— परिचय दास —
नेपाल के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में एक अद्भुत नाटकीयता उभर रही है। इस नाटकीयता में समय, परिस्थितियाँ और जनमानस की आकांक्षाएँ मिलकर एक नया विवेचन तैयार कर रही हैं। नेपाल, जो कभी राजशाही और हिंदू राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान रखता था, आज एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। हाल ही में बढ़ती सुगबुगाहट इस ओर संकेत करती है कि यह बदलाव जनता के मन में पूर्णतः समाहित नहीं हुआ है।
विगत कुछ वर्षों में नेपाल में लोकतंत्र की यात्रा कई मोड़ों से गुज़री है। 2008 में जब नेपाल ने राजशाही को समाप्त कर गणराज्य की घोषणा की थी, तब यह विचार किया गया था कि देश एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। धर्मनिरपेक्षता को स्वीकार कर लिया गया और यह धारणा बनाई गई कि विविध धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक समुदायों को समान अधिकार मिलेंगे परंतु, परिवर्तन का यह प्रवाह समाज की गहरी भावनाओं और ऐतिहासिक चेतना को पूरी तरह नहीं बहा सका। नेपाल का बहुसंख्यक हिंदू समाज, जिसने सदियों से राजशाही और धर्म का गहरा संबंध देखा ।
हाल ही में नेपाल में राजशाही की पुनर्बहाली और हिंदू राष्ट्र की मांग को लेकर जो आंदोलन उठ खड़ा हुआ है, वह केवल राजनीतिक नहीं बल्कि बहुस्तरीय आकांक्षाओं का परिणाम है। इसे केवल सत्ता के संघर्ष या राजनीतिक असंतोष के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। जब सड़कों पर हज़ारों लोग राजशाही और हिंदू राष्ट्र की मांग करते दिखते हैं तो यह केवल एक राजनीतिक आह्वान नहीं। इसे समझने की ज़रूरत है।
पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह की लोकप्रियता इस संदर्भ में एक दिलचस्प पहलू प्रस्तुत करती है। उन्होंने लंबे समय तक राजनीति से दूरी बनाए रखी, परंतु जनता का एक वर्ग अब भी उन्हें नेपाल की स्थिरता और सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक के रूप में देखता है। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि नेपाल में राजशाही केवल एक राजनीतिक व्यवस्था नहीं थी बल्कि यह नेपाल के हिंदू समाज का अभिन्न अंग थी। राजा की भूमिका केवल शासन करने तक सीमित नहीं थी बल्कि वे समाज के नैतिक और सांस्कृतिक संरक्षक के रूप में भी देखते थे।
नेपाल के राजनीतिक असंतोष को समझने के लिए वर्तमान सरकार और उसकी नीतियों पर भी ध्यान देना आवश्यक है। पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ की सरकार ने अपने वामपंथी रुझानों के कारण कई बार जनता के एक बड़े वर्ग की भावनाओं की उपेक्षा की थी। नये पीएम ओली भी व्यवस्था से घिरे ही हैं। नेपाल में बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी और आर्थिक अस्थिरता ने भी जनता में असंतोष को जन्म दिया है। जब सरकार जनता की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने में असफल रहती है, तब लोग स्वाभाविक रूप से अतीत की ओर देखने लगते हैं। यह अतीत केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि एक संभावित समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
नेपाल की राजनीति को समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय संदर्भ को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। भारत और चीन दोनों नेपाल की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। भारत नेपाल के लोकतांत्रिक परिवर्तन का समर्थक रहा है परंतु नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव ने भारत की भूमिका को कुछ सीमित कर दिया है। चीन नेपाल में वामपंथी सरकारों को समर्थन देता रहा है, जिससे नेपाल के हिंदू राष्ट्रवादी और राजशाही समर्थक समूह असंतुष्ट रहे हैं। इन समूहों को लगता है कि नेपाल की पारंपरिक पहचान को बाहरी शक्तियाँ प्रभावित कर रही हैं।
नेपाल की वर्तमान स्थिति को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह केवल नेपाल तक सीमित नहीं है। दुनियाभर में ऐसे कई देश हैं, जहाँ पारंपरिक राजशाही, धार्मिक पहचान और आधुनिक लोकतंत्र के बीच संघर्ष देखने को मिलता है। ब्रिटेन, जापान, सऊदी अरब जैसे देशों में राजशाही अब भी किसी न किसी रूप में बनी हुई है और वहाँ की सांस्कृतिक अस्मिता से गहराई से जुड़ी हुई है। वहीं, ईरान जैसे देशों में धर्म का शासन अब भी प्रभावी है, जबकि कुछ देशों में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास जारी है। नेपाल में भी यही है। …
आधुनिक विश्व में यह सवाल उठता है कि क्या लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को सभी देशों में समान रूप से लागू किया जा सकता है? नेपाल का उदाहरण दर्शाता है कि हर समाज की अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि होती है, जिसे नज़रअंदाज़ कर कोई भी शासन व्यवस्था सफल नहीं हो सकती। नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग को केवल धार्मिकता के चश्मे से देखना भी एकांगी दृष्टिकोण होगा। यह मांग उस पहचान की भी है, जो नेपाल को विश्व में विशिष्ट बनाती है। हिंदू राष्ट्र की संकल्पना नेपाल के इतिहास में सदियों तक रही है।
नेपाल की वर्तमान स्थिति एक प्रकार से उन सवालों को जन्म देती है, जो केवल नेपाल तक सीमित नहीं हैं। यह उन सभी समाजों के लिए प्रासंगिक हैं, जहाँ परंपरा और आधुनिकता के बीच संघर्ष जारी है। नेपाल में लोकतंत्र को अपनाने का निर्णय आधुनिकता की ओर एक कदम था परंतु यह स्पष्ट होता जा रहा है कि इस कदम ने समाज के भीतर गहरी जड़ों वाली परंपराओं को पूरी तरह समाप्त नहीं किया। यह परंपराएँ समय के साथ फिर से जागृत हो रही हैं और एक नई दिशा की ओर संकेत कर रही हैं।
नेपाल की राजनीति और सामाजिक परिदृश्य में बदलाव केवल आंतरिक नहीं, बल्कि बाहरी प्रभावों से भी प्रेरित होता है। वैश्विक राजनीति में हिंदुत्व की बढ़ती प्रवृत्तियाँ, राष्ट्रवाद की नई लहरें और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के प्रभाव नेपाल की जनता पर भी पड़ते हैं। नेपाल में बढ़ती राजशाही की माँग केवल एक राजनीतिक इच्छा नहीं, बल्कि दक्षिण एशियाई भू-राजनीतिक परिवर्तनों का भी हिस्सा है।
आने वाले समय में नेपाल में क्या होगा, यह कहना कठिन है। क्या नेपाल फिर से राजशाही की ओर लौटेगा? क्या हिंदू राष्ट्र की मांग पूरी होगी? या फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था इन मांगों को किसी नए रूप में समाहित करने का प्रयास करेगी? यह सभी प्रश्न भविष्य के गर्भ में हैं परंतु यह निश्चित है कि नेपाल एक नए परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है। यह परिवर्तन केवल राजनीति का नहीं बल्कि विचारों, भावनाओं और अस्मिता का भी है। नेपाल की धरती पर जो भी निर्णय होगा, वह केवल सत्ता के संतुलन का नहीं बल्कि उसकी आत्मा की गूंज का परिणाम होगा।
सारे विश्व में यह अति – दक्षिणपंथ का रुझान है। नेपाल भी इससे बचा नहीं है।