— राकेश अचल —
मेरे लिए मोदीजी यानि अपने प्रधानमंत्री उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने मोदीजी के लिए नेहरूजी. मोदीजी से दुखी मेरे अनेक पाठकों ने मुझसे कहा है कि उन्हे वे लेख न भेजे जाएं जिनमें मोदीजी का नाम या तस्वीर हो. लेकिन मेरे लिए ये मुमकिन नहीं है. मोदीजी हर समय प्रासंगिक हैं.
अब कल 9 सितंबर को देश के नये उपराष्ट्रपति का चुनाव होना है. पुराने उपराष्ट्रपति माननीय जगदीप धनकड साहब 21अगस्त की शाम अपने पद से इस्तीफा देकर अंतर्ध्यान हो गये. अब चुनाव कराना सरकार की मजबूरी हो गई किंतु धनकड की जगह दूसरा धनकड का चुनाव सरकार के गले की हड्डी (माफ कीजिए फांस बन गया.)विपक्ष ने धनकड पद के लिए सरकारी धनकड के मुकाबले अपना प्रत्याशी उतार दिया. अब मुश्किल ये है कि सरकार को जैसा धनकड चाहिए वैसा धनकड विपक्ष का है नहीं.
सरकार यदि सबको साथ लेकर चलने में सिद्धहस्त होती तो मुमकिन है कि नया धनकड भी निर्विरोध चुन लिया जाता लेकिन सरकार की अकड ने नये धनकड के चुनाव को मुकाबले में बदल दिया. सरकार को विपक्ष के सहयोग की जरुरत धनकड के चुनाव में नहीं है. विपक्ष का सहयोग सरकार केवल आपरेशन सिंदूर के समय लेती है. बाद के दिनों में सरकार को विपक्ष न राज्यसभा में सुहाता है और न लोकसभा में. सरकार को विपक्ष में पाकिस्तान और चीन नजर आता है. ये बात और है कि अब सरकार खुद चीनाश्रित हो गई है.
बात धनकड फोबिया की है. धनकड फोबिया ने सरकार को इतना आतंकित कर दिया है कि अब तक केंद्रीय मंत्रियों तक को छात्रों की तरह खडा टर बात करने के आदी प्रधानमंत्री जी को नये धनकड के चुनाव से पहले पार्टी सांसदों को प्रशिक्षण देने के लिए आयोजित दो दिन के शिविर में सबसे पीछे बैठने पर विवश होना पड रहा है. मजबूरी खास को आम और पिलपिला आम बना देती है. अब मोदीजी सरकार की अंत्योदय योजना का लाभ लेना चाहते हैं.अंत्योदय यानि अंतिम छोर के व्यक्ति का उदय. अब मोदी जी ने वक्त की नजाकत देखकर आखरी छोर पकड लिया है.
मै माननीय मोदी जी का मुरीद हूं. मुरीद कम होते हैं और भक्त कम. अंधभक्त संख्या में भले ज्यादा हों लेकिन एक मुरीद की बराबरी नहीं कर सकते. मोदीजी धनकड चुनाव में थोडे ही हारने या जीतने वाले हैं. ये हार -जीत तो सीपीआर यानि मोदी सरकार के उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन के हिस्से में दर्ज होगी. पितृपक्ष में हो रहे इस चुनाव में कोई व्हिप नहीं, कोई जोर जबर नहीं. आत्मा की आवाज सुनकर मतदान होना है. अब आत्मा कितनों को जगा सकती है, अपनी आवाज सुना सकती है, ये कहना कठिन है. लेकिन यदि पितृपक्ष का लाभ उठाकर ज्यादा मतदाताओं की आत्मा जाग गई तो नया धनकड जस्टिस भी हो सकता है. वैसे मोदीजी को किसी जस्टिस में कोई दिलचस्पी नहीं है. होती तो जस्टिसों की दुनिया से नजदीकी न बढा ली होती. पहले उनकी दिलचस्पी जस्टिसों में थी इसीलिए उन्होने एक पूर्व जस्टिस को राज्यसभा में कुरसी दी. एक को गवर्नर बनाया.
आप जब इस आलेख को पढ रहे होंगे तब नये धनकड के चुनाव के लिए मतदान हो रहा होगा. ये मतदान हमारे केंचुआ के नियंत्रण वाली ईवीएम से नहीं हो रहा. इस चुनाव की मतदाता सूची में एस आई आर का इस्तेमाल नहीं हो पाता, इसलिए केंचुआ असहाय है, बेचैन है. बेचारा अपने आकाजान की कोई इमदाद नही कर सकता. कितना आत्मग्लानि से भरा होगा केंचुआ इस समय. दया आती है मुझे केंचुआ की इस अवस्था पर.
मेरी तो कामना है, प्रार्थना भी है कि सरकार जिस तरह धनकड चुनाव मतपत्रों के जरिये करा रही है उसी तरह बिहार विधानसभा के चुन भी ईवीएम के स्थान पर मतपत्रों से कराकर विपक्ष का एक हथियार छीन ले. जैसे जीएसटी स्लैब बदला है वैसे ही चुनाव की प्रणाली भी बदल ले. ईवीएम का कोई दूसरा इस्तेमाल खोज लिया जाएगा.
धनकड चुनाव में हमारी शुभकामनायें आज के राधाकृष्णन सीपी के साथ भी हैं और रेड्डी सुदर्शन के प्रति भी. हमारे लिए तो जो जीता वही सिकंदर होगा. सिकंदर न्यायप्रिय होतो और अच्छा. कठपुतली न हो तो सोने में सुहागा. भाजपा या कांग्रेस का न होकर देश का हो तो कहना ही क्या. अब देखते हैं कि ऊंट किस करवट बैठता है. बेचारा पहाड के नीचे तो पहले ही आ चुका है. इतिमित्थह.
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