जनेश्वर मिश्र : समाजवादी आंदोलन के “छोटे लोहिया” और जनसंघर्ष की अमिट विरासत

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Janeshwar Mishra

— रामबाबू अग्रवाल —

भारतीय समाजवादी आंदोलन के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने सत्ता से अधिक संघर्ष, पद से अधिक सिद्धांत और राजनीति से अधिक जनसेवा को महत्व दिया। ऐसे ही विरले नेताओं में जनेश्वर मिश्र का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। समाजवादी आंदोलन में उनके असाधारण योगदान और डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों के प्रति उनकी अटूट निष्ठा के कारण उन्हें प्रेमपूर्वक “छोटे लोहिया” कहा गया। 5 अगस्त को उनकी जयंती केवल एक नेता का जन्मदिन नहीं, बल्कि समाजवादी मूल्यों, लोकतांत्रिक संघर्ष और सामाजिक न्याय के प्रति संकल्प को पुनः स्मरण करने का अवसर है।

जनेश्वर मिश्र का जन्म 5 अगस्त 1933 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के शुभनाथही गाँव में हुआ। बलिया की क्रांतिकारी धरती ने उनके व्यक्तित्व को बचपन से ही राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक परिवर्तन के संस्कार दिए। छात्र जीवन से ही वे अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने लगे और आगे चलकर समाजवादी आंदोलन के प्रमुख स्तंभ बन गए।

जनेश्वर मिश्र पर डॉ. राममनोहर लोहिया के विचारों का गहरा प्रभाव था। उन्होंने लोहिया के समाजवाद को केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे अपने सार्वजनिक जीवन में उतारा। सामाजिक समानता, पिछड़ों, दलितों, किसानों, मजदूरों और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए वे निरंतर संघर्षरत रहे।उनकी राजनीति का मूल उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज में समान अवसर और न्याय की स्थापना करना था। यही कारण है कि वे समाजवादी कार्यकर्ताओं के बीच “छोटे लोहिया” के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

जनेश्वर मिश्र ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में अनेक आंदोलनों का नेतृत्व किया। वे महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं, लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के प्रश्नों पर लगातार संघर्ष करते रहे। आपातकाल के दौरान भी उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष किया और समाजवादी मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया।
उनकी राजनीति का केंद्र आम आदमी था। वे मानते थे कि लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और विकास के अवसर पहुँचेंगे।

आज जब राजनीति पर वैभव और दिखावे के आरोप लगते हैं, जनेश्वर मिश्र का जीवन सादगी और ईमानदारी का आदर्श प्रस्तुत करता है। उन्होंने सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत स्वार्थ को कभी स्थान नहीं दिया। मंत्री बनने के बाद भी उनका जीवन सामान्य कार्यकर्ता जैसा रहा। वे जनता के बीच सहज उपलब्ध रहते थे और उनकी समस्याओं को अपनी जिम्मेदारी मानते थे।

जनेश्वर मिश्र कई बार लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहे। उन्होंने केंद्र सरकार में विभिन्न मंत्रालयों की जिम्मेदारियाँ निभाईं। मंत्री रहते हुए भी उनकी प्राथमिकता किसानों, मजदूरों, गरीबों और आम नागरिकों के हितों की रक्षा रही। संसद में उनके भाषण तथ्यों, संवेदनशीलता और समाजवादी दृष्टि से परिपूर्ण होते थे।

जनेश्वर मिश्र ने अनेक पीढ़ियों के समाजवादी कार्यकर्ताओं को तैयार किया। उन्होंने हमेशा संगठन को व्यक्ति से बड़ा माना और वैचारिक राजनीति पर बल दिया। वे कहते थे कि समाजवादी आंदोलन की शक्ति जनता के बीच रहने, संघर्ष करने और सिद्धांतों पर अडिग रहने में है।
उनका मानना था कि समाजवाद केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन जीने का नैतिक और मानवीय दृष्टिकोण है।

आज जब आर्थिक विषमता, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती जैसे प्रश्न फिर से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में हैं, जनेश्वर मिश्र के विचार और संघर्ष पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देते हैं। उन्होंने जिस समाज का सपना देखा था, उसमें समान अवसर, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और मानवीय गरिमा सर्वोच्च मूल्य थे।
नई पीढ़ी के लिए उनका जीवन यह संदेश देता है कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का साधन होनी चाहिए।

जनेश्वर मिश्र भारतीय समाजवादी आंदोलन की उन महान विभूतियों में हैं जिन्होंने अपने जीवन से सिद्ध किया कि विचार, संघर्ष और सादगी ही किसी नेता की सबसे बड़ी पूँजी होती है। “छोटे लोहिया” के रूप में उन्होंने डॉ. राममनोहर लोहिया की समाजवादी परंपरा को आगे बढ़ाया और उसे जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया।
उनकी जयंती पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम सामाजिक न्याय, लोकतंत्र, समानता और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लें। यही उनके जीवन और संघर्ष का सबसे बड़ा संदेश है।

(लेखक इंदौर के वरिष्ठ समाजवादी नेता लोहिया विचार मंच मध्य प्रदेश के अध्यक्ष और समाजवादी समागम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)


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