— परिचय दास —
राजनीति का अपना एक दृश्य संसार है। उसमें सभाएँ हैं, भाषण हैं, यात्राएँ हैं, घोषणाएँ हैं और जनसमर्थन के अनेक रूप हैं। इस संसार में व्यक्ति की उपस्थिति प्रायः उसकी आवाज़, उसके पद और उसके प्रभाव से आँकी जाती है। किंतु राजनीति का एक अदृश्य संसार भी होता है, जहाँ विचार जन्म लेते हैं, सिद्धांत आकार ग्रहण करते हैं और मनुष्य अपने समय के प्रश्नों से मुठभेड़ करता है। दृश्य संसार तत्काल आकर्षित करता है, अदृश्य संसार धीरे-धीरे अपना अर्थ खोलता है। इतिहास में कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनकी पहचान उनके पदों या राजनीतिक सफलताओं से अधिक उनके विचारों की नैतिक ऊँचाई से बनती है। आचार्य नरेंद्र देव ऐसे ही व्यक्तित्व थे।
आचार्य नरेंद्र देव को याद करना भारतीय राजनीति के उस अध्याय में लौटना है, जहाँ राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने की युक्ति नहीं थी। वह समाज को समझने, मनुष्य की दशा बदलने और न्यायपूर्ण व्यवस्था की कल्पना करने का माध्यम भी थी। उनके लिए विचार कोई सजावटी वस्तु नहीं था, जिसे भाषणों में प्रदर्शित करके अलग रख दिया जाए। विचार जीवन की दिशा निर्धारित करता है। वह बताता है कि समाज में किसके पक्ष में खड़ा होना है, किन असमानताओं को चुनौती देनी है और किस प्रकार की व्यवस्था मनुष्य की गरिमा के अनुकूल हो सकती है।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन ने अनेक प्रकार के व्यक्तित्व निर्मित किए। कुछ ने जनांदोलनों का नेतृत्व किया, कुछ ने संगठन बनाए, कुछ ने वैचारिक धरातल तैयार किया। आचार्य नरेंद्र देव का महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने स्वतंत्रता के प्रश्न को सामाजिक परिवर्तन के प्रश्न से अलग करके नहीं देखा। राजनीतिक स्वतंत्रता आवश्यक थी, लेकिन क्या केवल विदेशी शासन से मुक्ति पा लेने पर समाज स्वतंत्र हो जाता है? क्या गरीबी, शोषण, अशिक्षा और सामाजिक विषमता से घिरा मनुष्य केवल राजनीतिक स्वाधीनता के आधार पर पूर्ण गरिमा प्राप्त कर सकता है? ऐसे प्रश्न उनके चिंतन के केंद्र में थे। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन में वास्तविक परिवर्तन की संभावना भी था।
उसमें मनुष्य के प्रति गहरी चिंता और सामाजिक न्याय की आकांक्षा उपस्थित थी। वे ऐसी व्यवस्था की कल्पना करते थे जिसमें आर्थिक विषमता और शोषण को स्वाभाविक मानकर स्वीकार न कर लिया जाए। समाज के संसाधनों और अवसरों पर कुछ लोगों का एकाधिकार मानवीय गरिमा के विरुद्ध है। समाजवाद का नैतिक आग्रह इसी असमानता को चुनौती देने में निहित है। उनके चिंतन में विचार और संवेदना का यह संबंध विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
राजनीति में विचार की उपस्थिति का अर्थ यह नहीं कि मतभेद समाप्त हो जाएँ। बल्कि विचार ही मतभेदों को सार्थक बनाता है। जब किसी व्यक्ति या दल के पास स्पष्ट वैचारिक आधार होता है, तब असहमति भी तर्क और सिद्धांत के धरातल पर व्यक्त होती है। लोकतंत्र की वास्तविक सुंदरता इसी में है कि अलग-अलग विचार एक-दूसरे के सामने उपस्थित हों, एक-दूसरे की परीक्षा लें और समाज के लिए बेहतर रास्ते खोजें। आचार्य नरेंद्र देव का राजनीतिक जीवन इस बात की याद दिलाता है कि वैचारिक मतभेद को व्यक्तिगत शत्रुता में बदल देना राजनीति की बौद्धिक गरिमा को कम करता है।
आज राजनीति का सार्वजनिक परिदृश्य बहुत अधिक विस्तृत और तीव्र हो गया है। संचार के साधनों ने प्रत्येक वक्तव्य को तत्काल व्यापक बना दिया है। एक क्षण में कही गई बात दूर-दूर तक पहुँच जाती है। राजनीतिक संवाद में तात्कालिक प्रतिक्रिया का महत्त्व बढ़ा है। इस गति के अपने लाभ हैं, लेकिन इसके साथ विचार के लिए आवश्यक ठहराव कम होने का खतरा भी है। किसी प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने के बजाय उसके पक्ष या विपक्ष में तुरंत खड़े हो जाना आसान हो गया है। तर्क की जगह प्रतिक्रिया और संवाद की जगह शोर ले ले, तो राजनीति अपनी वैचारिक जमीन खोने लगती है।
आचार्य नरेंद्र देव का स्मरण इसीलिए वर्तमान के लिए प्रासंगिक है। उनका जीवन हमें विचार की धीमी, किंतु टिकाऊ शक्ति का बोध कराता है। विचार का निर्माण एक दिन में नहीं होता। उसके लिए अध्ययन, अनुभव, आत्मानुशासन और समाज के वास्तविक जीवन से संपर्क आवश्यक है। विचारक अपने समय से केवल सहमति नहीं रखता; वह अपने समय से प्रश्न भी करता है। वह प्रचलित धारणाओं को अंतिम सत्य मानकर स्वीकार नहीं करता। वह उन लोगों की स्थिति पर भी दृष्टि डालता है जिनकी आवाज़ सामान्यतः सार्वजनिक विमर्श में कम सुनाई देती है।
आचार्य नरेंद्र देव की एक महत्त्वपूर्ण पहचान शिक्षाविद् की भी थी। शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण केवल ज्ञानार्जन या रोजगार की तैयारी तक सीमित नहीं था। शिक्षा मनुष्य में विवेक, स्वतंत्र चिंतन और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करती है। विश्वविद्यालय का अर्थ केवल भवन, पाठ्यक्रम और परीक्षाएँ नहीं है। वह विचारों के मिलने, टकराने और विकसित होने का स्थान है। वहाँ प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता होनी चाहिए और असहमति को बौद्धिक विकास की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए। जब शिक्षा केवल सूचना और प्रमाणपत्र तक सिमट जाती है, तब उसका मानवीय उद्देश्य पीछे छूटने लगता है।
आज विश्वविद्यालयों के सामने भी अनेक प्रश्न हैं। ज्ञान की उपयोगिता, रोजगार की आवश्यकता, शोध की गुणवत्ता और शिक्षा की सामाजिक भूमिका पर लगातार विचार हो रहा है। इन प्रश्नों के बीच आचार्य नरेंद्र देव की स्मृति हमें यह सोचने का अवसर देती है कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य किस प्रकार का मनुष्य तैयार करना है। क्या वह केवल प्रतिस्पर्धा में सफल व्यक्ति होगा, अथवा ऐसा नागरिक भी होगा जो समाज की विषमताओं को समझे, अपने समय के प्रश्नों पर विचार करे और दूसरों के अधिकारों के प्रति सजग रहे? शिक्षा का मानवीय पक्ष इसी दूसरे प्रश्न में अधिक स्पष्ट होता है।
आचार्य नरेंद्र देव के व्यक्तित्व का एक आकर्षक पक्ष यह भी है कि वे विचार को जीवन से अलग नहीं रखते थे। राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता का अर्थ केवल किसी मत का समर्थन करना नहीं है। उसका अर्थ है अपने व्यवहार में भी उन मूल्यों के प्रति उत्तरदायी रहना जिनकी सार्वजनिक घोषणा की जाती है। लोकतंत्र, समानता और सामाजिक न्याय की बात करने वाले व्यक्ति से अपेक्षा होती है कि वह अपने आचरण में भी इन मूल्यों का सम्मान करे। विचार की विश्वसनीयता शब्दों से आरंभ होती है, लेकिन आचरण में जाकर ही पूर्ण होती है।
यहाँ उनके स्मरण को किसी बीते हुए समय की आदर्शमयी तस्वीर बनाकर प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। अतीत का सम्मान तभी सार्थक है जब हम उससे अपने वर्तमान के प्रश्नों पर विचार करने की शक्ति प्राप्त करें। हर युग की अपनी चुनौतियाँ होती हैं। आज सामाजिक असमानता के रूप बदल रहे हैं, आर्थिक आकांक्षाएँ बढ़ रही हैं और लोकतांत्रिक संवाद नए माध्यमों से संचालित हो रहा है। इन परिस्थितियों में आचार्य नरेंद्र देव के विचारों को ज्यों का त्यों दोहराना पर्याप्त नहीं। उनके चिंतन की मूल संवेदना को समझकर वर्तमान के संदर्भ में नए प्रश्न उठाना अधिक आवश्यक है।
राजनीति में विचार की प्रतिष्ठा का अर्थ यह भी है कि व्यक्ति अपने विरोधी को सुनने की क्षमता बनाए रखे। लोकतंत्र में कोई भी विचारधारा समाज की संपूर्ण विविधता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती। समाज अनेक अनुभवों, आकांक्षाओं और विश्वासों से मिलकर बनता है। इसलिए राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल अपने समर्थकों को संबोधित करना नहीं, बल्कि उन नागरिकों के प्रति भी उत्तरदायी रहना है जो उससे सहमत नहीं हैं। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी जीवंतता का प्रमाण है। आचार्य नरेंद्र देव का वैचारिक स्मरण हमें इस लोकतांत्रिक शिष्टता की आवश्यकता का बोध कराता है।
समय के साथ राजनीतिक नारों का रंग बदलता है, संगठन बदलते हैं, सत्ता के केंद्र बदलते हैं और सार्वजनिक विमर्श की भाषा भी बदल जाती है। लेकिन मनुष्य की गरिमा, न्याय और समानता के प्रश्न बने रहते हैं। शायद इसी कारण कुछ व्यक्तित्व अपने समय की सीमाओं से आगे निकलकर हमारे वर्तमान में भी उपस्थित रहते हैं। आचार्य नरेंद्र देव ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। उन्हें याद करना किसी राजनीतिक पक्ष के समर्थन या विरोध का अवसर नहीं, बल्कि राजनीति के बौद्धिक और नैतिक आधारों की पड़ताल का अवसर है।
राजनीति जब विचार से संचालित होती है, तब सत्ता साध्य नहीं, समाज-परिवर्तन का साधन बनती है। तब सार्वजनिक जीवन में सफलता का अर्थ केवल पद प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने समय के प्रति कोई सार्थक उत्तरदायित्व निभाना भी होता है। आचार्य नरेंद्र देव की स्मृति इसी संभावना को जीवित रखती है। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना वस्तुतः उस विचारशील राजनीति को याद करना है जिसमें मनुष्य, समाज और न्याय सत्ता की आकांक्षा से बड़े प्रश्न बने रहते हैं। विचार का उजास शायद इसी में है कि वह समय बीत जाने के बाद भी हमारे भीतर प्रश्न जगाता रहे।
।। दो।।
विचार की जड़ें और समाज का नैतिक विवेक
किसी विचार का जन्म केवल पुस्तकों के पन्नों पर नहीं होता। पुस्तकें उसे भाषा देती हैं, अध्ययन उसे विस्तार देता है और तर्क उसे कसौटी प्रदान करता है; लेकिन उसकी वास्तविक जड़ें मनुष्य के जीवन में होती हैं। समाज की विषमताएँ, श्रम की अवमानना, अवसरों का असमान वितरण, मनुष्य की विवशताएँ और न्याय की अधूरी आकांक्षा विचार को भीतर से उद्वेलित करती हैं। जो विचार इन अनुभवों से अपना संबंध बनाए रखता है, वही समय के साथ जीवित रहता है। अन्यथा वह सिद्धांतों की ऐसी बंद कोठरी बन जाता है जिसमें शब्द तो सुरक्षित रहते हैं, लेकिन जीवन की हवा नहीं पहुँचती। आचार्य नरेंद्र देव के चिंतन को समझने के लिए विचार और जीवन के इसी संबंध को पहचानना आवश्यक है।
उनके विचार में आर्थिक शोषण का प्रश्न केंद्रीय था पर मनुष्य की मुक्ति को केवल आर्थिक संबंधों में परिवर्तन तक सीमित नहीं किया जा सकता था। सामाजिक चेतना, शिक्षा, नैतिकता और सांस्कृतिक विवेक भी इस परिवर्तन के आवश्यक पक्ष थे। इसीलिए उनके चिंतन में आर्थिक न्याय के साथ मानवीय गरिमा का आग्रह भी दिखाई देता है।
भारतीय समाज की संरचना में असमानता के अनेक स्तर रहे हैं। आर्थिक विषमता के साथ जातिगत भेदभाव, सामाजिक वंचना और अवसरों की असमानता ने मनुष्य के जीवन को प्रभावित किया है। इन स्थितियों को समझे बिना किसी भी सामाजिक परिवर्तन की कल्पना अधूरी रह जाती है। समाजवाद का प्रश्न केवल यह नहीं कि संपत्ति का वितरण किस प्रकार हो; यह भी है कि समाज में सम्मान, अवसर और अधिकार किस प्रकार वितरित हों। किसी व्यक्ति के पास आजीविका के साधन हों, लेकिन उसे सामाजिक अपमान सहना पड़े, तो उसकी स्वतंत्रता अधूरी है। इसी प्रकार राजनीतिक अधिकार प्राप्त होने पर भी यदि शिक्षा और जीवन की बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच न हो, तो समानता का आदर्श केवल कागज पर रह जाता है।
आचार्य नरेंद्र देव की वैचारिक दृष्टि में नैतिकता का महत्त्व इसी कारण विशेष है। राजनीति यदि केवल हितों के प्रबंधन का कौशल बन जाए, तो उसमें मनुष्य का प्रश्न पीछे छूट सकता है। राजनीतिक संगठन अपने अस्तित्व और प्रभाव के लिए सक्रिय रहते हैं, लेकिन उनका औचित्य इस बात से तय होता है कि वे समाज के व्यापक हितों के प्रति कितने उत्तरदायी हैं। विचारधारा का अर्थ केवल अपने पक्ष के लिए तर्क जुटाना नहीं, बल्कि अपने पक्ष की भी नैतिक समीक्षा करना है। अपने विचारों के प्रति प्रतिबद्ध रहना और अपने विचारों को प्रश्नों से परे मान लेना, दोनों अलग बातें हैं।
समाज का नैतिक विवेक इसी प्रश्नाकुलता से निर्मित होता है। वह किसी एक व्यक्ति, दल या संस्था की संपत्ति नहीं है। समाज के भीतर अनेक आवाजें, अनुभव और दृष्टियाँ होती हैं। कोई विचार तभी व्यापक सामाजिक अर्थ प्राप्त करता है जब वह इन विविध अनुभवों को सुनने और समझने की क्षमता रखता है। आचार्य नरेंद्र देव की राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ लोकतांत्रिक संवाद का महत्त्व इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उनके लिए समाज का परिवर्तन केवल ऊपर से लागू की जाने वाली व्यवस्था का प्रश्न नहीं था; उसमें जनता की चेतना और सहभागिता भी आवश्यक थी।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक परिवर्तन के प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। देश को औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराना ऐतिहासिक आवश्यकता थी, लेकिन स्वतंत्र भारत कैसा होगा, यह प्रश्न भी उतना ही महत्त्वपूर्ण था। क्या स्वतंत्रता के बाद पुरानी विषमताएँ नए रूप में बनी रहेंगी? क्या शासन की भाषा बदल जाने से समाज की संरचना अपने आप बदल जाएगी? क्या राजनीतिक सत्ता का भारतीय हाथों में आ जाना सामान्य मनुष्य के जीवन में सम्मान और अवसर की समानता सुनिश्चित कर देगा? इन प्रश्नों ने उस पीढ़ी के अनेक विचारकों को उद्वेलित किया। आचार्य नरेंद्र देव ने भी स्वतंत्रता को सामाजिक न्याय की व्यापक आकांक्षा से जोड़कर देखा।
उनकी वैचारिक यात्रा में बौद्ध दर्शन के अध्ययन और उसके प्रति अनुराग का भी उल्लेखनीय स्थान था। बौद्ध चिंतन में दुःख की पहचान, करुणा, विवेक और नैतिक अनुशासन के प्रश्न मनुष्य के अस्तित्व को समझने की आधारभूमि प्रदान करते हैं। आचार्य नरेंद्र देव ने बौद्ध दर्शन का गंभीर अध्ययन किया और इस विषय पर महत्त्वपूर्ण लेखन भी किया। उनके बौद्ध अध्ययन को केवल धार्मिक रुचि के रूप में देखना उचित नहीं होगा। उसमें दर्शन के माध्यम से मनुष्य, समाज और नैतिकता को समझने की जिज्ञासा भी उपस्थित थी। विचार की यह व्यापकता उन्हें किसी एक राजनीतिक खाँचे में सीमित होने से बचाती है।
यहाँ एक रोचक प्रश्न उठता है कि राजनीति में नैतिकता का स्थान कहाँ है। क्या नैतिकता केवल व्यक्तिगत जीवन का विषय है, जबकि राजनीति को व्यावहारिक हितों और परिस्थितियों के अनुसार चलना चाहिए? या राजनीति की सफलता का मूल्यांकन भी नैतिक कसौटियों पर होना चाहिए? आचार्य नरेंद्र देव का जीवन और चिंतन दूसरे प्रश्न की ओर हमारा ध्यान ले जाता है। सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का अर्थ यह नहीं कि राजनीति संघर्षों से मुक्त हो जाए। इसका अर्थ है कि संघर्ष के बीच भी मनुष्य की गरिमा, सत्यनिष्ठा और न्याय की मर्यादा नष्ट न हो।
आज जब राजनीतिक विमर्श में तात्कालिक लाभ, चुनावी गणना और सार्वजनिक छवि का प्रभाव बढ़ा हुआ दिखाई देता है, तब विचार की जड़ों की ओर लौटना आवश्यक लगता है। किसी भी राजनीतिक विचार को केवल उसके लोकप्रिय नारों से नहीं समझा जा सकता। उसके पीछे समाज की कैसी कल्पना है, वह व्यक्ति की स्वतंत्रता को कितना महत्त्व देता है, आर्थिक और सामाजिक न्याय के प्रश्नों को किस प्रकार देखता है और असहमति के प्रति उसका व्यवहार कैसा है, इन सबका परीक्षण जरूरी है। विचार का वास्तविक स्वरूप उसकी घोषणाओं से अधिक उसके व्यवहार में दिखाई देता है।
आचार्य नरेंद्र देव का स्मरण हमें यह भी सिखाता है कि वैचारिक गंभीरता का अर्थ कट्टरता नहीं है। विचार के प्रति निष्ठा और विचार के भीतर जिज्ञासा, दोनों साथ रह सकते हैं। जो व्यक्ति अपने सिद्धांतों को गंभीरता से ग्रहण करता है, वह उनसे जुड़े प्रश्नों से भागता नहीं। वह समय के अनुभवों के आलोक में अपने निष्कर्षों की समीक्षा करता है। समाज बदलता है, इसलिए समाज को समझने की भाषा और पद्धति भी विकसित होनी चाहिए। विचार की जीवंतता इसी विकासशीलता में निहित है।
आखिरकार राजनीति का नैतिक विवेक किसी पुस्तक, घोषणा-पत्र या भाषण में सुरक्षित रखी हुई वस्तु नहीं है। वह उस व्यवहार में प्रकट होता है जिसमें कमजोर की आवाज सुनी जाती है, असहमति को जगह मिलती है, सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग न्यायपूर्ण ढंग से होता है और सत्ता स्वयं को प्रश्नों से ऊपर नहीं मानती। आचार्य नरेंद्र देव की वैचारिक विरासत हमें इसी व्यापक अर्थ में समाजवाद, लोकतंत्र और नैतिकता के संबंध पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। विचार की जड़ें तभी गहरी होती हैं जब वे समाज की मिट्टी से जुड़ी रहें; और उनका विस्तार तभी संभव है जब उनमें मनुष्य के लिए पर्याप्त करुणा, न्याय और स्वतंत्रता का आकाश हो।
।। तीन।।
शिक्षा : मनुष्य के भीतर विचार का निर्माण
शिक्षा का संबंध केवल जानने से नहीं, समझने से है। जानकारियाँ मनुष्य की स्मृति को समृद्ध करती हैं, लेकिन समझ उसके विवेक को आकार देती है। कोई व्यक्ति अनेक विषयों का ज्ञान रख सकता है, अनेक परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर सकता है और प्रतिष्ठित उपाधियाँ प्राप्त कर सकता है, फिर भी यह आवश्यक नहीं कि उसमें जीवन को देखने की उदार दृष्टि विकसित हो गई हो। शिक्षा की वास्तविक उपलब्धि तब दिखाई देती है जब ज्ञान मनुष्य को अपने समय, समाज और अपने भीतर उपस्थित प्रश्नों के प्रति अधिक सजग बनाता है। वह केवल संसार में अपना स्थान बनाने की कला नहीं सिखाती, संसार को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी का बोध भी कराती है।
आचार्य नरेंद्र देव का व्यक्तित्व शिक्षा और विचार के इसी गहरे संबंध की याद दिलाता है। वे केवल राजनीतिक चिंतक और समाजवादी नेता नहीं थे, बल्कि गंभीर अध्येता, विद्वान और शिक्षाविद् भी थे। भारतीय इतिहास, दर्शन और बौद्ध चिंतन के प्रति उनकी रुचि उनके व्यापक बौद्धिक संसार का परिचय देती है। उनके व्यक्तित्व में अध्ययन और सार्वजनिक जीवन का जो संबंध दिखाई देता है, वह इस धारणा को बल देता है कि राजनीति को विचारवान बनाने के लिए शिक्षा और बौद्धिक अनुशासन की आवश्यकता होती है। बिना अध्ययन के राजनीति तत्कालीन परिस्थितियों की प्रतिक्रिया तो बन सकती है, लेकिन समाज के भविष्य की कल्पना करने में कठिनाई अनुभव करती है।
शिक्षा का एक उद्देश्य मनुष्य को प्रश्न करना सिखाना है। प्रश्न करने वाला विद्यार्थी केवल उत्तरों का संग्रह नहीं करता, वह उत्तरों के पीछे छिपी धारणाओं को भी समझना चाहता है। वह यह जानना चाहता है कि किसी विचार का आधार क्या है, किसी व्यवस्था का औचित्य किसमें है और किसी सामाजिक परंपरा का वर्तमान जीवन से संबंध कैसा है। प्रश्न पूछने की यह क्षमता ही स्वतंत्र चिंतन का आरंभ है। जिस शिक्षा में प्रश्नों के लिए जगह नहीं होती, वहाँ ज्ञान धीरे-धीरे अनुकरण में बदल सकता है। विद्यार्थी स्मरण तो कर सकता है, लेकिन विचार करने का साहस खो सकता है।
आचार्य नरेंद्र देव की वैचारिक दुनिया में अध्ययन का महत्त्व इसी व्यापक अर्थ में समझा जाना चाहिए। उनका बौद्ध दर्शन का गंभीर अध्ययन इस बात का उदाहरण है कि विचारक किसी एक अनुशासन या राजनीतिक आग्रह की सीमाओं में स्वयं को बंद नहीं रखता। दर्शन, इतिहास और समाज के प्रश्न एक-दूसरे से संवाद करते हैं। बौद्ध चिंतन में दुःख, करुणा, नैतिकता और प्रज्ञा के प्रश्न हैं; उनके चिंतन में शोषण, समानता और न्याय के प्रश्न हैं। इन दोनों के बीच संबंधों को समझने के लिए गहरी अध्ययनशीलता चाहिए। आचार्य नरेंद्र देव के बौद्ध अध्ययन ने उनके बौद्धिक व्यक्तित्व को एक विशिष्ट विस्तार दिया।
शिक्षा और संस्कृति का संबंध भी अत्यंत निकट है। संस्कृति केवल अतीत की स्मृतियों, परंपराओं और उत्सवों का संचय नहीं है। वह मनुष्य की जीवन-दृष्टि, उसकी संवेदना, उसकी भाषा और उसके सामाजिक व्यवहार में निरंतर निर्मित होती रहती है। शिक्षा जब संस्कृति से संवाद करती है, तब वह अतीत को केवल गौरवगान का विषय नहीं बनाती, बल्कि उसकी उपलब्धियों और सीमाओं दोनों को समझने की दृष्टि देती है। परंपरा का सम्मान उसके प्रश्नों से बचना नहीं, बल्कि उसे विवेक के साथ ग्रहण करना है। जो समाज अपनी सांस्कृतिक स्मृति से कट जाता है, वह अपनी पहचान के अनेक स्रोत खो देता है; और जो समाज स्मृति को ही अंतिम सत्य मान लेता है, वह नए अनुभवों के लिए अपने द्वार बंद कर सकता है।
आचार्य नरेंद्र देव के विचारों में भारतीय बौद्धिक परंपरा के अध्ययन और आधुनिक सामाजिक प्रश्नों के प्रति सजगता का सहअस्तित्व दिखाई देता है। यह सहअस्तित्व आज भी महत्त्वपूर्ण है। आधुनिक शिक्षा का अर्थ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से विमुख होना नहीं है, और सांस्कृतिक चेतना का अर्थ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से दूरी बनाना भी नहीं। शिक्षा का स्वस्थ स्वरूप इन दोनों के बीच संवाद स्थापित करता है। वह विद्यार्थी को अपनी विरासत से परिचित कराता है, लेकिन उसे विरासत का बंदी नहीं बनाता। वह उसे दुनिया के नए विचारों से जोड़ता है, लेकिन अपनी सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों को भूलने नहीं देता।
विश्वविद्यालय इस संवाद के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण संस्थाओं में हैं। उनका दायित्व केवल पाठ्यक्रम पूरा कराना और परीक्षाएँ आयोजित करना नहीं है। विश्वविद्यालय समाज की बौद्धिक चेतना के निर्माण में भाग लेते हैं। वहाँ ज्ञान का सृजन होता है, पुराने निष्कर्षों की समीक्षा होती है और नए प्रश्नों को स्वर मिलता है। शिक्षक का कार्य केवल पाठ्यपुस्तक की सामग्री समझाना नहीं, विद्यार्थी के भीतर जिज्ञासा और विवेक की लौ जगाना भी है। जब विश्वविद्यालय में विचारों की विविधता, अध्ययन की स्वतंत्रता और तर्कपूर्ण असहमति के लिए पर्याप्त जगह होती है, तब वह समाज के भविष्य को अधिक व्यापक बनाता है।
आचार्य नरेंद्र देव का शिक्षाविद् रूप हमें इस बात पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है कि शिक्षा और राजनीति के बीच संबंध कैसा होना चाहिए। राजनीति शिक्षा को दिशा देने वाली नीतियाँ बना सकती है, संसाधन उपलब्ध करा सकती है और संस्थागत ढाँचा विकसित कर सकती है; लेकिन शिक्षा की बौद्धिक स्वतंत्रता को संकुचित करना उसका उद्देश्य नहीं हो सकता। शिक्षा का क्षेत्र प्रश्नों, तर्कों और नए निष्कर्षों के लिए खुला रहना चाहिए। किसी भी विचार को केवल इसलिए स्वीकार या अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए कि वह किसी प्रभावशाली सत्ता, संगठन या समूह के अनुकूल है या प्रतिकूल। ज्ञान की अपनी कसौटियाँ होती हैं और उनका सम्मान ही विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा का आधार है।
आज शिक्षा के सामने रोजगार, तकनीकी दक्षता, शोध, कौशल-विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी अनेक चुनौतियाँ हैं। इनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। लेकिन यदि शिक्षा को केवल रोजगार प्राप्त करने की तैयारी मान लिया जाए, तो मनुष्य-निर्माण का उसका व्यापक उद्देश्य पीछे छूट जाएगा। समाज को कुशल इंजीनियर, चिकित्सक, वैज्ञानिक, प्रशासक और उद्यमी चाहिए, लेकिन उसे ऐसे नागरिक भी चाहिए जो न्याय और अन्याय के बीच अंतर कर सकें, सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी निभा सकें और दूसरे मनुष्य की गरिमा का सम्मान कर सकें। दक्षता जीवन को साधन देती है, विवेक उसे दिशा देता है।
शिक्षा का मानवीय पक्ष समान अवसरों के प्रश्न से भी जुड़ा है। जिस समाज में आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण बच्चों की शैक्षिक संभावनाएँ अलग-अलग हों, वहाँ केवल समान पाठ्यक्रम घोषित कर देना पर्याप्त नहीं। शिक्षा तक पहुँच, उसकी गुणवत्ता और आगे बढ़ने के अवसरों में न्याय सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। प्रतिभा किसी एक वर्ग, परिवार या क्षेत्र की संपत्ति नहीं होती। उसे विकसित होने के लिए अनुकूल वातावरण चाहिए। शिक्षा की लोकतांत्रिक भूमिका इसी में है कि वह जन्म और परिस्थिति से निर्मित बाधाओं को कम करे तथा अधिकाधिक लोगों के लिए ज्ञान के द्वार खोले।
आचार्य नरेंद्र देव को याद करते हुए शिक्षा की चर्चा इसलिए भी जरूरी है कि उनके चिंतन में सामाजिक परिवर्तन और बौद्धिक चेतना के प्रश्न एक-दूसरे से अलग नहीं थे। समाज में परिवर्तन केवल कानूनों और संस्थाओं के माध्यम से नहीं आता; उसके लिए मनुष्य की सोच में भी परिवर्तन आवश्यक है। शिक्षा इस परिवर्तन की आधारभूमि तैयार करती है। वह व्यक्ति को केवल अपने हित के बारे में नहीं, सामूहिक जीवन के बारे में भी सोचने की क्षमता देती है। वह अधिकारों का बोध कराती है और कर्तव्यों की समझ भी विकसित करती है।
शिक्षा का सबसे सुंदर परिणाम शायद यही है कि वह मनुष्य को थोड़ा अधिक मनुष्य बनाती है। उसके भीतर जिज्ञासा हो, लेकिन अहंकार नहीं; ज्ञान हो, लेकिन दूसरों के अनुभवों के प्रति उपेक्षा नहीं; अपनी संस्कृति के प्रति आत्मीयता हो, लेकिन अन्य संस्कृतियों के प्रति संकीर्णता नहीं। आचार्य नरेंद्र देव का स्मरण हमें शिक्षा के इसी व्यापक अर्थ की ओर लौटाता है। विश्वविद्यालयों की इमारतें समय के साथ बदल सकती हैं, पाठ्यक्रमों की भाषा बदल सकती है और ज्ञान के साधन नए हो सकते हैं, लेकिन शिक्षा का मूल प्रश्न बना रहेगा: हम कैसी चेतना का निर्माण कर रहे हैं? क्योंकि अंततः किसी समाज की सबसे बड़ी पूँजी उसके भवन, उपकरण या प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि वे विचारशील मनुष्य हैं जो अपने समय को समझने और उसे अधिक न्यायपूर्ण बनाने का साहस रखते हैं।
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