किशन पटनायक : विकल्पहीन नहीं है दुनिया

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किशन पटनायक (30 जून 1930 - 27 सितंबर 2004)

Parichay Das

— परिचय दास —

।। एक।।

कभी-कभी दुनिया इतनी भरी हुई दिखाई देती है कि उसमें किसी विकल्प के लिए जगह ही नहीं बचती। चारों ओर वही चेहरे, वही व्यवस्थाएँ, वही भाषाएँ, वही इच्छाएँ और उन्हीं इच्छाओं को पूरा करने की लगातार दौड़। लगता है कि जीवन हमारे लिए पहले ही तय हो चुका है। हमें बस उसमें अपनी जगह खोजनी है। जैसे किसी बहुत बड़े भवन में हमारे नाम का एक कमरा पहले से बना हुआ हो और हमें उसी में रहना हो।

ऐसे समय में किशन पटनायक की पुस्तक का शीर्षक धीरे से हमारे सामने आता है : विकल्पहीन नहीं है दुनिया।

यह कोई नारा नहीं है। यह एक बेचैन करने वाला वाक्य है।

वह हमें यह सुविधा नहीं देता कि हम दुनिया को जैसा है वैसा स्वीकार करके निश्चिंत हो जाएँ। वह हमारी आँखों के सामने एक छोटा-सा प्रश्न रख देता है : क्या सचमुच जो है, वही एकमात्र संभव है?

मनुष्य की सबसे बड़ी आदत शायद यही है कि वह वर्तमान को बहुत जल्दी नियति समझ लेता है। जो व्यवस्था लंबे समय तक चलती रहती है, वह स्वाभाविक लगने लगती है। जो असमानता पीढ़ियों से दिखाई देती है, वह व्यवस्था का हिस्सा लगने लगती है। जो जीवन-पद्धति हमें रोज दिखाई देती है, उसके बाहर कल्पना करना कठिन हो जाता है। धीरे-धीरे संभावना की जगह आदत ले लेती है।

और आदत बड़ी चतुर चीज है। वह जेल की दीवारों को भी घर का रंग दे सकती है।

विकल्प की कल्पना इसलिए कठिन है कि विकल्प पहले वास्तविकता में नहीं, कल्पना में जन्म लेता है। किसी भी नए रास्ते पर चलने से पहले मनुष्य को यह मानना पड़ता है कि रास्ता कहीं और भी जा सकता है। खेत में बीज डालते समय किसान को फसल दिखाई नहीं देती। उसे मिट्टी, मौसम और अपने श्रम पर एक ऐसी आस्था रखनी पड़ती है जिसका कोई तत्काल प्रमाण नहीं होता।

सामाजिक जीवन में भी विकल्प कुछ ऐसा ही है।

विकल्प का अर्थ केवल सत्ता बदलना नहीं है। विकल्प जीवन को देखने की दृष्टि में भी हो सकता है। हम क्या चाहते हैं, किसे विकास कहते हैं, किसे सफलता मानते हैं, किस प्रकार का समाज बनाना चाहते हैं, मनुष्य और प्रकृति के संबंध को किस रूप में देखते हैं, इन सभी प्रश्नों में विकल्प छिपे रहते हैं।

किशन पटनायक की चिंता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यही है कि आधुनिक समाज अपनी संभावनाओं को बहुत जल्दी कुछ सीमित रास्तों में बाँध देता है। आर्थिक विकास का एक मॉडल सामने आता है और धीरे-धीरे ऐसा लगता है कि विकास का अर्थ केवल वही है। उपभोग बढ़ता है और उसे जीवन की गुणवत्ता समझ लिया जाता है। बाजार सुविधाएँ देता है और उसी के साथ इच्छाओं का विस्तार भी करता जाता है।

मनुष्य के पास वस्तुएँ बढ़ती जाती हैं, लेकिन विकल्प घटते जाते हैं।

यह विरोधाभास हमारे समय की एक विचित्र विडंबना है।

हमारे पास पहले से कहीं अधिक साधन हैं, लेकिन यह तय करने की स्वतंत्रता कम होती जाती है कि उन साधनों का उपयोग किस जीवन के लिए किया जाए। हमारे पास सूचना बहुत है, पर अपने लिए प्रश्न चुनने का अवकाश कम है। हमारे पास संपर्क बहुत हैं, पर संवाद के लिए समय कम है।

विकल्प केवल वस्तुओं की संख्या बढ़ जाने का नाम नहीं है।

वास्तविक विकल्प वह है जिसमें मनुष्य अपने जीवन के अर्थ पर भी विचार कर सके।

किसी समाज की कल्पना करते समय सबसे कठिन काम यह नहीं कि हम उसकी कमियाँ गिनें। कठिन यह है कि हम उसके बाहर की कोई तस्वीर बना सकें। आलोचना अपेक्षाकृत आसान है; विकल्प की कल्पना कठिन। शिकायत के लिए भाषा तुरंत मिल जाती है, लेकिन निर्माण के लिए धैर्य चाहिए।

इसलिए ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ का अर्थ यह भी हो सकता है कि निराशा अंतिम सत्य नहीं है।

निराशा कई बार बहुत बुद्धिमान दिखाई देती है। वह हमें समझाती है कि दुनिया जैसी है, वैसी ही रहेगी; मनुष्य बदलता नहीं; व्यवस्था बदलती नहीं; इतिहास दोहराता है। निराशा अपने पक्ष में बहुत सारे उदाहरण जुटा लेती है। फिर वह निष्कर्ष देती है कि प्रयास व्यर्थ है।

लेकिन इतिहास में परिवर्तन हमेशा किसी असंभव लगने वाली कल्पना से ही शुरू हुआ है।

जो कभी असंभव था, वह किसी समय संभव हुआ। जो कभी सामान्य था, वह बदल गया। मनुष्य ने अपने सामाजिक संबंधों, राजनीतिक संस्थाओं, ज्ञान की सीमाओं और जीवन-पद्धतियों में अनेक परिवर्तन किए हैं। हर परिवर्तन ने पहले से मौजूद सामान्यता को असामान्य बनाया और किसी नई संभावना को सामान्य।

विकल्प का अर्थ यह नहीं कि कोई एक तैयार आदर्श दुनिया हमारे सामने रख दी जाए। शायद विकल्प की सच्ची प्रकृति ही यह है कि वह तैयार नहीं मिलता। उसे मनुष्य अपने अनुभव, संघर्ष और कल्पना से बनाता है।

इसीलिए विकल्प किसी एक व्यक्ति की संपत्ति भी नहीं हो सकता।

एक समाज में विकल्प तभी जीवित रहता है जब साधारण मनुष्य की कल्पना जीवित रहे। किसान अपने खेत के बारे में सोचता है, विद्यार्थी अपने भविष्य के बारे में, शिक्षक शिक्षा के बारे में, कलाकार मनुष्य की संवेदना के बारे में और नागरिक अपने समाज के बारे में। इन छोटी-छोटी कल्पनाओं के भीतर ही बड़े परिवर्तन के बीज छिपे होते हैं।

दुनिया को बदलने की इच्छा कई बार बहुत बड़े शब्दों में व्यक्त होती है। लेकिन परिवर्तन का वास्तविक आरंभ अक्सर बहुत छोटे प्रश्न से होता है : क्या इसे किसी दूसरे ढंग से किया जा सकता है?

यही प्रश्न विकल्प का पहला स्वर है।

किशन पटनायक के शीर्षक में मुझे इसी प्रश्न की चमक दिखाई देती है। यह दुनिया को किसी सरल समाधान का आश्वासन नहीं देता। यह केवल इतना कहता है कि मनुष्य की कल्पना को अंतिम रूप से बंद मत करो।

क्योंकि जिस दिन मनुष्य यह मान लेता है कि कोई विकल्प नहीं है, उसी दिन वह वर्तमान का नागरिक कम और उसकी स्वीकृति का हिस्सा अधिक बन जाता है।

विकल्प की खोज में जोखिम है। उसमें असफलता भी है। कभी-कभी नया रास्ता पुराने रास्ते से अधिक कठिन निकलता है। हर विकल्प बेहतर परिणाम देगा, यह भी जरूरी नहीं। मनुष्य की सामाजिक यात्रा इतनी सरल नहीं कि एक दरवाजा खोलते ही सामने स्वर्ग मिल जाए। इतिहास ने मनुष्य को यह सुखद सुविधा कभी नहीं दी।

फिर भी विकल्प की आवश्यकता बनी रहती है।

क्योंकि विकल्प का अर्थ सफलता की गारंटी नहीं, संभावना का संरक्षण है।

मनुष्य जब विकल्प की कल्पना करता है, तब वह अपने वर्तमान से थोड़ा-सा बाहर खड़ा होता है। वह स्वयं को देखने लगता है। शायद यही स्वतंत्रता का आरंभिक क्षण है। वह पूछता है : जो जीवन मैं जी रहा हूँ, क्या वही जीवन संभव जीवनों की अंतिम सीमा है?

इस प्रश्न के बाद दुनिया थोड़ी बदल जाती है।

सड़क वही रहती है, लेकिन उसके किनारे एक पगडंडी दिखाई देने लगती है।

और कभी-कभी सभ्यता की सबसे बड़ी यात्राएँ पक्की सड़कों से नहीं, उन्हीं पगडंडियों से शुरू होती हैं।

।। दो।।

किशन पटनायक की ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ को केवल राजनीतिक चिंतन की पुस्तक की तरह पढ़ना उसके भीतर चल रही बेचैनी को छोटा कर देना है। यह पुस्तक सभ्यता, विकास, गाँधी, समाजवाद, लोकतंत्र, बुद्धिजीवी, पत्रकारिता और राजनीति जैसे प्रश्नों के बीच से गुजरती हुई बार-बार उसी जगह लौटती है जहाँ मनुष्य अपने समय से पूछता है : क्या यही दुनिया अंतिम है?

पुस्तक का केंद्रीय स्वर इसी प्रश्न से बनता है।

‘सभ्यता का संकट’ शीर्षक के अंतर्गत पटनायक जिस दुनिया को देखते हैं, वहाँ संकट केवल आर्थिक या राजनीतिक नहीं है। संकट मनुष्य की उस कल्पना का भी है जिसमें जीवन को बेहतर बनाने के लिए बनाए गए साधन ही धीरे-धीरे जीवन के उद्देश्य बनने लगते हैं। विकास का अर्थ अधिक उत्पादन, अधिक उपभोग और अधिक सुविधा में सिमटने लगता है। तब प्रश्न उठता है कि विकास के बीच मनुष्य कहाँ है।

यह प्रश्न आज भी उतना ही बेचैन करता है।

हमने सड़कें चौड़ी कर लीं, शहर बड़े कर लिए, बाजार फैला लिए, लेकिन क्या मनुष्य का जीवन भी उतना ही विस्तृत हुआ? सुविधा बढ़ना और जीवन समृद्ध होना क्या एक ही बात है? पटनायक के चिंतन की ताकत इसी तरह के असुविधाजनक प्रश्नों में है।

वह विकास को केवल आँकड़ों में नहीं देखते। उनके लिए विकास का संबंध समाज की संरचना और मनुष्य की गरिमा से भी है। यदि विकास का लाभ समाज के बड़े हिस्से को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ता है, तो केवल उत्पादन की वृद्धि को विकास कह देना पर्याप्त नहीं।

यहाँ से उनकी दृष्टि गाँव, किसान, श्रम और सामान्य मनुष्य की ओर जाती है।

भारत को समझने के लिए केवल महानगरों को देखना पर्याप्त नहीं। भारत की असली धड़कन उन जगहों पर भी है जहाँ मनुष्य अपने श्रम, मिट्टी, पानी और समुदाय के साथ जीवन बनाता है। आधुनिकता जब इन जीवन-रूपों को केवल पिछड़ापन मानकर देखती है, तब पटनायक की दृष्टि उसके सामने एक दूसरा प्रश्न रखती है : क्या आधुनिक होने का अर्थ अपने जीवन की उन सारी स्मृतियों और सामाजिक संबंधों को खो देना है जिनसे मनुष्य बना है?

यहीं गाँधी का प्रसंग अर्थवान हो उठता है।

गाँधी को पटनायक किसी पूजा की वस्तु नहीं बनाते। उनके यहाँ गाँधी एक ऐसे विचार-स्रोत हैं जिनसे आधुनिक सभ्यता, विकास और राजनीति पर नए प्रश्न पूछे जा सकते हैं। गाँधी के मर्म में लौटना अतीत में लौटना नहीं, बल्कि वर्तमान की दिशा को जाँचने का एक तरीका है।

साधन और साध्य का संबंध गाँधी के चिंतन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। पटनायक के लिए भी यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है कि हम जिस समाज की कल्पना कर रहे हैं, वहाँ पहुँचने के लिए कैसी राजनीति और कैसी सामाजिक प्रक्रिया अपनाई जा रही है।

किसी सुंदर भविष्य की कल्पना यदि वर्तमान में मनुष्य को ही साधन बना दे, तो भविष्य की सुंदरता संदिग्ध हो जाती है।

यही बात लोकतंत्र पर भी लागू होती है।

लोकतंत्र केवल चुनाव का आयोजन नहीं है। चुनाव उसका एक आवश्यक संस्थागत पक्ष है, लेकिन लोकतांत्रिक जीवन उससे कहीं व्यापक है। समाज में निर्णय लेने की प्रक्रिया में सामान्य मनुष्य की भागीदारी कितनी है? क्या नागरिक केवल मतदाता है या वह अपने जीवन से जुड़े निर्णयों में सक्रिय भागीदार भी है? क्या राजनीति समाज को अधिक स्वतंत्र और अधिक जागरूक बनाती है?

पटनायक के चिंतन में लोकतंत्र की यही गहरी चिंता दिखाई देती है।

राजनीति यदि केवल सत्ता के केंद्र तक पहुँचने की प्रतिस्पर्धा बन जाए तो लोकतंत्र का सामाजिक अर्थ सिकुड़ सकता है। तब जनता चुनाव के समय दिखाई देती है और उसके बाद धीरे-धीरे आँकड़े में बदल जाती है।

पटनायक की बेचैनी उस मनुष्य को फिर से दृश्य में लाने की है।

समाजवाद के संदर्भ में भी उनका चिंतन किसी पुराने नारे को दोहराने भर का नहीं है। बराबरी का प्रश्न उनके लिए मनुष्य की वास्तविक स्वतंत्रता से जुड़ता है। आर्थिक असमानता केवल धन की असमानता नहीं होती। वह शिक्षा, अवसर, सम्मान, निर्णय और जीवन की संभावनाओं में भी उतरती है।

इसलिए बराबरी का प्रश्न आज भी केवल आर्थिक नीति का प्रश्न नहीं है। यह उस समाज की कल्पना का प्रश्न है जिसमें किसी मनुष्य का जन्म ही उसकी संभावनाओं की अंतिम सीमा न बन जाए।

पुस्तक का ‘बुद्धिजीवी, पत्रकारिता और प्रतिक्रांति’ वाला हिस्सा इसी सामाजिक जिम्मेदारी की ओर लौटता है। बुद्धिजीवी से केवल ज्ञान की अपेक्षा नहीं की जाती, अपने समय को समझने और उसके कठिन प्रश्नों के सामने खड़े होने की अपेक्षा भी की जाती है।

बुद्धिजीवी यदि समाज से कटकर केवल अपने ही बौद्धिक संसार में सुरक्षित हो जाए तो ज्ञान चमकदार हो सकता है, लेकिन उसकी सामाजिक उपयोगिता कम हो सकती है।

पत्रकारिता का प्रश्न भी इससे जुड़ता है। समाचार केवल सूचना नहीं है। समाज में क्या दिखाई देगा और क्या अदृश्य रह जाएगा, यह भी सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करता है। किसी घटना को लगातार सामने लाना और किसी दूसरी घटना को लगातार हाशिए पर रखना, दोनों का सामाजिक प्रभाव होता है।

पटनायक का चिंतन हमें सूचना की मात्रा से अधिक उसकी सामाजिक दिशा पर विचार करने को प्रेरित करता है।

‘प्रतिक्रांति’ का विचार यहाँ एक और अर्थ खोलता है। परिवर्तन की हर घोषणा परिवर्तन नहीं होती। कभी-कभी पुराने संबंध, पुराने हित और पुरानी मानसिकताएँ नए शब्दों में लौट आती हैं। ऊपर से दृश्य बदल जाता है, भीतर की संरचना बहुत कम बदलती है।

इसलिए परिवर्तन को केवल उसके नाम से नहीं, उसके परिणामों से पहचानना आवश्यक है।

यही दृष्टि उनकी राजनीति को भी अधिक जटिल बनाती है। वे किसी एक राजनीतिक व्यवस्था को अंतिम उत्तर मान लेने के बजाय उस सामाजिक यथार्थ को देखने की कोशिश करते हैं जिसमें राजनीति काम करती है। राजनीतिक दल बदल सकते हैं, नारे बदल सकते हैं, नेतृत्व बदल सकता है, लेकिन यदि समाज के भीतर असमानता, भय और निर्भरता की संरचनाएँ बनी रहती हैं तो परिवर्तन अधूरा रह सकता है।

विकल्प इसलिए केवल सत्ता के विकल्प का नाम नहीं है।

वह समाज के विकल्प की कल्पना है।

और समाज का विकल्प केवल किसी एक विचारधारा से नहीं बनता। उसके लिए मनुष्य के रोजमर्रा के जीवन को देखना पड़ता है। किसान की जमीन, मजदूर का श्रम, विद्यार्थी का भविष्य, स्त्री की स्वतंत्रता, छोटे समुदायों की सुरक्षा, प्रकृति का संतुलन और नागरिक की गरिमा, ये सब मिलकर उस समाज की तस्वीर बनाते हैं जिसे हम बेहतर समाज कहना चाहते हैं।

यहीं पुस्तक अपने शीर्षक के सबसे निकट आती है।

‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ का अर्थ यह नहीं कि कोई एक तैयार रास्ता हमारे सामने रखा हुआ है। इसका अर्थ इतना अधिक और इतना कठिन है कि हमें वर्तमान को अंतिम मान लेने से बचना चाहिए।

विकल्प पहले कल्पना में जन्म लेता है।

फिर वह प्रश्न बनता है।

फिर छोटी-छोटी कोशिशों में उतरता है।

और कभी-कभी बहुत देर बाद इतिहास उसे पहचानता है।

किसी पुस्तक की शक्ति उसके उत्तरों से अधिक उसके प्रश्नों में होती है। पटनायक की यह पुस्तक इसी कारण आज भी पढ़े जाने योग्य लगती है। उसके कई प्रसंग अपने समय से जुड़े हैं, लेकिन उनके भीतर उठते प्रश्न समय की सीमा पार कर जाते हैं।

क्या विकास मनुष्य के लिए है या मनुष्य विकास के लिए?

क्या लोकतंत्र केवल राजनीतिक संस्थाओं में है या सामाजिक जीवन में भी?

क्या बराबरी केवल कानून का शब्द है या जीवन का अनुभव?

क्या राजनीति समाज को बदलती है या केवल सत्ता का चेहरा बदलती है?

और सबसे बड़ा प्रश्न :

क्या जो दुनिया हमें मिली है, वही दुनिया हमें अगली पीढ़ी को भी देनी है?

इन प्रश्नों के सामने कोई अंतिम उत्तर नहीं है।

शायद यही इस पुस्तक की ईमानदारी है।

वह हमें किसी निश्चित मंजिल का नक्शा नहीं देती। वह इतना भर करती है कि हमारी आँखों के सामने रास्तों की संख्या फिर से बढ़ा देती है।

एक बंद कमरे में खिड़की खुल जाए तो बाहर जाने का रास्ता अभी नहीं बना होता। लेकिन हवा आ जाती है।

किशन पटनायक की यह पुस्तक ऐसी ही एक खिड़की है।

और खिड़की से दिखाई देता आकाश हमेशा मनुष्य को यह याद दिलाता है कि दुनिया अभी पूरी नहीं हुई है।


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