गांधी के बारे में कुछ गलतफहमियाँ – नारायण देसाई – तीसरी किस्त

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नारायण देसाई (24 दिसंबर 1924 - 15 मार्च 2015)

(महात्मा गांधी सार्वजनिक जीवन में शुचिता, अन्याय के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष और सत्यनिष्ठा के प्रतीक हैं। उनकी महानता को दुनिया मानती है। फिर भी गांधी के विचारों से मतभेद या उनके किसी कार्य से असहमति हो सकती है। लेकिन गांधी के बारे में कई ऐसी धारणाएं बनी या बनायी गयी हैं जिन्हें गलतफहमी ही कहा जा सकता है। पेश है गांधी जयंती पर यह लेख, जो ऐसी गलतफहमियों का निराकरण करता है। गांधी की छत्रछाया में पले-बढ़े और उनके सचिव मंडल का हिस्सा रहे स्व. नारायण देसाई का यह लेख गुजराती पत्रिका ‘भूमिपुत्र’ से लिया गया है। नारायण भाई ने गांधी की बृहद जीवनी भी लिखी है।)

4. क्या गांधीजी के उपवास दबाव डालने के लिए थे?

गांधीजी के उपवासों को लेकर कई बार बड़े-बड़े विद्वान भी गफलत में पड़ जाते थे। मसलन, जब 1918 में अहमदाबाद के मिल मजदूरों और मालिकों के बीच महँगाई भत्ते की दर को लेकर चली समझौते की लंबी बातचीत के अंत में मालिकान अपना रुख बदलने के लिए तैयार नहीं हुए, तो गांधीजी ने मजदूरों को हड़ताल करने की सलाह दी। हड़ताल शुरू होने से पहले उन्होंने मजदूरों से यह प्रतिज्ञा करवायी थी कि जब तक मसले का पूरा समाधान न हो जाए, वे हड़ताल पर टिके रहेंगे। हड़ताल के कुछ दिन बाद कुछ मजदूर ढीले पड़ने लगे। गांधीजी की तरफ से मजदूरों के संपर्क में रहनेवाले छगनलाल गांधी को एक बस्ती में यह सुनने में आया कि गांधीजी और अनसूयाबहन (जो मजदूरों की नेता और मिल-मालिक अंबालाल साराभाई की बहन थीं) तो खाते हैं, पीते हैं और गाड़ियों में घूमते हैं; हम भूखों मरते हैं। जब गांधीजी तक यह बात पहुँची तो वह सोच में पड़ गये। यह बात तो सही थी कि गांधीजी खा-पी रहे थे, पर यह भी सच था कि मजदूरों ने समाधान होने तक हड़ताल न तोड़ने की सार्वजनिक रूप से प्रतिज्ञा ली थी। गांधीजी ने तब उपवास किया था।

गुजरात के एक मूर्धन्य विद्वान श्री आनंदशंकर ध्रुव ने कहा था कि यह उपवास मिल-मालिकों पर दबाव डालने के लिए है। गांधीजी का उपवास यों तो मजदूरों को उनकी प्रतिज्ञा पर टिकाये रखने के लिए था। पर गांधीजी ने माना कि किसी हद तक मालिकों पर भी इससे दबाव पड़ता था। इस संबंध में गांधीजी ने अपनी विवशता जताकर मिल-मालिकों से कहा था कि मेरी जान बचाने की खातिर नहीं, बल्कि मजदूरों की माँग में कोई औचित्य दिखता हो, तो ही समझौता करें। मामला मध्यस्थ को सौंपा गया। मालिकों ने मध्यस्थ के तौर पर श्री ध्रुव का नाम सुझाया तो मजदूरों की तरफ से गांधीजी ने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। गांधीजी को श्री ध्रुव की न्यायप्रियता में पूरा विश्वास था। दोनों पक्षों ने एक ही मध्यस्थ चुना। मध्यस्थ ने मामले की पूरी पड़ताल करने के बाद जो फैसला सुनाया वह पूरी तरह मजदूरों की माँग के मुताबिक था। तब से मालिकों-मजदूरों के आपसी विवादों का हल मध्यस्थ के जरिये निकालने का सिलसिला शुरू हुआ जो आज तक जारी है।

5. क्या गांधीजी ने दलितों के लिए कुछ नहीं किया?

गांधीजी के विषय में एक गलतफहमी यह भी फैलायी गयी है कि उन्होंने दलितों के लिए कुछ नहीं किया, बल्कि दलितों के लिए जब पृथक मतदाता मंडल की व्यवस्था की जा रही थी, तब 1932 में उन्होंने इसके खिलाफ उपवास किया, जिससे ब्रिटिश प्रधानमंत्री को पृथक मतदाता मंडल का अपना निर्णय वापस लेना पड़ा। ब्रिटिश प्रधानमंत्री अपने उस निर्णय पर एक समय तक ही कायम रहे, क्योंकि उन्होंने यह रुख अख्तियार किया हुआ था कि दलित और गैर-दलित किसी सर्वसम्मत निर्णय पहुँचेंगे, तो सरकार अपने फैसले को बदलकर उस निर्णय के अनुसार कानून बनाएगी। सर्वसम्मत निर्णय के मुताबिक ही प्रस्तावित कानून में फेरबदल किया गया। इस फेरबदल से दलितों को लाभ हुआ या नहीं, इस विषय में दो राय हो सकती है और आज भी है। लेकिन गांधीजी ने ताजिंदगी दलितों के लिए कुछ भी नहीं किया, यह कहना अलग बात है, और यहाँ हम इसी गलतफहमी पर विचार कर रहे हैं।

गांधीजी एकदम छुटपन से ही छुआछूत नहीं मानते थे। जब उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत हुई तब उन्होंने ‘अस्पृश्य’ माने जानेवाले लोगों को अपने घर में रखा। और घर के सारे कामकाज उनके साथ ही वह बराबरी से करते थे। दक्षिण अफ्रीका से भारत आने पर जब उन्होंने साबरमती नदी के किनारे आश्रम स्थापित किया तब उसमें औरों के साथ एक दलित परिवार को भी बसाया था और इस वजह से आश्रम को मिलनेवाली मदद बंद होने की नौबत आ गयी तो उन्होंने यह निश्चय किया था कि दलितों की बस्ती में जाकर रहेंगे और वे जैसे रहते हैं वैसे ही रहेंगे, पर उपर्युक्त दलित परिवार को आश्रम से अलग तो हरगिज नहीं किया जा सकता। आश्रमवासियों में इस बाबत थोड़ी आनाकानी हुई तो वह अपने स्वजनों को छोड़ने के लिए तैयार हो गये थे, पर दलित कुटुंब को आश्रम से अलग करने के लिए तैयार नहीं हुए।

सार्वजनिक जीवन में गांधीजी के किये उपवास के कारण पूरे देश में अस्पृश्यता के कलंक की बाबत जैसी जागृति आयी वैसी पहले कभी नहीं आयी थी। देश में सैकड़ों मंदिर दलितों के लिए खोल दिये गये थे। अनेक गाँवों में सार्वजनिक कुएँ उनके लिए भी सुलभ हो गये और अनेक स्कूलों में दलित बच्चों को अलग बिठाने का चलन बंद हो गया। संक्षेप में कहा जाय, तो इस उपवास के फलस्वरूप छुआछूत का पूरा खात्मा तो नहीं हो गया, पर उसे अवांछित व्यवहार जरूर माना जाने लगा। इस उपवास के बाद गांधीजी ने दलितों की सेवा के लिए हरिजन सेवक संघ की स्थापना की थी और मृत्यु पर्यन्त इस काम के लिए चंदा जुटाते रहे थे।

गांधीजीने खुद महाराष्ट्र के गाँवों में मल-मूत्र की सफाई की थी। उनके आश्रम में तो अन्य सेवाओं की तरह यह काम भी तमाम आश्रमवासी स्वेच्छा से करते थे। स्वराज आया तब गांधीजी के आग्रह पर ही देश के प्रथम मंत्रिमंडल में कानूनमंत्री के तौर पर डॉ. बाबासाहब आंबेडकर को शामिल किया गया था और गांधीजी के आग्रह पर ही उन्हें देश का संविधान बनाने की समिति में सबसे अहम जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। जीवन के आखिरी दशक में गांधीजी का यह भी आग्रह रहता था कि वह ऐसे ही विवाह में शरीक होंगे जिसमें वर-वधू में से कोई एक दलित और दूसरा गैर-दलित हो। जाति-व्यवस्था तोड़ने के लिए अंतर्जातीय विवाह गांधीजी को अभीष्ट लगता था।

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