांतर से पुष्ट

किया। गुजरात के तांडव ने तो जैसे यह साबित कर दिया कि लोकतंत्रीय व्यवस्था में भी एक खास मानव-समूह या समुदाय को सुनियोजित ढंग से पाशविक हिंसा का शिकार बनाया जा सकता है और बहुमत के शासन के नाम पर राज्य-व्यवस्था को भी इसमें परोक्ष रूप से शामिल किया जा सकता है।

अगर किशन पटनायक 70 के दशक के बाद से ही ‘वैकल्पिक राजनीति’ को खड़ा करने की कोशिश में लगे तो दूसरी ओर वैकल्पिक सभ्यता के निर्माण के लिए एक विष्व-दृष्टि का भी विकास करते रहे। पूँजी, आधुनिक तकनीक, बाजारवाद, पर्यावरण विनाश और खासकर भूमंडलीकरण की विपदा उनके चिंतन के केन्द्र में रही। उन्होंने लेकिन सभ्यता के इस संकट को लेकर कभी हताषा व्यक्त नहीं की बल्कि इसका सामना करने के लिए विचारों का संधान करते रहे। यही कारण है कि किशन जी

उन गिने-चुने विचारकों में हैं जिन्होंने वैश्विकीकरण की चुनौतियों का सिर्फ रोना नहीं रोया बल्कि उसके विश्वसनीय, सार्थक और संभाव्य विकल्प का मार्ग तलाषते रहे। यहाँ उन्होंने गाँधीजी की अंगुली पकड़ी और आधुनिकता की वर्तमान कसौटियों को धता बताया।
किशनजी संगठन के महत्व को समझते थे इसीलिए संगठन बनाने के काम से वे कभी विरत नहीं हुए। उनका चिंतन और उनका कर्म-दोनों एक-दूसरे को परिपूरित करते थे, परिपुष्ट करते थे। सन् 74 आंदोलन के दौरान और उसके बाद भी परिवर्तनकामी जमात जेपी के बाद उनको अपना नेता मानने को तैयार थी, लेकिन वे स्वयं इसके लिए तैयार नहीं हुए। यों देखें तो जेपी और किशन पटनायक में कुछ बातें समान थीं, कुछ आधारभूत बातें, यथा – दोनों नें सत्ता के लिए सिद्धांतों से कभी कोई समझौता

नहीं किया; दोनों आजीवन मानव जीवन की बेहतरी के लिए विकल्पों की तलाश में लगे रहे; दोनों समाजवादी धारा का प्रतिनिधित्व करते थे; दोनों का नैतिकता के प्रति विशेष आग्रह है। लेकिन वहीं दोनों दूर-दूर भी दिखाई देते हैं – जेपी विकल्पों की तलाश में क्रांतिशोधक की भूमिका का निर्वाह करते हुए विचारधारा की परिधि को तोड़ते हैं, जबकि किशन पटनायक अंत तक समाजवादी बने रहते हैं; जेपी की राजनीति के केन्द्र में पार्टी या दल नहीं स्वयं ‘लोक’ है जबकि किशन जी संसदीय लोकतंत्र में पार्टी की महत्ता स्वीकार करते हैं; जेपी और किशन पटनायक के बीच कहीं लोहिया हैं जो ‘जाति-वर्ण’ को बदलाव का माध्यम बनाना चाहते हैं – किशन पटनायक इसी आइडिया को आगे तक ले जाकर ‘भारत शूद्रों का होगा’ का उद्घोष करते हैं; दूसरी ओर जेपी के अंदर का मार्क्सवादी जातीय चेतना की सीमा और

भंगुरता के प्रति सशंकित रहता है और वर्ग संगठन के माध्यम से जातीय चेतना का शोधन करना चाहता है, जो जातीय चेतना का वर्गीय चेतना में रूपांतरण चाहता है ताकि वंचित जातियों के बीच क्षैतिज विभाजन में क्रांति या बदलाव का लक्ष्य-बिंदु ही न लुप्त हो जाए!

इसमें कोई शक नहीं कि अस्सी के दषक से किषन जी भारत में लोकतंत्र और समाजवाद के सबसे प्रखर व ओजस्वी प्रवक्ता व व्याख्याकार रहे। उन्होंने नयी परिस्थितियों में समाजवादी सिद्धांतों के नवीकरण और शोधन का भरसक प्रयास किया और समाजवाद को अब भी एक मूल्य के रूप में बचाने में कामयाब रहे। इतने कठिन समय में यह उनकी महान उपलब्धि मानी जाएगी। उन्होंने आज की जटिल परिस्थितियों को समझने में पूर्व प्रचलित विचारधारा को असमर्थ बताने की हिम्मत दिखाई और नये शास्त्रों और विचारों के संधान

का आग्रह रखा। दूसरी ओर जमीनी आंदोलनों से जुड़े कार्यकर्ताओं के बीच अपनी जीवंत व प्रेरणादायी उपस्थिति से नयी पहलकदमियों की जमीन तैयार की। उनकी अनुपस्थिति में उनका संगठन ‘समाजवादी जन परिषद’ ही नहीं, समाजवादी आंदोलन नेतृतव के संकट से जूझ रहा है। किशनजी के युवजन साथी इस चुनौती को अवश्य स्वीकारेंगे, क्योंकि आखिरकार दुनिया को विकल्पहीनता में नहीं छोड़ा जा सकता!


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