प्रगति सक्सेना की चार कविताएँ

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1.


वो अटक जाते हैं भीतर के गहरे अँधेरे में कहीं

रेत भरी आंधी में जगमगाते हैं सुनहरी जुगनुओं की तरह

बबूल के काँटों से बचाना था दामन अपना

उसके फूलों में सिमट जाती हैं कितनी खाली जगहें

तार तार हुईं स्मृतियाँ कितनी

रास्ते के दोनों तरफ धूल में उड़ती हुई भीनी सी गंध

गूंथे रहती है वक्त को खुद में

हम बदले हुए पल में भी

वहीं छोड़ आते हैं खुद को

निश्छलस्थिरस्मृतिहीन

बढ़ती धूप में कुम्हलाएंगी नहीं पंखुड़ियाँ इसकी

तेज़ आँधी में उड़ जाएँगी

मिल जाएँगी प्रकृति की स्मृति में कहीं

और फिर लोग ढूँढेंगे इस सुनहरी खुशबू को

कि अटके तो थे एक अथाह अँधेरे में कहीं

उम्मीद के जुगनुओं से बबूल के फूल


2.

आँगन मारता है चिड़ियों को

आजादी और उड़ान के सपनों समेत

टाँग देता है उन्हें, सजा देता है अपने खुलेपन में

ये उसकी उदारता का बखान है, उसके प्रेम का,

मरी हुई चिड़ियों को तमगों की तरह दिखाता है

जब भी चाहे वो उन्हें दुलार सकता है

ये कहते हुए कि इन्हें उड़ने की पूरी आजादी है

आँगन उनसे जब चाहे बतिया सकता है

और कह सकता है कि अपने मन से उसके खुले में बैठी ये चिड़ियाँ

कोई शिकायत नहीं करतीं। वो उनका देश है,

घर से अलग अपने इस घर से वो बहुत प्यार करती हैं

आँगन कभी कभी सहम जाता है उन अत्याचारों पर

जिनसे कभी इन चिड़ियों को गुजरना पड़ता था

उनकी चहचहाहट उसके खुलेपन में गूँजती है

और वो अपनी उदारता और बड़प्पन से सराबोर

एक नयी चिड़िया का स्वप्न देखता है

और प्रेममय स्वर में हर नयी चिड़िया को बताता है,

उसका पता कोई नहीं, उसका घर कोई नहीं

वो बसता है इन चिड़ियों में, उनके सपनों में,

इनके इस कभी ना बदलने वाले पते में


3.


एक खाली जगह है

जिसे मैं भरती हूँ

रोज़ाना की तमाम अच्छी बुरी ख़बरों से

तुम्हारी खनखनाती हँसी से तो कभी घर के हर कोने में गूँजते तुम्हारे गीत से

या फिर बेदम कर देने वाली खाँसी से

खिजला देने वाली पुकार से

डाँट से

हर बार उस खाली जगह को भरती हूँ करीने से

कभी तुम्हारी गुस्से से भरी नजरों से

तो कभी उस गहरे दुलार से

मेरे घावों पर मरहम लपेटते हुए गर्म हाथों से

मेरे दर्द पर उफनते तुम्हारे आँसुओं से

हर बार खाली होती है वो जगह

जहां मैं पलट कर देखती रहती हूँ हमेशा

जहाँ दर्द से काँपते तुम्हारे हाथ उठते हैं

आशीर्वाद में, प्रार्थना में

जिसे भरने की कोशिश करती हूँ

आवाज़, स्पर्श, स्मृति से,

जो फैलती है, अपनी गर्माहट में सोखती है

खाली जगह,

जो अब रगों में दौड़ती है

बाहर और भीतर मौजूद,

तुम्हारे जाने से माँ


4.


दूर पुल पर सरकते ट्रैफिक की तरह

धीरे धीरे आँख से ओझल होते हैं

हालाँकि एक अनकही अलविदा

पहले से ही हवा में शामिल हो जाती है।

जाते हुए लोग

अक्सर यही कहते हैं,

वे कभी कहीं नहीं जाएँगे

फिर वे हलके से स्मृतियों में प्रवेश करते हैं

आपके साथ-साथ चलती-उड़ती पत्तियों में

मौजूद होते हुए भी वो करीब नहीं होते।

माहौल में, समय में, गंध में, हँसी और आवाज़ में

उन्हें ढूँढ़ते हुए खुद को दिलासा देते हैं

कि वे यहीं हैं हमारे आसपास।

जाते हुए लोग

लगातार चलती धुन में

कहते हैं- फिर मिलेंगे,

और एक खास वक्त की तस्वीर में तब्दील हो जाते हैं

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