विजय देव नारायण साही का प्रस्थान-बिंदु : सूफी, सत्ता और जायसी की मनुष्यता

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Vijaydev Narayan Sahi

Parichay Das

— परिचय दास —

विजयदेवनारायण साही की आलोचना~पुस्तक– ‘जायसी’ को केवल मलिक मुहम्मद जायसी पर लिखी गई आलोचनात्मक पुस्तक मानना उसके वास्तविक महत्व को कम कर देना है। यह पुस्तक हिंदी आलोचना में एक ऐसे बिंदु पर हस्तक्षेप करती है जहाँ धर्म, सूफी परंपरा, सत्ता, इतिहास और कविता के बीच बने हुए सुविधाजनक संबंध अचानक नए प्रश्नों के सामने आते हैं। साही का प्रस्थान-बिंदु यही है कि वे उन स्थापित धारणाओं को एक साथ चुनौती देते हैं, जिनके अनुसार सूफी होना अपने आप उदार होना है, सांस्कृतिक समन्वय का प्रतिनिधि होना अपने आप मानवीय होना है और किसी मुस्लिम कवि की रचना को समझने के लिए उसे सूफी आध्यात्मिकता के भीतर रख देना पर्याप्त है।

साही की आलोचना का मूल आग्रह अत्यंत सरल दिखाई देता है, लेकिन उसके परिणाम बहुत दूर तक जाते हैं: कवि की धार्मिक पहचान को उसकी काव्य-दृष्टि का पर्याय मत बनाइए।

जायसी मुस्लिम हैं, सूफी सांस्कृतिक संसार से जुड़े हैं, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि ‘पद्मावत’ केवल सूफी मत का काव्यात्मक रूपक है। इसी तरह अमीर खुसरो सूफी परंपरा से संबद्ध हैं, हिंदवी भाषा के महत्त्वपूर्ण आरंभिक व्यक्तित्व हैं और सांस्कृतिक स्मृति में हिंदू-मुस्लिम संपर्क के बड़े प्रतीक हैं, लेकिन इन प्रतिष्ठित पहचानों के कारण उनकी इतिहास-दृष्टि की आलोचना समाप्त नहीं हो जाती।

यहीं साही खुसरो और जायसी को आमने-सामने रखते हैं।

यह तुलना सामान्य साहित्यिक तुलना नहीं है। यह एक प्रकार की नैतिक और ऐतिहासिक कसौटी है। चित्तौड़ इसका केंद्र बनता है। अमीर खुसरो अलाउद्दीन खिलजी के दरबार से जुड़े थे और उनकी खजाइन-उल-फुतूह में अलाउद्दीन की विजयों का वर्णन मिलता है। जायसी ने लगभग दो शताब्दियों बाद पद्मावत में चित्तौड़ को एक ऐसी काव्यात्मक त्रासदी में रूपांतरित किया जिसमें सत्ता की विजय से अधिक मनुष्य की पराजय, प्रेम और मृत्यु का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है।

साही इसी अंतर को पकड़ते हैं।

प्रश्न यह नहीं है कि खुसरो मुसलमान थे और जायसी भी मुसलमान थे। प्रश्न यह है कि सत्ता की विजय के सामने कवि की दृष्टि किस ओर जाती है।

विजेता की ओर या पीड़ित की ओर?

सुल्तान की उपलब्धि की ओर या मनुष्य की त्रासदी की ओर?

इतिहास की विजय-गाथा की ओर या इतिहास में कुचले गए मनुष्य की स्मृति की ओर?

यहीं साही का आलोचनात्मक हस्तक्षेप अत्यंत तीखा हो जाता है। क्योंकि इससे साहित्यिक उदारता की एक प्रचलित कसौटी उलट जाती है। किसी कवि का सूफी होना उसे स्वतः मनुष्यवादी नहीं बनाता और किसी कवि का धार्मिक होना उसकी कविता को स्वतः संकीर्ण नहीं बनाता। कसौटी धर्म नहीं, काव्य-दृष्टि है; पहचान नहीं, मनुष्य के प्रति रचना का व्यवहार है।

साही के लिए जायसी का महत्व इसी बिंदु पर उभरता है। जायसी को केवल सूफी प्रेमाख्यानकार कह देना ‘पद्मावत’ की काव्यात्मक जटिलता को छोटा करना है। पद्मावती केवल आत्मा नहीं है, रत्नसेन केवल साधक नहीं है, नागमती केवल सांसारिक मोह नहीं है और अलाउद्दीन केवल आध्यात्मिक बाधा नहीं है। ये सब जीवित मनुष्य और इतिहास के पात्र भी हैं। इनके भीतर इच्छा है, देह है, प्रेम है, ईर्ष्या है, विरह है, सत्ता की आकांक्षा है, हिंसा है और मृत्यु है।

साही का आग्रह है कि प्रतीक के पीछे मनुष्य को गायब मत कर दीजिए।

यह आग्रह अत्यंत महत्वपूर्ण है। मध्यकालीन साहित्य को केवल धार्मिक प्रतीकों की भाषा में पढ़ना कभी-कभी आलोचक को इतना प्रसन्न कर देता है कि उसे कविता में रोता हुआ मनुष्य दिखाई ही नहीं देता। साही इस सुविधा को तोड़ते हैं।

यहीं उनके सूफी-विमर्श का वास्तविक अर्थ समझ में आता है।

साही जब सूफी संतों की भूमिका को इस्लाम की “बढ़ोत्तरी” से जोड़ते हैं, तो इसे केवल धर्मांतरण की संकीर्ण भाषा में पढ़ना उनकी स्थापना को छोटा करना होगा। धर्म का विस्तार केवल अनुयायियों की संख्या बढ़ने से नहीं होता। भाषा, लोककथा, संगीत, खानकाह, आध्यात्मिक शब्दावली, सामाजिक संपर्क और सांस्कृतिक प्रतिष्ठा के माध्यम से भी कोई धार्मिक परंपरा नए समाज में अपनी उपस्थिति विस्तृत करती है।

इस अर्थ में सूफी आंदोलन ने भारतीय समाज में इस्लामी आध्यात्मिक संस्कृति की पहुँच को व्यापक बनाया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर सूफी संत को केवल प्रचारक मान लिया जाए। सूफी परंपरा में आध्यात्मिक साधना, प्रेम, ईश्वरानुभूति, आत्मसंघर्ष और लोकसंपर्क सभी थे। साही का प्रश्न इन सबको नकारना नहीं, बल्कि यह पूछना है कि इनकी ऐतिहासिक भूमिका को केवल “उदार समन्वय” कहकर क्यों समाप्त कर दिया जाए।

यहीं साही का एक दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष सामने आता है।

वे हमें यह समझने के लिए बाध्य करते हैं कि धार्मिक उदारता और धार्मिक विस्तार एक-दूसरे के विरोधी नहीं होते।

किसी धार्मिक परंपरा का विस्तार तलवार से ही हो, यह आवश्यक नहीं। प्रेम, संत-परंपरा, लोकभाषा और सांस्कृतिक संपर्क भी किसी धार्मिक संसार को अधिक व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता दे सकते हैं। यदि ऐसा हुआ, तो उसे ऐतिहासिक तथ्य की तरह स्वीकार करना चाहिए, न कि आधुनिक भावनाओं के कारण उससे बचना चाहिए।

लेकिन इसके साथ दूसरी आधी सच्चाई भी उतनी ही आवश्यक है: भारतीय समाज ने जिन धार्मिक परंपराओं को ग्रहण किया, उन्हें ज्यों-का-त्यों स्वीकार नहीं किया। उन्हें स्थानीय भाषा, लोकविश्वास और भारतीय जीवनानुभव ने बदला। इसीलिए भारतीय सांस्कृतिक इतिहास को एकतरफा प्रसार की कहानी बनाना भी गलत होगा।

यहीं जायसी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

जायसी केवल इस्लामी सांस्कृतिक प्रभाव के वाहक नहीं हैं; वे उस प्रभाव के भारतीय रूपांतरण के महान रचनाकार हैं। उनकी भाषा, कथा और संवेदना में ऐसा सांस्कृतिक संश्लेषण बनता है जो किसी एक धार्मिक पहचान में समाप्त नहीं होता।

इसलिए जायसी को “सूफी” कहना सही है, लेकिन “केवल सूफी” कहना गलत है।

उन्हें मुस्लिम कवि कहना ऐतिहासिक सत्य है, लेकिन उनकी कविता को केवल मुस्लिम चेतना का दस्तावेज मान लेना आलोचनात्मक भूल है।

उन्हें भारतीय कवि कहना आवश्यक है, लेकिन भारतीय कहकर उनके इस्लामी-सूफी सांस्कृतिक स्रोतों को मिटा देना भी उतनी ही बड़ी भूल होगी।

साही का महत्व इसी संतुलन को संभव बनाने में है।

यहाँ खुसरो और जायसी की तुलना फिर निर्णायक बनती है।

खुसरो और जायसी दोनों मुस्लिम सांस्कृतिक संसार से आते हैं। दोनों के सामने भारतीय समाज है। दोनों की रचनाओं में भारतीय जीवन के अनेक संकेत मिलते हैं। फिर भी इतिहास और सत्ता के प्रश्न पर उनकी दृष्टियाँ समान नहीं दिखाई देतीं। यही साही की खोज है।

इस खोज का परिणाम बहुत गहरा है: सांस्कृतिक समन्वय का दावा कवि को आलोचना से मुक्त नहीं करता।

यदि कोई कवि दूसरी संस्कृति की भाषा, संगीत और लोकजीवन से प्रेम करता है, तो यह उसकी बड़ी उपलब्धि है। लेकिन जब वही कवि सत्ता की हिंसा के सामने खड़ा होता है, तब उसकी वास्तविक मानवीय दृष्टि की परीक्षा होती है।

यहीं साही खुसरो को कठघरे में खड़ा करते हैं।

लेकिन उनका लक्ष्य खुसरो को गिराना नहीं है। उनका लक्ष्य उस आसान समीकरण को तोड़ना है जिसमें “सूफी = उदार”, “हिंदवी = समन्वय”, “दरबारी कवि = सांस्कृतिक प्रतिनिधि” जैसे निष्कर्ष पहले से तैयार मिल जाते हैं।

साही कहते हैं, रचना को देखिए।

इतिहास को देखिए।

कवि की स्थिति को देखिए।

फिर निर्णय कीजिए।

यही आलोचना है।

यही वह जगह है जहाँ साही की आलोचना आज की अनेक वैचारिक आलोचनाओं से अधिक साहसी दिखाई देती है। वे किसी विचारधारा के तैयार निष्कर्ष को रचना पर आरोपित नहीं करते। वे रचना के भीतर से प्रश्न पैदा करते हैं। चित्तौड़ उनके लिए केवल इतिहास का प्रसंग नहीं है; वह कवि की नैतिक दृष्टि की परीक्षा है।

इसलिए साही की दृष्टि में जायसी की महानता का एक कारण यह है कि वे पराजित पक्ष की मानवीय पीड़ा को देख पाते हैं। वे विजेता की शक्ति से सम्मोहित होकर मनुष्य की हार को उत्सव में नहीं बदलते। यही वह जगह है जहाँ जायसी की काव्यात्मक स्वतंत्रता चमकती है।

और यही खुसरो के संदर्भ में साही का प्रश्न कठोर बन जाता है।

यदि खुसरो सत्ता के अत्यंत निकट थे, तो क्या उनकी काव्य-दृष्टि भी उस सत्ता से प्रभावित हुई? यदि हुई, तो सांस्कृतिक समन्वय के उनके अन्य योगदानों के बावजूद क्या उस प्रभाव की आलोचना नहीं की जानी चाहिए?

साही का उत्तर आलोचना के पक्ष में है।

यहाँ किसी कवि की सम्पूर्ण प्रतिभा को नकारना उद्देश्य नहीं है। बल्कि यह समझना उद्देश्य है कि एक महान कवि भी इतिहास के किसी क्षण में सत्ता के साथ खड़ा हो सकता है। प्रतिभा नैतिक निर्दोषता की गारंटी नहीं होती।

यह विचार हिंदी आलोचना में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

क्योंकि हम अक्सर अपने प्रिय कवियों को मनुष्य से देवता बना देते हैं। फिर देवता की आलोचना असंभव हो जाती है। साही इस मूर्तिपूजा को तोड़ते हैं।

उनके लिए खुसरो महान हो सकते हैं, लेकिन आलोचना से ऊपर नहीं।

जायसी मुस्लिम हो सकते हैं, लेकिन उनकी कविता मुस्लिम पहचान में समाप्त नहीं।

सूफी महान संत हो सकते हैं, लेकिन उनका ऐतिहासिक प्रभाव आलोचना से बाहर नहीं।

यही साही का प्रस्थान-बिंदु है।

और इसी बिंदु पर उनकी आलोचना को एक व्यापक भारतीय आलोचना-पद्धति के रूप में देखा जा सकता है।

भारतीय साहित्य की परंपरा में कोई कथा एक ही धार्मिक समुदाय की निजी संपत्ति नहीं रही। रामकथा अनेक भाषाओं में गई, बुद्धकथा अनेक संस्कृतियों में गई, कृष्णकथा अनेक सामाजिक समूहों में रूपांतरित हुई। परंपरा यहाँ स्थिर वस्तु नहीं, सतत पुनर्रचना है। इसलिए जायसी की ‘पद्मावत’ को भी किसी एक सांस्कृतिक स्रोत का स्वामित्व-पत्र नहीं बनाया जा सकता।

लेकिन बहुलता का अर्थ इतिहास-विस्मृति भी नहीं है।

जायसी को भारतीय कहने का अर्थ यह नहीं कि उनके इस्लामी सांस्कृतिक स्रोत अप्रासंगिक हो जाएँ। और उन्हें मुस्लिम या सूफी कहने का अर्थ यह नहीं कि उनकी भारतीय काव्यात्मक अनुभूति समाप्त हो जाए।

भारतीय आलोचना की वास्तविक शक्ति इसी दोहरे सत्य को एक साथ पकड़ने में है।

एक ओर स्रोतों की पहचान।

दूसरी ओर रचना की स्वायत्तता।

एक ओर इतिहास।

दूसरी ओर काव्य।

एक ओर धर्म।

दूसरी ओर मनुष्य।

साही का जायसी-विमर्श इसी तनाव को रचनात्मक आलोचना में बदलता है।

यही कारण है कि साही की आलोचना को केवल “जायसी की व्याख्या” कहना पर्याप्त नहीं। यह हिंदी आलोचना में आलोचक की स्वतंत्रता का भी घोष है।

साही हमें बताते हैं कि आलोचना का काम पहले से बनी प्रतिष्ठाओं की रक्षा करना नहीं है। आलोचना का काम प्रश्न करना है।

यदि खुसरो को सांस्कृतिक समन्वय का महान प्रतीक माना गया है, तो प्रश्न कीजिए कि सत्ता के प्रसंग में उनकी दृष्टि क्या है।

यदि सूफियों को उदार संत माना गया है, तो प्रश्न कीजिए कि उनके धार्मिक-सामाजिक प्रभाव का ऐतिहासिक अर्थ क्या है।

यदि जायसी को सूफी कवि कहा गया है, तो प्रश्न कीजिए कि क्या उनकी कविता केवल सूफी रूपक में समाप्त हो जाती है।

यदि ‘पद्मावत’ को प्रेमाख्यान कहा गया है, तो प्रश्न कीजिए कि उस प्रेम के भीतर सत्ता, हिंसा, स्त्री, युद्ध और मृत्यु के प्रश्न कैसे प्रवेश करते हैं।

यही प्रश्न साहित्य को जीवित रखते हैं।

साही की आलोचना का सबसे महत्त्वपूर्ण पाठ यह है कि कवि को उसके इतिहास से काटना भी गलत है और उसके इतिहास में कैद कर देना भी।

जायसी को समझने के लिए सूफी परंपरा आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं।

खुसरो को समझने के लिए उनकी सूफी पहचान आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं।

दोनों को समझने के लिए उनकी काव्य-दृष्टि, सत्ता से उनका संबंध और मनुष्य के प्रति उनकी संवेदना देखनी होगी।

यहीं से एक नई भारतीय आलोचना का मार्ग खुलता है।

ऐसी आलोचना जो न तो धार्मिक पहचान से भयभीत हो और न उससे मोहित।

जो सांस्कृतिक समन्वय का सम्मान करे, लेकिन उसके भीतर छिपी सत्ता-संरचनाओं पर प्रश्न उठाने से न डरे।

जो सूफी परंपरा की आध्यात्मिक गरिमा को स्वीकार करे, लेकिन उसके ऐतिहासिक प्रभाव का अध्ययन भी करे।

जो जायसी की सूफी पृष्ठभूमि को स्वीकार करे, लेकिन उनकी कविता को सूफी सिद्धांत का फुटनोट न बनाए।

और जो खुसरो की असाधारण प्रतिभा को स्वीकार करते हुए भी उनके दरबारी इतिहास-दृष्टि की आलोचना करने का साहस रखे।

इस अर्थ में साही की आलोचना न तो खुसरो-विरोध है, न सूफी-विरोध और न ही किसी धर्म-विरोध की परियोजना। यह आलोचनात्मक स्वाधीनता की परियोजना है।

उनका प्रस्थान-बिंदु इसी स्वतंत्रता में है।

उन्होंने साहित्यिक प्रतिष्ठाओं से पूछा: तुम्हारे पास प्रमाण क्या है?

उन्होंने धार्मिक व्याख्याओं से पूछा: कविता कहाँ है?

उन्होंने सांस्कृतिक समन्वय की धारणाओं से पूछा: सत्ता के सामने तुम्हारी मनुष्यता कहाँ है?

और उन्होंने जायसी से पूछा: तुम्हारे भीतर वह कौन-सा कवि है जो तुम्हारी धार्मिक पहचान से बड़ा होकर बोलता है?

यही प्रश्न ‘पद्मावत’ को फिर से पढ़ने का कारण बनता है।

जायसी की कविता में इस्लामी स्मृति है, सूफी संकेत हैं, भारतीय लोक-संसार है, प्रेम है, विरह है, सत्ता है, हिंसा है और मृत्यु है। इन सबको हटाकर जायसी को शुद्ध बनाने की आवश्यकता नहीं। बल्कि इन सबको साथ रखकर देखना होगा कि कविता किस प्रकार इन स्रोतों का अतिक्रमण करती है और अपना स्वतंत्र संसार बनाती है।

साही का सबसे बड़ा योगदान यही है कि उन्होंने इस स्वतंत्र संसार की ओर हमारा ध्यान खींचा।

उनकी आलोचना हमें यह भी सिखाती है कि किसी धार्मिक परंपरा का मूल्यांकन उसके अनुयायियों की संख्या से नहीं, उसके भीतर पैदा हुई मानवीय और काव्यात्मक संभावनाओं से भी होना चाहिए; लेकिन उसके ऐतिहासिक प्रभाव को छिपाकर उसे केवल उदारता का पर्याय बना देना भी आलोचना नहीं है।

इसलिए साही को पढ़ते हुए अंतिम निष्कर्ष यही बनता है:

सूफी परंपरा ने इस्लाम की सांस्कृतिक पहुँच बढ़ाई, लेकिन भारतीय समाज ने उसी प्रक्रिया में सूफी परंपरा को भी बदला। खुसरो ने सत्ता के निकट रहकर असाधारण सांस्कृतिक कृतियाँ दीं, लेकिन इससे उनकी इतिहास-दृष्टि आलोचना से मुक्त नहीं होती। जायसी सूफी सांस्कृतिक संसार से आते हैं, लेकिन ‘पद्मावत’ उस संसार की सीमा में समाप्त नहीं होती।

और इस पूरे परिदृश्य में साही का वास्तविक प्रस्थान-बिंदु यही है कि वे हमें किसी एक सरल निष्कर्ष पर पहुँचने नहीं देते।

वे हमें इतिहास के भीतर कविता खोजने को कहते हैं और कविता के भीतर इतिहास।

वे हमें धर्म के भीतर मनुष्य देखने को कहते हैं और मनुष्य के भीतर उसकी सांस्कृतिक स्मृति।

वे हमें खुसरो की महानता स्वीकार करते हुए उनकी आलोचना करने की स्वतंत्रता देते हैं और जायसी की धार्मिक पृष्ठभूमि स्वीकार करते हुए उनकी काव्यात्मक स्वायत्तता को पहचानने की दृष्टि देते हैं।

यही साही की सबसे बड़ी देन है।

कविता को उसकी परंपरा में रखिए, परंपरा में कैद मत कीजिए। इतिहास को समझिए, इतिहास को कविता का पर्याय मत बनाइए। धार्मिक पहचान को स्वीकारिए, लेकिन उसे काव्य का अंतिम अर्थ मत मानिए। और किसी महान कवि को इतना महान भी मत बना दीजिए कि उससे प्रश्न करना अपराध हो जाए।

साही की आलोचना का प्रस्थान-बिंदु इसी स्वतंत्रता में है।

और यही स्वतंत्रता आज की भारतीय आलोचना की सबसे बड़ी आवश्यकता भी है।


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