सेक्यूलर कौन है? सेक्यूलरवाद क्या है ? – प्रभाकर सिन्हा

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भारतीय अंग्रेजी में सेक्यूलर शब्द का अर्थ वही नहीं रह गया है, जो मूल अंग्रेजी में है। मूल अंग्रेजी में यह एक राज्य का गुणधर्म है और राज्य की गतिविधियों के परिप्रेक्ष्य में ही इसे परिभाषित किया जाता है। भारत में इसे व्यक्ति का गुणधर्म मान लिया गया है। और संघ के प्रयोग में तो इसका विशेष अर्थ है। इसे व्यक्ति का गुणधर्म तो माना ही जाता है, साथ ही इसमें कुछ और लक्षण आरोपित कर दिए जाते हैं। इसका अर्थ यह किया जाता है कि सेक्यूलर व्यक्ति ईश्वर में विश्वास नहीं करता है। वह धर्मविरोधी है। वह हिंदू विरोधी है। वह मुसलमानों और ईसाइयों का हितैषी है। लेकिन यह तथ्यात्मक रूप से गलत है तथा इसमें बदनीयती झलकती है। संघ के दुष्प्रचार से तो यह शब्द एक गाली बन गया है।
यह उनके घृणात्मक भाषण का हिस्सा है। जब वे किसी को ‘सेक्यूलर’ या ‘सिकुलर’ कहते हैं तो उसका अर्थ होता है संघविरोधी, हिंदूविरोधी और उनका शत्रु। उनकी दृष्टि में गाँधी जी की हत्या इसलिए की गई क्योंकि वे ‘सेक्यूलर’ अथवा ‘सिकुलर’ थे। वास्तविकता यह है कि महात्मा गाँधी निष्ठावान हिंदू थे। वह गहरे धार्मिक व्यक्ति थे। वह सभी धर्मों का सम्मान करते थे। वह न तो किसी धार्मिक समुदाय के विरोधी थे, न ही पक्षपाती। इसलिए वह इस अर्थ में शत-प्रतिशत सेक्यूलर थे कि उन्होंने सभी धार्मिक समुदायों के साथ समान व्यवहार किया। लेकिन वह गोडसे के लिए ‘सिकुलर’ हो गए और उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ी। संघ और गोडसेवादी हिंदू सेक्यूलर अथवा सिकुलर को इसी अर्थ में इस्तेमाल करते हैं।

गाँधी जी से अलग ऐसे लोग भी हैं जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, फिर भी सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करते हैं। ऐसे लोग भी सेक्यूलर हैं। नेहरू इसी कोटि के हैं। इस्लाम अथवा ईसाई धर्म में विश्वास करने वाला व्यक्ति भी यदि सभी
धर्मों के प्रति समान व्यवहार करता है तो वह सेक्युलर है। इसके उदाहरण मौलाना कलाम आजाद और राजकुमारी अमृत कौर हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि ऐसे व्यक्ति (हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी, बौद्ध अथवा नास्तिक) सेक्यूलर हैं, जो अन्य सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करते हैं और अपने धर्म के कारण किसी के साथ भेदभाव नहीं करते हैँ।
संघ के लोग उन सभी लोगों को ‘सिकुलर’ या ‘सेक्यूलर’ कहते हैं, जो सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करते हैं। वे इन शब्दों का प्रयोग गाली की तरह करते हैं। यह संघ के घृणात्मक भाषणों की शब्दावली है। संघ ‘सिकुलर’ या सेक्यूलरवाद शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में करता है, उसका इस शब्द के मूल अर्थ से कोई संबंध नहीं है। सेक्यूलर का वास्तविक अर्थ ऊपर बताया गया है। ऐसे सभी लोगों को सेक्यूलर कहा जाता है, जो धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करते हैं। अंग्रेजी भाषा में सेक्यूलर का अर्थ है, ऐसे मामले जो धर्म से संबंधित नहीं हैं। इसका संबंध व्यक्तिगत गुण से नहीं, बल्कि जीवन क्षेत्र में उसके द्वारा किए जा रहे कार्यों से है। सेक्यूलर के ठीक विपरीत शब्द है रेलिजन (धर्म), लेकिन भारत में इसके विपरीत अर्थ में कम्यूनल (सांप्रदायिक) शब्द का प्रयोग किया जाता है। इसका उद्भव चर्च एवं राज्य(राजा) के बीच उनके अधिकार क्षेत्र के संबंध में विवाद के समय हुआ। इसका समाधान इस समझौते के साथ हुआ कि जो कुछ भी धार्मिक है, वह चर्च के अधिकार क्षेत्र में रहे, इसके अलावा सभी मामले सेक्यूलर हैं और वे राज्य(राजा) के अधिकार क्षेत्र में रहें। बाद में सेक्यूलरवाद राज्य का गुणधर्म बन गया। इसका अर्थ यह हुआ कि एक सेक्यूलर राज्य सभी धार्मिक समुदायों के सदस्यों के साथ एक जैसा व्यवहार करेगा। यह न तो किसी धार्मिक समुदाय का पक्ष लेगा और न हीं किसी के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार करेगा। व्यवहार में सेक्यूलरवाद के कई रूप हैं। अमेरिकी सेक्यूलरवाद का अर्थ है कि राज्य किसी भी धर्म से संबंधित कोई भी कानून नहीं बनाएगा। लेकिन इसके अधिकारी सार्वजनिक तौर पर अपने धार्मिक आचारों के पालन से मुँह नहीं चुराते हैं। वाइट हाऊस में राष्ट्रपति के लिए चर्च है। भारत एक सेक्यूलर राज्य है। सैद्धांतिक तौर पर यह किसी धर्म या धार्मिक समुदाय के साथ भेदभाव नहीं कर सकता है, लेकिन धार्मिक मामले में कानून बना सकता है।
उदाहरण के लिए इसने तीन तलाक पर कानून बनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमाला में एक निश्चित उम्र की महिलाओं के प्रवेश न करने के धार्मिक आचार में हस्तक्षेप किया। राज्य के कार्यक्रमों में अनेक अवसरों पर सभी धर्मों के पुजारियों ने प्रार्थना की। लेकिन सेक्यूलरवाद का मूल भाव यही है कि किसी समुदाय के साथ उसके धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करना। यह सिद्धांत ही सेक्यूलरवाद, लोकतंत्र और कानून के शासन की आत्मा भी है और उसका जीवन भी। भारत में इसकी आत्मा पर हमले हो रहे हैं और यह बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई है। इसका कारण यह भी है कि वर्तमान सत्ताधारी शक्तियां शुरू से ही इस पर हमलावर रही हैं। सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक स्थिति इंग्लैंड की है। वहाँ राज्य का धर्म ईसाइयत है। राजा/रानी इंग्लैंड के चर्च के प्रधान हैं। लेकिन वे दूसरे धार्मिक विश्वास वालों के साथ भेदभाव नहीं करते हैं। इसके विपरीत भारत एक सेक्यूलर राज्य है, फिर भी अपने ही अल्पसंख्यकों के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार करता है, न सिर्फ सैद्धांतिक रूप से बल्कि व्यावहारिक रूप से भी। यह हमारे संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। यदि भारत को एक सभ्य देश बने रहना है तो उसे संविधान की मूल भावना का अक्षरशः पालन करना होगा और उन बुरी शक्तियों से पूरे प्राणप्रण से लड़ना होगा, जो सेक्यूलरवाद, कानून के शासन और लोकतंत्र को खत्म करने पर तुली हैं।

अँग्रेजी से अनुवाद – संजय गौतम

 


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