1977 का बजट सेशन चल रहा था। मोरारजी देसाई की सरकार थी। लिम्का और गोल्ड स्पॉट बनाने वाली कंपनी पार्ले के एक प्रतिनिधि ने उनसे बताया कि उनकी सरकार और अमेरिकी पेय कंपनी कोका-कोला के बीच कुछ चल रहा है। शाम को कोका-कोला के एक आदमी ने उनसे बताया कि आपके एक मंत्री को कोका-कोला ने 5 लाख रुपए में खरीद लिया है। उन्होंने यह बात मोरारजी को बताई। उस मंत्री को तो नहीं हटाया गया, लेकिन उसका विभाग बदल दिया गया और उसकी जगह जॉर्ज फर्नांडिस को नया उद्योग मंत्री बनाया गया।
ये शख्स थे समाजवादी नेता मधु लिमये, जिनका इस्तेमाल आरएसएस नहीं कर पाया। लिमये को संसदीय इतिहास के सबसे बड़े संविधानविदों में भी गिना जाता है, जिन्होंने चुनावी राजनीति से स्वेच्छा से दूरी बनाने के बाद एक लेखक के बतौर लोकतांत्रिक चेतना का विस्तार किया था। उन्हें समझना मौजूदा राजनीति को नैतिक पतन के दलदल से निकालने का रास्ता सुझाता है।
‘द लास्ट राइटिंग्स’ उनके अंतिम लेखों का संग्रह है, जो उन्होंने जुलाई 1994 से जनवरी 1995 के बीच विभिन्न अखबारों में लिखे थे। इनमें से कुछ लेख उनके मरने के बाद प्रकाशित हुए थे।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार सत्ता में थी। उस दौरान जनता दल और उसके नेता वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर, रामकृष्ण हेगड़े, एन.टी. रामाराव तथा कांग्रेस की अंदरूनी और व्यक्ति-आधारित राजनीतिक घटनाक्रमों की बहुत पैनी नज़र से व्याख्या की गई है। भाजपा और उसके नेताओं द्वारा फैलाए जा रहे सांप्रदायिक तनाव और कल्याण सिंह पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई सांकेतिक कार्यवाही पर भी अच्छी सामग्री है।
भारतीय विदेश नीति, सोवियत यूनियन के विघटन के बाद अमेरिकी वर्चस्व, चीन और यूरोपियन यूनियन की आंतरिक राजनीति तथा चुनाव आयोग की कार्यशैली और समस्याओं पर सारगर्भित चर्चा है, जिसे तब के अखबारों में पढ़कर सरकार चलाने वालों को भी अपनी प्रतिक्रिया देने की परंपरा की जानकारी होती थी। आज शायद ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
जैन हवाला केस पर उनके लेखों, बदनाम जैन बंधुओं के सुरेंद्र जैन और सीबीआई के पूर्व प्रमुख विजय करण द्वारा उनको लिखे गए पत्र, तथा उनके जवाबी पत्रों से इस समाजवादी नेता की निष्ठा और कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण को महसूस किया जा सकता है। (पेज 128, 132)
मुस्लिम और ईसाई दलितों के आरक्षण की बहुत मजबूत पैरवी भी उन्होंने की थी। वहीं जातिगत जनगणना की जरूरत पर भी उन्होंने 30 साल पहले लिखा था। (पेज 97)
उनकी दूरदर्शिता ही उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाए हुए है। सनद रहे, यह मधु लिमये ही थे जिन्होंने 9 जनवरी 1995 को एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित अपने लेख में कहा था कि, “मैं उम्मीद करता हूं कि गैर-कांग्रेसी सेकुलर पार्टियां अपने उद्देश्यों के प्रति सुसंगत तरीके से मजबूत होंगी, लेकिन देश के एक शुभचिंतक के बतौर मैं एक बेहतर और एकीकृत कांग्रेस पार्टी को देश में सबसे जरूरी मानता हूं।” (पेज 115)
गांधी को पहली और आखिरी बार देखने और उनके विचारों को सुनकर हमेशा के लिए उनका बंदी बन जाना, और गांधीजी की हत्या की खबर इटली की सड़क पर सुबह अखबार बेचने वाले एक लड़के से सुनना—यह वैश्विक स्वीकार्यता का भावात्मक चित्रण है। (पेज 126)
आभार – समता संदेश
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