चंद्रशेखर : प्रेरणादायक समाजवादी नेता

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Politician Chandrashekhar

Randhir K Gautam

— Randhir Gautam —

हान व्यक्तित्व की खासियत होती है कि वह एक प्रतीक बन जाता है, और उस प्रतीक में उच्च मानवीय मूल्य, विचार और प्रेरणा की असीम ऊर्जा अंतर्निहित रहती है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के विद्यार्थी जीवन से ही चंद्रशेखर जी की रुचि राजनीति और सामाजिक परिवर्तन की सोच में हो गई थी। बलिया की धरती से उन्होंने बगावत और संघर्ष के स्वरों को अपने संस्कार में हमेशा जीवंत रखा। समाजवादी आंदोलन के प्रभाव में आकर वह युवाओं, किसानों, भूमिहीनों, हाशिए पर पड़े लोगों और समाज के उपेक्षित वर्गों की आवाज़ को अपनी राजनीति के केंद्र में लाए । साथ ही, ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने का सपना उन्हें राजनीति में परिवर्तन और परिवर्तन की राजनीति के लिए हमेशा बेचैन करता रहा।

किसी जननेता को सफल बनाने के लिए उसमें चार बुनियादी तत्व होने जरूरी हैं। पहली, उसकी छवि; दूसरी, उसके सहयोग में लगे समर्पित और सही विचार वाले साथी; तीसरी, समय की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ; और चौथी, वह राजनीतिक परंपरा, जिससे वह स्वयं को प्रस्तुत करता है। चंद्रशेखर जी इन चारों कसौटियों पर एक ऐसे नेता के रूप में जाने जाते हैं, जिन्होंने समाजवादी स्वर, ऊर्जा और संवेदना को मूर्त रूप दिया।

इसके साथ ही, कुछ निराधार मूल्यांकन भी ऐसे होते हैं, जो किसी नेता की छवि को हमेशा के लिए धूमिल करने की कोशिश करते रहते हैं। उदाहरण के लिए, चंद्रशेखर जी पर कुछ लोगों ने यह आरोप लगाया कि उन्होंने वी. पी. सिंह की सरकार गिरा दी। यह दोष चंद्रशेखर जी पर लगाना न सिर्फ गलत है, बल्कि अन्यायपूर्ण भी है, क्योंकि चंद्रशेखर जी अपने निजी जीवन में जाति-विरोधी और जातिवाद-विरोधी थे। वह हमेशा अंतरजातीय विवाह और प्रेम विवाह को प्रोत्साहित भी किया करते थे। और एक सच्चे समाजवादी की तरह चंद्रशेखर जी हमेशा जातिवादी स्वरों को कमजोर करते रहे। यूँ कहें कि उनकी जाति समाजवादी थी। उनके भीतर स्वजाति के प्रति आत्मीयता अवश्य थी, लेकिन जाति के नाम पर होने वाली हिंसा और कुप्रथाओं के वह सख्त विरोधी थे।
उदाहरण के तौर पर, राजस्थान में जब सती प्रथा के विरोध का प्रश्न उठा, तो चंद्रशेखर जी ने एक सच्चे नारीवादी समाजवादी की तरह संकीर्ण राजनीतिक प्रवृत्तियों को न सिर्फ चुनौती दी, बल्कि उनका प्रतिकार भी किया। रूपकंवर के मामले में उन्होंने उस समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री को बुलाकर डाँट-फटकार भी लगाई। ऐसे अनेक उदाहरण चंद्रशेखर जी ने प्रस्तुत किए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लोगों ने वी .पी. सिह की असफलता को चंद्रशेखर जी के कथित कुर्सी-लालच से अन्यायपूर्ण तरीके से जोड़कर देखा।
चंद्रशेखर जी सांप्रदायिकता के खिलाफ भी हमेशा लड़ते रहे। संकीर्ण विचारधाराओं के प्रति उनका प्रतिरोध बना रहता था; इसमें दक्षिणपंथी विचारधारा भी आती थी और कम्युनिस्टिक सोच भी। चंद्रशेखर जी उन पहले व्यक्तियों में थे, जिन्होंने स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने का विरोध किया था। चंद्रशेखर जी हमेशा सत्ता को अपने जूते की नोक पर रखते थे। उन्होंने यह बात आपातकाल के दौर में साबित की। आपातकाल से पहले भी वह इंदिरा गांधी से दो-दो बार टकराए थे—नैतिकता के सवाल पर, न्याय के सवाल पर।

वह अकेले नेता थे, जिन्होंने सबसे पहले स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने की आलोचना की थी, क्योंकि वे हमेशा मानते थे कि संवाद और बातचीत के द्वारा शांतिपूर्ण तरीके से आंतरिक समस्याओं का हल ढूँढा जा सकता है। प्रोफेसर रामचंद्र प्रधान बताते थे कि चंद्रशेखर जी ने एक समय बाबरी मस्जिद की समस्या का हल भी लगभग खोज लिया था, लेकिन एक पूर्व प्रधानमंत्री के दखल से पूरी शांति-वार्ता और समझौता टूट गया।

जब शहाबुद्दीन ने बाबरी मस्जिद के बाद भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं और स्वतंत्रता संग्राम के समारोहों के बहिष्कार की बात कही, तो उस समय चंद्रशेखर जी ने इस पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की और कहा कि इस प्रक्रिया से हिंदू-मुस्लिम के बीच खाई बढ़ेगी। उनकी बात को लोगों ने माना। हिंदू-मुस्लिम के बीच खाई पैदा करने वाले हर विचार को वह भारत के विचार के विरोध के रूप में देखते थे। इसलिए वे मनुष्य-विरोधी और हिंसा की राजनीति को हमेशा चुनौती देते रहे।

चंद्रशेखर जी के छह महीने के कार्यकाल में एक निष्पक्ष राजनीतिक प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति देखी गई। अपने प्रतिद्वंद्वियों की राजनीति को समझते हुए भी उन्होंने शरद पवार, फारूक अब्दुल्ला और राजीव गांधी जैसे नेताओं के साथ संवाद का मार्ग अपनाया। इन सब सामाजिक परिवर्तनकारी स्वरों के बावजूद भी कुछ लोगों ने उन पर कलंक लगाने की कोशिश की, जो पूर्णतः असफल रही। वे चंद्रमा की तरह चमकते रहे—एक शीतल प्रकाश की तरह, जो घनघोर अंधेरे में भी देखने की शक्ति देता है।
भारत यात्रा का प्रयोजन
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जितने भी महान नेता हुए हैं, उन्होंने भारत की खोज के लिए पदयात्राएँ और यात्राएँ की हैं। स्वामी विवेकानंद, गांधीजी से होते हुए यह परंपरा चंद्रशेखर की पदयात्रा तक आती है। भारत यात्रा के दौरान उनके अंदर जबरदस्त आत्मविश्वास था कि नई पीढ़ी को राजनीति में अवसर देकर भविष्य की राजनीति को आधार और विस्तार देने की जरूरत है।
समाजवादी आंदोलन के विखंडन और समाजवादी नेताओं के एक साथ टिक न पाने के अनुभव ने उन्हें नई ऊर्जा के साथ नए संगठन की बुनियाद बनाने का मार्ग दिखाया।

एक महान नेतृत्व की खासियत होती है कि वह अपने जीवन में उस विरासत को, जो उसे अतीत से मिली है, भविष्य तक संवर्धित और सुरक्षित करने की साधना भी करता है। आज भी सैकड़ों की संख्या में चंद्रशेखर जी के प्रशंसक समाज-सेवा के विभिन्न कार्यों में लगे है जिनमें से कुछ राजनीति में भी सक्रिय हैं और उनके साथ के अपने अनुभवों से बहुत प्रेरणा पाते हैं। संगठन निर्माण के लिए उन्होंने 15 भारत यात्रा केंद्र जैसे विचार-केंद्र बनाए (Kerala, Tamil Nadu, Karnataka, Maharashtra, Madhya Pradesh, Gujarat, Uttar Pradesh और Haryana), जहाँ सैकड़ों लोग प्रशिक्षित हुए। उनके विचार केंद्र यात्रा से प्रशिक्षित युवाओं ने न केवल सामाजिक-राजनीतिक जीवन को, बल्कि पारिवारिक और व्यक्तिगत जीवन को भी अनुशासित किया और रामकृष्ण हेगड़े, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और नीतीश कुमार जैसे नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचे। चंद्रशेखर जी की राजनीति पक्ष और विपक्ष के बजाय निष्पक्ष होने की राजनीति थी। इस निष्पक्षता का कारण जनता के बुनियादी मुद्दे, देश-निर्माण की संकल्पना, समाजवादी समाज के निर्माण का विचार और किसी भी कीमत पर सत्ता से समझौता न करना शामिल था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब चुनाव हुआ, तो चंद्रशेखर जी अपनी पार्टी से अकेले चुनाव जीते। उसके बाद भी उन्होंने राजनीति में सत्ता को चुनौती देकर जनता की सत्ता के निर्माण में स्वयं को लगाए रखा।

अपने भारत यात्रा के अनुभवों को उन्होंने इस रूप में प्रस्तुत किया है:

“For nearly six months till we reached Delhi on 25 June 1983, it was a continuous procession. It was the spontaneous response of the people which made the Yatra a unique success. For the first time, people realized that there were some who were ready to come to their houses to understand their problems. When we started, it was doubtful whether people would react positively to Bharat Yatra or would take it as a political drama. But all through the Yatra, the villagers who were illiterate, who were ignorant, who were helpless, lined up in large numbers to receive the volunteers who were walking. In almost all the villages, even the poor people managed to offer the best welcome that they could afford. There might have been difficulty of language, but the language of the heart, which was more powerful, helped to communicate the feelings. We ourselves understood that the people are willing to cooperate if we go to them. In this respect, it was Mahatma Gandhi who put his finger on the pulse of the people. It was an adventure in self, it was an adventure of self-education.”

भारत यात्रा का अभियान इस संकल्पना पर आधारित था कि भारत के ग्रामीण जीवन की समस्याओं को समझा जाए और भारत की चुनौतियों का समाधान पाँच प्रमुख बिंदुओं के आधार पर खोजा जाए। ये पाँच बिंदु थे—

• हर गाँव के लिए पेयजल,
• स्वास्थ्य सुविधाएँ तथा बच्चों और गर्भवती माताओं में कुपोषण की रोकथाम के उपाय,
• सबके लिए शिक्षा,
• आदिवासियों और दलितो की समस्याएँ,
• सांप्रदायिक सद्भाव।

भारतीय राजनीति मुख्यतः दो ही तरीकों से पल्लवित और पुष्पित होती रही है—एक पक्ष की राजनीति और दूसरी विपक्ष की राजनीति। इससे अलग, चंद्रशेखर जी निष्पक्ष राजनीति के पैरोकार बने। एक तरफ वह सांप्रदायिक शक्तियों से टकराते रहे, तो दूसरी तरफ पूँजीवादी सत्ता से भी। चंद्रशेखर जी की राजनीति को मैं महाभारत के विदुर की राजनीति के रूप में देखता हूँ। जैसे महाभारत में विदुर सही बात कहते थे, लेकिन उन्हें सुनता कोई नहीं था। कहा जाता है कि यदि विदुर की बात सुन ली गई होती, तो महाभारत युद्ध नहीं होता। क्योंकि वह दासीपुत्र थे, इसलिए लोगों ने उनके ज्ञान को नहीं पहचाना। हालाँकि विदुर धृतराष्ट्र और पांडवों के बीच एक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व थे, फिर भी उनकी बात को पर्याप्त महत्व नहीं मिला।

चंद्रशेखर जी के भीतर निर्भय, निष्पक्ष और नैतिक होने का जो भाव था, वही उनकी राजनीति को हमेशा के लिए प्रेरणादायक बना देता है। उनकी देशज समाजवादी प्रवृत्ति उन्हें एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती थी।

उनकी करुणामयी नेतृत्व-क्षमता के कारण उन्होंने लोगों के दोषों को दरकिनार कर उनके भीतर की क्षमता का उपयोग देश-निर्माण और राजनीतिक परिवर्तन में किया। चंद्रशेखर जी ईर्ष्या-बोध नहीं रखते थे। लोगों को माफ करके और उन्हें प्रेरणा देकर, बुरे लोगों से भी अच्छे कर्म करा लेते थे। वे हमेशा मानते थे कि हम सब लोग तमाम तरह के दोषों से भरे हुए हैं, लेकिन हमारे भीतर जनतंत्र के लिए प्रेम है, और उसी को पल्लवित-पुष्पित करके हम लोकतांत्रिक राष्ट्र-निर्माण की संकल्पना को मूर्त रूप दे सकते हैं।
चंद्रशेखर जी ने अपनी राजनीति के माध्यम से जनतंत्र के भीतर उपस्थित भीड़तंत्र के खतरे को चुनौती दी और सामूहिक हित की बात करके सामूहिक चेतना को प्रेरित किया। जब भी मैं चंद्रशेखर जी जैसे नेताओं के बारे में सोचता हूँ, तो मुझे लगता है कि यह व्यक्तित्व देश की जनता की विरासत है, न कि किसी पार्टी या विचारधारा की बपौती। आज भी जनता के बीच चंद्रशेखर जी की राजनीतिक साधना और विरासत का विशेष महत्व है।

आज जब मैं समाजवादियों की राजनीति को देखता हूँ, तो लगता है मानो विरासत के मूल्य खो गए हैं। लालू यादव, तमाम तरह की सामाजिक न्याय की राजनीति करते हुए भी, परिवारवाद के दोष से ग्रस्त हुए। यही हाल मुलायम सिंह यादव का भी रहा। जॉर्ज फर्नांडिस सांप्रदायिक शक्तियों से हाथ मिला बैठे। स्वयं नीतीश कुमार भी, सामाजिक न्याय के अनेक प्रयोग करते हुए, अंततः ऐसी सरकार को सत्ता-प्राप्ति में मदद करते दिखे, जिसने देश की संप्रभुता और समरसता को कमजोर किया। लेकिन चंद्रशेखर जी हमेशा सच के लिए लड़ते रहे और उन्होंने समाजवादी विरासत को धूमिल नहीं होने दिया। कांग्रेस के भीतर जाकर भी उन्होंने समाजवादी आंदोलन के विचार को नई गति दी।

एक समाजवादी होने के नाते वे हमेशा अनियंत्रित निजीकरण के खिलाफ, एकाधिकार के खिलाफ, और ऐसी वैश्वीकरण प्रक्रिया के खिलाफ आवाज उठाते रहे, जो प्रथम विश्व की पूँजी और तृतीय विश्व के श्रम के बीच असमानता को बनाए रखती है। वे भारत के सार्वजनिक क्षेत्र (PSUs) को सशक्त बनाकर राज्य की शक्ति और क्षमता को देश-निर्माण में लगाना चाहते थे। इसके साथ ही, ग्रामीण भारत और शहरी भारत के बीच जीवन-स्तर की असमानता को भी दूर करना चाहते थे। अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी चंद्रशेखर जी की जबरदस्त समझ थी। तिब्बत मुक्ति की साधना से लेकर सार्क को सशक्त करने की उनकी पहल अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। वह वैज्ञानिक चेतना को बढ़ाने और शैक्षणिक संस्थानों में बेहतर गुणवत्ता लाने के लिए भी प्रेरित किया करते थे। डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा था: “Chandra Shekhar, during his brief tenure as Prime Minister, steered the nation and the economy through stormy waters with statesmanship and wisdom.” उनकी नेतृत्वकारी संगठन-क्षमता और सिद्धांतनिष्ठ राजनीति की प्रवृत्ति चंद्रशेखर जी को भारत के महानतम प्रधानमंत्रियों में से एक के रूप में चिह्नित करती है।

चंद्रशेखर जी हमेशा अपनी राजनीति के दौरान खतरा उठाते रहे, क्योंकि उनका सपना बड़ा था। उसके लिए अनासक्ति जरूरी थी, सत्ता से संघर्ष जरूरी था, और व्यवस्था-परिवर्तन की लड़ाई को ऊर्जा देना जरूरी था। हर कोशिश को सफल करने की साधना में उनकी राजनीति को आज की जनता भी देख सकती है। उनको कभी इस बात की चिंता नहीं रही कि लोग उन्हें कैसे याद करेंगे। उस समय के लिए जो भी संघर्ष उनके सामने दिखाई दिया, उसमें उन्होंने जोखिम उठाकर अपनी भूमिका निभाई।

व्यक्तिगत गुणों से भी व्यक्ति के चरित्र का प्रभाव समझ में आता है। प्रोफेसर राजकुमार जैन और आनंद कुमार जी अपने संस्मरणों में बताते हैं कि चंद्रशेखर जी में अपने सहयोगियों के लिए अत्यंत प्रेम था। वह किसी भी स्तर तक जाकर अपने सहयोगियों की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। इसीलिए संगठन के कार्यकर्ता भी उन पर गहरा विश्वास रखते थे। उन्हें मित्रता बहुत प्रिय थी। अपने पुराने मित्रों को वह बहुत सहेजकर रखते थे। और जो विरासत उन्हें गांधी, आचार्य नरेंद्र देव , लोहिया और जयप्रकाश जी से मिली थी, उसे लेकर भी वे बहुत भावुक और अनुगृहित रहते थे, और हमेशा उन नेताओं की साधना को सफल करने के प्रयास में लगे रहते थे।

लोग कहते हैं कि चंद्रशेखर जी को उन्होंने कभी अपने पिता को याद करते हुए नहीं देखा, लेकिन आचार्य नरेंद्र देव को वह हमेशा याद करते थे। जितना भावपूर्ण जन्मशती समारोह चंद्रशेखर जी के प्रयास से आचार्य नरेंद्र देव का हुआ, उतना शायद ही किसी राष्ट्रीय आंदोलन के नेता का हुआ हो। यह बताता है कि चंद्रशेखर जी व्यक्ति से ज्यादा विचार के ऋणी थे, और वह विचार भारत के विचार का प्रतीक भी था और प्रतिबिंब भी।

आचार्य जी की जन्मशती के समय उन्होंने देश भर के नेताओं को बुलाकर आचार्य जी के सामने शीश झुकवा दिया। ऐसे ही होते हैं विरासत के समाजवादी, जो अपनी समाजवादी विरासत को बड़े शौक और श्रद्धा के साथ सँजोते हैं, जैसे कोई व्यक्ति अपने शरीर पर आभूषण को सहेजकर रखता है। जब भी कोई नेता अपनी विरासत के विचार को इस पवित्रता के साथ महसूस करता है, तो वह सुंदर होता है, सरल होता है, सहज होता है और पवित्र होता है। इसलिए चंद्रशेखर जी के व्यक्तित्व में उस पवित्रता, उस मासूमियत और उस सुंदरता को महसूस किया जा सकता है।चंद्रशेखर जी का निर्मोही व्यक्तित्व उन्हें और भी महान बनाता है। ऐसे राजनेता में कोहिनूर की तरह चमक होती है।

आज चंद्रशेखर जी के प्रशंसकों में हर तरह के विचार को मानने वाले लोग हैं। जो लोग चंद्रशेखर जी के विचारों को मानते हैं, वे तो उन्हें मानते ही हैं, लेकिन जो उनके विचारों से अलग हैं, वे भी उन्हें उतना ही सम्मान देते हैं। जो लोग चंद्रशेखर जी के आखिरी दिनों में उनसे अलग हो गए थे, आज वे भी उनके जन्मशती समारोह को मनाने के लिए उतने ही व्याकुल हैं, जितने उनके अपने लोग।
इसीलिए चंद्रशेखर जी मृत्यु के बाद भी अपने विचार , प्रेम और प्रेरणा से लोगों को प्रेरित करते रहते हैं। चंद्रशेखर जी जीते-जी अपने मुँह से कभी किसी के लिए छोटी बात नहीं किया करते थे, चाहे वह उनका कितना भी बड़ा आलोचक क्यों न हो। इसीलिए जिन्होंने चंद्रशेखर जी के साथ विश्वासघात किया, वे भी आज शर्मिंदा होते हुए उन्हें याद करने से नहीं चूक रहे। चंद्रशेखर जी के विचारों की दृष्टि एक दर्पण भी है। आइए, हम उस दर्पण में अपनी छवि देखें और अपने दोषों से मुक्त होकर समाजवादी समाज का निर्माण करें।

हर विचारक अपनी साधना से अपने वैचारिक गुरु का ऋण चुकाता है। जब यह मौका चंद्रशेखर जी को मिला, तो उन्होंने समाजवादी परंपरा का ऋण चुकाया। आज हम समाजवादियों को उनकी प्रेरणा से जो ऊर्जा मिली है, उसका उपयोग सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक न्याय के संघर्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र-निर्माण की परिकल्पना को मूर्त करने में लगाना चाहिए। यही उनके जन्मशती का आह्वान है। आइए, हम उनके जन्मशती समारोह के लिए गुरुग्राम के भारत यात्रा केंद्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँ।


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