रेणु की विचारधारा व साहित्य – डॉ अवधेश कुमार राय

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Dr. Awadhesh Kumar Rai

स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कथाकारों में रेणु ऐसे पहले रचनाकार हैं, जिन्होंने प्रेमचंद की परम्परा को आगे बढ़ाया। उन्होंहे प्रेमचन्द की तरह ही अपनी कथा साहित्य का केंद्र बिंदु ग्रामीण परिवेश को बनाया तथा उस परिवेश के रूप, रंग ,गंध और संवेदना को आत्मसात करके अपने साहित्य की रचना की । प्रेमचंद की तरह ही उनके पात्र भी उसी भाव भूमि से आते हैं जिसे हम ग्रामीणांचल कहते हैं ।रेणु ने अपनी रचनाओं में अंचल विशेष को केंद्र में रखकर उसके लोक जीवन ,लोकरंग ,लोकसंस्कृति को उद्घाटित किया है ।रेणु का प्रथम उपन्यास ‘’मैला आँचल ‘’(१९५४ ) में प्रकाशित हुआ, जिसे उन्होंने स्वयं ही आंचलिक उपन्यास से अभिहित किया ।इस उपन्यास में उन्होंने अपने नए शिल्प , कथ्य ,बिम्ब और संवेदना के माध्यम से उपन्यास की नई धारा प्रस्तुत की ।इसके पहले उनकी एक कहानी ‘’बट बाबा ‘’(१९४४ )में साप्ताहिक विश्वामित्र में प्रकाशित ही चुकी थी ।रेणु के पहले, नागर्जुन के उपन्यास ‘’रतिनाथ की चाची’’(१९४८ )और ‘’ बलचनमा ‘’ ( १९५२ ) प्रकाशित हो चुके थे जिनमें आंचलिकता विद्यमान है । लेकिन रेणु ने ही अपने उपन्यास ‘मैला आँचल ‘ को सबसे पहले आंचलिक उपन्यास से अभिहित किया । इसी कड़ी में उनका दूसरा उपन्यास ‘’परती परिकथा ‘’ (१९५७) में प्रकाशित हुआ । यह उपन्यास कोसी अंचल की विभिषका से त्रस्त परानपुर की कथा है जो उस अंचल में होने वाली तमाम सामाजिक , आर्थिक व राजनीतिक विषयों की गहराई से विश्लेषण करता है तथा उनके अंतर विरोधों को उजागर करता है ।मैला आँचल पूर्णिया जिले के मेरीगंज व उसके आस –पास में होने वाली उथल –पुथल की कथा है ,जिसे कथाकार ने अपनी लेखनी से उस अंचल विशेष के समस्त जीवन को चित्रित कर दिया है । कथाकार ने इस अंचल की राजनीतिक , सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियों के साथ –साथ उनके बीच होने वाले संघर्षों को भी रेखांकित किया है। इस उपन्यास में लेखक की वैचारिकता व प्रतिबद्धता भी दृष्टिगोचर होती है।रेणु के अन्य उपन्यास दीर्घतपा . जुलूस और पल्टू बाबू रोड हैं ।उनकी कहानियोँ में ठुमरी ,अग्निखोर ,आदिम रात्रि की महक और एक श्रावणी दोपहरी की धूप आदि संग्रह हैं ।ऋणजल , धनजल ,वन तुलसी की गंध ,श्रुत –अश्रुत पूर्व (संस्मरण )तथा नेपाली क्रांति कथा (रिपोर्ताज ) हैं ।

रेणु का जन्म ४ मार्च १९२१ को औराही हिंगना (अब रेणु गाँव ) , जिला अररिया जो पहले पूर्णिया जिले का हिस्सा था, में हुआ था । उनके पूर्वज मालदह जिले से आकर हिंगना गाँव के बगल में बस गए थे , इसलिए हिंगना के लोग और जगह के होने के कारण उनके टोले को औराही कहने लगे । रेणु के जन्म के समय उनके परिवार को ऋण लेना पड़ा था इसलिए उनके परिवार के लोग उन्हें रेनुआ कहने लगे ,जो बाद में उनके नाम के साथ रेणु के रूप में जुड़ गया । रेणु अपने जन्म स्थान के बारें में कहते हैं –
‘’पूर्णिया जिला देशी- विदेशी जमींदारों का गढ़ था , अंग्रेज जमींदारों के नाम पर फोर्ब्सगंज (फारबिसगंज ),एक साहब की बीबी के नाम पर मेरीगंज ,कई राजे , नबाबों के नाम पर गढ़ और हवेलियां आज भी मौजूद हैं । जिले में ऐसे भी बड़े –बड़े किसान हैं, जिनके पास दो – दो हवाई जहाज हैं और दूसरी ओर वहीं पचहत्तर प्रतिशत भूमिहीन अभी भी बड़े , छोटे और मझोले किसानों के शोषण के लिए मौजूद हैं ।१

रेणु जब स्कूल में पढ़ते थे तभी उनकी शादी रेखा देवी से हो गई थी । वह महमदिया गाँव से चार किलोमीटर दूर बलवा गाँव की थी ।उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया था जिसका नाम कविता था ।उनको लकवा मार गया था जिससे मृत्यु हो गई।उनकी दूसरी शादी १९५० में शिलानाथ ने महमदिया गाँव के खूबलाल मंडल की बेटी पद्मा से कराई जिससे रेणु के तीन बेटियां और चार बेटे हुए ।रेणु की तीसरी शादी लतिका राय चौधरी से १९५२ में हुई थी जिससे कोई संतान नहीं है । रेणु का परिवार एक किसान परिवार था और उनके पास यथेष्ट भूमि थी ।उनके पिता का नाम शिला नाथ मंडल था वे एक जागरूक व्यक्ति थे व उनकी स्वतंत्रता आन्दोलन में गहरी रूचि थी और जिला स्तर पर जाया करते थे ।उनके घर पर कई पत्रिकाएं आती थी ।रेणु पांचवीं कक्षा में थे तभी उन्होंने अपने घर पर सुंदरलाल की प्रतिबंधित पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज’ और ‘चाँद’ का वह अंक देखा था जिसमें क्रांतिकारियों के लेख छपे थे । इन किताबों के लिए उनके घर पर पुलिस का छापा पड़ा था लेकिन रेणु ने अपने सूझ –बुझ से इन पुस्तकों को अपने झोले में रख लिया और उसे लेकर स्कूल चले गए । रेणु के मनःस्थिति पर स्वतंत्रता आन्दोलन व राष्ट्रभक्ति कि नींव इसी समय पड़नी शुरू हो गई थी।

रेणु को पढने के लिए फरबिंसगंज के ली अकादमी में भेजा गया लेकिन १९३६ में वे बिराटनगर स्थित हाई स्कूल चले गए । इसका संचालन नेपाल का कोइराला परिवार करता था। यहीं रहकर उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास की और कोइराला परिवार से भी उनकी निकटता बढ़ी । यहीं से उनका राजनीतिक सन्निद्धता भी शुरू हुई । १९३७ में उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास की और आगे की पढ़ाई के लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में दाखिला लिया । १९४० में उन्होंने यहीं रहकर इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की । विराट नगर और वाराणसी में ही रेणु के व्यक्तित्व का विकास होना शुरू हुआ । यह समय राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तर पर हलचलों से भरा था । १९२९ में पंडित नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बनते है और १९३१ में भगत सिंह की फांसी होती है ।१९३४ में कांग्रेस के अन्दर ही समाजवादियों की पहल से कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना होती है जिसमें आचार्य नरेन्द्र देव , जय प्रकश नारायण , लोहिया जैसे अनेक युवा भाग लेते हैं ।इसी समय १९३६ में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना होती है । देश के अंदर विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार में स्वामी सहजानंद के नेतृत्व में किसान आन्दोलन जोरों पर था ।कांग्रेस पार्टी के अन्दर सुबाष बाबू और पट्टाभिसीतारमैया के बीच टक्कर होती है । अन्तराष्ट्रीय स्तर पर १९३९ में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो जाता है, ये सारी घटनाएँ रेणु के व्यक्तित्व को प्रभावित कर रहीं थी । रेणु जब बनारस में थे तभी वे जयप्रकाश जी द्वारा चलाये जाने वाले ‘’समर स्कूल ऑफ़ पॉलिटिक्स’’ से प्रभावित थे । वे कहते हैं –

‘’उन दिनों मै बनारस में पढ़ता था ।पटना से प्रकाशित होने वाली सोशलिस्ट पार्टी की (रामबृक्ष बेनीपुरी द्वारा सम्पादित ) पत्रिका ‘’जनता’’ में कारवाईयां विस्तारपूर्वक छपती रहती थी,जय प्रकाश जी उस स्कूल के प्रिंसिपल थे ।एक –डेढ़ महीने का यह शिविर अपने ढंग का अकेला था ।कमला देवी चटोपाध्याय.मीनू मसानी ,अच्युत पटवर्धन , नरेन्द्रदेव , मेहर अली अशोक मेहता जैसे लोगों ने क्लास लिए थे और इसका हमारे जैसे लोगों पर अनुकूल प्रभाव पड़ा था । यानी समाजवाद और बिहार सोशलिस्ट पार्टी के प्रति अधिक आस्थावान हो गया था —– मैं उसमें चाहकर भी सम्मिलित न हो सका , किन्तु बेनीपुरी के संपादन और लेखन की कृपा से दूर रहकर भी इसमें सम्मिलित होने जैसा लाभ हुआ ।‘’ २

रेणु जी पढ़ाई से विरक्त होकर १९४० में घर वापस आ जाते हैं और किसान आन्दोलन में सक्रिय हो जाते हैं । रेणु इसी समय समाजवादी आन्दोलन में भी सक्रिय होते है । सोशलिस्ट राजनीतिक आन्दोलन को राष्ट्रीय आन्दोलन से पृथक नहीं मानते थे और देश की गुलामी से मुक्ति के लिए सघर्षरत थे ,लेकिन उनका उद्देश्य समाजवादी लक्ष्यों की प्राप्ति थी , जिसका उद्देश्य उत्पादन के समस्त साधनों पर सामाजिक आधिपत्य स्थापित करना था । रेणु का भी यही राजनीतिक लक्ष्य था । वे ‘१९४२ ‘ के भारत छोड़ों आन्दोलन में भाग लेते हैं और गिरफ्तार हो जाते हैं। लेकिन उनकी बीमारी के कारण उन्हें डेढ़ साल के बाद रिहा कर दिया जाता हैं और पटना के मेडिकल कॉलेज में उनका प्लूसिस का इलाज होता है । यहीं पर उनका परिचय लतिका जी से होता है । रेणु इस समय साहित्य और राजनीति के बीच जूझ रहे थे । इसी समय उनकी पहली कहानी ‘ बटबाबा’ १९४४ में विश्वामित्र में छपती है ।रेणु भारत की आजादी के साथ गहरे रूप से जुड़े रहे और इन संघर्षों को गहरे रूप से आत्मसात करते है और वैचारिकता के स्तर पर भी ग्रहण करते है , इसका प्रतिफलन उनके साहित्य में दृष्टिगत होता है।

देश के समाजवादियों ने आजादी को झूठा माना और इसके जश्न में शामिल नहीं हुए । उन्होंने सन १९४८ में अपने पार्टी के नाम के साथ कांग्रेस शब्द हटा दिया और इससे अलग हो गए क्योंकि ऊन्हें लगता था कि कांग्रेस पार्टी दक्षिणपंथी शक्तियों का जमावड़ा है। इसके बाद समाजवादी पार्टी ने अपने उद्देश्यों के लिए संघर्ष तेज कर दिया । रेणु अपने पूर्णिया जिले में इसी समाजवादी पार्टी के कार्यकर्त्ता बनते हैं ।इस समय अधिकांश समाजवादी नेहरू जी के प्रति मोह और मैत्री के भाव रखते थे लेकिन नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनका मोह भंग हो जाता है । रेणु में भी यह मोह भंग है । इसके बाद उन्होंने एक एकांकी लिखी –‘उत्तर नेहरू चरितम ‘ , जिसमें वे ब्यंग्यपूर्ण लहजे में नेहरू के कई रूपों को एक साथ देखने की कोशिश करते हैं । रेणु समाजवादी पार्टी से १९५२ तक सक्रिय रूप से जुड़े रहते हैं ।रेणु के राजनीतिक गुरु जयप्रकाश जी थे , दोनों की मानसिकता में गहरा साम्य था । १९५२ में देश के अन्दर पहला आम चुनाव हुआ लेकिन इस चुनाव में समाजवादियों को गहरा आघात लगा और अपेक्षित सफलता नहीं मिली। समाजवादियों ने इस अवसाद में कांग्रेस से अलग हुए आचार्य कृपलानी की पार्टी से विलय कर प्रजा समाजवादी पार्टी बनाया । इस विलय के लिए कृपलानी ने यह शर्त रखी कि सोशलिस्टों को वर्ग संघर्ष त्यागना होगा । प्रेम प्रकाश मणि समालोचना ब्लॉग में रेणु की राजनीतिक चेतना में लिखते हैं – ‘’दुखी आचार्य नरेन्द्रदेव ने इसे समाजवाद का बधियाकरण माना और कहा वर्ग संघर्ष की नीति त्याग देने के बाद समाजवादियों के पास बचता क्या है ।‘’ ३

इसी समय रेणु के मन में भी उथल –पुथल मची थी। उनकी पार्टी का सिद्धांतों से समझोता कर लेने के कारण वे निराश थे और उन्होंने अपने को साहित्य तक सीमित कर लिया , लेकिन वे राजनीतिक सोच व विचारधारा से अलग नहीं हुए । यह सोच व विचारधारा हम उनके उपन्यासों व कहानियों में देख सकते है। उनके साहित्य के केंद्र बिंदु में समाज का वह वर्ग है जिसे हम कमजोर और हाशिये का समाज कहते हैं ।प्रेम प्रकाश मणि, रेणु के बारे में लिखते हैं –‘’अपने दोनों उपन्यासों ‘मैला आँचल ‘ और ‘ परती परिकथा ‘ में वर्णित दो गाँवों मेरीगंज और परानपुर में आजाद भारत के ग्रामीण ढांचे में उभरते राजनीतिक हलचल को जिस बारीकी से देखा –समझा हैं ,वह महत्वपूर्ण है।मेरा मानना है उस पर अपेक्षित कार्य नहीं हुआ है ।भारतीय परिपेक्ष्य में रेणु का वही महत्त्व है. जो फ़्रांसिसी परिपेक्ष में अपने समय में बाल्जाक का था ।‘’४

रेणु सन १९५५ से १९६५ तक विशुद्ध रूप से साहित्यिक कर्म में रत रहे ।उन्होंने १९५० में नेपाल के राणाशाही के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया और यहाँ तक कि अपनी रक्षा के लिए पत्नी लतिका का जेवर बेचकर पिस्तौल भी खरीदी ।
रेणु पार्टियोँ के अन्दर ख़त्म हो रहे लोकतन्त्र को भी बारीकी से देख रहे थे और महसूस कर रहें थे कि व्यक्तियों की तानाशाही बढ़ रही है और साधारण कार्यकर्ताओं की हैसियत कम होती जा रही है । १९६५ में उनकी कहानी ‘आत्मसाक्षी ‘ प्रकाशित हुई जिसमें उन्होंने लिखा कि किस तरह १९३० से कम्युनिस्ट पार्टी का कार्यकर्ता गनपत खजड़ी बजाकर पार्टी के लिए चंदा उगाहता है लेकिन पार्टी में उसकी कोई हैसियत नहीं है और पार्टी के अधिकारियों द्वारा उसे बेइज्जत किया जाता है ।‘ मैला आँचल’ में कालीचरण की स्थिति यही है ।ग्रामीण परिवेश से आये हुए क्रन्तिकारी चेतना वाले नवयुवकों की कोई औकात नहीं है ।

सन १९७० में ‘दिनमान’ के संपादक रघुवीर सहाय को दिए गए एक साक्षात्कार में वे अपने क्षेत्र की मुख्य समस्या भूमि समस्या को माना था , इस वार्ता का शीर्षक ‘टूटता विश्वास ‘ था ।यह वार्तालाप नक्षत्र मालाकार को केंद्रबिंदु में रखकर की गई थी ।यह नक्षत्र मालाकार मैला आँचल का जीवित पात्र चलित्तर कर्मकार है ।जो पहले समाजवादी पार्टी से जुड़ा था , लेकिन बाद में वह कम्युनिस्ट पार्टी में चला जाता है । सन १९७० के आस –पास ‘दिनमान ‘ की रिपोर्टिग करते हुए रेणु ने इस इलाके की भूमि समस्या को उठाया । २२ नवम्बर ,१९७१ को रुसपुर चंदवा गाँव के जमींदार चौदह आदिवासियों की हत्या कर देते है ।यह बिहार का पहला नरसंहार था । यह नरसंहार तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष व हिंदी लेखक लक्ष्मीनारायण सुधांशु के नेतृत्व में हुआ था । इसके खिलाफ समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर ने एक आन्दोलन छेड़ दिया था जिसके फलस्वरूप भोला पासवान शास्त्री को लक्ष्मीनारायण सुधांशु को गिरफ्तार करना पड़ा । राजनीतिक दलों पर से उनका विश्वास उठने लगा लेकिन आम जन की पीड़ा और दर्द का अहसास और गहरा होता गया । १९७२ में रेणु इस व्यवस्था से दुखी होकर फरबिंसगंज से निर्दलीय चुनाव भी लड़ते है. लेकिन आशा के विपरीत चुनाव में उनकी पराजय हो जाती है । इसी बीच उनके राजनीतिक गुरु जय- प्रकाश जी राजनीतिक रूप से सक्रिय हो जाते हैं और सम्पूर्ण क्रांति का बिगुल बजा देते हैं । रेणु इस आन्दोलन में कूद पड़ते हैं और पद्मश्री की उपाधि लौटाकर आपातकाल में जेल भी जाते हैं ।

रेणु सक्रिय राजनीति से अलग होने के बाद भी अपने समाजवादी आदर्शों से समझौता नहीं करते हैं ।अपने अवसाद के क्षणों में उन्होंने बंगला संस्कृति के प्रभाव से वामपंथी औघड़ पंथ में रूचि ली । प्रेम प्रकाश मणि कहते है , ‘’अपने लेखन में उन मूल्यों की हमेशा हिफाजत की जिन मूल्यों के लिए वह राजनीतिक संघर्ष कर रहें थे, भूमिहीन किसान ,कारीगर –दस्तकार , स्त्रियाँ , आवारा बच्चे , हर तरह क्र पाखंड से जूझ रहे सामाजिक कार्यकर्ता , अपनी पार्टी के अन्दर लोकतान्त्रिक मूल्यों के लड़ रहें राजनीतिक कार्यकर्त्ता और लछमिन कोठारिन ,वामन दास और प्रशांत जैसे निष्कलुष –निर्जात (डिकास्ट) चरित्र हिंदी साहित्य में रेणु के ही यहाँ क्यों हैं? इस पर किसी ने सोचा है ?’’ ५

रेणु की विचारधारा का प्रतिफलन उनके साहित्य में दृष्टिगोचर होता है ।रेणु एक समाजवादी कथाकार थे और उनकी प्रतिबद्धता समाज के कमजोर वर्ग के प्रति थी । रेणु के उपन्यास ‘मैला आँचल ‘, परती परिकथा व व अन्य उपन्यासों में यह प्रतिबद्धता हमें दृष्टिगत होती है ।रेणु ने देश के स्वतंत्रता आन्दोलन और नेपाल के राणाशाही के खिलाफ आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था । वे ‘४२’ के आन्दोलन में गिरफ्तार हुए थे ।स्वतंत्रता आन्दोलन की झलक हमें उनके उपन्यास ‘मैला आँचल ‘’में दिखाई देती है। मैला आँचल में वामनदास. चुन्नी गोसाई ,बालदेव, शिवनाथ चौधरी व रामकिसुन बाबू जैसे कई पात्र हैं , जो कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं और स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेते हैं , जेल जाते हैं । ये सभी गाँधी के अनुयायी हैं और सत्य और अंहिंसा में विश्वास रखते हैं । रेणु जिस कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े थे , वह भी आजादी के पहले इसी कांग्रेस पार्टी की अंग थी । लेकिन आजादी के बाद इसके नेताओं का नेहरू जी मोह भंग हो जाता है क्योंकि उन्हें लगता है कि कांग्रेस पार्टी में सेठों , साहूकारों ,सामंतों और जमींदारों का ही बोलबाला है ।सन १९४८ में नासिक के सम्मलेन में इस पार्टी के नेताओं ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से कांग्रेस शब्द हटा दिया ।आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी के नेताओं के नैतिक व चारित्रिक पतन का भी उल्लेख मैला आँचल में मिलताहै ।अधिकांश नेता भष्टाचार में लिप्त हैं और पार्टी के अन्दर असामजिक व भष्ट्र नेताओं की घुसपैठ हो गई थी ।रेणु इन अंतर्विरोधों का पर्दाफास करते हैं।

मैला आँचल में आजादी के पूर्व और बाद दोनों की कथा है । आजादी के पश्चात जमींदारी प्रथा के उन्मूलन के बाद होने वाले संघर्ष का भी उल्लेख यहाँ मिलता है।इस अंचल में यह संघर्ष सामाजिक और राजनीतिक दोनों है और समाज के उच्च वर्ग ,सामंत और जमींदारों के शोषण के विरुद्ध सर्वहारा वर्ग उठ खड़ा होता है ।रेणु इस सामाजिक व राजनीतिक चेतना के फलस्वरूप समाज के कमजोर वर्ग में नेतृत्व का उभार देखते है और इससे वे संपृक्त होते हैं ।सोशलिस्ट पार्टी इसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करतीं है और कालीचरण , बासुदेव जैसे लोग इसका नेतृत्व करतें हैं । इस उपन्यास का जीवित पात्र चरित्तर कर्मकार जिसका वास्तविक नाम नक्षत्र मालाकार था , वह भी सोशलिस्ट पार्टी का सदस्य था लेकिन बाद में वह कम्युनिस्ट पार्टी में चला जाता है । वह बड़े सेठों , जमींदारों को लूटकर सर्वहारा वर्ग की सेवा करता है । उसके नाम से अंचल के सभी बड़े लोग डरते हैं ।रेणु ग्रामीण जीवन में व्याप्त अन्धविश्वास ,अज्ञानता , गरीबी , अशिक्षा , दुःख –दैन्य और पिछड़ापन का बड़े बारीकी से चित्रण करते हैं और समाज के पिछड़े वर्ग में आ रही नई चेतना को भी दर्शाते हैं । रेणु के इस उपन्यास में वामनदास जैसे गाँधीवादी नेता भी हैं जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपनी जान दे देते हैं । यह उपन्यास स्वतंत्रता के बाद इस अंचल के राजनीतिक व सामाजिक संघर्ष को बड़े बारीकी से चित्रण करता है और कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टी के बीच अपने वर्चस्व के लिए होने वाले संघर्ष की तरफ भी इंगित करता है ।यह संघर्ष, वर्ग संघर्ष का है ।

मैला आंचल में बालदेव जैसे सत्याग्रही हैं जिन्होंने देश की आजादी के लिए कई बार जेल की यात्रा की है ।बालदेव बार – बार अहिंसा की बात करते हैं और महात्मा गाँधी की जय बोलते हैं –
‘’प्यारे भाइयों आप लोग जो अन्डोलन किये है , यह अच्छा नहीं ।——-आप लोग हिंसावाद करने जा रहें हैं ।इसके लिए हमें अनसन करना होंगा ,भारत माता का, गांधीजी का यह रास्ता नहीं ——।‘’६

रेणु का स्वतंत्रता आन्दोलन व राष्ट्र के प्रति गहरा लगाव है इसलिए इसका उल्लेख बार- बार करते हैं । बालदेव ‘ ४२ ‘ के आन्दोलन का जिक्र इस प्रकार करते हैं –
‘’मोमेंट में जब गोरा मलेटरी हमको पकड़ा तो मारते- मारते बेहोस कर दिया ।पानी मागता था तो मुंह में पेसाब कर दिया था —।‘’७

इसी उपन्यास का एक पात्र वावनदास है जो बार –बार गाँधी जी को पत्र लिखता है । वह सच्चे गाँधीवादी नेता हैं जो ‘’४२ के आन्दोलन में भाग लेते हैं और कचहरी पर झंडा फहराते हैं –
जब ‘ ४२ ‘ के मोमेंट में लोग कचहरी पर झंडा फहराने जा रहे थे तो मलेटरी ने घेर लिया था । बौनदास एक मलेटरी के फैले हुए पैरों के बीच से उस पार चला गया और कचहरी में झंडा फहरा दिया ।‘’८

मैला आँचल में सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं का सर्वहारा वर्ग के प्रतिबद्धता दिखलाई पड़ती है ।पार्टी का नेता कालीचरण नारा लगता है –
‘’ कमाने वाला खायेगा , इसके चलते कुछ भी हो ‘’
किसान राज कायम हो , मजदूर राज कायम हो ।‘’९

सोशलिस्ट पार्टी का नारा जमींन किसकी? जोतने वालों की संथालों को विशेष रूप से आलोड़ित करता है और विरसा मांझी का जवान बेटा मंगल मांझी कालीचरण के वाक्यों को गीत में जोड़ने का प्रयत्न करता है- ‘’जोहिरे जोतिबे सोहिरे बोबिये ‘’।१०
सोशलिस्ट पार्टी का नारा है –
‘’ किसान राज कायम हो
मजदूर राज कायम हो
गरीबों की पार्टी सोशलिस्ट पार्टी
सोसिलिस्ट पार्टी जिंदाबाद ।‘’११

रेणु समाज के वर्ग चरित्र को अच्छी तरह से समझते हैं ।वे जानते है कि समाज में दो ही वर्ग है – अमीर और गरीब । वे देखते हैं कि जब संथालों से संघर्ष होता तब राजपूत , कायस्थ व यादव सब एक तरफ हो जाते है । रेणु इस अंतर्विरोध को अच्छी तरह से समझते हैं और इस क्षेत्र की मुख्य समस्या भूमि समस्या मानते है ।भूमि का अधिकांश हिस्सा बड़े जमींदारों के पास है और पचहत्तर प्रतिशत जनता भूमिहीन है ।इस समस्या को हल किये बिना इस अंचल में शांति नहीं हो सकती है । उपन्यास का नायक प्रशांत इस पिछड़े क्षेत्र में आकर मलेरिया व कालाजार पर रिसर्च करता है और जी – जान से सेवा करता है लेकिन वह भी कांग्रेस पार्टी के दुष्चक्र का शिकार हो जाता है और पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाता है । वह अपने सहपाठिन ममता से कहता है कि मैंने फैसला कर लिया है , ‘’रिसर्च असफल होने की घोषणा कर दूंगा तो ममता कहती है,असफल नहीं हुआ । मिट्टी और मनुष्य से इतनी गहरी मुहब्बत किसी लैबोटरी में नहीं बनती ।‘’१२

रेणु आजादी के बाद कांग्रेसी नेताओं के पतन को बारीकी से देख रहे थे । बालदेव को किरासन तेल और कपड़ा का पर्ची बांटने का काम मिलता है लेकिन वे अपने सगे सम्बन्धियों में ही बाँट देते है ।तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद कांग्रेस के लीडर बन जाते हैं और जमींदारी उन्मूलन के बाद भी सभी गरीबों की जमींन हड़प लेते हैं । बामन दास को अब केवल गाँधी जी पर भरोसा है । कांग्रेस पार्टी में सेठ , साहूकार , अपराधी सभी घुस गए हैं। कटहा का दुलार चंद जो पहले जुआरी था ,अब कटहा थाने का कांग्रेस पार्टी का सेक्रेटरी है और अब सीमेंट और कपडे की कालाबाजारी करता है जिसका प्रतिरोध करता हुआ वामनदास अपनी जान दे देता है।

रेणु के ‘जुलुस ‘ उपन्यास में पूर्वी बंगाल से आये हुए शरणार्थिओं की समस्या है। ये शरणार्थी गोड़ीयर गाँव में आ करके बस गए हैं लेकिन गाँव के लोग उसे पाकिस्तानी टोले के नाम से पुकारते हैं ।इस टोले का नामकरण राज्य के पुनर्वास मंत्री इस्माइल नबी करते हैं और कहते हैं – ‘’ यह उस बापू की महिमा है कि मेरे जैसे अदना खिदमतगार. कि जनता छोटे से सेवक , के नाम पर नगर बसाये जाते हैं ।‘’१३

इस टोले की पढ़ी- लिखी महिला पवित्रा चटर्जी है जो निस्वार्थ भाव से सबकी सेवा करती है । गोड़ीयर गाँव के सभी पात्र बिना किसी उद्देश्य के जुलुस में शामिल हैं । गाँव का सबसे धनाढ्य व्यक्ति तालेशर गोढ़ी है जो सबकों नचाता हैऔर सामंती वर्ग का प्रतिनिधत्व करता है ।

अपने एक अन्य उपन्यास ‘’पल्टू बाबू रोड ‘’ में रेणु एक कस्बे बैरगाछी को अपने कथा का आधार बनाते हैं । इस कस्बे की नियति पल्टू बाबू जैसे धूर्त , काईयाँ और कामुक व्यक्ति के हाथ में है ।इस उपन्यास में रेणु उच्च वर्ग के अंतर्विरोधों , उसकी गिरावट ,आर्थिक और राजनीतिक संबंधों में यौनाचार आदि का चित्रण करते हैं ।समाज का उच्च वर्ग भोग- विलास व यौनाचार में लिप्त है ।उपन्यास में कांग्रेसी नेताओं के चारित्रिक पतन और गिरावट का भी उल्लेख किया गया है । मुरली मनोहर मेहता जैसे कांग्रेसी नेता और छोगमल जैसे सरकारी कर्मचारी सभी भष्टाचार और यौनाचार में लिप्त हैं ।रेणु समाज के इस वर्ग का पर्दाफास करते हैं । इस उपन्यास के सोशलिस्ट कार्यकर्ता घंटा कहता है – ‘’सब पूंजीवादी – अर्थशास्त्र के सिद्धांत गलत हैं ।बहस करूँगा ,हारूँगा नहीं।‘’१४

रेणु एक प्रतिबद्ध समाजवादी कथाकार हैं जिनकी प्रतिबद्धता समाज के सर्वहारा व कमजोर वर्ग के प्रति है । उनके साहित्य और जीवन दोनों में इस वर्ग के लिए छटपटाहट दृष्टिगत होती है। रेणु देश की आजादी के सेनानी रहें हैं और उनमें राष्ट्रप्रेम कूट – कूट कर भरा है। उनके अन्दर गाँधी जी के प्रति सच्ची संवेदना है लेकिन आजादी के बाद कांग्रेसी नेताओं के वर्ग चरित्र को वे अच्छी तरह से पहचानते हैं और उसका पर्दाफाश करते हैं। वे समाज के कमजोर वर्ग के दुःख – दर्द को अपनी आवाज देते है तथा उनके लिए संघर्ष भी करते हैं । इसलिए जीवन के अंतिम पड़ाव पर जब उनके राजनीतिक गुरु जयप्रकाश जी सम्पूर्ण क्रांति का नारा देते है तब वे इसमें कूद पड़ते हैं और पद्मश्री की उपाधि लौटकर आपातकाल में जेल चले जाते हैं । राजनीतिक नेताओं के नैतिक पतन के कारण उनकी दलीय व्यवस्था में भी आस्था कम हो गई थी ।११ अप्रैल ,१९७७ को उन्होंने अंतिम साँस पटना में ली । रेणु एक क्रांतिधर्मी चेतना के व्यक्ति थे और सर्वहारा वर्ग के सच्चे प्रतिनिधि थे ।

सन्दर्भ;
१. रेणु रचनावली , भाग -४ ,एक साक्षात्कार में रेणु ,पृष्ठ -४२१
२. रेणु रचनावली , भाग ४ ,पृष्ठ ४४९
३. समालोचना ,रेणु की राजनीति –प्रेम प्रकाश मणि
४. वही
५. वही
६. मैला आंचल,पृष्ठ -२२
७. वही , पृष्ठ -३३
८. वही ,पृष्ठ -१३३
९. वही – पृष्ठ ,११०
१०. वही पृष्ठ -११२
११. वही , पृष्ठ ११४
१२ वही पृष्ठ -३१२
१३. जुलुस , पृष्ठ -८
१४. पल्टू बाबू रोड , पृष्ठ -११०

संपर्क ; वसंत ओएसिस, मरोल, अँधेरी
मुंबई -५९
मोबाइल – ९८६९८५५७१६


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