24 नवम्बर। ट्रेड यूनियनों की तरफ से बढ़ते विरोध और कई राज्यों की ओर से आपत्ति जताए जाने के बाद मोदी सरकार लेबर कोड को लागू करने की जल्दबाजी से रुक गई है? दैनिक भास्कर में इस आशय की एक खबर दो दिन पहले प्रकाशित हुई थी, जिसमें ट्रेड यूनियनों के तीखे होते विरोध का जिक्र किया गया है। गौरतलब है, कि नवंबर महीने में दिल्ली में ट्रेड यूनियनों के कई बड़े प्रदर्शन हुए। 5-6-7 को टीयूसीआई ने जंतर मंतर पर धरना दिया। 13 नवंबर को करीब डेढ़ दर्जन ट्रेड यूनियनों के मंच मासा ने रामलीला मैदान में एक बड़ा प्रदर्शन किया। 21 नवंबर को जंतर मंतर पर कई ट्रेड यूनियनों ने दिन भर का धरना दिया।
हालांकि दैनिक भास्कर ने अपनी खबर में कहा है कि “लेबर कोड के संबंध में जब श्रम मंत्रालय में मजदूर संगठनों की ओर से बैठक होती है, तब संगठनों की ओर से कोई विरोध दर्ज नहीं कराया जाता है। यह सच में हैरान करने वाली बात है, कि जहाँ एक तरफ मजदूरों संगठन विशाल प्रदर्शन करके नए लेबर कोड्स का पुरजोर विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर श्रम मंत्रालय के सामने वो कुछ भी नहीं बोल रहे हैं।” असल में अखबार ने मोदी सरकार का पक्ष ही बताया है। ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि 44 श्रम कानून खत्म करके जो चार लेबर कोड बनाए गए, उसपर ट्रेड यूनियनों की कोई राय नहीं ली गई। यहाँ तक कि कई सालों से लेबर कान्फ्रेंस तक नहीं की गई।
टीयूसीआई के जनरल सेक्रेटरी संजय सिंघवी ने मीडिया के हवाले से बताया कि श्रम कानूनों को मोदी सरकार कारपोरेट हितों के मुताबिक बनाना चाहती है, इसलिए ट्रेड यूनियन बनाने के अधिकार से लेकर हड़ताल के अधिकार को भी इसमें छीन लिया गया है। मोदी सरकार लेबर कोड को लेकर कितनी जल्दबाजी में है, ये 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही दिख रहा है। मोदी सरकार ने शपथ ग्रहण करने के एक हफ्ते के अंदर सुधार के नाम पर श्रम कानूनों को खत्म करने की घोषणा कर दी थी। इसीलिए लॉकडाउन के दौरान ही संसद से तीन कृषि कानूनों को पास कराने के 24 घंटे के भीतर लेबर कोड भी जबरदस्ती पास कराए गए। 26-27 नवंबर 2020 को इसके विरोध में दस बड़ी केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने आम हड़ताल भी की थी।
(‘वर्कर्स यूनिटी’ से साभार)
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